मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)
Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)
Public domain in India · Report a copyright issue
Page 68 of 173
Read in contextतृतीय अंक
(स्थान—राजभवन की अटारी)
कंचुकी आता है।
कंचुकी।— हे रूप आदिक विषय जो राखे हिये बहु लोभ सों।
सो मिटे इन्द्रीगन सहित ह्वै सिथिल अतिही छोभ सों॥ ५
मानत कह्यौ कोउ नाहि सब अङ्ग अङ्ग ढीले ह्वै गए।
तौहू न तृश्ने ! क्यों तजत तू मोहि बूढोह भए॥
(आकाश की ओर देख कर) अरे। अरे। सुगांगप्रसाद के लोगो! सुनो। महाराज चन्द्रगुप्त ने तुम लोगों को यह आज्ञा दी है कि कौमुदी-महोत्सव के होने से परम शोभित १० कुसुमपुर को मै देखना चाहता हूं, इस से उस अटारी को बिछौने इत्यादि से सज रक्खो, देर क्यों करते हो। (आकाश की ओर देख कर) क्या कहा? कि क्या महाराज चन्द्रगुप्त नही जानते कि कौमुदी-महोत्सव अब की न होगा? दुर दइमारो! क्या मरने को लगे हो? शीघ्रता करो। १५
कवित्त।
बहु फूल की माल लपेट कै खंभन धूप सुगंध सों ताहि धुपाइये। तापे चहुं दिस चंद छुपा से सुसोभित चौर घने लटकाइये॥ भार सों चारु सिहासन के मुरछा मे धरा परी धेनु सी पाइये। छींटि के तापैं गुलाब मिल्यौ जल चन्दन ता २० कह जाइ जगाइये॥
(आकाश की ओर देख कर) क्या कहते हो—कि हम लोग अपने काम मे लग रहे हैं? अच्छा २ झटपट सब सिद्ध करो, देखो! वह महाराज चन्द्रगुप्त आ पहुंचे।