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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 75 of 173

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Page 75

७८ मुद्राराक्षस-

जहँ लो विविध मणिखण्ड मंडित समुद्र दक्षिणदिसि बहै ॥
तहँ लो सबै नृप आइ भय सों तोहि सीस झुकावहीँ ।
तिनके मुकुट मणि रँगे तुव पद निरखि हम सुख पावही ॥

चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप की कृपा से ऐसा ही हो रहा है।

५ बैठिए।

(दोनों यथास्थान बैठते हैं)

चाणक्य।—वृषल ! कहो, मुझे क्यों बुलाया है ?
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य के दर्शन से कृतार्थ होने को।
चाणक्य।—[हस कर] भया, बहुत शिष्टाचार हुआ, अब

१० बताओ क्यो बुलाया है ? क्योंकि राजा लोग किसी को बेकाम नहीं बुलाते।
चन्द्रगुप्त।—आर्य्य ! आप ने कौमुदी महोत्सव के न होने से क्या फल सोचा है ?
चाणक्य।—[हस कर] तो यही उलाहना देने को बुलाया

१५ है न ?
चन्द्रगुप्त।—उलाहना देने को कभी नही।
चाणक्य।—तो क्यों ?
चन्द्रगुप्त।—पूछने को।
चाणक्य।—जब पूछना ही है तब तुम को इससे क्या ? शिष्य

२० को सर्व्वदा गुरु की रुचि पर चलना चाहिए।
चन्द्रगुप्त।—इस मे कोई सन्देह नही पर आप की रुचि बिना प्रयोजन नही प्रवृत्त होती, इस से पूछा।
चाणक्य।—ठीक है तुम ने मेरा आशय जान लिया, बिना प्रयोजन के चाणक्य की रुचि किसी ओर कभी फिरती

२५ ही नही।
चन्द्रगुप्त।—इसी से तो सुनने बिना मेरा जी अकुलाता है।
चाणक्य।—सुनो, अर्थशास्त्रकारों ने तीन प्रकार के राज्य लिखे हैं—एक राजा के भरोसे, दूसरा मन्त्री के भरोसे, तीसरा