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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

७३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

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७३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) शक्यमेकं वा सामन्तं साधयेत्, तेन द्विगुणो द्वितीयं, त्रिगुणस्तृती-
यम् । एष चतुर्थो मार्गः पृथिवीं जेतुम् ।
(२) जित्वा च पृथिवीं विभक्तवर्णाश्रमां स्वधर्मेण भुञ्जीत ।
(३) उपजापोऽपसर्पो वा वामनं पर्युपासनम् ।
अवमर्दश्च पञ्चैते दुर्गलम्भस्य हेतवः ।

इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे पर्युपासनकर्म अवमर्दश्चेति चतुर्थोऽध्यायः,
आदितस्त्रिचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


(१) अथवा जीतने योग्य समीपस्थ सामन्त को ही पहिले अपने अनुकूल बनाया जाय । उसको मिलाकर जब अपनी शक्ति दुगुनी हो जाय तब दूसरे सामन्त को अपने अनुकूल बनाने का यत्न किया जाय । उसको भी मिलाकर जब अपनी शक्ति तिगुनी हो जाय तब विजिगीषु तीसरे सामन्त को अपने वश में करने का यत्न करे । पृथ्वी को विजय करने का यह चौथा मार्ग है ।

(२) इस प्रकार सारी पृथ्वी का साम्राज्य प्राप्त कर उस शक्तिशाली सम्राट् को चाहिए कि वह अपने साम्राज्य में वर्णों और आश्रमों की यथोचित व्यवस्था कर धर्मपूर्वक पृथिवी के राज्य का उपभोग करे ।

(३) उपजाप ( बहकाना ), अपसर्प ( गुप्तचरों द्वारा शत्रुनाश ), वामन ( विष प्रयोग ), पर्युपासन ( घेरा डालना ) और अवमर्द ( विध्वंस ), ये पाँच उपाय हैं, जिनके द्वारा शत्रु के दुर्ग को जीता जा सकता है ।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में पर्युपासनकर्म-अवमर्द नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण १७६लब्धप्रशमनम्
अध्याय ५

(१) द्विविधं विजिगीषोः समुत्थानम्, अटव्यादिकमेकग्रामादिकं च ।
(२) त्रिविधश्चास्य लम्भः—नवो, भूतपूर्वः, पित्र्य इति ।
(३) नवमवाप्य लम्भं परदोषान् स्वगुणैश्छादयेत् गुणान् गुणद्वैगुण्येन । स्वधर्मकर्मानुग्रहपरिहारदानमानकर्मभिश्च प्रकृतिप्रियहितान्यनुवर्तेत । यथासम्भाषितं च कृत्यपक्षमुपग्राहयेत् । भूयश्च कृतप्रयासम् । अविश्वास्यो हि विसंवादकः स्वेषां परेषां च भवति । प्रकृतिविरुद्धाचारश्च । तस्मात्समानशीलवेषभाषाचारतामुपगच्छेत् । देशदैवतसमाजोत्सवविहारेषु च भक्तिमनुवर्तेत ।


विजित देश में शान्ति की स्थापना

( १ ) विजिगीषु का उद्योग ( समुत्थान ) दो रूपों में फलित होता है । एक जंगल आदि के रूप में और दूसरा गाँव आदि के रूप में ।

( २ ) विजिगीषु का लाभ तीन प्रकार का होता है । १. नव २. भूतपूर्व और ३. पित्र्य ।

( ३ ) नवलाभ : विजिगीषु को चाहिए कि नए राज्य को प्राप्त कर वह शत्रु के दोषों को अपने गुणों से ढक दे और शत्रु के गुणों को अपने दुगुने गुणों से पराभूत कर दे । विजिगीषु सदा अपने धर्म, कर्म, अनुग्रह, परिहार ( करमाफी ), दान और सम्मान आदि श्रेष्ठ कार्यों के द्वारा प्रजा के अनुकूल कल्याणकारी कार्यों के करने में लगा रहे । अपनी पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार अपने कृत्यपक्ष को धन आदि देकर वह सदा प्रसन्न बनाये रखे और जिस प्रजाजन या मित्र ने उसके अभ्युदय में अधिक परिश्रम किया हो उसे विपुल धन देकर खूब प्रसन्न कर दे क्योंकि पहिले प्रतिज्ञा कर बाद में उससे मुकर जाने वाला अपने प्रजावर्ग के विरुद्ध आचरण करने वाला राजा अपने तथा पराये सभी का विश्वास खो बैठता है । इसलिए राजा को उचित है कि वह अपने प्रजाजनों के समान ही शील, वेष, भाषा तथा आचरण का व्यवहार करे और प्रजा के विश्वासों की तरह राष्ट्रदेवता, समाजोत्सव तथा विहारों में अपनी भक्तिभावना रखे ।

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७३२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) देशग्रामजातिसङ्घमुख्येषु चाभीक्ष्णं सत्रिणः परस्यापचारं दर्श-
येयुः। माहाभाग्यं भक्तिं च तेषु स्वामिनः स्वामिसत्कारं च विद्यमानम्।
उचितैश्चैनान् भोगपरिहाररक्षावेक्षणैर्भुञ्जीत। सर्वदेवताश्रमपूजनं च
विद्यावाक्यधर्मशूरपुरुषाणां च भूमिद्रव्यदानपरिहारान् कारयेत्। सर्वबन्धन-
मोक्षणमनुग्रहं दीनानाथव्याधितानां च। चातुर्मास्येष्वर्धमासिकमघातं,
पौर्णमासीषु च चातूरात्रिकं राजदेशनक्षत्रेष्वेकरात्रिकम्। योनिबालवधं
पुंस्त्वोपघातं च प्रतिषेधयेत्। यच्च कोशदण्डोपघातिकमधर्मिष्ठं वा चरित्रं
मन्येत, तदपनीय धर्म्यं व्यवहारं स्थापयेत्। चोरप्रकृतीनां म्लेच्छजातीनां
च स्थानविपर्यासमनेकस्थं कारयेद् दुर्गराष्ट्रदण्डमुख्यानां च। परोपगृही-
तानां च मन्त्रिपुरोहितादीनां परस्य प्रत्यन्तेष्वनेकस्थं वासं कारयेत्। अप-


