मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
चतुर्थ अङ्क । ६५
चतुर्थ अङ्क । ६५
राक्षस ।—क्यों जी, एक कौमुदीमहोत्सव के निषेध ही से
चाणक्य चन्द्रगुप्त मे बिगाड़ हुआ कि कोई और
कारण भी है ?
मलयकेतु ।—क्यों मित्र भागुरायण ! अब और बेर मे यह
क्या फल निकालैंगे ? ५
भागुरायण ।—यह फल निकाला है कि चाणक्य बड़ा बुद्धि-
मान् है, वह व्यर्थ चन्द्रगुप्त को क्रोधित न करावैगा और
चन्द्रगुप्त भी उस की बातै जानता है, वह भी बिना बात
चाणक्य का ऐसा अपमान न करैगा, इससे उन लोगों
मे बहुत झगड़े से जो बिगाड़ होगा तो पक्का होगा । १०
करभक ।—आर्य्य ! और भी कई कारण है ।
राक्षस ! कौन ?
करभक ।—कि जब पहिले यहा से राक्षस और कुमार मलय-
केतु भागे तब उस ने क्यों नही पकड़ा ?
राक्षस ।—( हर्ष से ) मित्र शकटदास ! अब तो चन्द्रगुप्त १५
हाथ मे आ जायगा ।
शकटदास ।—अब चन्दनदास छूटैगा, और आप कुटुम्ब से
मिलगे, वैसे ही जीवसिद्धि इत्यादि लोग क्लेश से छूटैंगे ।
भागुरायण । ( आप ही आप ) हा, अवश्य जीवसिद्धि
का क्लेश छूटा । २०
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! अब मेरे हाथ चन्द्रगुप्त
आवैगा, इस मे इन का क्या अभिप्राय है ?
भागुरायण ।—और क्या होगा ? यही होगा कि यह चाणक्य
से छूटे चन्द्रगुप्त के उद्धार का समय देखते हैं *
* राक्षस ने तो 'चन्द्रगुप्त हाथ में आवैगा' इस आशय से कहा था कि चन्द्रगुप्त जीता जायगा पर भागुरायण ने भेद कराने को मलयकेतु को उस का उलटा अर्थ समझाया ।
६६ मुद्राराक्षस-
राक्षस ।-अजी, अब अधिकार छिन जाने पर वह ब्राह्मण कहां है ?
करभक ।-अभी तो पटने ही में है ।
राक्षस ।-( घबडा कर ) हैं ! अभी वहीं है ? तपोबन नहीं चला गया ? या फिर कोई प्रतिज्ञा नहीं की ?
करभक । - अब तपोबन जायगा -ऐसा सुनते हैं ।
राक्षस । -(घबडा कर ) शकटदास, यह बात तो काम की नहीं,
देव नन्द को नहि गन्यो जिन भीतर अपमान ।
सो निज कृत नृप चन्द की बात न सहिहै जान ॥
१० मलयकेतु । मित्र भागुरायण ! चाणक्य के तपोबन जाने वा फिर प्रतिज्ञा करने से कौन कार्यसिद्धि निकाली है ?
भागुरायण ।-कुमार ! यह तो कोई कठिन बात नहीं है, इस का आशय तो स्पष्ट ही है कि चन्द्रगुप्त से जितनी दूर चाणक्य रहेगा उतनी ही कार्यसिद्धि होगी ।
१५ शकटदास । अमात्य ! आप व्यर्थ सोच न करें, क्योंकि देखें
सबहि भाँति अधिकार लहि, अभिमानी नृप चन्द ।
नहि सहिहै अपमान अब, राजा होइ स्वच्छन्द ॥
तिमि चाणक्यहु पाइ दुख एक प्रतिज्ञा पारि ।
अब दूजो करिहै न कछु उद्यम निज मद चूरि ॥
२० राक्षस । - ऐसाही होगा । मित्र शकटदास ! जाकर करभक को डेरा इत्यादि दो ।
शकटदास ।-जो आज्ञा ।
( करभक को लेकर जाता है )
राक्षस ।-इस समय कुमार से मिलने की इच्छा है ।
२५ मलयकेतु ।-(आगे बढ कर ) मै आप ही आप से मिलने को आया हूँ ।