मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
About this granth
This is Bharatendu Harishchandra's Hindi rendering of Vishakhadatta's Sanskrit play Mudrarakshasa (मुद्राराक्षस). Bharatendu (1850–1885), often called the father of modern Hindi literature, described it as a remarkable drama on politics, and his translation is one of the important early works of Hindi theatre.
The play follows Chanakya's scheme, after the fall of the Nanda dynasty, to bring the Nanda minister Rakshasa over to Chandragupta's side. The cast list names Chandragupta, Rakshasa, Chanakya, Malayaketu, Chanakya's agent Siddharthaka, Rakshasa's friend the jeweller Chandanadasa, Shakatadasa, and the spy Viradhagupta disguised as a snake-charmer.
This printing was compiled by Babu Ramdin Singh, editor of the Kshatriya Patrika, published by Rai Ramranvijay Singh Bahadur and printed at the Khadgavilas Press, Bankipur; the title page marks it as the eighth printing and carries the year 1925. Bharatendu dedicated the work to Raja Shivaprasad "Sitara-e-Hind". At about 173 pages, it shows the Hindi of the Bharatendu era and its approach to translating Sanskrit drama.
७० मुद्राराक्षस—
राक्षस ।—तो अब हम भी चल कर करभक को कुसुमपुर भेजें (उठता है)। अहा ! क्या उस मृतक चाणक्य से चन्द्रगुप्त से बिगाड़ हो जायगा, क्यों नही ? क्योंकि सबै कामों को सिद्ध ही देखता हूं ।
५ चन्द्रगुप्त निज तेज बल, करत सबन को राज ।
तेहि समझत चाणक्य यह, मेरो दियो समाज ॥
अपनो २ करि चुके, काज रह्यो कछु जौन।
अब जौ आपस मे लडें, तौ बड अचरज कौन ॥
(जाता है)
१० ॥ इति द्वितीयाङ्क ॥
तृतीय अंक
(स्थान—राजभवन की अटारी)
कंचुकी आता है।
कंचुकी।— हे रूप आदिक विषय जो राखे हिये बहु लोभ सों।
सो मिटे इन्द्रीगन सहित ह्वै सिथिल अतिही छोभ सों॥ ५
मानत कह्यौ कोउ नाहि सब अङ्ग अङ्ग ढीले ह्वै गए।
तौहू न तृश्ने ! क्यों तजत तू मोहि बूढोह भए॥
(आकाश की ओर देख कर) अरे। अरे। सुगांगप्रसाद के लोगो! सुनो। महाराज चन्द्रगुप्त ने तुम लोगों को यह आज्ञा दी है कि कौमुदी-महोत्सव के होने से परम शोभित १० कुसुमपुर को मै देखना चाहता हूं, इस से उस अटारी को बिछौने इत्यादि से सज रक्खो, देर क्यों करते हो। (आकाश की ओर देख कर) क्या कहा? कि क्या महाराज चन्द्रगुप्त नही जानते कि कौमुदी-महोत्सव अब की न होगा? दुर दइमारो! क्या मरने को लगे हो? शीघ्रता करो। १५
कवित्त।
बहु फूल की माल लपेट कै खंभन धूप सुगंध सों ताहि धुपाइये। तापे चहुं दिस चंद छुपा से सुसोभित चौर घने लटकाइये॥ भार सों चारु सिहासन के मुरछा मे धरा परी धेनु सी पाइये। छींटि के तापैं गुलाब मिल्यौ जल चन्दन ता २० कह जाइ जगाइये॥
(आकाश की ओर देख कर) क्या कहते हो—कि हम लोग अपने काम मे लग रहे हैं? अच्छा २ झटपट सब सिद्ध करो, देखो! वह महाराज चन्द्रगुप्त आ पहुंचे।
७२ मुद्राराक्षस—
बहु दिन श्रम करि नन्द नृप बह्यो राज धुर जौन ॥
बालेपन ही मे लियो, चन्द सोस निज तौन ॥
डिगत न नेकहु विषम पथ, दृढ़ प्रतिज्ञ दृढ़ गात ॥
गिरत चहत सम्हरत बहुरि, नेकु न जिय घबरात ॥
५ (नेपथ्य मे) इधर महाराज इधर ।
(राजा और प्रतिहारी आते हैं)
राजा ।—(आप ही आप) राज उसी का नाम है जिस में अपनी आज्ञा चले, दूसरे के भरोसे राज करना भी एक बोझा ढोना है। क्योंकि—
१० जो दूजे को हित करै, तौ खोवै निज काज ।
जौ खोयो निज काज तौ, कौन बात को राज ॥
दूजे हो को हित करै, तौ वह परबस मूढ़ ।
कठपुतरी सो स्वाद कछु, पावै कबहु न कूंढ़ ॥
और राज्य पाकर भी इस दुष्ट राजलक्ष्मी का सम्हालना
१५ बहुत कठिन है। क्योंकि—
कूर सदा भाखत पियहि, चञ्चल सहज सुभाव ।
नर गुन औगुन नहि लखत, सजन खल सम भाव ॥
डरत सूर सौं भीरु कह, गिनत न कछु रति*हीन ।
बारनारि अरु लच्छमी, कहौ कौन बस कीन ॥
२० यद्यपि गुरु ने कहा है कि तू झूठी कलह कर के स्वतन्त्र हो कर अपना प्रबन्ध आप कर ले, पर यह तो बड़ा पाप सा है। अथवा गुरुजी क उपदेश पर चलने से हम लोग तो सदा ही स्वतन्त्र हैं।
जब लौं बिगारै काज नहि तब लौं न गुरु कछु तेहि कहै ।
२५ पै शिष्य जाइ कुराह तौ गुरु सीस अंकुस ह्नै रहै ॥
* रति का यहां प्रीति अर्थ है।
तृतीय अङ्क । ७३
तृतीय अङ्क । ७३
तासों सदा गुरु वाक्य बस हम नित्य पर आधीन हैं ।
निर्लोभ गुरु से सन्त जनही जगत मे स्वाधीन हैं ॥
(प्रकाश) अजी बैहीनार ! " सुगांगप्रसाद " का मार्ग दिखाओ ।
कंचुकी ।—इधर आइये महाराज उधर । ५
राजा ।—( आगे बढ़ता है ) ।
कंचुकी ।—महाराज ! सुगांगप्रसाद की यहीं सीढ़ी है ।
राजा ।—( ऊपर चढ़ कर ) अहा ! शरद् ऋतु की शोभा से सब दिशाए कैसी सुन्दर हो रही हैं !
