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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

७५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

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७५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) पुनर्नवमवाचीनं निम्बः काकमधुश्च यः।
कपिरोम मनुष्यास्थि बद्ध्वा मृतकवाससा ॥
निखन्यते गृहे यस्य पिष्ट्वा वा यं प्रपाययेत् ।
सपुत्रदारः सधनस्त्रीन्पक्षान्नातिवर्तते ॥
(२) पुनर्नवमवाचीनं निम्बः काकमधुश्च यः।
स्वयंगुप्ता मनुष्यास्थि पदे यस्य निखन्यते ॥
द्वारे गृहस्य सेनाया ग्रामस्य नगरस्य वा।
सपुत्रदारः सधनस्त्रीन् पक्षान्नातिवर्तते ॥
(३) अजमर्कटरोमाणि मार्जारनकुलस्य च।
ब्राह्मणानां श्वपाकानां काकोलूकस्य चाहरेत् ॥
एतेन विष्ठावक्षुण्णा सद्य उत्सादनकारिका।
(४) प्रेतनिर्मालिका किण्वं रोमाणि नकुलस्य च ॥
वृश्चिकाल्यहिकृत्तिश्च पदे यस्य निखन्यते।
भवत्यपुरुषः सद्यो यावत्तन्नापनीयते ॥
(५) त्रिरात्रोपोषितः पुष्येण शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुंसः शिरः-
कपाले मृत्तिकायां गुञ्जा आवास्योदकेन च सेचयेत्। जातानाममावास्यायां

(१) दक्षिण की ओर पैदा होने वाला पुनर्नवा तथा जिसका फल कौओं के लिए स्वादुकर होता है, ऐसा काकमधु, नीम, बन्दर के बाल और मनुष्य की हड्डी, इन सबको मरे हुए आदमी के कपड़े में बाँध कर जिसके घर में गाड़ दिया जाता है अथवा जिसको पीस कर पिला दिया जाता है वह पुरुष डेढ़ मास के भीतर ही समस्त धन-जन के सहित विनष्ट हो जाता है।

(२) दक्षिण की ओर पैदा होने वाला पुनर्नवा, काकमधु, नीम, धमासा (स्वयंगुप्ता) और मनुष्य की हड्डी, इन सबको जिसके घर, सेना, गाँव, नगर या दरवाजे पर गाड़ दिया जाता है वह व्यक्ति डेढ़ मास के भीतर समस्त जन-धन के सहित विनष्ट हो जाता है।

(३) बकरा, बन्दर, बिल्ली, नेवला, ब्राह्मण, चाण्डाल, कौआ और उल्लू, इन सबके बालों को इकट्ठा करके तथा जिसको मारना हो उसका पाखाना इन बालों के साथ मिलाकर उसका स्पर्श कराते ही उस व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो जाती है।

(४) मुर्दे पर डाली गई माला, सुराबीज और नेवले के बाल इन सबको यदि बिच्छू, भौंरा और सांप, इन तीनों की खाल के साथ मिलाकर किसी के स्थान पर गाड़ दिया जाय तो वह पुरुष तब तक नपुंसक बना रहता है, जब तक कि उसके स्थान से उन गड़ी हुई चीजों को न निकाला जाय।

(५) तीन रात तक उपवास करने के बाद पुष्य नक्षत्र में हथियार से मारे हुए

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प्र० १७८ : अ० ३ ] भैषज्यमन्त्रप्रयोग ७५९

पौर्णमास्यां वा पुष्ययोगिन्यां गुञ्जावल्लीर्ग्राहयित्वा मण्डलकानि कारयेत् । तेष्वन्नपानभाजनानि न्यस्तानि न क्षीयन्ते ।

(१) रात्रिप्रेक्षायां प्रवृत्तायां प्रदीपाग्निषु मृतधेनोः स्तानानुत्कृत्य दाहयेत् । दग्धान् वृषमूत्रेण पेषयित्वा नवकुम्भमन्तर्लेपयेत्; तं ग्राममपसव्यं परिणीय तत्र न्यस्तं नवनीतमेषां तत्सर्वमागच्छतीति ।

(२) कृष्णचतुर्दश्यां पुष्ययोगिन्यां शुनो लग्नकस्य योनौ कालायसीं मुद्रिकां प्रेषयेत्; तां स्वयं पतितां गृह्णीयात्; तया वृक्षफलान्याकारितान्यागच्छन्ति ।

(३) मन्त्रभैषज्यसंयुक्ता योगा मायाकृताश्च ये ।
उपहन्यादमित्रांस्तैः स्वजनं चाभिपालयेत् ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे प्रलम्भने भैषज्यमन्त्रप्रयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः; आदितः सप्तचत्वारिंशदधिकशततमः ।

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या फांसी लगे व्यक्ति की खोपड़ी में मिट्टी भर कर उसमें रत्ती ( गुंजा ) बो दिये जांय और उन्हें निरंतर सींचा जाय । जब उसमें लताएँ निकल आवें तब पुष्य नक्षत्र की अमावस्या या पूर्णमासी को उन गुंजा की बेलों को उखाड़ कर उनका गोल घेरा बना दिया जाय । उस घेरे के बीच में रखी हुई खाने-पीने की सामग्री कभी खतम ही नहीं होती है ।

( १ ) रात में जिस समय कोई तमाशा हो रहा हो तब, मशाल की आग से मरी हुई गाय के झुलसे हुए थनों को काट कर उन्हें बैल के पेशाब के साथ पीसने के बाद एक कोरे घड़े के भीतर चारों ओर लीप दिया जाय । उस घड़े को बाईं ओर से गाँव की परिक्रमा करा के जिस जगह पर रखा जाय, गाँव भर का सारा मक्खन उस घड़े में खिंचा चला आता है ।

( २ ) पुष्य नक्षत्र की कृष्ण चतुर्दशी में किसी कामासक्त कुतिया की योनि में लोहे की एक अंगूठी लगा दी जाय और जब वह अंगूठी अपने आप गिर पड़े तो उसे ले लिया जाय । उसके बाद उस अंगूठी के द्वारा जिस पेड़ का फल बुलाना हो फौरन अपने पास चला आता है ।