(१) विजिगीषु के गुप्तचरों को चाहिए कि वे देश, ग्राम, जाति, संघ और संघ-मुख्यों के पास जाकर प्रजा के प्रति किये गये शत्रु के अपकारों को बराबर दिखायें, और साथ ही देश आदि के प्रति किये गये नये विजिगीषु के उदारता, प्रेम तथा सत्कार आदि कार्यों को अच्छी तरह खोलकर रखें। विजिगीषु राजा, समुचित राज-भाग, करमाफी (परिहार) और सुख-सुविधायें (रक्षाक्षण) देकर प्रजा की रक्षा करे। विजिगीषु को चाहिए कि वह सभी धर्मों के देवताओं तथा आश्रमों की पूजा कराये और विद्वानों, वक्ताओं एवं धर्मप्राण व्यक्तियों को भूमि तथा द्रव्य देकर उनसे किसी प्रकार का राजकर वसूल न करे। जो दीन, अनाथ तथा व्याधिग्रस्त प्रजाजन हैं उनकी हर तरह से सहायता करे और कारागार में बन्द सभी अपराधियों को मुक्त कर दे। चार-चार महीने में पंद्रह दिन ऐसे रखे, जिनमें किसी को प्राणदण्ड न दिया जाय। इसी प्रकार वर्ष भर में चार पूर्णमासियां ऐसी छांट ले, जिनमें किसी का वध न किया जाय। राज्याभिषेक और राज्यविजय के नक्षत्रों में किसी का वध न किया जाय। बच्चे पैदा करने वाले मादा जानवरों तथा शिशु जानवरों के वध का सर्वथा निषेध किया जाय; और नर जानवरों को बधिया (पुंस्त्वहीन) न बनाये जाने की भी निषेधाज्ञा कर दी जाय। जिस आचरण को विजिगीषु राजा कोष और सेना के लिए हानिकर तथा धर्माचरण विरुद्ध समझे उसको दूर कर धर्मयुक्त सदाचार की स्थापना करे। चोर प्रकृति म्लेच्छ जातियों तथा दुर्ग, राष्ट्र और सेना के मुख्य अधि-कारियों को परस्पर दूर-दूर स्थानों में नियुक्त करके उनको स्थानान्तरित कर दिया जाय। शत्रु का उपकार करने वाले मंत्री, पुरोहित आदि को शत्रु के सीमा-प्रदेशों के भिन्न-भिन्न स्थानों में नियुक्त किया जाय, जिससे कि वे परस्पर न मिलने पायें। जो व्यक्ति विजिगीषु का अपकार करने में समर्थ हों अथवा विजिगीषु का विनाश करने

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प्र० १७६ : अ० ५ ] लब्धप्रशमन ७३३

कारसमर्थानिन्दु क्षियतो वा भर्तृविनाशमुपांशुदण्डेन प्रशमयेत् । स्वदेशीयान् वा परेण वावरुद्धानपवाहितस्थानेषु स्थापयेत् ।
(१) यश्च तत्कुलीनः प्रत्यादेयमादातुं शक्तः प्रत्यन्ताटवीस्थो वा प्रबाधितुमभिजातः, तस्मै विगुणां प्रयच्छेत्; गुणवत्याश्चतुर्भागं वा कोशदण्डदानमवस्थाप्य, यदुपकुर्वाणः पौरजानपदान् कोपयेत् । कुपितैस्तैरेनं घातयेत्, प्रकृतिभिरपकृष्टमपनयेदौपघातिके वा देशे निवेशयेदिति ।
(२) भूतपूर्वे येन दोषेणापवृत्तः, तं प्रकृतिदोषं छादयेत् । येन च गुणेनोपावृत्तः, तं तीव्रीकुर्यादिति ।
(३) पित्र्ये पितृदोषाञ् छादयेत् । गुणांश्च प्रकाशयेदिति ।


की प्रवृत्ति से उसके यहाँ रहते हों उन्हें उपांशुदण्ड देकर समाप्त कर दिया जाय । अपने देश के तथा शत्रु द्वारा बन्दी बनाये गये लोगों को विजयी राजा उन अधिकार-पदों पर नियुक्त करे, जो शत्रु पक्ष के पुरुषों को पदच्युत करने से रिक्त हुए हों ।

(१) शत्रु से छीने हुए राज्य को यदि कोई शत्रुवंशज वापिस लेने में समर्थ हो, अथवा सीमांत प्रदेश के सामन्त या आटविक के द्वारा उस राज्य पर बाधा पहुँचाये जाने की संभावना हो तो विजिगीषु राजा उन्हें किसी गुणहीन (ऊसर) भूमि का कुछ हिस्सा दे दे, अथवा उन्हें गुणवती (उर्वर) भूमि का चौथा हिस्सा इस शर्त पर दे कि वह सामंत विजिगीषु का अधिकाधिक कोष और सेना देता रहेगा । ऐसा कराने का यह परिणाम होगा कि धन तथा सेना को इकट्ठा करने में सामंत अपनी प्रजा को कुपित कर देगा । इस प्रकार प्रजाजनों के कुपित हो जाने पर बाद में इन्हीं के द्वारा उस सामंत का वध कराया जाय । अथवा अमात्य आदि प्रकृतियों के द्वारा निन्दा की जाने पर उस सामंत को वहाँ से हटा दिया जाय । या उसको ऐसे प्रदेश में भेज दिया जाय, जहाँ उसके विनाश के अनेक साधन विद्यमान हों ।