सरद विमल ऋतु सोहई, निरमल नील अकास । १०
निसानाथ पूरन उदित, सोलह कला प्रकास ॥
चारु चमेली बन रही, महमह महँकि सुबास ।
नदी तीर फूले लखौ, सेत सेत बहु कास ॥
कमल कुमोदिनि सरन मे, फूले सोभा देत ।
भौँर वृन्द जापै लखौ, गूंजि गूंजि रस लेत ॥ १५
बसन चांदनी चन्द्रमुख, उडुगन मोती माल ।
कास फूल मधु हास यह, सरद् किधौं नव बाल ॥
( चारो ओर देख कर ) कंचुकी ! यह क्या ? नगर मे "चन्द्रिकोत्सव" कही नही मालूम पड़ता; क्या तू ने सब लोगों से ताकीद कर के नही कहा था कि उत्सव होय ? २०
कंचुकी ।—महाराज ! सब से ताकीद कर दी थी ।
राजा ।—तो फिर क्यों नही हुआ ? क्या लोगों ने हमारी आज्ञा नही मानी ?
कंचुकी ।—( कान पर हाथ रख कर ) राम राम ! भला नगर क्या, इस पृथ्वी में ऐसा कौन है जो आप की आज्ञा न मानै ? २५
७४ मुद्राराक्षस—
राजा।—तो फिर चन्द्रिकोत्सव क्यों नही हुआ ? देख न—
गज रथ बाजि सजे नही, बँधी न बन्दनवार ।
तने बितान न कहुँ नगर, रजित कहूं न द्वार ॥
नर नारी डोलत न कहुँ, फूल माल गल डार ।
५ > नृत्य बाद धुनिगीत नहि, सुनियत श्रवन मंझार ॥
कंचुकी।—महाराज ! ठीक है—ऐसा ही है।
राजा।—क्यो ऐसा ही है ?
कंचुकी।—महाराज योंही है ।
राजा।—स्पष्ट क्यों नही कहता ?
१० कंचुकी।—महाराज ! चन्द्रिकोत्सव बन्द किया गया है।
राजा।—( क्रोध से ) किस ने बन्द किया है ?
कंचुकी।—( हाथ जोड़ कर ) महाराज ! यह मै नही कह सकता ।
राजा।—कही आर्य्य चाणक्य ने तो नही बन्द किया ?
१५ कंचुकी।—महाराज ! और किस को अपने प्राणों से शत्रुता करनी थी ?