( ३ ) मंत्र, ओषधि और माया से युक्त ऊपर जिन योगों का निरूपण किया गया है, उनसे शत्रु का नाश और स्वजनों का उपकार करना चाहिए ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में भैषज्यमन्त्रप्रयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १७९स्वबलोपघातप्रतीकारः
अध्याय ४

(१) स्वपक्षे परप्रयुक्तानां दूषिविषगराणां प्रतीकारे श्लेष्मातककपित्थदन्तिदन्तशठगोजीशिरीषपाटलीबलास्योनाकपुनर्नवाश्वेतावरणक्वाथयुक्तं चन्दनसालावृकीलोहितयुक्तं तेजनोदकं राजोपभोग्यानां गुह्यप्रक्षालनं स्त्रीणां सेनायाश्च विषप्रतीकारः ।

(२) पृषतनकुलनीलकण्ठगोधापित्तयुक्तं मषीराजिचूर्णं सिन्दुवारितवरणवारणीतण्डुलीयकशत्पर्वाग्रपिण्डीतकयोगो मदनदोषहरः ।

(३) शृगालविन्नामदनसिन्दुवारितवरणवारणवल्लीमूलकषायाणामन्यतमस्य समस्तानां वा क्षीरयुक्तं पानं मदनदोषहरम् ।


शत्रु द्वारा किये गये घातक प्रयोगों का प्रतीकार

( १ ) शत्रु द्वारा किये गये दूषक तथा विष आदि के घातक प्रयोगों का प्रतीकार इस प्रकार करना चाहिए : लहसोड़ा ( श्लेष्मातक ), कैथा ( कपित्थ ), जमालघोटा ( दंती ); जम्भीरी नीबू ( दंतशठ ), गोभी ( गोजी ); सिरस ( शिरीष ), काली पाढरी या पाटल ( पाटली ), खरैंटी ( बला ), सोनापाठा ( स्योनाक ); पुनर्नवा, शराव और वरनावृक्ष का काढ़ा बना कर चंदन, सालावृकी ( बंदरिया या सियारिन या कुतिया ) के खून से सानकर बांस के पानी ( तेजनोदक ) से राजा के उपयोग में आने वाली स्त्रियों की योनि, स्तन आदि गुप्तांगों को साफ कराया जाय और सेना में प्रयुक्त विष का प्रतीकार किया जाय ।

( २ ) दागीमृग ( पृषतन ), नेवला, मोर और गोह के पित्ते को काले संभालू ( मषी ) तथा राई के चूर्ण में मिलाकर बनाये गये योग से पागल बना देने वाले विषों का प्रतीकार किया जाय । संभालू, बरना, दूब ( बारुणी ), चौलाई, बाँस का अग्रभाग ( शतपर्वाग्र ) और मैनफल, इन सब चीजों का योग भी उन्मादजन्य दोषों का उपशमन करने वाला होता है ।

( ३ ) शृगालविन्ना औषधि, धतूरा ( मदन ), संभालू ( सिंधुवारित ), बरना ( वरण ) और गजपीपल ( वारणवल्लीमूल ) इन सबकी जड़ों को मिलाकर अथवा उनका अलग-अलग काढा, दूध के साथ पीने से उन्माद पैदा करने वाले विषयोगों को शांत कर देता है ।

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प्र० १७९ : अ० ४ ] घातक प्रयोगों का प्रतीकार ७६१

( १ ) कैडर्यपूतिलतैलमुन्मादहरं नस्तःकर्म ।
( २ ) प्रियङ्गुनक्तमालयोगः कुष्ठहरः ।
( ३ ) कुष्ठलोध्रयोगः पाकशोषण्नः ।
( ४ ) कट्फलद्रवन्तीविलङ्गचूर्णं नस्तःकर्म शिरोरोगहरम् ।
( ५ ) प्रियङ्गुमञ्जिष्ठातगरलाक्षारसमधुकहरिद्राक्षौद्रयोगो रज्जूदक-विषप्रहारपतननिःसंज्ञानां पुनःप्रत्यानयनाय ।
( ६ ) मनुष्याणामक्षमात्रं, गवाश्वानां द्विगुणं, चतुर्गुणं हस्त्युष्ट्राणाम् ।
( ७ ) रुक्मगर्भश्चैषां मणिः सर्वविषहरः ।
( ८ ) जीवन्तीश्वेतामुष्ककपुष्पवन्दाकानामक्षीबे जातस्य अश्वत्थस्य मणिः सर्वविषहरः ।


( १ ) कायफल ( कैडर्य ), कांटेदार कंजरुआ ( पूति ) और तिल इन तीनों के तेल को नासिका में डालने से उन्माद शांत हो जाता है ।

( २ ) मेंहदी या कांगनी ( प्रियंगु ) और करंज ( नक्तमाल ), इन दोनों का योग कुष्ठ-रोग को दूर कर देता है ।

( ३ ) कूट और लोध से बनाया गया योग पाकरोग ( बाल आदि का पकना ) और क्षयरोग को दूर कर देता है ।

( ४ ) कायफल ( कट्फल ), मूषकपर्णी ( द्रवंत्ती ) और बायविडंग ( विडंग ), इन तीनों के चूर्ण को नासिका में डालने से शिर के समस्त रोग दूर हो जाते हैं ।

( ५ ) प्रियंगु, मजीठ, तगर; लाख, महुआ, हल्दी और शहद इन सब चीजों का चूर्णयोग रस्सी, दूषित जल, विष, चोट तथा गिर जाने से हुई बेहोशी को दूर करने में लाभदायक है ।

( ६ ) प्रतीकार के लिए दी जाने वाली उक्त औषधियों की मात्रा मनुष्यों के लिए एक अक्ष ( सोलह माष ), गाय तथा घोड़ों को उससे दुगुनी और हाथी तथा ऊँटों को उससे चौगुनी देनी चाहिए ।

( ७ ) बेहोशी को दूर करने वाला जो योग ऊपर बताया गया है उसको यदि सोने के पत्तर में रखकर उसका तावीज बनाकर धारण किया जाय तो किसी भी प्रकार का विष असर नहीं करने पाता है ।