(२) भूतपूर्व लाभ : अपने अपहृत भूतपूर्व राज्य को पुनः प्राप्त कर विजिगीषु राजा को चाहिए कि अपने उस दोष का वह परित्याग कर दे, जिसके कारण उसका राज्य उसके हाथ से निकल गया था और अपने जिन गुणों के कारण उसने शत्रु के हाथ से अपना राज्य पुनः प्राप्त किया हो, उनको अधिक बढ़ाये ।

(३) पित्र्य लाभ : यदि पिता के दोषों के कारण राज्य शत्रु के कब्जे में गया हो तो विजिगीषु को उचित है कि पिता के उन दोषों को छिपा दे, जिनके कारण राज्य पर शत्रु ने अधिकार कर लिया था और पिता के जो अच्छे गुण रहे हों, उनको प्रकट करता रहे ।

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७३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) चरित्रमकृतं धर्म्यं कृतं चान्यैः प्रवर्तयेत् ।
प्रवर्तयेन्न चाधर्म्यं कृतं चान्यैर्निवर्तयेत् ॥

इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे लब्धप्रशमनं नाम पञ्चमोऽध्यायः;

आदितश्चतुश्चत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

समाप्तमिदं दुर्गलम्भोपायनामकं त्रयोदशमधिकरणम् ।

—: ० :—


( १ ) विजिगीषु राजा को चाहिए कि विजित राज्य में वह उन धर्मयुक्त आचार-व्यवहारों का प्रचलन करे, जिसका अब तक वहाँ अभाव था, तथा जो धर्मप्रवृत्त लोग रहे हों उन्हें प्रोत्साहित करे। अधर्मयुक्त आचार-व्यवहारों को वह कतई न पनपने दे तथा जो लोग अधर्मप्रवृत्त रहे हों उन्हें यत्नपूर्वक रोके।

दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में लब्धप्रशमन नामक पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

चौदहवाँ अधिकरण

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चौदहवाँ अधिकरण

औपनिषदिक

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७३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) कीटो वान्यतमस्तप्तः कृष्णसर्पप्रियङ्गुभिः ।
शोषयेदेष संयोगः सद्यः प्राणहरो मतः ॥
(२) धामार्गवयातुधानमूलं भल्लातकपुष्पचूर्णयुक्तमार्धमासिकः ।
(३) व्याघातकमूलं भल्लातकपुष्पचूर्णयुक्तं कीटयोगो मासिकः । कला-
मात्रं पुरुषाणां द्विगुणं खराश्वानां चतुर्गुणं हस्त्युष्ट्राणाम् ।
(४) शतकर्दमोच्चिट्टिङ्गकरवीरकटुतुम्बीमत्स्यधूमो मदनकोद्रवपला-
लेन हस्तिकर्णपलाशपलालेन वा प्रवातानुवाते प्रणीतो यावच्चरति तावन्मा-
रयति ।
(५) पूतिकीटमत्स्यकटुतुम्बीशतकर्दमेध्मेन्द्रगोपचूर्णं पूतिकीपक्षद्रा-
रालाहेमविदारीचूर्णं वा बस्तशृङ्गखुरचूर्णयुक्तमन्धीकरो धूमः ।


(इछ्म), गिरगिट (कृकलास), छिपकली (गृहगोधिका), अंधा या विषरहित साँप (अंधाहिक), जंगली तीतर (कृकण), पूतिकीट नामक कीड़ा तथा गोमारिका नामक औषधि, इन सब का चूर्ण मिलाया जाय तो उसका धुआँ तत्काल ही प्राणान्त कर देता है।

(१) उक्त कीड़ों में से किसी भी एक को यदि आग में तपाकर सूंघ लिया जाय तो उससे शरीर सूख जाता है। यदि काले साँप को कागुन के साथ मिलाकर उसका धुआँ किया जाय तो वह भी तत्काल प्राणांत कर डालता है।

(२) यदि कड़वी तोरई और यातुधान नामक औषधि की जड़ों को भिलावा के फूलों के चूर्ण के साथ मिला लिया जाय तो वह योग पंद्रह दिन में ही प्राण ले लेता है।

(३) यदि अमलतास की जड़ को भिलावे के पुष्पचूर्ण के साथ मिलाकर उसमें पूर्वोक्त किसी तपे हुए कीड़े का योग कर दिया जाय तो उसका प्रयोग एक मास में प्राण हर लेता है। इस कीटयोग की मात्रा मनुष्य को एक कला, गधे को उससे दुगुना और हाथी-ऊटों को उसका चौगुना देना चाहिए।

(४) शतावरी, कर्दम (अगर, तगर, केसर, कस्तूरी, कुंकुम और कपूर का पीसा हुआ लेप), उच्चिटिंग (बिच्छू ?), कनेर, कडवी तुंबी और मछली, इसका धुआँ; अथवा धतूरा, कोदो और धान के पुआल के साथ, अथवा धनिया, ढाक तथा पुआल के साथ धुआँ किया जाय और उसको तेज हवा में रख दिया जाय तो जहाँ तक वह जायगा वहाँ तक के प्राणियों को मार डालेगा।

(५) पूतिकीट (पात बिच्छी), मछली, कड़वी तूंबी, शतावरी, कर्दम, ढाक की लकड़ी और इंद्रगोप (बीर बहूटी), इन सबका चूर्ण; अथवा पूतिकीट, कटेरी, राल, धतूरा और विदारी कंद इन सबका चूर्ण यदि बकरे के सींग और खुर के चूर्ण के साथ मिला दिया जाय तो उनका धुआँ अंधा बना देता है।

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७४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