राजा।—( अत्यन्त क्रोध से ) अच्छा, अब हम बैठेंगे ।
कंचुकी।—महाराज ! यह सिहासन है, विराजिए ।
राजा।—(बैठ कर क्रोध से) अच्छा, कंचुकी ! आर्य्य चाणक्य से कह कि "महाराज आपका देखा चाहते हे।"
२० कंचुकी।—जो आज्ञा ( बाहर जाता हे )।
( एक ओर परदा उठता है और चाणक्य बैठा हुआ दिखाई पड़ता है । )
चाणक्य।—( आप ही आप ) दुष्ट राक्षस हमारी बराबरी करता है, वह जानता है कि—
२५ > जिमि हम नृप अपमान सों, महा क्रोध उर धारि।
करी प्रतिज्ञा नन्द नृप, नासन की निरधारि ॥
तृतीय अङ्क । ७५
तृतीय अङ्क । ७५
सो नृप नन्द हि पुत्र सह नासि करी हम पूर्ण ।
चन्द्रगुप्त राजा कियो, करि राक्षस मद चूर्ण ॥
तिमि सोऊ मोहि नीति बल, छलन चहत हति चन्द ।
पे मो आछुत यह जतन, वृथा तासु अति मन्द ॥
(ऊपर देख कर क्रोध से) अरे राक्षस ! छोड़ छोड़ यह ५
व्यर्थ का श्रम, देख—
जिमि नृप नन्दहि मारि कै, वृषलहि दीनों राज ।
आइ नगर चाणक्य किय, दुष्ट सर्प सो काज ॥
तिमि सोऊ नृप चन्द्र सों, चाहत करन बिगार ।
निज लघु मति लाघ्यौ चहत, मो बल बुद्धि पहार ॥ १०
(आकाश की ओर देख कर) अरे राक्षस ! मेरा पीछा छोड़
क्योंकि—
राज काज मन्त्री चतुर, करत बिना अभिमान ।
जैसो तुव नृप नन्द हो, चन्द्र न तौन समान ॥
तुम कछु नहि चाणक्य जो, साध्यौ कठिनहु काज । १५
तासों हम सों बैर करि, नहि सरि है तुव राज ॥
अथवा इस मे तो मुझे कुछ सोचना ही न चाहिये । क्योंकि—
मम भागुरायण आदि भृत्यन मलय राख्यो घेरिकै ।
तिमि गए सिद्धार्थक ऐहैं तेउ काज निबेरिकै ॥
अब लखहु करि छल कलह नृपसों भेद बुद्धि उपाइकै । २०
पर्ब्बत जनन सों हम बिगारत राक्षस हि उलटाइकै ॥
कञ्चुकी ।—हा ! सेवा बड़ी कठिन होती है ।
नृप सों सचिव सों सब मुसाहेब गनन सों डरते रहै ।
पुनि विटहु जे अति पास के तिनकौ कह्यौ करते रहै ॥
मुख लखत बीतत दिवस निसि भय रहत सकित प्रानहै । २५
निज उदर पूरन हेतु सेवा श्वान वृत्ति समान है ॥
७६ मुद्राराक्षस—
[ चारों ओर घूम कर देख कर ]
अहा ! यही आर्य्य चाणक्य का घर है तो चल (कुछ आगे
बढ कर और देख कर)।
अहाहा ! यह राजाधिराज श्रीमन्ती जी के घर की सम्पत्ति
५ है। जो—
कहु परे गोमय शुष्क कहु सिल परी सोभा दै रही।
कहु तिल कह जव रासिलागी बटुन जा भिक्षा लही॥
कहु कुस परे कह समिध सूखत भार सों ताके नयो।
यह लखौ छप्पर महा जरजर होइ कैसो झुकि गयो॥
१० महाराज चन्द्रगुप्त के भाग्य से ऐसा मन्त्री मिला है—
बिन गुनहु के नृपन कों, धन हित गुरुजन धाइ।
सुखो मुख करि झूठही, बहु गुन कहहि बनाइ॥
पै जिन को तृष्णा नही, ते न लबार समान।
तिन सों तृन सम धनिक जन, पावत कबहू न मान॥
१५ (देख कर डर से) अरे आर्य्य चाणक्य यहा बैठे हैं,
जिन्होंने—
लोक धरणि चन्द्रहि कियो, राजा, नन्द गिराइ।
होत प्रात रवि के कढत, जिमि ससि तेज नसाइ॥
(प्रगट दण्डवत् कर के) जय हो ! आर्य्य की जय हो ! !
२० चाणक्य ।—(देख कर) कौन है वेहोनर ! क्यो आया है ?
कंचुकी ।—आर्य्य ! अनेक राजगण क मुकुट माणिक्य से
सर्वदा जिन के पदतल लाल रहते है उन महाराज चन्द्रगुप्त
ने आप के चरणो मे दण्डवत् कर के निवेदन किया है
कि ‘यदि आप क किसी कार्य्य मे विघ्न न पड तो मै
२५ आप का दर्शन किया चाहता हूं।”
चाणक्य ।—वेहीनर ! क्या वृषल मुझे देखा चाहता है ? क्या
मै ने कौमुदी महोत्सव का प्रतिषेध कर दिया है यह वृषल
नही जानता ?
तृतीय अङ्क । ७९
तृतीय अङ्क । ७९
कञ्चुकी ।—आर्य्य, क्यों नही ।
चाणक्य ।—( क्रोध से ) है ? किस ने कहा बोल तो ?