( ८ ) गिलोय ( जीवन्ती ), सफेद संभालू, काली पाढ़री, पुष्प ( औषधि ) और अमरवेल ( बन्दा ), इन सब को मणि ( ताबीज ); अथवा सहिजन या नीम के पेड़ में पैदा हुए पीपल के पत्ते को ताबीज में रख कर बाँध दिया जाय तो सभी प्रकार के विष शांत हो जाते हैं ।

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७६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) तूर्याणां तैः प्रलिप्तानां शब्दो विषविनाशनः ।
लिप्तध्वजं पताकां वा दृष्ट्वा भवति निर्विषः ॥
(२) एतैः कृत्वा प्रतीकारं स्वसैन्यानामथात्मनः ।
अमित्रेषु प्रयुञ्जीत विषधूमाम्बुदूषणान् ॥

इति औपनिषदिके चतुर्दशेऽधिकरणे स्वबलोपघातप्रतीकारो नाम चतुर्थोऽध्यायः;
आदितोऽष्टचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
समाप्तमिदमौपनिषदिकं चतुर्दशमधिकरणम् ।
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(१) गिलोय आदि औषधियों से चुपड़े गये वाद्यों का शब्द विष को नष्ट करने वाला होता है । इसी प्रकार इन्हीं औषधियों से लिप्त ध्वजाओं को देखकर भी विष का प्रभाव जाता रहता है ।

(२) विजिगीषु राजा को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार की औषधियों द्वारा वह अपनी सेना की तथा अपनी रक्षा करके विषैले धुंए का और विषाक्त पानी का प्रयोग सदा अपने शत्रुओं पर करता रहे ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में स्वबलोपघातप्रतीकार नामक चौथा अध्याय समाप्त
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पन्द्रहवाँ अधिकरण

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पन्द्रहवाँ अधिकरण

तन्त्रयुक्ति

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प्रकरण १८०
अध्याय १

तन्त्रयुक्तयः


(१) मनुष्याणां वृत्तिरर्थः, मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः, तस्याः पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ।

(२) तद् द्वात्रिंशद्युक्तियुक्तम्—अधिकरणं, विधानं, योगः, पदार्थः, हेत्वर्थः, उद्देशः, निर्देशः, उपदेशः, अपदेशः, अतिदेशः, प्रदेशः, उपमानम्, अर्थापत्तिः, संशयः, प्रसङ्गः, विपर्ययः, वाक्यशेषः, अनुमतम्, व्याख्यानम्, निर्वचनं, निदर्शनम्, अपवर्गः, स्वसंज्ञा, पूर्वपक्षः, उत्तरपक्षः, एकान्तः, अनागतावेक्षणम्, अतिक्रान्तावेक्षणम्, नियोगः, विकल्पः, समुच्चयः, ऊह्यमिति ।

(३) यमर्थमधिकृत्योच्यते तदधिकरणम्—‘पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि प्रायशस्तानि संहृत्यैकमिद-मर्थशास्त्रं कृतम्’ ( अधि० १. अध्या० १ ) इति ।


अर्थशास्त्र की युक्तियाँ

( १ ) मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहते हैं । मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं । इस प्रकार की भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है ।

( २ ) वह अर्थशास्त्र बत्तीस प्रकार की युक्तियों से समन्वित है; जिनकी नामावली इस प्रकार है : १. अधिकरण २. विधान ३. योग ४. पदार्थ ५. हेत्वर्थ ६. उद्देश्य ७. निर्देश ८. उपदेश ९. अपदेश १०. अतिदेश ११. प्रदेश १२ उपमान १३. अर्थापत्ति १४. संशय १५. प्रसंग १६. विपर्यय १७. वाक्यशेष १८. अनुमत १९. व्याख्यान २०. निर्वचन २१. निदर्शन २२. अपवर्ग २३. स्वसंज्ञा २४. पूर्वपक्ष २५. उत्तरपक्ष २६. एकांत २७. अनागतावेक्षण २८. अतिक्रांतावेक्षण २९. नियोग ३०. विकल्प ३१. समुच्चय और ३२. ऊह्य ।

( ३ ) अधिकारपूर्वक कहे गये अर्थ का नाम अधिकरण है, ग्रन्थारंभ में जैसे सम्पूर्ण पृथिवी को प्राप्त करने तथा पालन करने का कथन कर संपूर्ण शास्त्र को एक अधिकरण बताया गया है । इसी प्रकार अपने-अपने अर्थों को अधिकारपूर्वक निरूपण करने वाले विनयाधिकारिकः अध्यक्षप्रचार आदि अधिकरण हैं ।

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७६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवां अधिकरण

(१) शास्त्रस्य प्रकरणानुपूर्वी विधानम्—‘विद्यासमुद्देशः, वृद्धसंयोगः, इन्द्रियजयः, अमात्योत्पत्तिः' (अधि० १. अध्या० १) इत्येवमादिकमिति ।

(२) वाक्ययोजना योगः—‘चतुर्वर्णाश्रमो लोकः' (अधि० १. अध्या० ४) इति ।

(३) पदावधिकः पदार्थः—‘मूलहरः' इति पदम् । ‘यः पितृपैतामहमर्थ-मन्यायेन भक्षयति स मूलहरः' ( अधि० २. अध्या० ९ ) इत्यर्थः ।

(४) हेतुरर्थसाधको हेत्वर्थः—‘अर्थमूलौ हि धर्मकामौ' ( अधि० १. अध्या० ७ ) इति ।

(५) समासवाक्यमुद्देशः—‘विद्याविनयहेतुरिन्द्रियजयः' ( अधि० १. अध्या० ६ ) इति ।

(६) व्यासवाक्यं निर्देशः—‘कर्णत्वगक्षिजिह्वाघ्राणेन्द्रियाणां शब्दस्पर्श-रूपरसगन्धेष्वविप्रतिपत्तिरिन्द्रियजयः' (अधि० १ अध्या० ६) इति ।

(७) एवं वर्तितव्यमित्युपदेशः—‘धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत न निः-सुखः स्यात्' (अधि० १, अध्या० ७ ) इति ।


