कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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(१) दृष्टान्तो दृष्टान्तयुक्तो निदर्शनम्–‘विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाभ्युपैति’ (अधि० ७. अध्या० ३) इति ।
(२) अभिप्लुतव्यपकर्षणमपवर्गः–‘नित्यमासन्नमरिबले वासयेदन्य-त्राभ्यन्तरकोपशङ्कायाः’ ( अधि० ९. अध्या० २) इति ।
(३) परैरसंमितः शब्दः स्वसंज्ञा–प्रथमा प्रकृतिस्तस्य भूम्यनन्तरा द्वितीया भूम्येकान्तरा तृतीया (अधि० ६. अध्या० २) इति ।
(४) प्रतिषेद्धव्यं वाक्यं पूर्वपक्षः–‘स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीयः’ (अधि० ८. अध्या० १) इति ।
(५) तस्य निर्णयनवाक्यमुत्तरपक्षः–‘तदायत्तत्वात्, तत्कूटस्थानीयो हि स्वामी’ (अधि० ८. अध्या० १)।
(६) सर्वत्रायतमेकान्तः–‘तस्मादुत्थानमात्मनः कुर्वीत’ (अधि० १. अध्या १९) इति ।
व्यसन शब्द का अर्थ ही यह है कि जो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट कर दे—व्यस्यति एनं श्रेयसः इति व्यसनम् ।
( १ ) दृष्टांत देकर किसी बात का स्पष्टीकरण करना निदर्शन कहलाता है । जैसे : किसी शक्तिशाली से लड़ना ऐसा ही है, जैसे हाथी पर चढ़े हुए व्यक्ति से जमीन पर खड़े होकर युद्ध करना ।
( २ ) किसी नियम का सामान्यतया व्यापक निरूपण करते हुए उसके विषय को संकुचित बना देना अपवर्ग कहलाता है, जैसे अपने राज्य के सीमांत प्रदेश में शत्रु-सेना को रहने दिया जाय, किन्तु यदि राज्य-क्रांति होने की संभावना हो तो उसको कदापि न टिकने दिया जाय ।
( ३ ) दूसरों के द्वारा संकेत न किये गये शब्द-प्रयोग को स्वसंज्ञा कहते हैं, जैसे : विजिगीषु के राष्ट्र के समीप जो राष्ट्र हो उसे प्रथमा प्रकृति, उसके बाद जो राष्ट्र हो उसे द्वितीया प्रकृति और उसके बाद भी जो राष्ट्र हो उसे तृतीया प्रकृति कहते हैं।
( ४ ) प्रतिषेध किया जाने वाला वाक्य पूर्वपक्ष कहलाता है, जैसे : स्वामी और अमात्य-संबंधी विपत्ति में अमात्य संबंधी विपत्ति अधिक अनिष्टकर है ।
( ५ ) पूर्वपक्ष का निषेध करने वाला वाक्य उत्तरपक्ष कहलाता है, जैसे : अमात्य आदि प्रकृतियों का उत्थान-पतन राजा पर ही निर्भर होता है, क्योंकि सातों प्रकार की प्रकृतियों में राजा ही प्रधान ( कूटस्थानीय ) होता है ।
( ६ ) जो अर्थ किसी भी देश-काल में न छोड़ा जा सके उसको एकांत कहते हैं, जैसे राजा को चाहिए कि वह सदा अपने को उन्नतिशील बनाने का यत्न करता रहे ।
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