कञ्चुकी ।—( भय से ) महाराज प्रसन्न हों, जब सुगांगप्रसाद की अटारी पर गए थे तो देख कर महाराज ने आप ही जान लिया कि कौमुदी-महोत्सव अबकी नही हुआ । ५
चाणक्य ।—अरे ठहर, मैं ने जाना यह तुम्ही लोगों ने वृषल का जी मेरी ओर से फेर कर उसे चिढ़ा दिया है, और क्या ।
कञ्चुकी ।—( भय से नीचा मुंह कर के चुप रह जाता है । )
चाणक्य ।—अरे राज के कारबारियों का चाणक्य के ऊपर बड़ा ही विद्वेष पक्षपात है । अच्छा, वृषल कहा है ? १० बता ।
कञ्चुकी ।—( डरता हुआ ) आर्य्य ! सुगांगप्रसाद की अटारी पर से महाराज ने मुझे आप के चरणो मे भेजा है ।
चाणक्य ।—(उठकर) कञ्चुकी ! सुगांगप्रसाद का मार्ग बता ।
कञ्चुकी ।—इधर महाराज ( दोनों घूमते हैं ) । १५
कञ्चुकी ।—महाराज ! यह सुगांगप्रसाद की सीढ़ियां हैं, चढ़ें ।
( दोनों सुगांगप्रसाद पर चढते हैं और चाणक्य के घर का परदा गिर के छिप जाता है । )
चाणक्य ।—( चढ़ कर और चन्द्रगुप्त को देख कर प्रसन्नता से आप ही आप ) अहा ! वृषल सिंहासन पर बैठा है— २०
हीन नन्द सो रहित नृप, चन्द्र करत जेहि भोग ।
परम होत सन्तोष लखि, आसन राजा जोग ॥
( पास जाकर ) जय हो वृषल की !
चन्द्रगुप्त ।—(उठ कर और पैरों पर गिर कर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त दण्डवत् करता है । २५
चाणक्य ।— ( हाथ पकड़ कर उठाकर ) उठो बेटा ! उठो ।
'जहँ लो हिमालय के शिखर सुरधनी कन सीतल रहै ।
७८ मुद्राराक्षस-
जहँ लो विविध मणिखण्ड मंडित समुद्र दक्षिणदिसि बहै ॥
तहँ लो सबै नृप आइ भय सों तोहि सीस झुकावहीँ ।
तिनके मुकुट मणि रँगे तुव पद निरखि हम सुख पावही ॥
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप की कृपा से ऐसा ही हो रहा है।
५ बैठिए।
(दोनों यथास्थान बैठते हैं)
चाणक्य।—वृषल ! कहो, मुझे क्यों बुलाया है ?
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य के दर्शन से कृतार्थ होने को।
चाणक्य।—[हस कर] भया, बहुत शिष्टाचार हुआ, अब
१० बताओ क्यो बुलाया है ? क्योंकि राजा लोग किसी को बेकाम नहीं बुलाते।
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप ने कौमुदी महोत्सव के न होने से क्या फल सोचा है ?
चाणक्य।—[हस कर] तो यही उलाहना देने को बुलाया
१५ है न ?
चन्द्रगुप्त।—उलाहना देने को कभी नही।
चाणक्य।—तो क्यों ?
चन्द्रगुप्त।—पूछने को।
चाणक्य।—जब पूछना ही है तब तुम को इससे क्या ? शिष्य
२० को सर्व्वदा गुरु की रुचि पर चलना चाहिए।
चन्द्रगुप्त।—इस मे कोई सन्देह नही पर आप की रुचि बिना प्रयोजन नही प्रवृत्त होती, इस से पूछा।
चाणक्य।—ठीक है तुम ने मेरा आशय जान लिया, बिना प्रयोजन के चाणक्य की रुचि किसी ओर कभी फिरती
२५ ही नही।
चन्द्रगुप्त।—इसी से तो सुनने बिना मेरा जी अकुलाता है।
चाणक्य।—सुनो, अर्थशास्त्रकारों ने तीन प्रकार के राज्य लिखे हैं—एक राजा के भरोसे, दूसरा मन्त्री के भरोसे, तीसरा
तृतीय अङ्क । ७६
तृतीय अङ्क । ७६
राजा और मन्त्री दोनों के भरोसे, सो तुम्हारा राज तो केवल सचिव के भरोसे है, फिर इन बातों के पूछने से क्या ? व्यर्थ मुह दुखाना है, यह सब हम लोगों के भरोसे है, हम लोग जानें ।
( राजा क्रोध से मुह फेर लेता है )
( नेपथ्य में दो वैतालिक गाते हैं )
प्रथम वै० ।—( राग बिहाग ) अहो यह शरद शम्भु ह्वै आई ।
कास फूल फूले चहु दिसि ते सोइ मनु भस्म लगाई ॥
चन्द उदित सोइ सीस अभूषण सोभा लगत सुहाई ।
तासों रजित घन पटली सोइ मनु गज खाल बनाई ॥
फूले कुसुम मुण्ड माला सोइ सोहत अति धवलाई ।
राजहंस सोभा सोइ मानों हास विभव दरसाई ॥
अहो यह शरद शम्भु बनि आई ।
( और भी )
( राग कलिगड़ा ) हरौ हरि नयन तुम्हारी बाधा ।
सरदागम लखि सेस अंक तैं जगे जगत शुभ साधा ।
कछु कछु खुले मुदे कछु सोभित आलस भरि अनियारे ॥
अरुन कमल से मद के माते थिर भे जदपि डरारे ॥
सेस सीस मनि चमक चकौंधन तनिकहु नहि सकुचाही ।
नींद भरे श्रम जगे चुभत जे नित कमला उर माही ॥
हरौ हरि नैन तुम्हारी बाधा ।
दूसरा वै० ।—( कड़खे की चाल में )
अहो, जिन कों बिधि सब जीव सों, बढ़ि दीनो जग काज ।
अरे, दान सलिल वारे सदा जे जीतहि गजराज ॥
अहो, झुक्यो न जिन को मान ते, नृपवर जग सिरताज ।
अरे, सहहि न आज्ञा भग जिमि दन्तपात मृगराज ॥
८० मुद्राराक्षस—
( और भी )
अरे, केवल बहु गहिना पहिरि राजा होइ न कोय ।
अहो, जाकी नहि आज्ञा टरै, सो नृप तुम सम होय ॥
चाणक्य ।—( सुन कर आप ही आप ) भला पहिले ने तो
५ देवता रूप शरद के वर्णन मे आशीर्वाद दिया, पर इस
दूसरे ने क्या कहा ? [कुछ सोच कर ] अरे जाना, यह
सब राक्षस की करतूत है । अरे दुष्ट राक्षस ! क्या तू नहीं
जानता कि अभी चाणक्य सो नहीं गया है ?