(१) प्रकरण के अनुसार शास्त्र की आनुपूर्वी का कथन करना विधान कहलाता है, जैसे : विद्यासमुद्देश, वृद्धसंयोग, इन्द्रियजय और अमात्योत्पत्ति आदि ।

(२) वाक्य-योजना को योग कहते हैं, जैसे : ‘चतुर्वर्णाश्रमो लोकः’ चारों वर्णाश्रम के लोग ।

(३) केवल पद के अर्थ को पदार्थ कहते हैं, जैसे : ‘मूलहर’ यह एक पद है उसका यह अर्थ कि ‘पैतृक सम्पत्ति को अन्याय से नष्ट कर दे या अपहरण कर ले’ । यह ‘मूलहर’ पद का अर्थ है ।

(४) अर्थ को सिद्ध करने वाला हेतु हेत्वर्थ कहलाता है, जैसे धर्म और काम अर्थ पर ही निर्भर है ।

(५) संक्षिप्त वाक्य का कथन उद्देश कहलाता है, जैसे विद्या और विनय इन्द्रियजय पर निर्भर है ।

(६) विस्तृत वाक्य का कथन करना निर्देश कहलाता है, जैसे : नाक, त्वचा, आँख, जीभ, कान को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि की ओर से बचाना ही इन्द्रियजय है ।

(७) ‘इस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए’ ऐसा कहना उपदेश कहलाता है, जैसे : धर्म और अर्थ के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, इसके प्रतिकूल चलने वाला सुखी नहीं रहता है ।

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प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७६७

(१) एवमसावाहैत्यपदेशः—'मन्त्रिपरिषदं द्वादशामात्यान् कुर्वीतेति मानवाः, षोडशेति बार्हस्पत्याः, विंशतिमित्यौशनसाः, यथासामर्थ्यमिति कौटिल्यः' (अधि० १. अध्या० १५) ।

(२) उक्तेन साधनमतिदेशः—'दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम्' (अधि० ३. अध्या० १६) इति ।

(३) वक्तव्येन साधनं प्रदेशः—'सामदानभेददण्डैर्वा यथापत्सु व्याख्यास्यामः' (अधि० ७. अध्या० १४) इति ।

(४) दृष्टेनादृष्टस्य साधनमुपमानम्—'निवृत्तपरिहारान् पितेवानुगृह्णीयात्' (अधि० २. अध्या० १) इति ।

(५) यदनुक्तमर्थादापद्यते सार्थापत्तिः—'लोकयात्राविद् राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणाश्रयेत' (अधि० ५. अध्या० ४) नाप्रियहितद्वारेणाश्रयेतेत्यर्थादापन्नं भवतीति ।


( १ ) 'अमुक व्यक्ति ने इस विषय में ऐसा कहा है' इस प्रकार दूसरे के मत को प्रकट करना अपदेश कहलाता है; जैसे : मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि मंत्रि-परिषद् में बारह अमात्य होने चाहिए । बृहस्पति के अनुयायियों के मत से उनकी संख्या सोलह, उशना के अनुयायियों के मत से बीस और कौटिल्य के मत से सामर्थ्य के अनुसार अमात्यों की संख्या होनी चाहिए ।

( २ ) कही हुई बात से, न कही हुई बात को सिद्ध कर देना अतिदेश कहलाता है जैसे; दी गई वस्तुओं को न लौटाने पर ऋणदान-विषयक नियमों को समझ लेना चाहिए ।

( ३ ) आगे कही जाने वाली बात से न कही गई बात को सिद्ध कर देना प्रदेश कहलाता है; जैसे : साम, दान, भेद और दण्ड के द्वारा वैसा ही करना चाहिए, जैसे आपत्प्रकरण अध्याय में आगे कहा जायेगा ।

( ४ ) देखी हुई वस्तु से न देखी हुई वस्तु को सिद्ध करना उपमान कहलाता है; जैसे : यदि पुरवासी उस परिहार द्रव्य को चुकता कर दें तो राजा को पिता के समान उन पर अनुग्रह करना चाहिए ।

( ५ ) न कही हुई जो बात अर्थ से ही प्राप्त हो जाय उसे अर्थापत्ति कहते हैं, जैसे लोक व्यवहार में पटु व्यक्तियों को चाहिए कि वे आत्मद्रव्य-प्रकृतिसंपन्न राजा का आश्रय उसके प्रिय और हितैषी लोगों के द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा करें । अर्थात् 'अप्रिय और अहितकर लोगों के द्वारा आश्रय न लें', यह आशय उक्त सूत्र में अर्थापत्ति के द्वारा ही जाना जा सकता है ।

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७६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवाँ अधिकरण

(१) उभयतो हेतुमानर्थः संशयः–‘क्षीणलुब्धप्रकृतिमपचरितप्रकृतिं वा’ (अधि० ७. अध्या० ५) इति ।
(२) प्रकरणान्तरेण समानोऽर्थः प्रसङ्गः–‘कृषिकर्मप्रदिष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेण’ ( अधि १. अध्या० ११ ) इति ।
(३) प्रतिलोमेन साधनं विपर्ययः–‘विपरीतमतुष्टस्य’ ( अधि० १. अ० १६ ) इति ।
(४) येन वाक्यं समाप्यते, स वाक्यशेषः–‘छिन्नपक्षस्येव राज्ञश्चेष्टानाशश्चेति’ ( अधि० ८. अध्या० १) । तत्र शकुनेरिति वाक्यशेषः ।
(५) परवाक्यमप्रतिषिद्धमनुमतम्–‘पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः’ (अधि० १०. अध्या० ६) इति ।
(६) अतिशयवर्णना व्याख्यानम्–‘विशेषतश्च सङ्घानां सङ्घधर्मिणां च राजकुलानां द्यूतनिमित्तो भेदः तन्निमित्तो विनाश इत्यसत्प्रग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानां तन्त्रदौर्बल्यात्’ (अधि० ८. अध्या० ३) इति ।
(७) गुणतः शब्दनिष्पत्तिर्निर्वचनम्–‘व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनम्’ (अधि० ८. अध्या० १) इति ।


( १ ) एक ही बात जब दोनों विरोधी पक्षों की ओर से समान लगे तो उसे संशय कहते हैं; जैसे : क्षीण-क्षुब्ध-प्रकृति और अपचरित प्रकृति, इन दोनों राजाओं में से पहिले किस राजा पर आक्रमण करना चाहिए ?

