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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 816 of 918

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Page 816

७३२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तेरहवां अधिकरण

(१) देशग्रामजातिसङ्घमुख्येषु चाभीक्ष्णं सत्रिणः परस्यापचारं दर्श-
येयुः। माहाभाग्यं भक्तिं च तेषु स्वामिनः स्वामिसत्कारं च विद्यमानम्।
उचितैश्चैनान् भोगपरिहाररक्षावेक्षणैर्भुञ्जीत। सर्वदेवताश्रमपूजनं च
विद्यावाक्यधर्मशूरपुरुषाणां च भूमिद्रव्यदानपरिहारान् कारयेत्। सर्वबन्धन-
मोक्षणमनुग्रहं दीनानाथव्याधितानां च। चातुर्मास्येष्वर्धमासिकमघातं,
पौर्णमासीषु च चातूरात्रिकं राजदेशनक्षत्रेष्वेकरात्रिकम्। योनिबालवधं
पुंस्त्वोपघातं च प्रतिषेधयेत्। यच्च कोशदण्डोपघातिकमधर्मिष्ठं वा चरित्रं
मन्येत, तदपनीय धर्म्यं व्यवहारं स्थापयेत्। चोरप्रकृतीनां म्लेच्छजातीनां
च स्थानविपर्यासमनेकस्थं कारयेद् दुर्गराष्ट्रदण्डमुख्यानां च। परोपगृही-
तानां च मन्त्रिपुरोहितादीनां परस्य प्रत्यन्तेष्वनेकस्थं वासं कारयेत्। अप-


(१) विजिगीषु के गुप्तचरों को चाहिए कि वे देश, ग्राम, जाति, संघ और संघ-मुख्यों के पास जाकर प्रजा के प्रति किये गये शत्रु के अपकारों को बराबर दिखायें, और साथ ही देश आदि के प्रति किये गये नये विजिगीषु के उदारता, प्रेम तथा सत्कार आदि कार्यों को अच्छी तरह खोलकर रखें। विजिगीषु राजा, समुचित राज-भाग, करमाफी (परिहार) और सुख-सुविधायें (रक्षाक्षण) देकर प्रजा की रक्षा करे। विजिगीषु को चाहिए कि वह सभी धर्मों के देवताओं तथा आश्रमों की पूजा कराये और विद्वानों, वक्ताओं एवं धर्मप्राण व्यक्तियों को भूमि तथा द्रव्य देकर उनसे किसी प्रकार का राजकर वसूल न करे। जो दीन, अनाथ तथा व्याधिग्रस्त प्रजाजन हैं उनकी हर तरह से सहायता करे और कारागार में बन्द सभी अपराधियों को मुक्त कर दे। चार-चार महीने में पंद्रह दिन ऐसे रखे, जिनमें किसी को प्राणदण्ड न दिया जाय। इसी प्रकार वर्ष भर में चार पूर्णमासियां ऐसी छांट ले, जिनमें किसी का वध न किया जाय। राज्याभिषेक और राज्यविजय के नक्षत्रों में किसी का वध न किया जाय। बच्चे पैदा करने वाले मादा जानवरों तथा शिशु जानवरों के वध का सर्वथा निषेध किया जाय; और नर जानवरों को बधिया (पुंस्त्वहीन) न बनाये जाने की भी निषेधाज्ञा कर दी जाय। जिस आचरण को विजिगीषु राजा कोष और सेना के लिए हानिकर तथा धर्माचरण विरुद्ध समझे उसको दूर कर धर्मयुक्त सदाचार की स्थापना करे। चोर प्रकृति म्लेच्छ जातियों तथा दुर्ग, राष्ट्र और सेना के मुख्य अधि-कारियों को परस्पर दूर-दूर स्थानों में नियुक्त करके उनको स्थानान्तरित कर दिया जाय। शत्रु का उपकार करने वाले मंत्री, पुरोहित आदि को शत्रु के सीमा-प्रदेशों के भिन्न-भिन्न स्थानों में नियुक्त किया जाय, जिससे कि वे परस्पर न मिलने पायें। जो व्यक्ति विजिगीषु का अपकार करने में समर्थ हों अथवा विजिगीषु का विनाश करने