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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 199 of 307

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Page 199

१८२ राजयोग

पुस्तक का पाठ नही, वरन् उन ग्रन्थो का पाठ, जो यह शिक्षा देते है कि आत्मा की मुक्ति कैसे होती है। फिर स्वाध्याय से तर्क या विचारात्मक पुस्तक का पाठ नही समझना चाहिए। जो योगी है, वे तो विचार आदि करके तृप्त हो चुके रहते है, विचार मे उनकी और कोई रुचि नही रह जाती। वे पठन-पाठन करते है केवल अपनी धारणाओ को दृढ करने के लिए। शास्त्रीय ज्ञान दो प्रकार के है। एक है वाद (जो तर्क-युक्ति और विचारात्मक है), और दूसरा है सिद्धान्त (मीमासात्मक)। अज्ञानावस्था मे मनुष्य प्रथमोक्त प्रकार के शास्त्रीय ज्ञान के अनुशीलन में प्रवृत्त होता है, वह तर्क-युद्ध के समान है—प्रत्येक वस्तु के सब पहलू देखकर विचार करना, इस विचार का अन्त होने पर वह किसी एक मीमासा या सिद्धान्त पर पहुँचता है। किन्तु केवल सिद्धान्त पर पहुँचने से नही हो जाता। इस सिद्धान्त के बारे मे मन की धारणा को दृढ करना होगा। शास्त्र तो अनन्त है और समय अल्प है, अत ज्ञान-प्राप्ति का रहस्य है—सब वस्तुओ का सार भाग ग्रहण करना। उस सार भाग को ग्रहण करो और उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करो। भारतवर्ष में एक पुरानी किम्बदन्ती है कि यदि तुम किसी राजहस के सामने एक कटोरा भर पानी मिला हुआ दूध रख दो तो वह दूध-दूध पी लेगा और पानी छोड देगा। उसी प्रकार ज्ञान का जो अश आवश्यक है, उसे लेकर असार भाग को हमें फेंक देना चाहिए। पहले-पहल बुद्धि की कसरत आवश्यक होती है। अन्धे के समान कुछ भी ले लेने से नही बनता। पर जो योगी है, वे इस तर्क-युक्ति की अवस्था को पार कर एक ऐसे सिद्धान्त पर पहुँच चुके है, जो पर्वत के समान अचल-अटल