( २ ) दूसरे प्रकरण के साथ अर्थ की समानता होना प्रसंग कहलाता है, जैसे : खेती के लिए निर्दिष्ट भूमि के संबंध में पूर्ववत् नियम समझना चाहिए ।

( ३ ) विपरीत बातों से किसी वस्तु का निर्देश करना विपर्यय कहलाता है, जैसे : इससे विपरीत भाव होने पर उसको अपने से प्रसन्न समझे ।

( ४ ) जिससे वाक्य की समाप्ति हो उसे वाक्यशेष कहते हैं; जैसे : पंख-कटे पक्षी की तरह राजा की समस्त चेष्टायें नष्ट हो जाती हैं । यहाँ पर ‘पक्षी’ ( शकुनि ) पद वाक्यशेष है ।

( ५ ) प्रतिषेध न किया हुआ दूसरे का वाक्य अनुमत कहलाता है, जैसे : पक्ष, उरस्य और प्रतिग्रह इस प्रकार का व्यूह-विभाग उशना आचार्य ने किया है ।

( ६ ) सिद्ध अर्थ का अनेक युक्तियों के द्वारा समर्थन करना व्याख्यान कहलाता है, जैसे : और विशेषतः एकमत होकर एक साथ रहने वाले राजकुलों का द्यूत के कारण मतभेद हो जाने से दोनों का नाश हो जाता है । दुर्जन लोगों का साथ या सत्कार तथा मद्यपान अन्य सभी व्यसनों से बड़ा व्यसन है; क्योंकि उससे राजा का सारा शासनतन्त्र दुर्बल हो जाता है ।

( ७ ) अर्थान्वयपूर्वक किसी शब्द की सिद्धि करना निर्वचन कहलाता है; जैसे :

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प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७६९

(१) दृष्टान्तो दृष्टान्तयुक्तो निदर्शनम्–‘विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाभ्युपैति’ (अधि० ७. अध्या० ३) इति ।
(२) अभिप्लुतव्यपकर्षणमपवर्गः–‘नित्यमासन्नमरिबले वासयेदन्य-त्राभ्यन्तरकोपशङ्कायाः’ ( अधि० ९. अध्या० २) इति ।
(३) परैरसंमितः शब्दः स्वसंज्ञा–प्रथमा प्रकृतिस्तस्य भूम्यनन्तरा द्वितीया भूम्येकान्तरा तृतीया (अधि० ६. अध्या० २) इति ।
(४) प्रतिषेद्धव्यं वाक्यं पूर्वपक्षः–‘स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीयः’ (अधि० ८. अध्या० १) इति ।
(५) तस्य निर्णयनवाक्यमुत्तरपक्षः–‘तदायत्तत्वात्, तत्कूटस्थानीयो हि स्वामी’ (अधि० ८. अध्या० १)।
(६) सर्वत्रायतमेकान्तः–‘तस्मादुत्थानमात्मनः कुर्वीत’ (अधि० १. अध्या १९) इति ।

व्यसन शब्द का अर्थ ही यह है कि जो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट कर दे—व्यस्यति एनं श्रेयसः इति व्यसनम् ।

( १ ) दृष्टांत देकर किसी बात का स्पष्टीकरण करना निदर्शन कहलाता है । जैसे : किसी शक्तिशाली से लड़ना ऐसा ही है, जैसे हाथी पर चढ़े हुए व्यक्ति से जमीन पर खड़े होकर युद्ध करना ।

( २ ) किसी नियम का सामान्यतया व्यापक निरूपण करते हुए उसके विषय को संकुचित बना देना अपवर्ग कहलाता है, जैसे अपने राज्य के सीमांत प्रदेश में शत्रु-सेना को रहने दिया जाय, किन्तु यदि राज्य-क्रांति होने की संभावना हो तो उसको कदापि न टिकने दिया जाय ।

( ३ ) दूसरों के द्वारा संकेत न किये गये शब्द-प्रयोग को स्वसंज्ञा कहते हैं, जैसे : विजिगीषु के राष्ट्र के समीप जो राष्ट्र हो उसे प्रथमा प्रकृति, उसके बाद जो राष्ट्र हो उसे द्वितीया प्रकृति और उसके बाद भी जो राष्ट्र हो उसे तृतीया प्रकृति कहते हैं।

( ४ ) प्रतिषेध किया जाने वाला वाक्य पूर्वपक्ष कहलाता है, जैसे : स्वामी और अमात्य-संबंधी विपत्ति में अमात्य संबंधी विपत्ति अधिक अनिष्टकर है ।

( ५ ) पूर्वपक्ष का निषेध करने वाला वाक्य उत्तरपक्ष कहलाता है, जैसे : अमात्य आदि प्रकृतियों का उत्थान-पतन राजा पर ही निर्भर होता है, क्योंकि सातों प्रकार की प्रकृतियों में राजा ही प्रधान ( कूटस्थानीय ) होता है ।

( ६ ) जो अर्थ किसी भी देश-काल में न छोड़ा जा सके उसको एकांत कहते हैं, जैसे राजा को चाहिए कि वह सदा अपने को उन्नतिशील बनाने का यत्न करता रहे ।

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७७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवां अधिकरण

(१) पश्चादेवं विहितमित्यनागतावेक्षणम्—‘तुलाप्रतिमानं पौतवाध्यक्षे वक्ष्यामः’ (अधि० २. अध्या० १३) इति ।

(२) पुरस्तादेवं विहितमित्यतिक्रान्तावेक्षणम्—‘अमात्यसम्पदुक्ता पुरस्तात्’ (अधि० ६. अध्या० १) इति ।

(३) एवं नान्यथेति नियोगः—‘तस्माद् धर्ममर्थं चास्योपदिशेन्नाधर्ममनर्थं च’ (अधि० १. अध्या० १७) इति ।

