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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 69 of 173

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Page 69

७२ मुद्राराक्षस—

बहु दिन श्रम करि नन्द नृप बह्यो राज धुर जौन ॥
बालेपन ही मे लियो, चन्द सोस निज तौन ॥
डिगत न नेकहु विषम पथ, दृढ़ प्रतिज्ञ दृढ़ गात ॥
गिरत चहत सम्हरत बहुरि, नेकु न जिय घबरात ॥

५ (नेपथ्य मे) इधर महाराज इधर ।
(राजा और प्रतिहारी आते हैं)

राजा ।—(आप ही आप) राज उसी का नाम है जिस में अपनी आज्ञा चले, दूसरे के भरोसे राज करना भी एक बोझा ढोना है। क्योंकि—

१० जो दूजे को हित करै, तौ खोवै निज काज ।
जौ खोयो निज काज तौ, कौन बात को राज ॥
दूजे हो को हित करै, तौ वह परबस मूढ़ ।
कठपुतरी सो स्वाद कछु, पावै कबहु न कूंढ़ ॥

और राज्य पाकर भी इस दुष्ट राजलक्ष्मी का सम्हालना
१५ बहुत कठिन है। क्योंकि—
कूर सदा भाखत पियहि, चञ्चल सहज सुभाव ।
नर गुन औगुन नहि लखत, सजन खल सम भाव ॥
डरत सूर सौं भीरु कह, गिनत न कछु रति*हीन ।
बारनारि अरु लच्छमी, कहौ कौन बस कीन ॥

२० यद्यपि गुरु ने कहा है कि तू झूठी कलह कर के स्वतन्त्र हो कर अपना प्रबन्ध आप कर ले, पर यह तो बड़ा पाप सा है। अथवा गुरुजी क उपदेश पर चलने से हम लोग तो सदा ही स्वतन्त्र हैं।

जब लौं बिगारै काज नहि तब लौं न गुरु कछु तेहि कहै ।
२५ पै शिष्य जाइ कुराह तौ गुरु सीस अंकुस ह्नै रहै ॥


* रति का यहां प्रीति अर्थ है।