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७४० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) शारिकाकपोतबकबलाकाण्डमर्काक्षिपोलुकस्नुहिक्षीरपिष्टमन्धीकरणमञ्जनमुदकदूषणं च ।
(२) यवकशालिमूलमदनफलजातीपत्रनरमूत्रयोगाः प्लक्षविदारीमूलयुक्तो मूकोदुम्बरमदनकोद्रवक्वाथयुक्तो हस्तिकर्णपलाशक्वाथयुक्तो वा मदनयोगः । शृङ्गिगौतमवृक्षकण्टकारमयूरपदीयोगो गुञ्जालाङ्गलीविषमूलिकेङ्गुदीयोगः करवीराक्षिपोलुकार्कमृगमारणीयोगो मदनकोद्रवक्वाथयुक्तो हस्तिकर्णपलाशक्वाथयुक्तो वा मदनयोगः । समस्ता वा यवसेन्धनोदकदूषणाः ।
(३) कृतकण्डलकृकलासगृहगौलिकान्धाहिकधूमो नेत्रवधमुन्मादं च करोति ।
(४) कृकलासगृहगौलिकायोगः कुष्ठकरः ।
(५) स एव चित्रभेकान्त्रमधुयुक्तः प्रमेहमापादयति, मनुष्यलोहितयुक्तः शोषम् ।


( १ ) मैना, कबूतर, बगला और बगली इन पक्षियों की विष्ठा को आक, अक्षी पीलु तथा सेंहुड़ ( स्नुही ) के दूध में मिला कर जो अंजन बनाया जाता है वह प्राणियों को अंधा करने वाला तथा जल को विषाक्त कर देने वाला होता है ।

( २ ) जौ ( यव ), धान ( शाली ), इन दोनों की जड़, तथा मैनफल, चमेली, जावित्री और आदमी का पेशाब, इन सब चीजों को मिलाकर फिर उनमें पिलखन या लाख देने वाले पीपल तथा विदारी की जड़ों का योग कर दिया जाय, अथवा गंदे पानी में बने हुए गूलर, धतूरा और कोदों के क्वाथ का योग कर दिया जाय; या धनियाँ तथा पलाश के क्वाथ का योग कर दिया जाय तो मदनरस तैयार हो जाता है, जो कि आदमी को पागल या बेहोश बना देता है । श्रृंगी नामक मछली का पित्त ( शृंगिगौतम ), लोध, सेंमल तथा अजमोदा का योग; अथवा रत्ती, जल पीपल या नारियल, कालकूट आदि विष, तथा इंगुदी का योग; अथवा कनेर ( करवीर ), अक्षी ( बहेड़े के जैसा पेड़ ), पीलु, आक तथा मृगमारिणी औषधि का योग; धतूरा और कोदो के क्वाथ के साथ; या धनिया और पलाश के क्वाथ के साथ मिलाकर मदनयोग तैयार होता है । इस प्रकार के मदनयोग उन्माद पैदा करते हैं तथा घास, लकड़ी और पानी को विषयुक्त बना देते हैं ।

( ३ ) पकायी गयी नस-नाड़ियों वाले गिरगिट, छिपकली और अंधअहिक का धुआँ अंधा तथा पागल बना देता है ।

( ४ ) गिरगिट और छिपकली का मिश्रित धुआँ कोढ़ पैदा कर देता है ।

( ५ ) यदि गिरगिट और छिपकली का उक्त योग चितकबरे मेढ़क तथा शहद में मिला दिया जाय तो उससे प्रमेह पैदा हो जाता है । यदि इसी योग में मनुष्य का खून मिला दिया जाय तो उससे क्षयरोग पैदा हो जाता है ।

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प्र० १७७ : अ० १ ] शत्रु-वध के प्रयोग ७४१

(१) दूषीविषं मदनकोद्रवचूर्णमुपजिह्विकायोगः मातृवाहकाञ्जलिकारप्रचलाकभेकाक्षिपीलुकयोगो विषूचिकाकरः ।
(२) पञ्चकुष्ठककौण्डिन्यकराजवृक्षपुष्पमधुयोगो ज्वरकरः ।
(३) भासनकुलजिह्वाग्रन्थिकायोगः खरीक्षीरपिष्टो मूकबधिरकरो मासार्धमासिकः । कलामात्रं पुरुषाणामिति समानं पूर्वेण ।
(४) भङ्गक्वाथोपनयनमौषधानां चूर्णं प्राणभृताम् । सर्वेषां वा क्वाथोपनयनम्, एवं वीर्यवत्तरं भवति । इति योगसम्पत् ।
(५) शाल्मलीविदारीधान्यसिद्धो मूलवत्सनाभसंयुक्तश्चुचुन्दरीशोणितप्रलेपेन दिग्घो बाणो यं विध्यति, स विद्धोऽन्यान् दश पुरुषान् दशति, ते दष्टा दशान्यान् दशन्ति पुरुषान् ।
(६) भल्लातकयातुधानापामार्गबाणानां पुष्पैरेल्काक्षिगुग्गुलुहालाहलानां च कषायं बस्तनरशोणितयुक्तं दंशयोगः । ततोऽर्धधरणिको योगः


( १ ) औषधियों से शुद्ध किया हुआ विष, धतूरा और कोदो का चूर्ण दीमक ( उपजिह्विका ) के साथ मिलाकर फिर मातृवाह पक्षी, अंजलिकार ओषधि, मोरपेंच ( प्रचालक ), मेंढ़क, सहिजन और पीलु के साथ तैयार किया हुआ योग हैजा पैदा कर देता है ।

( २ ) कूट वृक्ष के पाँचों अंग, कौण्डिन्य नामक कीड़ा, अमलतास ( राजवृक्ष ), शहद और महुआ ( पुष्पमधु ), इन सब चीजों का योग ज्वर उत्पन्न कर देता है ।

( ३ ) यदि गिद्ध, नेवला और मजीठ का योग गधी के दूध में पीसा जाय तो वह योग महीने या पन्द्रह दिन के भीतर मनुष्य को गूंगा और बहिरा बना देता है । इन सभी योगों की मात्रा मनुष्य के लिए एक कला, घोड़े, गधे के लिए उससे दुगुनी और हाथी, ऊँट आदि के लिए उससे चौगुनी होनी चाहिए ।