(४) अनेन वानेन वेति विकल्पः—‘दुहितरो वा धर्मिष्ठेषु विवाहेषु जाताः’ (अधि० ३. अध्या० ५) इति ।

(५) अनेन चानेन चेति समुच्चयः—‘स्वसञ्जातः पितृबन्धूनां च दायादः’ (अधि० ३. अध्या० ७) इति ।

(६) अनुक्तकरणमूह्यम्—‘यथावद् दाता प्रतिग्रहीता च नोपहतौ स्यातां, तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः’ (अधि० ३. अध्या० १६) इति ।

(७) एवं शास्त्रमिदं युक्तमेताभिस्तन्त्रयुक्तिभिः ।
अवाप्तौ पालने चोक्तं लोकस्यास्य परस्य च ॥


(१) ‘पीछे से इस प्रकार का विधान किया जायेगा’, इस प्रकार कहना अनागतावेक्षण कहलाता है; जैसे तौलने के तरीकों का निरूपण आगे पौतवाध्यक्ष प्रकरण में किया जायेगा ।

(२) ‘इस का निरूपण पहिले किया जा चुका है’ ऐसा कहना अतिक्रांतावेक्षण कहलाता है; जैसे : अमात्यों के गुणों का निरूपण पहिले किया जा चुका है ।

(३) ‘अमुक कार्य इस ढंग से करना चाहिये, अन्यथा नहीं’ ऐसा कहना नियोग कहलाता है; जैसे : इसलिये सरल बुद्धि बालकों को सदा धर्म और अर्थ का ही उपदेश करना चाहिए; अधर्म और अनर्थ का कदापि नहीं ।

(४) ‘अमुक कार्य इस तरह से किया जाना चाहिए अथवा इस तरह से ?,’ ऐसा कहना विकल्प कहलाता है; जैसे : उस सम्पत्ति के अधिकारी उसके पुत्र हों अथवा वे लड़कियाँ, जो धार्मिक विवाहों से पैदा हुई हैं ?

(५) ‘अमुक कार्य इस तरह भी हो सकता है, और इस तरह भी’ ऐसा कहना समुच्चय कहलाता है; जैसे : पिता या उसके बान्धवों से उत्पन्न किया हुआ बालक उन दोनों की सम्पत्ति का दायभागी होता है ।

(६) न कही हुई बात को कर लेना ऊह्य कहलाता है; जैसे : निपुण धर्मस्थ व्यक्तियों को उचित है कि वे अनुरूप ( दान ) का इस प्रकार निर्णय करें, जिससे देने और लेने वाले, दोनों को कोई हानि न पहुँचे ।

(७) इस प्रकार इस शास्त्र में बत्तीस तन्त्र-युक्तियों का निरूपण किया गया

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प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७७१

(१) धर्ममर्थं च कामं च प्रवर्तयति पाति च ।
अधर्मानर्थ विद्वेषानिदं शास्त्रं निहन्ति च ॥
(२) येन शास्त्रं च शस्त्रं च नन्दराजगता च भूः ।
अमर्षेणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम् ॥
(३) दृष्ट्वा विप्रतिपत्तिं बहुधा शास्त्रेषु भाष्यकाराणाम् ।
स्वयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रं च भाष्यं च ॥

इति कौटिलीये अर्थशास्त्रे तन्त्रयुक्तौ पञ्चदशाधिकरणे तन्त्रयुक्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितश्चतुःशदुत्तरशततमः ।

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एतावता कौटिलीयस्यार्थशास्त्रस्य तन्त्रयुक्तिः पञ्चदशमधिकरणं समाप्तम्

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है। इस लोक और परलोक की प्राप्ति तथा रक्षा करने में यही शास्त्र सहायक बताया गया है ।

( १ ) यही अर्थशास्त्र धर्म, अर्थ तथा काम में प्रवृत्त करता है, उनकी रक्षा करता है और अर्थ के विरोधी अधर्मों को नष्ट करता है ।

( २ ) जिसने शास्त्र, शस्त्र और नन्दराजा के अधीनस्थ भूमि का शीघ्र उद्धार अपने क्रोध किया है, उसी विष्णुगुप्त कौटिल्य ने इस अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थ की रचना की है ।

( ३ ) प्राचीन अर्थ-शास्त्रों में बहुधा भाष्यकारों के मतभेदों को देखकर स्वयं ही विष्णुगुप्त कौटिल्य ने इस अर्थशास्त्र के सूत्रों और उनके भाष्य का निर्माण किया है ।

तन्त्रयुक्ति नामक पन्द्रहवें अधिकरण में तन्त्रयुक्ति नामक पहला अध्याय समाप्त

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१७०


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... (२)
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... (३)
...


... (१)

... (२)

... (३)

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र

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रस भक्ति-आख्यान

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र

सुखस्य मूलं धर्मः ॥ १ ॥ धर्मस्य मूलमर्थः ॥ २ ॥ अर्थस्य मूलं राज्यम् ॥ ३ ॥ राज्यमूलमिन्द्रियजयः ॥ ४ ॥ इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः ॥ ५ ॥ विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा ॥ ६ ॥ वृद्धसेवाया विज्ञानम् ॥ ७ ॥ विज्ञानेनात्मानं सम्पादयेत् ॥ ८ ॥ सम्पादितात्मा जितात्मा भवति ॥ ९ ॥ जितात्मा सर्वार्थैः संयुज्येत ॥ १० ॥ अर्थसम्पत्प्रकृतिसम्पदं करोति ॥११॥ प्रकृतिसम्पदा ह्यनायकमपि राज्यं नीयते ॥ १२ ॥ प्रकृतिकोपः सर्वकोपेभ्यो गरीयान् ॥ १३ ॥

अविनीतस्वामिलाभादस्वामिलाभः श्रेयान् ॥ १४ ॥ सम्पाद्यात्मानमन्विच्छेत् सहायवान् ॥ १५ ॥ नासहायस्य मन्त्रनिश्चयः ॥ १६ ॥ नैकं चक्रं परिभ्रमयति ॥ १७ ॥ सहायः समसुखदुःखः ॥ १८ ॥