चन्द्रगुप्त ।—अजो वैहीनर ! इन दोनों गानेवालों को लाख
१० लाख मोहर दिलवा दो ।
वैहीनर ।—जो आज्ञा महाराज ( उठ कर जाना चाहता है ) ।
चाणक्य ।—वैहीनर, ठहर अभी मत जा । वृषल, यह अर्थ
कुपात्र को इतना क्यों देते हो ?
चन्द्रगुप्त ।—आप मुझे सब बातों में योंही रोक दिया करते
१५ ह, तब यह मेरा राज क्या है वरन उलटा बन्धन है ।
चाणक्य । - वृषल ! जो राजा आप असमर्थ होते हैं उन म
इतना ही तो दोष है, इस से जो ऐसी इच्छा हो तो तुम
अपने राज का प्रबन्ध आप कर लो ।
चन्द्रगुप्त । बहुत अच्छा, आज से मैं ने सब काम सम्हाला ।
२० चाणक्य ।—इस से अच्छी और क्या बात है, तो मे भी
अपने अधिकार पर सावधान हू ।
चन्द्रगुप्त ।—जब यही है तो पहिले मै पूछता ह कि कौमुदी-
महोत्सव का निषेध क्यों किया गया ?
चाणक्य ।—मै भी यही पूछता हू कि उस के होने का प्रयोजन
२५ क्या था ?
चन्द्रगुप्त ।—पहिले तो मेरी आज्ञा का पालन ।
तृतीय अङ्क । ८१
तृतीय अङ्क । ८१
चाणक्य।—में ने भी आप की आज्ञा के अपालन के हेतु ही कौमुदी महोत्सव का प्रतिषेध किया ।
क्योंकि—
आइ चारहू सिन्धु के, छोरहु के भूपाल ।
जो सासन सिर पै धरैं जिमि फूलन की माल ॥ ५
तेहि हम जौ कछु टारही, सोउ तुव हित उपदेश ।
जासों तुमरो विनय गुन, जग मै बढ़ै नरेस ॥
चन्द्रगुप्त।—और जो दूसरा प्रयोजन है वह भी सुनूं ।
चाणक्य।—वह भी कहता हूं ।
चन्द्रगुप्त।—कहिए । १०
चाणक्य।—शोणोत्तरे ! अचलदत्त कायस्थ से कहो कि तुम्हारे पास जो भद्रभट इत्यादिकों का लेखपत्र है वह मागा है ।
प्र०।—जो आज्ञा ( बाहर से पत्र लाकर देती है ) ।
चाणक्य।—वृषल ! सुनो । १५
चन्द्रगुप्त।—में उधर ही कान लगाए हूं ।
चाणक्य।—( पढता है ) स्वस्ति परम प्रसिद्ध नाम महाराज श्री चन्द्रगुप्त देव के साथी जो अब उन को छोड़ कर कुमार मलयकेतु के आश्रित हुए हैं उन का यह प्रतिज्ञापत्र है । पाहला गजाध्यक्ष, भद्रभट, अश्वाध्यक्ष, पुरुषदत्त, २० महाप्रतिहार चन्द्रभानु का भानजा हिंगुरात, महाराज के नातेदार महाराज बलगुप्त, महाराज के लड़कपन का सेवक राजसेन, सेनापति सिंहबलदत्त का छोटा भाई भागुरायण, मालवे के राजा का पुत्र रोहिताक्ष और क्षत्रियों में सब से प्रधान विजयवर्मा (आप ही) ये हम सब लोग यहां २५ महाराज का काम सावधानी से साधते है (प्रकाश) यही इस पत्र में लिखा है । सुना ?
