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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

प्रथम अङ्क । ३७

प्रथम अङ्क । ३७

शिष्य ।—मूर्ख ! इस को जानने से गुरु को क्या काम ?
दूत ।—यही तो कहता हूं कि यह तेरा गुरु ही समझेगा कि इसके जानने से क्या होता है ? तू तो सीधा मनुष्य है तू केवल इतना ही जानता है कि कमल को चन्द्र प्यारा नहीं है । देख—

जदपि होत सुन्दर कमल, उलटो तदपि सुभाव ।
जो नित पूरन चन्द सों, करत बिरोध बनाव ॥

चाणक्य ।—( सुन कर आपही आप ) अहा ! “मै चन्द्रगुप्त के बैरियों को जानता हूं ” यह कोई गूढ वचन से कहता है ।
शिष्य ।—चल मूर्ख ! क्या बेठिकाने की बकवाद कर रहा है ।
दूत ।—अरे ब्राह्मण ! यह सब ठिकाने की बाते होंगी ।
शिष्य ।—कैसे होंगी ?
दूत ।—जो कोई सुननेवाला और समझनेवाला होय ।
चाणक्य ।—रावल जी ! बेखटके चले आइये, यहां आपको सुनने और समझनेवाले मिलेंगे ।
दूत ।—आया ( आगे बढ़ कर ) जय हो महाराज की ।
चाणक्य ।— ( देख कर आप ही आप ) कामों की भीड़ से यह नहीं निश्चय होता कि निपुणक को किस बात के जानने के लिये भेजा था । अरे जाना, इसे लोगों के जी का भेद लेने को भेजा था ( प्रकाश ) आओ, आओ, कहो, अच्छे हो ? बैठो ।
दूत ।—जो आज्ञा ( भूमि मे बैठता है ) ।
चाणक्य ।—कहो, जिस काम को गए थे उसका क्या किया ? चन्द्रगुप्त को लोग चाहते हैं कि नही ?
दूत ।—महाराज ! आप ने पहिले ही से ऐसा प्रबन्ध किया है कि कोई चन्द्रगुप्त से बिराग न करै, इस हेतु सारी प्रजा महाराज चन्द्रगुप्त मे अनुरक्त है, पर राक्षस मन्त्री के दृढ़ मित्र तीन ऐसे है जो चन्द्रगुप्त की वृद्धि नही सह सकते ।

३८ मुद्राराक्षस—

चाणक्य ।—( क्रोध से ) अरे ! कह, कौन अपना जीवन नही सह सकते, उन के नाम तू जानता है ?

दूत ।—जो नाम न जानता तो आप के सामने क्योंकर निवेदन करता ?

चाणक्य । - मै सुना चाहता हूं कि उन के क्या नाम है ?

दूत ।—महाराज सुनिये । पहिले तो शत्रु का पक्षपात करने वाला क्षपणक है ।

चाणक्य ।—(हर्ष से आप ही आप ) हमारे शत्रुओं का पक्ष पाती क्षपणक है ? ( प्रकाश ) उस का नाम क्या है ?

दूत ।—जीवसिद्धि नाम है ।

चाणक्य ।—तू ने कैसे जाना कि क्षपणक मेरे शत्रुओं का पक्ष पाती है ?

दूत ।—क्योंकि उस ने राक्षस मन्त्री के कहने से देव पर्वतेश्वर पर विषकन्या का प्रयोग किया ।

चाणक्य ।—( आप ही आप ) जीवसिद्धि तो हमारा गुप्त दू है ( प्रकाश ) हा, और कौन है ।

दूत ।—महाराज ! दूसरा राक्षस मन्त्री का प्यारा सखा शकट दास कायथ है ।

चाणक्य ।—( हँस कर आप ही आप ) कायथ कोई बडी बात नहीं है तो भी क्षुद्र शत्रु का भी उपेक्षा नही करनी चाहिए, इसी हेतु तो मैने सिद्धार्थक को उस का मित्र बना कर उस के पास रक्खा है, ( प्रकाश ) हा, तीसरा कौन है ?

दूत ।—( हँस कर ) तीसरा तो राक्षस मन्त्री का मानो हृदय ही पुष्पपुरवासी चन्दनदास नामक वह बड़ा जोहरी है जिस के घर मे मन्त्री राक्षस अपना कुटुम्ब छोड़ गया है ।

चाणक्य ।—(आप ही आप) अरे ! यह उस का बड़ा अन्तरग मित्र होगा, क्योंकि पूरे विश्वास बिना राक्षस अपना