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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सप्तम अङ्क । १४

सप्तम अङ्क । १४

ह्वै बिनु काम लजाय करि, नीचो मुख भरि सोक ।
सोवत सदा निषङ्ग में, मम बानन के थोक ॥
सोवहि धनुष उतारि हम, जदपि सकहि जग जीति ।
जा गुरु के जागत सदा, नीति निपुण गत भीति ॥
( चाणक्य के पास जाकर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त प्रणाम ५
करता है ।
चाणक्य ।—वृषल ! अब सब असीस सच्ची हुई, इस से
इन पूज्य अमात्य राक्षस को नमस्कार करो, यह
तुम्हारे पिता के सब मन्त्रियों में मुख्य है ।
राक्षस ।—( आप ही आप ) लगाया न इस ने सम्बन्ध १०
राजा ।— ( राक्षस के पास जा कर ) आर्य्य ! चन्द्रगुप्त
प्रणाम करता है ।
राक्षस ।—( देख कर आप ही आप) अहा ! यही चन्द्रगुप्त
है !
होनहार जाको उदय, बालपने ही जोइ । १५
राज लह्यो जिन बाल गज, जूथाधिप सम होइ ॥
( प्रगट ) महाराज ! जय हो ।
राजा ।—आर्य्य !
तुमरे आछत बहुरि गुरु, जागत नीति प्रबीन ।
कहहु कहा या जगत में, जाहि न जय हम कीन ॥ २०
राक्षस ।—( आप ही आप ) देखो, यह चाणक्य का सिखाया
पढ़ाया मुझ से कैसी सेवको की सी बात करता है !
नहीं २, यह आप ही विनीत है । अहा ! देखो, चन्द्रगुप्त
पर डाह के बदले उलटा अनुराग होता है । चाणक्य
सब स्थान पर यशस्वी है, क्योंकि— २५
पाइ स्वामि सतपात्र जौ, मन्त्री मूरख होइ ।
तौह पावै लाभ जस, इत तौ पण्डित दोइ ॥

१८६ मुद्राराक्षस-

मूरख स्वामी लहि गिरै, चतुर सचिव हू हारि ।
नदी तीर तरु जिमि नसै, तीरन ह्वै लहि बारि ॥

चाणक्य।—क्यों अमात्य राक्षस ! आप क्या चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हैं ?
५ राक्षस ।—इस मे क्या सन्देह है ?
चाणक्य ।—पर अमात्य ! आप शस्त्र ग्रहण नही करते, उस से सन्देह होता है कि आप ने अभी राजा पर अनुग्रह नही किया, इस से जो सच ही चन्दनदास के प्राण बचाया चाहते हों तो यह शस्त्र लीजिये ।
१० राक्षस ।—सुनो विष्णुगुप्त ! ऐसा कभी नही हो सकता, क्योंकि हम लोग उस योग्य नही, विशेष कर के जब तक तुम शस्त्र ग्रहण किए हो तब तक हमारे शस्त्र ग्रहण करने का क्या काम है ?
चाणक्य । - भला अमात्य ! आपने यह कहा से निकाला,
१५ कि हम योग्य हैं और आप अयोग्य हैं ? क्योंकि देखिये—
रहत लगामहि कसे अश्व की पीठ न छोडत ।
खान पान असनान भोग तजि सुख नहि मोडत ॥
छूटे सब सुख साज नीद नहि आवत नयनन ।
निसि दिन चौंकत रहन बीर सब भय धरि तिन मन ॥
२० वह हौदन सों सब छन कस्यौ नृप गजगन अवरोखिए ।
रिपुदर्प्प दूर कर अति प्रबल निज महात्मबल देखिए ॥

वा इन बातों से क्या ! आप के शस्त्र ग्रहण किये बिना तो चन्दनदास बचता भी नही ।
राक्षस । ( आप ही आप )
२५ नन्द नेह छूट्यौ नही, दास भए अरि साथ ।
ते तरु कैसे काटि ह, जे पाले निज हाथ ॥