मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context८४ मुद्राराक्षस—
कितना भी मान करो, उन्हे थोड़ा ही दिखलाता है, तो
इस का क्या उपाय है। यह तो अनुग्रह का वर्णन हुआ,
अब दण्ड का सुनिये, कि यदि हम इन सबों को प्रधान
पद पाकर क जो बहुत दिनों से नन्दकुल के सर्व्वदा
५ शुभाकांक्षी और साथी रहे दण्ड दे कर दुखी करें
तो नन्दकुल के साथियों का हम पर से विश्वास
उठ जाय इस से छोड ही देना योग्य समझा, सो
उन्हीं सब हमारे भृत्यों के पक्षपाती बन कर राक्षस के
उपदेश से म्लेच्छराज की बडी सहायता पा कर और अपने
१० पिता के वध से क्रोधित हो कर पर्व्वतक का पुत्र
कुमार मलयकेतु हम लोगों से लड़ने को उद्यत हो रहा
है, सो यह लड़ाई के उद्योग का समय है उत्सव का
समय नही। इस से गढ के सस्कार के समय कौमुदी
महोत्सव क्या होगा, यही सोच कर उस का प्रतिषेध
कर दिया।
१५ **चन्द्रगुप्त ।—**आर्य्य ! मुझे अभी इस मे बहुत कुछ पूछना है।
चाणक्य ।— भली भांति पूछो, क्योंकि मुझे भी बहुत कुछ कहना है।
**चन्द्रगुप्त ।—**यह पूछता हूं —
२० **चाणक्य ।—**हा ! मै भी कहता हू ।
**चन्द्रगुप्त ।—**यह कि हम लोगों के सब अनर्थों की जड़ मलयकेतु है, उसे आप ने भागती समय क्यों नहीं पकडा ?
चाणक्य ।-- बृषल ! मलयकेतु के भागने के समय भी दोही उपाय थे- या तो मेल करते या दण्ड देते, जो मेल करते तो आधा राज देना पड़ता और जो दण्ड देते तो फिर यह हम लोगों की कृतघ्नता सब पर प्रसिद्ध हो जाती