राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातजल-योगसूत्र १७५
समष्टिस्वरूप), अहकार, महत्तत्त्व (जो समूचे व्यक्त जगत् का कारण है), सत्त्व, रज और तम की साम्यावस्थारूप प्रधान, प्रकृति या अव्यक्त—ये सभी सूक्ष्म वस्तु के अन्तर्गत हैं। केवल पुरुष अर्थात् आत्मा ही इसके भीतर नहीं आती।
ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥
सूत्रार्थ—ये सभी सबीज समाधि हैं।
व्याख्या—इन सब समाधियों में पूर्वकर्मों का बीज नष्ट नहीं होता, अत उनसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती। तो फिर उनसे होता क्या है? यह आगे के सूत्र मे बतलाया गया है।
निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥
सूत्रार्थ—निर्विचार समाधि की निर्मलता होने पर चित्त की स्थिति दृढ़ हो जाती है।
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥
सूत्रार्थ—उसमें जिस ज्ञान की प्राप्ति होती है, उसे ऋतम्भर यानी सत्यपूर्ण ज्ञान कहते हैं।
व्याख्या—अगले सूत्र में इसकी व्याख्या होगी।
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥४९॥
सूत्रार्थ—जो ज्ञान विश्वस्त मनुष्यों के वाक्य और अनुमान से प्राप्त होता है, वह साधारण वस्तु विषयक होता है। जो सब विषय आगम और अनुमान से उत्पन्न ज्ञान के गोचर नहीं हैं, वे पूर्वोक्त समाधि द्वारा प्रकाशित होते हैं।
व्याख्या—तात्पर्य यह है कि हमें सामान्य वस्तुओं का ज्ञान प्रत्यक्ष अनुभव, उस पर स्थापित अनुमान और विश्वस्त मनुष्यों के वाक्यों से होता है। 'विश्वस्त मनुष्यों' से योगियों का तात्पर्य है 'ऋषिगण', और ऋषि का अर्थ है—वेद में वर्णित