( ४ ) ऊपर बताये गये सभी योगों में जो औषधियाँ हैं कूट-कूट कर उनका क्वाथ बनाना चाहिए । प्राणियों के उपयोग के लिए उसका चूर्ण या क्वाथ बनाकर उपयोग में लाना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से औषधि अधिक प्रभावकारी हो जाती है । यहाँ तक विशेष-विशेष योगों का निरूपण किया गया ।

( ५ ) सेमर, बिदारी और धनियाँ की भावना देकर तथा पिप्पलीमूल एवं वत्सनाभ से युक्त और छछून्दर के रक्त से लेप किया हुआ बाण जिसको लगता है वह व्यक्ति दूसरे दस व्यक्तियों को काट लेता है; और वे दस व्यक्ति दूसरे दस-व्यक्तियों को काट खाते हैं । इस प्रकार विष के फैल जाने से सारी शत्रु सेना नष्ट हो जाती है ।

( ६ ) भिलावा, यातुधान, अपामार्ग और अर्जुन वृक्ष ( बाण ), इन सब चीजों के फूलों से सिद्ध किया हुआ; इलायची, अक्षी, गूगल तथा हलाहल को मिलाकर बनाया हुआ काढ़ा यदि बकरे और मनुष्य के रक्त में मिला दिया जाय तो वह दंश-

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प्र० १७७ : अ० १ ] शत्रु-वध के प्रयोग ७४३

(१) चण्डालाग्निं च मांसेन चिताग्निं मानुषेण च ।
समस्तान् बस्तवसया मानुषेण ध्रुवेण च ॥
जुहुयादग्निमन्त्रेण राजवृक्षकदारुभिः ।
एष निष्प्रतिकारोऽग्निर्द्विषतां नेत्रमोहनः ॥
(२) अदिते ! नमस्ते, अनुमते ! नमस्ते, सरस्वति ! नमस्ते, देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, भूः स्वाहा, भुवः स्वाहा ।

इति औपनिषदिके चतुर्दशाऽधिकरणे परघातप्रयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितः पञ्चचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


किया जाय, व्यभिचारिणी स्त्री के घर से लायी गयी अग्नि में सरसों से हवन किया जाय; सूतिका गृह से लायी गयी अग्नि में दही से हवन किया जाय; अग्निहोत्री के घर से लायी गयी अग्नि में चावलों से हवन किया जाय ।

( १ ) चांडाल के यहाँ से लायी गयी अग्नि में मांस से हवन किया जाय; चिता से लायी गयी अग्नि में मनुष्य से हवन किया जाय; और तदनंतर इन सब अग्नियों को एकत्र करके उनमें बकरी की चर्बी से सूखी बरगद की लकड़ी से हवन किया जाय; तदनन्तर अग्नि के स्तुतिवाचक मंत्रों द्वारा अमलतास की लकड़ियों द्वारा हवन किया जाय । इस प्रकार की अग्नि का फिर कोई प्रतीकार नहीं है । यह अग्नि केवल दुर्ग आदि को ही नहीं जलाती, वरन् उसको देखने मात्र से ही शत्रुओं की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ।

( २ ) इन मंत्रों से हवन किया जाय—आदिते ! नमस्ते । अनुमते ! नमस्ते । सरस्वति ! नमस्ते । देव ! सवितर्नमस्ते । अग्नये स्वाहा । सोमाय स्वाहा । भूः स्वाहा । भुवः स्वाहा ।

औपनिषदिक नामक चौदहवें अधिकरण में परघातप्रयोग नामक पहला अध्याय समाप्त

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प्रकरण १७८प्रलम्भने अद्भुतोत्पादनम्
अध्याय २

(१) शिरीषोडुम्बरशमीचूर्णं सर्पिषा संहृत्यार्धमासिकक्षुद्योगः ।
(२) कशेरुकोत्पलकन्देक्षुमूलबिसदूर्वाक्षीरघृतमण्डसिद्धो मासिकः ।
(३) माषयवकुलत्थदर्भमूलचूर्णं वा क्षीरघृताभ्यां, वल्लीक्षीरघृतं वा समसिद्धं सालपृश्निपर्णीमूलकल्कं पयसा पीत्वा, पयो वा तत्सिद्धं मधुघृताभ्यामशित्वा, मासमुपवसति ।
(४) श्वेतबस्तमूत्रे सप्तरात्रोषितैः सिद्धार्थकैः सिद्धं तैलं कटुकालाबौ मासार्धमासस्थितं चतुष्पदद्विपदानां विरूपकरणम् ।
(५) तक्रयवभक्षस्य सप्तरात्रादूर्ध्वं श्वेतगर्दभस्य लण्डयवैः सिद्धं गौरसर्षपतैलं विरूपकरणम् ।


प्रलम्भन योग में अद्भुत उत्पादन

( १ ) सिरण ( शिरीष ), गूलर और शमी इन तीनों के चूर्ण को घी के साथ मिलाकर खाने से पन्द्रह दिन तक भूख नहीं लगती है ।

( २ ) कसेरु, कमल की जड़, गन्ने की जड़, कमल डंडी, दूब, दूध, घी और मांड, इन सबको एक साथ मिलाकर खाने से एक महीने तक भूख नहीं लगती है ।

( ३ ) उड़द, जौ, कुलथी और कुशा की जड़ इन सब को दूध-घी के साथ मिलाकर पीने से एक मास तक भूखा रहा जा सकता है; अथवा अजमोद, दूध और घी को बराबर मिलाकर पी लेने पर भी एक महीने तक भूख नहीं लगती है । इसी प्रकार शालपर्णी ( सालवन ) और पृश्निपर्णी ( पिठवन ) की जड़ों के कल्क को दूध के साथ पीने से या शालपर्णी और पृश्निपर्णी के साथ दूध को पकाकर उसे शहद के साथ खाने से भी एक मास तक भूख नहीं लगती है ।

