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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 186 of 307

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Page 186

पातंजल-योगसूत्र १६९

विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥

सूत्रार्थ— अथवा शोक से रहित ज्योतिष्मान् पदार्थ के (ध्यान) से भी (समाधि होती है)।

व्याख्या— यह और एक प्रकार की समाधि है। ऐसा ध्यान करो कि हृदय मे मानो एक कमल है; उसकी पँखुडियाँ अधोमुखी है और उसके भीतर से सुषुम्ना गई है। उसके बाद पूरक करो, फिर रेचक करते समय सोचो कि वह कमल पँखुडियों सहित ऊर्ध्वमुखी हो गया है और कमल के भीतर एक महाज्योति विद्यमान है। उस ज्योति का ध्यान करो।

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥३७॥

सूत्रार्थ— अथवा जिस हृदय ने इन्द्रिय-विषयों के प्रति समस्त आसक्ति छोड़ दी है, (उसके ध्यान से भी चित्त स्थिर होता है)।

व्याख्या— किन्ही महापुरुष या साधु को लो, जो पूर्ण रूप से अनासक्त हो और जिन पर तुम्हारी अत्यन्त श्रद्धा हो। उनके हृदय के बारे मे चिन्तन करो। उनका अन्त करण सर्व विषयों में अनासक्त हो गया है, अत उनके अन्त करण के बारे मे चिन्तन करने पर तुम्हारा अन्त करण शान्त हो जायगा। यदि यह न कर सको, तो और एक उपाय है —

स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥

सूत्रार्थ— अथवा स्वप्नावस्था में कभी-कभी जो अपूर्व ज्ञान-लाभ होता है, उसका, तथा सुषुप्ति अवस्था में प्राप्त सात्त्विक सुख का ध्यान करने से भी (चित्त प्रशान्त होता है)।

व्याख्या— कभी-कभी मनुष्य ऐसा स्वप्न देखता है कि उसके पास देवता आकर बातचीत कर रहे हैं; वह मानो एक प्रकार से भावावेश में चूर हो गया है, वायु में एक अपूर्व संगीत