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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

द्वितीय अङ्क। ६६

द्वितीय अङ्क। ६६

भोजनादिक का ठीक करो।
शकटदास।—जो आज्ञा।
(सिद्धार्थक को ले कर जाता है)
राक्षस। मित्र विराधगुप्त ! अब तुम कुसुमपुर का वृत्तान्त
जो छूट गया था सो कहो। वहा के निवासियों को मेरी ५
बातै अच्छी लगती है कि नही?
विराधगुप्त।—बहुत अच्छी लगती हैं, बरन वे सब तो आप
ही के अनुयायी है।
राक्षस।—ऐसा क्यों?
विराधगुप्त।—इस का कारण यह है कि मलयकेतु के निकलने १०
के पीछे चाणक्य को चन्द्रगुप्त ने कुछ चिढ़ा दिया और
चाणक्य ने भी उस की बात न सह कर चन्द्रगुप्त की
आज्ञा भंग कर के उस को दुखी कर रक्खा है, यह मैं
भली भांति जानता हूं।
राक्षस।—(हर्ष से) मित्र विराधगुप्त ! तो तुम इसी सपेरे के १५
भेस से फिर कुसुमपुर जाओ और वहा मेरा मित्र स्तन-
कलस नामक कवि है उस से कह दो कि चाणक्य के
आज्ञाभगादिकों के कबित्त बना बना कर चन्द्रगुप्त को
बढ़ावा देता रहे और जो कुछ काम हो जाय वह करभक
से कहला भेजे। २०
विराधगुप्त।—जो आज्ञा (जाता है।
(प्रियम्बदक आता है)
प्रियम्बदक।—जय हो महाराज ! शकटदास कहते हैं कि यह
तीन आभूषण बिकते हैं, इन्हें आप देखें।
राक्षस।—(देख कर) अहा यह तो बड़े मूल्य के गहने हैं, २५
अच्छा शकटदास से कह दो कि दाम चुका कर ले ले।
प्रियम्बदक।—जो आज्ञा (जाता है)।

७० मुद्राराक्षस—

राक्षस ।—तो अब हम भी चल कर करभक को कुसुमपुर भेजें (उठता है)। अहा ! क्या उस मृतक चाणक्य से चन्द्रगुप्त से बिगाड़ हो जायगा, क्यों नही ? क्योंकि सबै कामों को सिद्ध ही देखता हूं ।

५ चन्द्रगुप्त निज तेज बल, करत सबन को राज ।
तेहि समझत चाणक्य यह, मेरो दियो समाज ॥
अपनो २ करि चुके, काज रह्यो कछु जौन।
अब जौ आपस मे लडें, तौ बड अचरज कौन ॥
(जाता है)

१० ॥ इति द्वितीयाङ्क ॥

तृतीय अंक

(स्थान—राजभवन की अटारी)

कंचुकी आता है।

कंचुकी।— हे रूप आदिक विषय जो राखे हिये बहु लोभ सों।
सो मिटे इन्द्रीगन सहित ह्वै सिथिल अतिही छोभ सों॥ ५
मानत कह्यौ कोउ नाहि सब अङ्ग अङ्ग ढीले ह्वै गए।
तौहू न तृश्ने ! क्यों तजत तू मोहि बूढोह भए॥

(आकाश की ओर देख कर) अरे। अरे। सुगांगप्रसाद के लोगो! सुनो। महाराज चन्द्रगुप्त ने तुम लोगों को यह आज्ञा दी है कि कौमुदी-महोत्सव के होने से परम शोभित १० कुसुमपुर को मै देखना चाहता हूं, इस से उस अटारी को बिछौने इत्यादि से सज रक्खो, देर क्यों करते हो। (आकाश की ओर देख कर) क्या कहा? कि क्या महाराज चन्द्रगुप्त नही जानते कि कौमुदी-महोत्सव अब की न होगा? दुर दइमारो! क्या मरने को लगे हो? शीघ्रता करो। १५

कवित्त।
बहु फूल की माल लपेट कै खंभन धूप सुगंध सों ताहि धुपाइये। तापे चहुं दिस चंद छुपा से सुसोभित चौर घने लटकाइये॥ भार सों चारु सिहासन के मुरछा मे धरा परी धेनु सी पाइये। छींटि के तापैं गुलाब मिल्यौ जल चन्दन ता २० कह जाइ जगाइये॥

(आकाश की ओर देख कर) क्या कहते हो—कि हम लोग अपने काम मे लग रहे हैं? अच्छा २ झटपट सब सिद्ध करो, देखो! वह महाराज चन्द्रगुप्त आ पहुंचे।

७२ मुद्राराक्षस—

बहु दिन श्रम करि नन्द नृप बह्यो राज धुर जौन ॥
बालेपन ही मे लियो, चन्द सोस निज तौन ॥
डिगत न नेकहु विषम पथ, दृढ़ प्रतिज्ञ दृढ़ गात ॥
गिरत चहत सम्हरत बहुरि, नेकु न जिय घबरात ॥

५ (नेपथ्य मे) इधर महाराज इधर ।
(राजा और प्रतिहारी आते हैं)

राजा ।—(आप ही आप) राज उसी का नाम है जिस में अपनी आज्ञा चले, दूसरे के भरोसे राज करना भी एक बोझा ढोना है। क्योंकि—

१० जो दूजे को हित करै, तौ खोवै निज काज ।
जौ खोयो निज काज तौ, कौन बात को राज ॥
दूजे हो को हित करै, तौ वह परबस मूढ़ ।
कठपुतरी सो स्वाद कछु, पावै कबहु न कूंढ़ ॥

और राज्य पाकर भी इस दुष्ट राजलक्ष्मी का सम्हालना
१५ बहुत कठिन है। क्योंकि—
कूर सदा भाखत पियहि, चञ्चल सहज सुभाव ।
नर गुन औगुन नहि लखत, सजन खल सम भाव ॥
डरत सूर सौं भीरु कह, गिनत न कछु रति*हीन ।
बारनारि अरु लच्छमी, कहौ कौन बस कीन ॥

२० यद्यपि गुरु ने कहा है कि तू झूठी कलह कर के स्वतन्त्र हो कर अपना प्रबन्ध आप कर ले, पर यह तो बड़ा पाप सा है। अथवा गुरुजी क उपदेश पर चलने से हम लोग तो सदा ही स्वतन्त्र हैं।

जब लौं बिगारै काज नहि तब लौं न गुरु कछु तेहि कहै ।
२५ पै शिष्य जाइ कुराह तौ गुरु सीस अंकुस ह्नै रहै ॥


* रति का यहां प्रीति अर्थ है।