८० मुद्राराक्षस-
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! मे इन सबों के उदास होने का कारण सुनना चाहता हूं ।
चाणक्य ।—वृषल ! सुनो—वह जो गजाध्यक्ष और अश्वाध्यक्ष थे वह रात दिन मद्य, स्त्री और जूआ में डूब कर अपने काम से निरे बेसुध रहते थे इस से मैं ने उन से अधिकार लेकर केवल निर्वाह के योग्य जीविका कर दी थी, इस से उदास हो कर कुमार मलयकेतु के पास चले गए और वहा अपना अपना कार्य्य सुना कर फिर उसी पद पर नियुक्त हुए हैं, और हिङ्गुगत और बलगुप्त ऐसे लालची हैं कि कितना भी दिया पर अन्त मे मारे लालच के कुमार मलयकेतु के पास इस लोभ से जा रहे कि यही बहुत मिलेगा, और जो आप का लड़कपन का सेवक राजसेन था उस ने आप की थोडी ही कृपा से हाथी, घोड़ा, घर और धन सब पाया, पर इस भय से भाग कर मलयकेतु के पास चला गया कि यह सब छिन न जाय, और वह जो सिंह-बलदत्त सेनापति का छोटा भाई भागुरायण है उस से पर्व्वतक से बड़ी प्रीति थी सो उस ने कुमार मलयकेतु से यह कहा कि “जैसे विश्वासघात कर के चाणक्य ने तुम्हारे पिता को मार डाला वैसे ही तुम्हे भी मार डालेगा इस से यहा से भाग चलो”, ऐसे ही बहकाकर कुमार मलयकेतु को भगा दिया और जब आप के बैरी चन्दनदासादिकों को दण्ड हुआ तब मारे डर के मलयकेतु के पास जा रहा, उस ने भी यह समझ कर कि इस ने मेरे प्राण बचाए और मेरे पिता का परिचित भी है उस को कृतज्ञता से अपना अन्तरंगी मन्त्री बनाया है, और वह जो रोहिताक्ष और विजयवर्म्मा थे वह ऐसे अभिमानी थे कि जब आप उन के और नातेदारों का आदर करते थे तो वह कुढ़ते थे,
तृतीय अङ्क । ८३
तृतीय अङ्क । ८३
इसी से वे भी मलयकेतु के पास चले गए, बस, यही उन लोगों की उदासी का कारण है ।
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! जब इन सब के भागने का उद्यम जानते ही थे तो क्यो न रोक रक्खा ?
चाणक्य ।—ऐसा कर नही सके । ५
चन्द्रगुप्त ।—क्या आप इस मे असमर्थ हो गए वा कुछ उस मे भी प्रयोजन था ?
चाणक्य ।—असमर्थ कैसे हो सकते हैं ? उस मे भी कुछ प्रयोजन ही था ।
चन्द्रगुप्त ।— आर्य्य ! वह प्रयोजन मै सुना चाहता हूं । १०
चाणक्य ।—सुनो और भूल मत जाओ ।
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! मै सुनता हई हूं, भूलूगा भी नही, कहिए ।
चाणक्य ।—अब जो लोग उदास हो गए हैं या बिगड़ गए हैं उन के दो ही उपाय हैं, या तो फिर से उन पर अनुग्रह १५ करें या उन को दण्ड दें और मद्रभट, पुरुषदत्त से जो अधिकार ले लिया गया है तो अब उन पर अनुग्रह यही है कि फिर उन को उन का अधिकार दिया जाय, और यह हो नही सकता, क्योंकि उन को मृगया, मद्यपानादिक का जो व्यसन है इस से इस योग्य नही हैं कि हाथी, २० घोड़ों को सम्हाले और सब सेना की जड़ हाथी, घोड़े ही हैं । वैसे ही हिगुरात, बलगुप्त को कौन प्रसन्न कर सकता है, क्योंकि उन को सब राज्य पाने से भी सन्तोष न होगा, और राजसेन भागुरायण तो धन और प्राण के डर से भागे हैं; ये तो प्रसन्न होई नही सकत, और रोहिताक्ष, २५ विजयवर्म्मा का तो कुछ पूछना ही नही है, क्योकि वे तो और नातेदारों के मान से जलते हैं और उन का