मानी प्रतिमानिनमात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत् ॥ १९ ॥ अविनीतं स्नेहमात्रेण न मन्त्रे कुर्वीत ॥ २० ॥ श्रुतवन्तमुपधाशुद्धं मन्त्रिणं कुर्वीत ॥ २१ ॥ मन्त्रमूलाः सर्वारम्भाः ॥ २२ ॥ मन्त्ररक्षणे कार्यसिद्धिर्भवति


सुख का मूल धर्म है ॥ १ ॥ धर्म का मूल अर्थ है ॥ २ ॥ अर्थ का मूल राज्य है ॥ ३ ॥ राज्य का मूल इन्द्रियजय है ॥ ४ ॥ इन्द्रियजय का मूल विनय ( नम्रता ) है ॥ ५ ॥ विनय का मूल वृद्धों की सेवा है ॥ ६ ॥ वृद्धों की सेवा का मूल विज्ञान है ॥ ७ ॥ इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आप को विज्ञान से सम्पन्न बनाए ( आत्मोन्नति करे ) ॥ ८ ॥ जो पुरुष विज्ञान से सम्पन्न होता है वह स्वयं को भी जीत सकता है ॥ ९ ॥ अपने ऊपर काबू पाने वाला मनुष्य समस्त अर्थों से सम्पन्न होता है ॥ १० ॥ अर्थ-सम्पत्ति अमात्य आदि प्रकृति सम्पत्ति को देने वाली होती है ॥ ११ ॥ प्रकृति-सम्पत्ति, के द्वारा नेता-रहित राज्य का भी संचालन किया जा सकता है ॥ १२ ॥ अमात्य आदि का कोप सब कोपों में बड़ा होता है ॥ १३ ॥

अविनीत स्वामी के प्राप्त होने की अपेक्षा, स्वामी का न मिलना श्रेयस्कर है ॥ १४ ॥ अपने आपको सर्व-सम्पन्न बना लेने के बाद ही सहायकों की इच्छा करनी चाहिए ॥ १५ ॥ सहायकहीन व्यक्ति के विचार अनिश्चित होते हैं ॥ १६ ॥ एक पहिये से गाड़ी को नहीं चलाया जा सकता ॥ १७ ॥ सहायक वही है, जो अपने सुख-दुःख में सदा साथ रहे ॥ १८ ॥

मनस्वी राजा को चाहिए कि वह, अपने समान दूसरे मनस्वी व्यक्ति को ही अपना सलाहकार नियुक्त करे ॥ १९ ॥ विनयहीन व्यक्ति को, एकमात्र स्नेह के कारण, कभी भी सलाह के समय सम्मिलित नहीं करना चाहिए ॥ २० ॥ बहुश्रुत एवं सब तरह से परीक्षित व्यक्ति को ही मन्त्री नियुक्त करना चाहिए ॥ २१ ॥ समस्त

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७७६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र

॥ २३ ॥ मन्त्रविस्रावी कार्यं नाशयति ॥ २४ ॥ प्रमादाद् द्विषता वशमुप-
यास्यति ॥ २५ ॥ सर्वद्वारेभ्यो मन्त्रो रक्षितव्यः ॥ २६ ॥ मन्त्रसम्पदा
राज्यं वर्धते ॥ २७ ॥ श्रेष्ठतमां मन्त्रगुप्तिमाहुः ॥ २८ ॥ कार्यान्धस्य
प्रदीपो मन्त्रः ॥ २९ ॥ मन्त्रचक्षुषा परिच्छिद्राण्यवलोकयन्ति ॥ ३० ॥
मन्त्रकाले न मत्सरः कर्तव्यः ॥ ३१ ॥ त्रयाणामेकवाक्ये सम्प्रत्ययः
॥ ३२ ॥ कार्याकार्यतत्त्वार्थदर्शिनो मन्त्रिणः ॥ ३३ ॥ षट्कर्णाद् भिद्यते
मन्त्रः ॥ ३४ ॥
आपत्सु स्नेहसंयुक्तं मित्रम् ॥ ३५ ॥ मित्रसंग्रहणे बलं संपद्यते ॥३६॥
बलवानलब्धलाभे प्रयतते ॥ ३७ ॥ अलब्धलाभो नालसस्य ॥ ३८ ॥
अलसस्य लब्धमपि रक्षितुं न शक्यते ॥ ३९ ॥ न चालसस्य रक्षितं विवर्धते
॥ ४० ॥ न भृत्यान् प्रेषयति ॥ ४१ ॥
अलब्धलाभादिचतुष्टयं राज्यतन्त्रम् ॥ ४२ ॥ राज्यतन्त्रायतं नीति-
शास्त्रम् ॥ ४३ ॥ राज्यतन्त्रेष्ववायत्तौ तन्त्रावापौ ॥ ४४ ॥ तन्त्रं स्वविषय-
कृत्येष्ववायत्तम् ॥ ४५ ॥ आवापो मण्डलनिविष्टः ॥ ४६ ॥ सन्धिविग्रह-


कार्य-व्यापार मन्त्र पर ही निर्भर है ॥ २२ ॥ मन्त्र की रक्षा करने से ही कार्य की सिद्धि होती है ॥ २३ ॥ मन्त्र का भेद खोल देने वाला व्यक्ति कार्य को नष्ट कर देता है ॥ २४ ॥ प्रमाद करने से ( व्यक्ति ) शत्रु के वश में चला जाता है ॥ २५ ॥ इस-लिए सभी प्रकार से मन्त्र की रक्षा करनी चाहिए ॥ २६ ॥ मन्त्र की सुरक्षा से राज्य की संवृद्धि होती है ॥ २७ ॥ मन्त्र को गुप्त रखना बड़े महत्त्व की बात है ॥ २८ ॥ कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित राजा के लिए मन्त्र दीपक के तुल्य है ॥ २९ ॥ मन्त्ररूपी आंखों से राजा अपने शत्रु के दोषों को देख लेता है ॥ ३० ॥

