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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 78 of 173

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तृतीय अङ्क । ८१

चाणक्य।—में ने भी आप की आज्ञा के अपालन के हेतु ही कौमुदी महोत्सव का प्रतिषेध किया ।

क्योंकि—

आइ चारहू सिन्धु के, छोरहु के भूपाल ।
जो सासन सिर पै धरैं जिमि फूलन की माल ॥ ५
तेहि हम जौ कछु टारही, सोउ तुव हित उपदेश ।
जासों तुमरो विनय गुन, जग मै बढ़ै नरेस ॥

चन्द्रगुप्त।—और जो दूसरा प्रयोजन है वह भी सुनूं ।
चाणक्य।—वह भी कहता हूं ।
चन्द्रगुप्त।—कहिए । १०
चाणक्य।—शोणोत्तरे ! अचलदत्त कायस्थ से कहो कि तुम्हारे पास जो भद्रभट इत्यादिकों का लेखपत्र है वह मागा है ।
प्र०।—जो आज्ञा ( बाहर से पत्र लाकर देती है ) ।
चाणक्य।—वृषल ! सुनो । १५
चन्द्रगुप्त।—में उधर ही कान लगाए हूं ।
चाणक्य।—( पढता है ) स्वस्ति परम प्रसिद्ध नाम महाराज श्री चन्द्रगुप्त देव के साथी जो अब उन को छोड़ कर कुमार मलयकेतु के आश्रित हुए हैं उन का यह प्रतिज्ञापत्र है । पाहला गजाध्यक्ष, भद्रभट, अश्वाध्यक्ष, पुरुषदत्त, २० महाप्रतिहार चन्द्रभानु का भानजा हिंगुरात, महाराज के नातेदार महाराज बलगुप्त, महाराज के लड़कपन का सेवक राजसेन, सेनापति सिंहबलदत्त का छोटा भाई भागुरायण, मालवे के राजा का पुत्र रोहिताक्ष और क्षत्रियों में सब से प्रधान विजयवर्मा (आप ही) ये हम सब लोग यहां २५ महाराज का काम सावधानी से साधते है (प्रकाश) यही इस पत्र में लिखा है । सुना ?