८४ मुद्राराक्षस—
कितना भी मान करो, उन्हे थोड़ा ही दिखलाता है, तो
इस का क्या उपाय है। यह तो अनुग्रह का वर्णन हुआ,
अब दण्ड का सुनिये, कि यदि हम इन सबों को प्रधान
पद पाकर क जो बहुत दिनों से नन्दकुल के सर्व्वदा
५ शुभाकांक्षी और साथी रहे दण्ड दे कर दुखी करें
तो नन्दकुल के साथियों का हम पर से विश्वास
उठ जाय इस से छोड ही देना योग्य समझा, सो
उन्हीं सब हमारे भृत्यों के पक्षपाती बन कर राक्षस के
उपदेश से म्लेच्छराज की बडी सहायता पा कर और अपने
१० पिता के वध से क्रोधित हो कर पर्व्वतक का पुत्र
कुमार मलयकेतु हम लोगों से लड़ने को उद्यत हो रहा
है, सो यह लड़ाई के उद्योग का समय है उत्सव का
समय नही। इस से गढ के सस्कार के समय कौमुदी
महोत्सव क्या होगा, यही सोच कर उस का प्रतिषेध
कर दिया।
१५ **चन्द्रगुप्त ।—**आर्य्य ! मुझे अभी इस मे बहुत कुछ पूछना है।
चाणक्य ।— भली भांति पूछो, क्योंकि मुझे भी बहुत कुछ कहना है।
**चन्द्रगुप्त ।—**यह पूछता हूं —
२० **चाणक्य ।—**हा ! मै भी कहता हू ।
**चन्द्रगुप्त ।—**यह कि हम लोगों के सब अनर्थों की जड़ मलयकेतु है, उसे आप ने भागती समय क्यों नहीं पकडा ?
चाणक्य ।-- बृषल ! मलयकेतु के भागने के समय भी दोही उपाय थे- या तो मेल करते या दण्ड देते, जो मेल करते तो आधा राज देना पड़ता और जो दण्ड देते तो फिर यह हम लोगों की कृतघ्नता सब पर प्रसिद्ध हो जाती
तृतीय अङ्क । ८५
तृतीय अङ्क । ८५
कि इन्हीं लोगों ने पर्व्वतक को भी मरवा डाला और जो
आधा राज देकर अब मेल कर लें तो भी उस बिचारे पर्व्व-
तक के मारने का पाप ही पाप हाथ लगे । इससे मलयकेतु
को भागने समय छोड़ दिया ।
चन्द्रगुप्त ।—और भला राक्षस इसी नगर मे रहता था, उस का ५
भी आप ने कुछ न किया इस का क्या उत्तर है ?
चाणक्य ।--सुनो, राक्षस अपने स्वामी की स्थिर भक्ति से और
यहां के बहुत दिन के रहने से यहां के लोगों का और
नन्द के सब साथियों का विश्वासपात्र हो रहा है और
उस का स्वभाव सब लोग जान गए हैं और उसमें बुद्धि १०
और पौरुष भी है वैसे ही उस के सहायक भी हैं और
कोषबल भी है, इस से जो वह यहां रहे तो भीतर के सब
लोगों को फोड़ कर उपद्रव करे और जो यहां से दूर
रहे तो वह ऊपर जोड़ जोड़ लगावे पर उन के मिटाने में
इतनी कठिनाई न हो इस से उसके जाने के समय १५
उपेक्षा कर दी गई ।
चन्द्रगुप्त ।--तो जब वह यहां था तभी उस को वश में क्यों
नही कर लिया ?
चाणक्य ।--वश क्या कर लें, अनेक उपायों से तो वह छाती मे
गड़े कांटे की भांति निकाल कर दूर किया गया है । उसे २०
दूर करने में और कुछ प्रयोजन ही था ।
चन्द्रगुप्त । तो बल से क्यों नही पकड़ रक्खा ?
चाणक्य ।—वह राक्षस ऐसा नहीं है, उस पर जो बल किया
जाय तो यातो वह आप मारा जाय या तुम्हारा नाश करदे ।
और—
हम खोवैं इक महत नर जो वह पावै नास । २५
जो वह नासै सैन तुम तौहू जिय अति त्रास ॥
८६ मुद्राराक्षस-
तासों कल बल करि बहुत अपने बस करि वाहि ।
जिमि गज पकरैं सुघर तिमि बाघेंगे हम ताहि ॥
चन्द्रगुप्त ।—मै आप की बात तो नही काट सकता, पर इस से तो मन्त्री राक्षस ही बढ चढ के जान पडता है ।
५ चाणक्य ।—( क्रोध से ) 'आप नहीं' इतना क्यों छोड दिया ? ऐसा कभी नही है उसने क्या किया है कहो तो ?
चन्द्रगुप्त ।—जो आप न जानते हों तो सुनिये कि वह महात्मा
जदपि आपु जीती पुरी तदपि धारि कुशलात ।
जब लो जित चाहौ रहौ धारि सीस पै लात ॥
१० डोडी फेरन के समय निज बल जय प्रगटाय ।
मेरे बल के लोग कौ दीनों तुरत हराय ॥
मोहि परिजन रीति सों जाके सब बिनु त्रास ।
जौ मोपै निज लोकहू आनहि नहि विश्वास ॥
चाणक्य ।—( हस कर ) वृषल ! राक्षस ने यह सब किया ?
१५ चन्द्रगुप्त ।—हा ! हा ! अमात्य राक्षस ने यह सब किया ।
चाणक्य । - तो हमने जाना, जिस तरह नन्द का नाश करके तुम राजा हुए वैसे ही अब मलयकेतु राजा होगा ।
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! यह उपालम्भ आप को नही शोभा देता, करने वाला सब दैव है ।
२० चाणक्य ।—रे कृतघ्न !
अतिहि क्रोध करि खोलि कै, सिखा प्रतिज्ञा कीन ।
सो सब देखत भुब करो, नव नृप नन्द विहीन ॥
घिरी स्वान अरु गीध सों, भय उपजावनिहारि ।
जारि नन्दहू नहि भई, सान्त मसान दवारि ॥
२५ चन्द्रगुप्त ।—यह सब किसी दूसरे ने किया ।
चाणक्य ।—किस ने ?
चन्द्रगुप्त ।—नन्दकुल के द्वेषी दैव ने ।
तृतीय अङ्क । ८७
तृतीय अङ्क । ८७
चाणक्य । —देव तो मूर्ख लोग मानते है ।
चन्द्रगुप्त ।—और विद्वान् लोग भी यद्वा तद्वा करते है ।
चाणक्य ।—( क्रोध नाट्य कर के ) अरे वृषल ! क्या नौकरों की तरह मुझ पर आज्ञा चलाता है ?