( ४ ) यदि सफेद बकरे के पेशाब में सात रात तक रखी हुई सरसों से निकाला हुआ तेल एक मास या पंद्रह दिन तक तूम्बी में रखा जाय तो उसके बाद जिन चौपायों या दुपायों पर वह तेल लगाया जायेगा, उनका रूप बदल जायेगा; इसको विरूपकरण ( दूसरा रूप बनाना ) योग कहते हैं ।

( ५ ) इसी तरह किसी आदमी को यदि सात दिन तक मट्ठा और जौ खिलाकर सफेद गधे की लीद तथा जौ के साथ पकाये हुये सफेद सरसों के तेल को लगाने या खाने को दिया जाय तो उसकी शक्ल बदल जाती है ।

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प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४५

(१) एतयोरन्यतरस्य मूत्रलण्डरससिद्धं सिद्धार्थकतैलमर्कतूलपतङ्ग-चूर्णप्रतिवापं श्वेतीकरणम् ।
(२) श्वेतकुक्कुटाजगरलण्डयोगः श्वेतीकरणम् ।
(३) श्वेतबस्तमूत्रे श्वेतसर्षपाः सप्तरात्रोषितास्तक्रमर्कक्षीरमर्कतूल-कटुकमत्स्यविडङ्गाश्च । एष पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ।
(४) समुद्रमण्डूकीशङ्खसुधाकदलीक्षारतक्रयोगः श्वेतीकरणम् ।
(५) कदल्यवल्गुजक्षाररसशुक्ताः सुरायुक्तास्तक्रार्कतूलस्नुहिलवणं धान्याम्लं च पक्षस्थितो योगः श्वेतीकरणम् ।
(६) कटुकालाबौ वल्लीगते नगरमर्धमासस्थितं गौरसर्षपपिष्टं रोम्णां श्वेतीकरणम् ।
(७) अर्कतूलोऽर्जुने कीटः श्‍वेता च गृहगौलिका ।
एतेन पिष्टेनाभ्यक्ताः केशाः स्युः शङ्खपाण्डराः ॥


( १ ) सफेद गधा या सफेद बकरे के पेशाब तथा लीद के रस के साथ पकाये हुए सरसों के तेल को आक, पलास, पीपल और धान के चूर्ण के साथ मिलाकर श्वेतीकरण योग बनाया जाता है, इसके लगाने या खाने से शक्ल-सूरत सफेद हो जाती है ।

( २ ) सफेद मुर्गा और अजगर साँप, इन दोनों की विष्ठा को मिलाकर तैयार किया हुआ योग भी सफेद बना देता है ।

( ३ ) यदि सफेद बकरे के पेशाब में सात रात तक सफेद सरसों को रखा जाय और तदनन्तर पन्द्रह दिन तक उस सरसों को मठा, आक का दूध, आक, पारस पीपल, कड़वा परवल ( पटोल ), मछली तथा वायबिडंग के चूर्ण के साथ मिलाकर बनाया जाय तो वह भी आकृति को सफेद बना देता है ।

( ४ ) समुद्री मेढकी, शंख, सुधा, केला, जवाखार और मठा, इन सब चीजों का योग भी सफेद कर देता है ।

( ५ ) केला, बाकुची, जवाखार, पारा, और कोई खट्टा फल, इन सबको शराब में भिगो दिया जाय, तदनन्तर छाछ, आक, पारसपीपल, सेंहुड़, नमक और कंजा को उसमें मिलाकर पंद्रह दिन तक रखा रहने दिया जाय । इस तरह का योग भी सफेद बना देता है ।

( ६ ) बेल में लगी हुई कड़वी तूम्बी में सोंठ भरकर उसे पंद्रह दिन तक रख दिया जाय और बाद में उसको बंगा सरसों के साथ पीस लिया जाय, यह भी श्वेतीकरण योग है ।

( ७ ) आक, पारसपीपल, अर्जुन कीट और सफेद छिपकली, इन सबको एक साथ पीस कर यदि बालों में लगाया जाय तो बाल शंख के समान श्वेत हो जाते हैं ।

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७४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

(१) गोमयेन तिन्दुकारिष्टकल्केन मर्दिताङ्गस्य भल्लातकरसानुलिप्तस्य मासिकः कुष्ठयोगः ।
(२) कृष्णसर्पमुखे गृहगौलिकामुखे वा सप्तरात्रोषिता गुञ्जाः कुष्ठयोगः ।
(३) शुकपित्ताण्डरसाभ्यङ्गः कुष्ठयोगः ।
(४) कुष्ठस्य प्रियालकल्ककषायः प्रतीकारः ।
(५) कुक्कुटीकोशातकीशतावरीमूलयुक्तमाहारयमाणो मासेन गौरो भवति ।
(६) वटकषायस्नातः सहचरकल्कदिग्धः कृष्णो भवति ।
(७) शकुनकङ्गुतैलयुक्ता हरितालमनःशिलाः श्यामीकरणम् ।
(८) खद्योतचूर्णं सर्षपतैलयुक्तं रात्रौ ज्वलति ।
(९) खद्योतगण्डूपदचूर्णं समुद्रजन्तूनां भृङ्गकपालानां खदिरकर्णिकाराणां पुष्पचूर्णं वा शकुनकङ्गुतैलयुक्तं तेजनचूर्णं पारिभद्रकत्वङ्मषी मण्डूकवसया युक्ता गात्रप्रज्वलनमग्निना ।


( १ ) गोबर, छोटा तेंदुआ और नीम के कल्क से शरीर पर मालिश करने के बाद, यदि भिलावा और पारा मिला कर शरीर में लगा दिया जाय तो एक महीने के अन्दर कोढ़ उपज आता है ।

( २ ) काले सांप के या छिपकली के मुँह में सात रात तक रखी हुई रत्ती को यदि देह पर रगड़ा जाय तो कोढ़ हो जाता है ।

