मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
तृतीय अङ्क । ८५
तृतीय अङ्क । ८५
कि इन्हीं लोगों ने पर्व्वतक को भी मरवा डाला और जो
आधा राज देकर अब मेल कर लें तो भी उस बिचारे पर्व्व-
तक के मारने का पाप ही पाप हाथ लगे । इससे मलयकेतु
को भागने समय छोड़ दिया ।
चन्द्रगुप्त ।—और भला राक्षस इसी नगर मे रहता था, उस का ५
भी आप ने कुछ न किया इस का क्या उत्तर है ?
चाणक्य ।--सुनो, राक्षस अपने स्वामी की स्थिर भक्ति से और
यहां के बहुत दिन के रहने से यहां के लोगों का और
नन्द के सब साथियों का विश्वासपात्र हो रहा है और
उस का स्वभाव सब लोग जान गए हैं और उसमें बुद्धि १०
और पौरुष भी है वैसे ही उस के सहायक भी हैं और
कोषबल भी है, इस से जो वह यहां रहे तो भीतर के सब
लोगों को फोड़ कर उपद्रव करे और जो यहां से दूर
रहे तो वह ऊपर जोड़ जोड़ लगावे पर उन के मिटाने में
इतनी कठिनाई न हो इस से उसके जाने के समय १५
उपेक्षा कर दी गई ।
चन्द्रगुप्त ।--तो जब वह यहां था तभी उस को वश में क्यों
नही कर लिया ?
चाणक्य ।--वश क्या कर लें, अनेक उपायों से तो वह छाती मे
गड़े कांटे की भांति निकाल कर दूर किया गया है । उसे २०
दूर करने में और कुछ प्रयोजन ही था ।
चन्द्रगुप्त । तो बल से क्यों नही पकड़ रक्खा ?
चाणक्य ।—वह राक्षस ऐसा नहीं है, उस पर जो बल किया
जाय तो यातो वह आप मारा जाय या तुम्हारा नाश करदे ।
और—
हम खोवैं इक महत नर जो वह पावै नास । २५
जो वह नासै सैन तुम तौहू जिय अति त्रास ॥
८६ मुद्राराक्षस-
तासों कल बल करि बहुत अपने बस करि वाहि ।
जिमि गज पकरैं सुघर तिमि बाघेंगे हम ताहि ॥
चन्द्रगुप्त ।—मै आप की बात तो नही काट सकता, पर इस से तो मन्त्री राक्षस ही बढ चढ के जान पडता है ।
५ चाणक्य ।—( क्रोध से ) 'आप नहीं' इतना क्यों छोड दिया ? ऐसा कभी नही है उसने क्या किया है कहो तो ?
चन्द्रगुप्त ।—जो आप न जानते हों तो सुनिये कि वह महात्मा
जदपि आपु जीती पुरी तदपि धारि कुशलात ।
जब लो जित चाहौ रहौ धारि सीस पै लात ॥
१० डोडी फेरन के समय निज बल जय प्रगटाय ।
मेरे बल के लोग कौ दीनों तुरत हराय ॥
मोहि परिजन रीति सों जाके सब बिनु त्रास ।
जौ मोपै निज लोकहू आनहि नहि विश्वास ॥
चाणक्य ।—( हस कर ) वृषल ! राक्षस ने यह सब किया ?
१५ चन्द्रगुप्त ।—हा ! हा ! अमात्य राक्षस ने यह सब किया ।
चाणक्य । - तो हमने जाना, जिस तरह नन्द का नाश करके तुम राजा हुए वैसे ही अब मलयकेतु राजा होगा ।
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! यह उपालम्भ आप को नही शोभा देता, करने वाला सब दैव है ।
२० चाणक्य ।—रे कृतघ्न !
अतिहि क्रोध करि खोलि कै, सिखा प्रतिज्ञा कीन ।
सो सब देखत भुब करो, नव नृप नन्द विहीन ॥
घिरी स्वान अरु गीध सों, भय उपजावनिहारि ।
जारि नन्दहू नहि भई, सान्त मसान दवारि ॥
२५ चन्द्रगुप्त ।—यह सब किसी दूसरे ने किया ।
चाणक्य ।—किस ने ?
चन्द्रगुप्त ।—नन्दकुल के द्वेषी दैव ने ।