मन्त्र के समय ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए ॥ ३१ ॥ तीन व्यक्तियों की एक राय होने पर किसी विषय का निश्चय किया जा सकता है ॥ ३२ ॥ कार्य और अकार्य की वास्तविकता को देखने वाले मन्त्री होते हैं ॥ ३३ ॥ छह कानों में जाते ही मन्त्र का भेद प्रकट हो जाता है ॥ ३४ ॥

जो व्यक्ति आपत्ति के समय, स्नेह से अपने साथ बना रहे, वही मित्र है ॥ ३५ ॥ अधिक मित्रों के बना लेने से अपना बल बढ़ जाता है ॥ ३६ ॥

बलवान् व्यक्ति अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति के लिए यत्न करता है ॥ ३७ ॥ आलसी व्यक्ति अप्राप्त वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ ३८ ॥ यदि कदाचित् उसको प्राप्त हो जाये तो वह उसकी रक्षा नहीं कर पाता ॥ ३९ ॥ उसके द्वारा रक्षित वस्तु बढ़ती नहीं है ॥ ४० ॥ न वह अपने भृत्यवर्ग को ही वितरित करता है ॥ ४१ ॥

अप्राप्त की प्राप्त, प्राप्ति का संरक्षण, संरक्षित का संवर्द्धन और संवर्द्धित का वितरण—ये चार ही राज्य के सर्वस्व हैं ॥ ४२ ॥ राज्यतन्त्र ( राजस्थिति ) का आधार नीतिशास्त्र है ॥ ४३ ॥ तन्त्र और आवाप राज्यतन्त्र के अधीन होते हैं

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चाणक्य-प्रणीत सूत्र — ७७७

योनिर्मण्डलः ॥ ४७ ॥ नीतिशास्त्रानुगो राजा ॥४८॥ अनन्तरप्रकृतिः शत्रुः ॥ ४९ ॥ एकान्तरितं मित्रमिष्यते ॥ ५० ॥ हेतुतः शत्रुमित्रे भविष्यतः ॥ ५१ ॥ हीयमानः सन्धिं कुर्वीत ॥ ५२ ॥ तेजो हि सन्धानहेतुस्तदर्थिनाम् ॥ ५३ ॥ नातप्तलोहो लोहेन संधीयते ॥ ५४ ॥

बलवान् हीनेन विगृह्णीयात् ॥ ५५ ॥ न ज्यायसा समेन वा ॥ ५६ ॥ गजपाद्युद्धमिव बलवद्विग्रहः ॥ ५७ ॥ आमपात्रमामेन सह विनश्यति ॥ ५८ ॥ अरिप्रयत्नमभिसमीक्षेत ॥ ५९ ॥ सन्ध्यायैकतो वा ॥ ६० ॥

अमित्रविरोधादात्मरक्षामवासेत् ॥ ६१ ॥

शक्तिहीनो बलवन्तमाश्रयेत् ॥ ६२ ॥ दुर्बलाश्रयो दुःखमावहति ॥ ६३॥ अग्निवद्राजानमाश्रयेत् ॥ ६४ ॥ राज्ञः प्रतिकूलं नाचरेत् ॥ ६५ ॥ उद्धतवेषधरो न भवेत् ॥ ६६ ॥ न देवचरितं चरेत् ॥ ६७ ॥


॥ ४४ ॥ अपने देश में सामदामादि उपायों का प्रयोग ही 'आयत्त' कहलाता है ॥ ४५ ॥ बाहरी राज्यमण्डल में प्रयुक्त सामदामादि उपायों को ही 'आवाप' कहते हैं ॥ ४६ ॥ सन्धि और विग्रह का निर्णय मण्डल पर निर्भर होता है ॥ ४७ ॥ राजा उसको कहते हैं, जो नीति शास्त्र के अनुसार राज्य का संचालन करे ॥ ४८ ॥ अपने देश से जुड़ी हुई राज्य-सीमा का राजा अपना शत्रु है ॥ ४९ ॥ एक राज्य के बाद अगला राजा अपना मित्र है ॥ ५० ॥ किसी कारणवश ही कोई राजा शत्रु या मित्र बनता है ॥ ५१ ॥ कमजोर को सन्धि कर लेनी चाहिए ॥ ५२ ॥ तेज से ही कार्य-सिद्धि होती है ॥ ५३ ॥ ठंडा लोहा गरम लोहे से नहीं जुड़ता है ॥ ५४ ॥

बलवान् राजा को चाहिए कि वह दुर्बल राजा से झगड़ा कर ले ॥ ५५ ॥ अपने से बड़े या बराबर वाले के साथ झगड़ा न करे ॥ ५६ ॥ बलवान् के साथ किया गया विग्रह वैसा ही होता है, जैसे गज-सैन्य से पदाति-सैन्य का मुकाबला ॥ ५७ ॥ कच्चा बर्तन, कच्चे बर्तन के साथ भिड़कर टूट जाता है । इसलिए बराबर वाले के साथ भी लड़ाई नहीं करनी चाहिए ॥ ५८ ॥ शत्रु के प्रयत्न का सदा भलीभांति निरीक्षण करते रहना चाहिए ॥ ५९ ॥ अनेक शत्रु होने पर एक शत्रु से संधि कर लेनी चाहिए ॥ ६० ॥

शत्रु के विरोध को भली प्रकार तजबीजना चाहिए; या तो अनेक शत्रु होने पर, एक शत्रु से सन्धि कर लेनी चाहिए । शत्रु के द्वारा किये जाने वाले विरोध से अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥ ६१ ॥

शक्तिहीन राजा को चाहिये कि वह बलवान् का आश्रय ले ले ॥ ६२ ॥ दुर्बल का आश्रय लेने वाला राजा सदा दुःख उठाता है ॥ ६३ ॥ आश्रयी राजा के समीप उसी प्रकार रहना चाहिए, जैसे आग के समीप रहा जाता है ॥ ६४ ॥ राजा के प्रतिकूल कभी भी आचरण न करे ॥ ६५ ॥ उद्धत वेश धारण न करे ॥ ६६ ॥ देवताओं के चरित्र की नकल न करे ॥ ६७ ॥