( ३ ) तोते के पित्ते तथा अंडे के रस से शरीर पर मालिश करने से कोढ़ हो जाता है ।

( ४ ) चिरौंजी के कल्क से बनाया हुआ काढ़ा कुष्ठ रोग का प्रतीकार है ।

( ५ ) मुर्गी, कड़वी तोरई, परवल और शतावरी की जड़ को एक मास तक खाने से शरीर गौरवर्ण हो जाता है ।

( ६ ) यदि बरगद के काढ़े से स्नान कर फिर पियाबांस के कल्क की मालिश की जाय तो शरीर काला पड़ जाता है ।

( ७ ) गिद्ध और काँगनी के तेल में हड़ताल तथा मैनसिल मिलाकर मालिश करने से भी शरीर साँवला हो जाता है ।

( ८ ) यदि जुगुन्तू का चूर्ण सरसों के तेल के साथ मिला दिया जाय तो वह रात में जलने लगता है ।

( ९ ) जुगनू और गेंहुए का चूर्ण तथा इसी प्रकार के छोटे-छोटे समुद्री जानवरों का चूर्ण भृंग नामक पक्षी के सिर की हड्डियों का चूर्ण, खैर तथा कनेर के फूलों का चूर्ण, गिद्ध तथा कांगनी के तेल में मिला बांस का चूर्ण और मेढ़क की चर्बी से मिली

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प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४७

(१) पारिभद्रकत्वग्वज्रकदलीतिलकल्कप्रदिग्धं शरीरमग्निना ज्वलति ।
(२) पीलुत्वङ्मषीमयः पिण्डो हस्ते ज्वलति । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति ।
(३) तेन प्रदिग्धमङ्गं कुशाम्रफलतैलसिक्तं समुद्रमण्डूकीफेनकसर्जरस-चूर्णयुक्तं वा ज्वलति ।
(४) मण्डूकवसासिद्धेन पयसा कुलीरादीनां वसया समभागं तैलं सिद्ध-मभ्यङ्गो गात्राणामग्निप्रज्वालनम् । मण्डूकवसादिग्धोऽग्निना ज्वलति ।
(५) वेणूमूलशैवललिप्तमङ्गं मण्डूकवसादिग्धमग्निना ज्वलति ।
(६) पारिभद्रकप्रतिबलावञ्जुलवज्रकदलीमूलकल्केन मण्डूकवसा-दिग्धेन तैलेनाभ्यक्तपादोऽङ्गारेषु गच्छति ।
(७) उपोदका प्रतिबला वञ्जुलः पारिभद्रकः ।
एतेषां मूलकल्केन मण्डूकवसया सह ॥


नीम की छाल की स्याही, इनमें से प्रत्येक चूर्ण को देह पर मलने से बिना किसी पीड़ा या जलन के शरीर पर आग जलने लगती है ।

( १ ) नीम की छाल, थूहर, केला और तिल के कल्क से पोते हुए शरीर पर बिना किसी पीड़ा के अग्नि जलने लगती है ।

( २ ) पीलु वृक्ष की छाल की स्याही का बना हुआ गोला, बिना अग्नि-संसर्ग के ही, हाथ में जलने लगता है। मेढक की चर्बी से सना हुआ वही गोला आग के संसर्ग से जलने लगता है।

( ३ ) उस गोले को अंग में लपेट कर कुशा के तेल और आम की गुठली के तेल से शरीर में चुपड़े अथवा समुद्री मेढ़की, समुद्रफेन और राल, इन सब के चूर्ण को देह में लगाया जाय तो अग्नि का संसर्ग होते ही देह जलने लगती है ।

( ४ ) मेढ़क की चर्बी के साथ पके हुए दूध तथा केंकड़े की चर्बी में उतना ही तेल मिलाकर यदि उससे मालिश की जाय तो शरीर में अग्नि की लपटें उठने लगती हैं । मेढ़क की चर्बी से सना हुआ व्यक्ति अग्नि का संसर्ग पाते ही जल उठता है ।

( ५ ) बाँस की जड़ और सेंवार से लिपा हुआ अंग तथा मेढक की चर्बी से लिपा हुआ अंग अग्नि के संसर्ग से जलने लगता है ।

( ६ ) नीम ( पारिभद्रक ), खरेंटी ( प्रतिबला ), वंजुल ( तेंदुआ, बेत, अशोक ) थूहर और केला, इन सब पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर तथा उसमें मेढक की चर्बी एवं तेल मिला लिया जाय और तब उस योग की पैरों में मालिस की जाय तो अंगारों कें ऊपर चला जा सकता है ।

( ७ ) पोदीना ( उपोदका ), खरेंटी, वंजुल और नीम, इनके पेड़ों की जड़ों का कल्क बनाकर उसमें मेढक की चर्बी मिला दी जाय तो उस तेल का साफ पैरों

७४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

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७४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौदहवां अधिकरण

साधयेत्तैलमेतेन पादावभ्यज्य निर्मलौ ।
अङ्गारराशौ विचरेद्यथा कुसुमसञ्चये ॥
(१) हंसक्रौञ्चमयूराणामन्येषां वा महाशकुनीनामुदकप्लवानां पुच्छेषु बद्धा नलदीपिका रात्रावुल्कादर्शनम् ।
(२) वैद्युतं भस्माग्निशमनम् ।
(३) स्त्रीपुष्पपायिता माषा व्रजकुलीमूलं मण्डूकवसामिश्रं चुल्ल्यां दीप्तायामपाचनम् । चुल्लीशोधनं प्रतीकारः ।
(४) पीलुमयो मणिरग्निगर्भः सुवर्चलामूलग्रन्थिः सूत्रग्रन्थिर्वा पिचुपरिवेष्टितो मुखादग्निधूमोत्सर्गः ।
(५) कुशाम्रफलतैलसिक्तोऽग्निर्वर्षप्रवातेषु ज्वलति ।
(६) समुद्रफेनकस्तैलयुक्तोऽम्भसि प्लवमानो ज्वलति ।
(७) प्लवङ्गमानामस्थिषु कल्माषवेणुना निर्मथितोऽग्निर्नोदकेन शाम्यति, उदकेन च ज्वलति ।


