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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 849 of 918

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Page 849
प्रकरण १८०
अध्याय १

तन्त्रयुक्तयः


(१) मनुष्याणां वृत्तिरर्थः, मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः, तस्याः पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थशास्त्रमिति ।

(२) तद् द्वात्रिंशद्युक्तियुक्तम्—अधिकरणं, विधानं, योगः, पदार्थः, हेत्वर्थः, उद्देशः, निर्देशः, उपदेशः, अपदेशः, अतिदेशः, प्रदेशः, उपमानम्, अर्थापत्तिः, संशयः, प्रसङ्गः, विपर्ययः, वाक्यशेषः, अनुमतम्, व्याख्यानम्, निर्वचनं, निदर्शनम्, अपवर्गः, स्वसंज्ञा, पूर्वपक्षः, उत्तरपक्षः, एकान्तः, अनागतावेक्षणम्, अतिक्रान्तावेक्षणम्, नियोगः, विकल्पः, समुच्चयः, ऊह्यमिति ।

(३) यमर्थमधिकृत्योच्यते तदधिकरणम्—‘पृथिव्या लाभे पालने च यावन्त्यर्थशास्त्राणि पूर्वाचार्यैः प्रस्थापितानि प्रायशस्तानि संहृत्यैकमिद-मर्थशास्त्रं कृतम्’ ( अधि० १. अध्या० १ ) इति ।


अर्थशास्त्र की युक्तियाँ

( १ ) मनुष्यों की जीविका को अर्थ कहते हैं । मनुष्यों से युक्त भूमि को भी अर्थ कहते हैं । इस प्रकार की भूमि को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने वाले उपायों का निरूपण करने वाला शास्त्र अर्थशास्त्र कहलाता है ।

( २ ) वह अर्थशास्त्र बत्तीस प्रकार की युक्तियों से समन्वित है; जिनकी नामावली इस प्रकार है : १. अधिकरण २. विधान ३. योग ४. पदार्थ ५. हेत्वर्थ ६. उद्देश्य ७. निर्देश ८. उपदेश ९. अपदेश १०. अतिदेश ११. प्रदेश १२ उपमान १३. अर्थापत्ति १४. संशय १५. प्रसंग १६. विपर्यय १७. वाक्यशेष १८. अनुमत १९. व्याख्यान २०. निर्वचन २१. निदर्शन २२. अपवर्ग २३. स्वसंज्ञा २४. पूर्वपक्ष २५. उत्तरपक्ष २६. एकांत २७. अनागतावेक्षण २८. अतिक्रांतावेक्षण २९. नियोग ३०. विकल्प ३१. समुच्चय और ३२. ऊह्य ।

( ३ ) अधिकारपूर्वक कहे गये अर्थ का नाम अधिकरण है, ग्रन्थारंभ में जैसे सम्पूर्ण पृथिवी को प्राप्त करने तथा पालन करने का कथन कर संपूर्ण शास्त्र को एक अधिकरण बताया गया है । इसी प्रकार अपने-अपने अर्थों को अधिकारपूर्वक निरूपण करने वाले विनयाधिकारिकः अध्यक्षप्रचार आदि अधिकरण हैं ।