मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
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Read in context८० मुद्राराक्षस-
चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! मे इन सबों के उदास होने का कारण सुनना चाहता हूं ।
चाणक्य ।—वृषल ! सुनो—वह जो गजाध्यक्ष और अश्वाध्यक्ष थे वह रात दिन मद्य, स्त्री और जूआ में डूब कर अपने काम से निरे बेसुध रहते थे इस से मैं ने उन से अधिकार लेकर केवल निर्वाह के योग्य जीविका कर दी थी, इस से उदास हो कर कुमार मलयकेतु के पास चले गए और वहा अपना अपना कार्य्य सुना कर फिर उसी पद पर नियुक्त हुए हैं, और हिङ्गुगत और बलगुप्त ऐसे लालची हैं कि कितना भी दिया पर अन्त मे मारे लालच के कुमार मलयकेतु के पास इस लोभ से जा रहे कि यही बहुत मिलेगा, और जो आप का लड़कपन का सेवक राजसेन था उस ने आप की थोडी ही कृपा से हाथी, घोड़ा, घर और धन सब पाया, पर इस भय से भाग कर मलयकेतु के पास चला गया कि यह सब छिन न जाय, और वह जो सिंह-बलदत्त सेनापति का छोटा भाई भागुरायण है उस से पर्व्वतक से बड़ी प्रीति थी सो उस ने कुमार मलयकेतु से यह कहा कि “जैसे विश्वासघात कर के चाणक्य ने तुम्हारे पिता को मार डाला वैसे ही तुम्हे भी मार डालेगा इस से यहा से भाग चलो”, ऐसे ही बहकाकर कुमार मलयकेतु को भगा दिया और जब आप के बैरी चन्दनदासादिकों को दण्ड हुआ तब मारे डर के मलयकेतु के पास जा रहा, उस ने भी यह समझ कर कि इस ने मेरे प्राण बचाए और मेरे पिता का परिचित भी है उस को कृतज्ञता से अपना अन्तरंगी मन्त्री बनाया है, और वह जो रोहिताक्ष और विजयवर्म्मा थे वह ऐसे अभिमानी थे कि जब आप उन के और नातेदारों का आदर करते थे तो वह कुढ़ते थे,