कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context७३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण
(१) शक्यमेकं वा सामन्तं साधयेत्, तेन द्विगुणो द्वितीयं, त्रिगुणस्तृती-
यम् । एष चतुर्थो मार्गः पृथिवीं जेतुम् ।
(२) जित्वा च पृथिवीं विभक्तवर्णाश्रमां स्वधर्मेण भुञ्जीत ।
(३) उपजापोऽपसर्पो वा वामनं पर्युपासनम् ।
अवमर्दश्च पञ्चैते दुर्गलम्भस्य हेतवः ।
इति दुर्गलम्भोपाये त्रयोदशेऽधिकरणे पर्युपासनकर्म अवमर्दश्चेति चतुर्थोऽध्यायः,
आदितस्त्रिचत्वारिंशदुत्तरशततमः ।
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(१) अथवा जीतने योग्य समीपस्थ सामन्त को ही पहिले अपने अनुकूल बनाया जाय । उसको मिलाकर जब अपनी शक्ति दुगुनी हो जाय तब दूसरे सामन्त को अपने अनुकूल बनाने का यत्न किया जाय । उसको भी मिलाकर जब अपनी शक्ति तिगुनी हो जाय तब विजिगीषु तीसरे सामन्त को अपने वश में करने का यत्न करे । पृथ्वी को विजय करने का यह चौथा मार्ग है ।
(२) इस प्रकार सारी पृथ्वी का साम्राज्य प्राप्त कर उस शक्तिशाली सम्राट् को चाहिए कि वह अपने साम्राज्य में वर्णों और आश्रमों की यथोचित व्यवस्था कर धर्मपूर्वक पृथिवी के राज्य का उपभोग करे ।
(३) उपजाप ( बहकाना ), अपसर्प ( गुप्तचरों द्वारा शत्रुनाश ), वामन ( विष प्रयोग ), पर्युपासन ( घेरा डालना ) और अवमर्द ( विध्वंस ), ये पाँच उपाय हैं, जिनके द्वारा शत्रु के दुर्ग को जीता जा सकता है ।
दुर्गलम्भोपाय नामक तेरहवें अधिकरण में पर्युपासनकर्म-अवमर्द नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
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