मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
चतुर्थे अङ्क । ६१
चतुर्थे अङ्क । ६१
(आकाश की ओर देख कर) अजी क्या कहा, कि क्यों हटाते हो ? अमात्य राक्षस के सिर में पीडा सुन कर कुमार मलयकेतु उन को देखने को इधर ही आते हैं (जाता है)।
(भागुरायण और कञ्चुकी के साथ मलयकेतु आता है)। ५
मलयकेतु ।—(लम्बी सास लेकर—आप ही आप) हा ! देखो पिता को मरे आज दस महीने हुए और व्यर्थ वीरता का अभिमान कर के अब तक हम लोगों ने कुछ भी नहीं किया, बरन तर्पण करना भी छोड़ दिया। या क्या हुआ, मैं ने तो पहिले यही प्रतिज्ञा ही किया है। १०
कर वलय उर ताड़त गिरे, आचरहु की सुधि नहि परी ।
मिलि करहि आरतनाद हाहा, अलक खुलि रज सों भरी ॥
जो शोक सों भइ मात गन की दशा सो उलटाइ है ।
करि रिपु जुवतिगन की सोई गति पितहि तृप्ति कराइ है ॥
और भी— १५
रन मरि पितु ढिग जात हम, बीरन की गति पाइ ।
कै माता दृग जल भग्न, रिपु जुवती मुख लाइ ॥
(प्रकाश) अजी जाजले ! सब राजा लोगों से कहो कि “मैं बिना कहे सुने राक्षस मन्त्री के पास अकेला जाकर उन को प्रसन्न करू गा” इस से वे सब लोग उधर ही २० ठहरैं ।
कञ्चुकी । जो आज्ञा (घूमते २ नेपथ्य की ओर देख कर ।)
अजी राजा लोग ! सुनो, कुमार की आज्ञा है कि मेरे साथ कोई न चलै (देख कर आनन्द से) महाराजकुमार ! आप देखिये । आप की आज्ञा सुनते ही सब राजा रुक गए— २५
अति चपल जे रथ चलत ते, सुनि चित्र से तुरतहि भए ।
जे खुरन खोदत नभ पर्थाहि, ते बाजिगन झुकि रुक गए ॥
६२ मुद्राराक्षस -
जे रहे धावत ठिठकि ते, गज मूक घण्टा सह सधे ।
मरजाद तुव नहिं तजहि नृपगण, जलधि से मानहु बँधे ।
मलयकेतु ।—अजी जाजले ! तुम भी सब लोगों को लेकर जाओ, एक केवल भागुरायण मेरे संग रहे ।
५ कचुकी ।—जो आज्ञा (सब को लेकर जाता है ) ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! जब मैं यहां आता था तो भद्रभट प्रभृति लोगों ने मुझ से निवेदन किया कि “हम राक्षस मन्त्री के द्वारा कुमार के पास नहीं रहना चाहते, कुमार के सेनापति शिखरसेन के द्वारा रहेंगे । दुष्ट मन्त्री १० ही के डर से तो चन्द्रगुप्त को छोड़ कर यहां सब बात का सुभीता जान कर कुमार का आश्रय लिया है ।” सो उन लोगों की बात का मैं ने आशय नहीं समझा ।*
भागुरायण ।—कुमार ! यह तो ठीक ही है क्योंकि अपने कल्याण के हेतु सब लोग स्वामी का आश्रय हित और १५ प्रिय के द्वारा करते हैं ।
मलयकेतु ।—मित्र भागुरायण ! तो फिर राक्षस मन्त्री तो हम लोगों का परमप्रिय और बड़ा हित है ।
भागुरायण ।—ठीक है, पर बात यह है कि अमात्य राक्षस का बैर चाणक्य से है, कुछ चन्द्रगुप्त से नहीं है, इस से जो २० चाणक्य की बातों से रूठ कर चन्द्रगुप्त उन से मन्त्री का काम ले ले और नन्दकुल की भक्ति से “यह नन्द ही के वश का है” यह सोच कर राक्षस चन्द्रगुप्त से मिल जाय और चन्द्रगुप्त भी अपने बड़े लोगों का पुराना मन्त्री समझ कर उस को मिला ले, तो ऐसा न हो कि कुमार हम लोगों पर भी विश्वास न करें ।
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* चाणक्य के मन्त्रणी से लगाने मलयकेतु से ऐसा कहा था ।