मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context७६ मुद्राराक्षस—
[ चारों ओर घूम कर देख कर ]
अहा ! यही आर्य्य चाणक्य का घर है तो चल (कुछ आगे
बढ कर और देख कर)।
अहाहा ! यह राजाधिराज श्रीमन्ती जी के घर की सम्पत्ति
५ है। जो—
कहु परे गोमय शुष्क कहु सिल परी सोभा दै रही।
कहु तिल कह जव रासिलागी बटुन जा भिक्षा लही॥
कहु कुस परे कह समिध सूखत भार सों ताके नयो।
यह लखौ छप्पर महा जरजर होइ कैसो झुकि गयो॥
१० महाराज चन्द्रगुप्त के भाग्य से ऐसा मन्त्री मिला है—
बिन गुनहु के नृपन कों, धन हित गुरुजन धाइ।
सुखो मुख करि झूठही, बहु गुन कहहि बनाइ॥
पै जिन को तृष्णा नही, ते न लबार समान।
तिन सों तृन सम धनिक जन, पावत कबहू न मान॥
१५ (देख कर डर से) अरे आर्य्य चाणक्य यहा बैठे हैं,
जिन्होंने—
लोक धरणि चन्द्रहि कियो, राजा, नन्द गिराइ।
होत प्रात रवि के कढत, जिमि ससि तेज नसाइ॥
(प्रगट दण्डवत् कर के) जय हो ! आर्य्य की जय हो ! !
२० चाणक्य ।—(देख कर) कौन है वेहोनर ! क्यो आया है ?
कंचुकी ।—आर्य्य ! अनेक राजगण क मुकुट माणिक्य से
सर्वदा जिन के पदतल लाल रहते है उन महाराज चन्द्रगुप्त
ने आप के चरणो मे दण्डवत् कर के निवेदन किया है
कि ‘यदि आप क किसी कार्य्य मे विघ्न न पड तो मै
२५ आप का दर्शन किया चाहता हूं।”
चाणक्य ।—वेहीनर ! क्या वृषल मुझे देखा चाहता है ? क्या
मै ने कौमुदी महोत्सव का प्रतिषेध कर दिया है यह वृषल
नही जानता ?