खुली सिखाह बांधिबे चञ्चल भे पुनि हाथ ।
( क्रोध से पैर पृथ्वी पर पटक कर )
घोर प्रतिज्ञा पुनि चरन करन चहत कर साथ ॥
नन्द नसे सौं निरज ह्वै तू फूल्यौ गरबाय ।
सो अभिमान मिटाइहौं तुरतहि तोहि गिराय ॥
चन्द्रगुप्त ।—( घबड़ा कर ) अरे ! क्या आर्य्य को सचमुच क्रोध आ गया !
फर फर फरकत अधर पुट, भए नयन जुग लाल ।
चढ़ी जाति भौंहै कुटिल, स्वास तजत जिमि ब्याल ॥
मनहुँ अचानक रुद्रदृग खुल्यौ त्रितिय दिखरात ।
( आवेग सहित )
धरनी बार्यौ बिनु धसे हा हा किमि पदघात ॥
चाणक्य ।—(नकली क्रोध रोक कर) तो वृषल ! इस कोरी बकवाद से क्या लाभ है ! जो राक्षस चतुर है तो यह शस्त्र उसी को दे । (शस्त्र फेंक कर और उठ कर) (आप ही आप) ह ह ह ! राक्षस ! यही तुम ने चाणक्य को जीतने का उपाय किया ।
तुम जानौ चाणक्य सों नृप चन्दहि लरवाय ।
सहजहि लैहै राज हम निज बल बुद्धि उपाय ॥
सो हम तुमही कह छलन कियो क्रोध परकास ।
तुमरोई करिहै उलटि यह तुव भेद बिनास ॥
( क्रोध प्रकट करता हुआ चला जाता है )
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य वैहीनार ! “चाणक्य का अनादर कर के
८८ मुद्राराक्षस--
आज से हम सब काम काज आपही सम्हालेंगे' यह लोगों से कह दो।
कञ्चुकी।-- (आप ही आप) अरे ! आज महाराज ने चाणक्य के पहले आर्य्य शब्द नहीं कहा ! क्यों ? क्या सच ५ मुच अधिकार छीन लिया ? वा इस में महाराज का क्या दोष है।
सचिव दोष सों होत हैं, नृपहु बुरे तत्काल।
हाथीवान प्रमाद सों, गज कहवावत व्याल ॥
चन्द्रगुप्त ।--क्यों जी ? क्या सोच रहे हो ?
१० कञ्चुकी ।--यही कि महाराज को महाराज शब्द अब यथार्थ शोभा देता है।
चन्द्रगुप्त ।--(आप ही आप) इन्ही लोगों के धोखा खाने से आर्य्य का काम होगा। (प्रगट) शोणोत्तरे ! इस सूखी कलह से हमारा सिर दुखने लगा, इस से शयनगृह का १५ मार्ग दिखलाओ।
प्रतिहारी।--इधर आवें महाराज, इधर आवें।
चन्द्रगुप्त ।--(उठ कर चलता हुआ आप ही आप)
गुरु आयसु छल सों कलह, करिहू जीय डराय।
किमि नर गुरुनन सों लरहि, यहै सोच जिय हाय ॥
२० (सब जाते हैं--जवनिका गिरती है,
॥ तृतीय अङ्क समाप्त हुआ ॥
चतुर्थ अंक
स्थान—मन्त्री राक्षस के घर के बाहर का प्रान्त।
(करभक घबड़ाया हुआ आता है)
करभक ।— अहाहा हा ! अहाहा हा !
अतिशय दुरगम ठाम मै, सत जोजन सौं दूर। ५
कौन जात है धाइ बिनु, प्रभु निदेस भरपूर॥
अब राक्षस मन्त्री के घर चलूं (थका सा घूम कर)
अरे कोई चौकीदार है? स्वामी राक्षस मन्त्री से जाकर कहो कि 'करभक काम पूरा कर के पटने से दौड़ा आता है'। १०
(दौवारिक आता है)
दौवारिक ।— अजी ! चिल्लाओ मत, स्वामी राक्षस मन्त्री को राजकाज सोचने २ सिर मे ऐसी बिथा हो गई है कि अब तक सोने के बिछोने से नहीं उठे, इस से एक घड़ी भर ठहरो, अवसर मिलता है तो मै निवेदन किये देता हूं। १५
(परदा उठता है और सोने के बिछौने पर चिन्ता में भरा राक्षस और शकटदास दिखाई पड़ते हैं)
राक्षस ।— (आप ही आप) -
कारज उलटो होत है, कुटिल नीति के जोर।
का कीजै सोचत यही, जागि होय है भोर॥ २०
और भी।
आरम्भ पहिले साचि रचना चेरा की करि लावहीं।
इक बात मै गर्भित बहुत फल गूढ़ भेद दिखावहीं॥
कारन अकारन सोचि फैली क्रियन कों सकुचावहीं।
जे करहि नाटक बहुत दुख हम सरिस तेऊ पावहीं॥ २५