में मालिश करने से धधकते अंगारों के ढेर में वैसे ही घूमा जा सकता है, जैसे कि फूलों के ढेर में ।

( १ ) यदि हंस, क्रौंच, मयूर और अन्य बत्तख आदि जलचर पक्षियों की पूंछों पर नलदीपिका ( नरकट पर रखी हुई छोटी-सी जलती हुई बत्ती ) लगायी जाय तो वह रात में दूर से भयप्रद उल्का के समान दिखाई देती है ।

( २ ) बिजली गिरने से जली हुई लकड़ी की राख अग्नि को शांत कर देती है ।

( ३ ) स्त्री के रज से मिले हुए उड़द और मेढक की चर्बी से मिली हुई गोष्ठ ( गायों की जगह ) में पैदा होने वाली बड़े कटहल की जड़, इन दोनों को आग पर चढ़ाकर कितना भी पकाया जाय, पर नहीं पकती । चूल्हे से उतार कर इनको साफ कर देना ही इनका प्रतीकार है ।

( ४ ) पीलु की लकड़ी से बना हुआ मटका अग्निगर्भ ( तत्काल ही अग्नि को खींचने वाला ) होता है । अलसी की जड़ की गांठ या अलसी के सूतों की गांठ रूई से लपेट देने पर मुँह से आग और धुआँ छोड़ने का साधन है ।

( ५ ) कुश, आम और तेल के सहारे जलायी हुयी आग आँधी और वर्षा में भी जलती रहती ।

( ६ ) पानी में तैरते हुए समुद्र झाग में यदि तेल मिला दिया जाय तो वह जलते हुए तैरता रहेगा ।

( ७ ) बंदर की हड्डियों में विचित्र बाँस के मंथन से पैदा की गई अग्नि जल से नहीं बुझ सकती है, बल्कि जल के संसर्ग से वह और भी धधकने लगती है ।

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प्र० १७८ : अ० २ ] प्रलम्भन योग में उत्पादन ७४९

(१) शस्त्रहतस्य शूलप्रोतस्य वा पुरुषस्य वामपार्श्वपर्शुकास्थिषु कल्माषवेणुना निर्मथितोऽग्निः, स्त्रियाः पुरुषस्य वास्थिषु मनुष्यपर्शुक्रया निर्मथितोऽग्नियंत्र त्रिप्रसव्यं गच्छति, न चात्रान्योऽग्निर्ज्वलति ।

(२) चुचुन्दरी खञ्जरीटः खारकीटश्च पिष्यते ।
अश्वमूत्रेण संसृष्टा निगलानां तु भञ्जनम् ॥

(३) अयस्कान्तो वा पाषाणः ।
(४) कुलीराण्डदर्दुरखारकीटसाप्रदेहेन द्विगुणो दारकगर्भः कङ्कभास-पार्श्वोत्पलोदकपिष्टश्चतुष्पदद्विपदानां पादलेपः, उलूकगृध्रवसाभ्यामुष्ट्र-चर्मोपानहावभ्यज्य वटपत्रैः प्रतिच्छाद्य पञ्चाशद्योजनान्यश्रान्तो गच्छति । श्येनकङ्ककाकगृध्रहंसक्रौञ्चवीचिरल्लानां मज्जानो रेतांसि वा योजन-शताय । सिंहव्याघ्रद्वीपिकाकोलूकानां मज्जानो रेतांसि वा, सार्ववर्णिकानि गर्भपतनान्युष्ट्रिकायामभिषूय श्मशाने प्रेतशिशून् वा तत्समुत्थितं मेदो योजनशताय ।


(१) तलवार, भाला या त्रिशूल आदि से मारे हुए पुरुष की बाईं पसली की हड्डियों में विचित्र बाँस के मंथन से पैदा की गई अग्नि, या स्त्री अथवा पुरुष की हड्डियों में मनुष्यों की पसली से मंथन कर पैदा हुई अग्नि, इन दोनों अग्नियों को जहाँ पर तीन बार वाईं ओर से घुमा दिया जाय, वहाँ पर कोई आग नहीं जल सकती है।

(२) छुछुन्दर, खंजन और खारकीट, इन तीनों को घोड़े के पेशाब के साथ अलग-अलग पीस कर फिर एक साथ मिला दिया जाय तो वह मिश्रण बेड़ी, हथकड़ी, आदि तोड़ने के काम में आ सकता है।

(३) अथवा अयस्कांत नामक मणि से भी लोहे की जंजीरें तोड़ी जा सकती हैं।

(४) केंकड़े के अंडे, मेढक, खारकीट की चर्बी से बढ़ाये हुए सूकरगर्भ को कंक पक्षी, गिद्ध की पसलियों तथा कमल के जल से पीस कर, उस औषधि को चौपायों या दुपायों के पैरों में लेप कर दिया जाय तो बिना थकावट के पचास योजन तक चला जा सकता है, उल्लू, तथा गिद्ध की चर्बी को ऊँट के चमड़े से बने जूतों पर चुपड़ कर और बरगद के पत्तों से ढँककर फिर उन्हीं जूतों को पहिन कर पचास योजन तक बिना थकावट के सफर किया जा सकता है; बाज, सफेद चील (कंक), कौआ, गीध, हंस, क्रौंच और वीचिरल्ल की चर्बी और वीर्य को मिलाकर पूर्वोक्त ढंग से पैरों तथा जूतों में लेप किया जाय तो बिना थके-अलसाये सौ योजन सफर किया जा सकता है; शेर, बाघ, भेड़िया, कौआ और उल्लू, इन सबकी चर्बी तथा वीर्य, अथवा सभी वर्णों के गिरे हुए गर्भो को मिट्टी के किसी बर्तन में अथवा