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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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१६८ | राजयोग

लिए सर्वथा नवीन है, इसीलिए उसके चिन्तन से मस्तिष्क में नई प्रणालियाँ तैयार होती रहती हैं, जिससे सारा शरीर ही मानो उलट-पलट जाता है। यही कारण है कि साधन करते समय साधारण मनुष्य पहले-पहल अपने मार्ग से विच्युत हो जाता है। इन विघ्न-बाधाओ को यथासम्भव कम करने के लिए ही पतंजलि ने इन सब उपायो का आविष्कार किया है, ताकि हम उनमें से ऐसी किसी एक साधनप्रणाली को चुनकर अपना लें, जो हमारे लिए सर्वथा उपयोगी हो।

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ॥३५॥

सूत्रार्थ—जिन सब समाधियो में अलौकिक इन्द्रिय-विषयों की अनुभूति होती है, वे मन की स्थिति का कारण होती हैं।

व्याख्या—यह बात धारणा अर्थात् एकाग्रता से अपने-आप आती रहती है, योगीगण कहते हैं कि यदि नासिका के अग्र भाग मे मन को एकाग्र किया जाय, तो कुछ दिनो में ही अद्भुत सुगन्धि का अनुभव होने लगता है। इसी प्रकार जिह्वामूल में मन को एकाग्र करने पर सुन्दर शब्द सुनाई देता है। जिह्वाग्र में ऐसा करने पर दिव्य रसास्वादन होता है। जिह्वा के बीच में संयम करने पर प्रतीत होता है कि मैने मानो किसी एक वस्तु का स्पर्श किया। तालु मे संयम करने पर दिव्य रूप दीख पडते हैं। यदि कोई अस्थिरचित्त व्यक्ति इस योग के कुछ साधनो का अवलम्बन करना चाहे और फिर भी उनकी सच्चाई में सन्दिग्ध-चित्त हो, तो कुछ दिन साधन करने के बाद, ये सब अनुभूतियाँ होने पर, फिर उसे सन्देह नही रहेगा। तब फिर वह अध्यवसाय के साथ साधन करता रहेगा।