कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
४०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
(१) बहिर्विहारगतो वा दूष्यानासन्नावासान् पूजयेत् । तेषां देवीव्य-
ञ्जना वा दुःस्त्री रात्रावावासेषु गृह्येतेति समानं पूर्वेण ।
(२) दूष्यमहामात्रं वा 'सूदो भक्षकारो वा ते शोभनः' इति स्तवेन
भक्ष्यभोज्यं याचेत । बहिर्वा क्वचिदध्वगतः पानीयं तदुभयं रसेन योज-
यित्वा प्रतिस्वादने तावेवोपयोजयेत् । तदभिविख्याप्य 'रसदाविति'
घातयेत् ।
(३) अभिचारशीलं वा सिद्धव्यञ्जनो गोधाकूर्मकर्कटकूटानां लक्षण्या-
नामन्यतमप्राशनेन मनोरथानवाप्स्यसीति ग्राहयेत् । प्रतिपन्नं कर्मणि रसेन
लोहमुसलैर्वा घातयेत् 'कर्मव्यापदा हत' इति ।
(४) चिकित्सकव्यञ्जनो वा दौरात्मिकमसाध्यं वा व्याधिं दूष्यस्य
स्थापयित्वा भैषज्याहारयोगेषु रसेनातिसंदध्यात् ।
उन शस्त्रधारी तीक्ष्ण पुरुषों को गिरफ्तार कर लें । वयान में वे कहें कि इन दूष्य लोगों ने राजा को मारने के लिए हमें हथियार लाने को कहा है । तदनन्तर नगर भर में यह बात फैला दी जाय कि वे महामात्र राजा को मारना चाहते थे । इस अपराध में उन्हें प्राण दण्ड दिया गया । उन गिरफ्तार तीक्ष्ण पुरुषों के स्थान पर दूसरों को ही मरवा दिया जाय ।
(१) अथवा प्रवास के लिए गया हुआ राजा अपने पास ठहरे हुए उन दूष्य लोगों का खूब आदर-सत्कार करे । फिर किसी व्यभिचारिणी स्त्री को महारानी के वेष में उनके पास भेज दे, फिर सिपाहियों से वहीं पर उन्हें गिरफ्तार करवा ले, और इसी अपराध से उनका वध करवा डाले ।
(२) अथवा राजा, दूष्य महामात्र से यह तारीफ करके 'तुम्हारे रसोइये और पकवान बनाने वाले बड़े ही निपुण हैं' कुछ खाने को माँगे । या इसी प्रकार का बहाना बनाकर पीने के लिए पानी माँगे; तदनन्तर उनमें विष मिला कर 'लीजिए, पहिले आपही ग्रहण कीजिए' ऐसा कहकर उनको मरवा दे; और तदनन्तर रसोइयों पर विष देने का अपराध लगाकर उन्हें प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।
(३) अथवा सिद्ध पुरुष के वेष में गुप्तचर महामात्र से कहे 'अच्छी नस्ल के गोह, कछुआ, केंकड़ा और टूटे हुए सींग वाले हिरण आदि में से किसी एक को यदि अभिचारिक विधि से श्मशान में पकाकर खाया जाय तो सारे मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। जब महामात्र इसके लिए राजी हो जाय तो उसे जहर मिलाकर या लोहे के मूसल से कूटकर मार दिया जाय और यह प्रचार कराया जाय कि साधना में व्यति पात हो जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई ।
(४) अथवा चिकित्सक के वेष में गुप्तचर महामात्र के पास जाकर कहे कि
प्र० ८६ : अ० १ ] राजद्रोही अधिकारियों हेतु दण्ड-विधि ४०९
(१) सूदारालिकव्यञ्जना वा प्रणिहिता दूष्यं रसेनातिसन्दध्युः । इत्युपनिषत्प्रतिषेधः ।
(२) उभयदूष्यप्रतिषेधस्तु । यत्र दूष्यः प्रतिषेद्धव्यस्तत्र दूष्यमेव फल्गुबलतीक्ष्णयुक्तं प्रेषयेत्—‘गच्छामुष्मिन्दुर्गे राष्ट्रे वा सैन्यमुत्थापय हिरण्यं वा, वल्लभाद्वा हिरण्यमाहारय, वल्लभकन्यां वा प्रसह्यानय । दुर्गसेतुवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्मणामन्यतमं वा कारय, राष्ट्रपाल्यमन्तपाल्यं वा । यश्च त्वा प्रतिषेधयेन्न वा ते साहाय्यं दद्यात्, स बन्धव्यः स्यादिति । तथैवेतरेषां प्रेषयेत्—‘अमुष्याविनयः प्रतिषेद्धव्यः’ इति । तमेतेषु कलहस्थानेषु कर्मप्रतिघातेषु वा विवदमानं तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा प्रच्छन्नं हन्युः । तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः ।
(३) पुराणां ग्रामाणां कुलानां वा दूष्याणां सीमाक्षेत्रखलवेश्ममर्यादासु द्रव्योपकरणसस्यवाहनहिंसासु प्रेक्षाकृत्योत्सवेषु वा समुत्पन्ने कलहे तीक्ष्णै-
उसको दुराचार से उत्पन्न या असाध्य रोग हो गया है और चिकित्सा करते समय औषधि या भोजन में विष मिलाकर उसको मार डाले ।
( १ ) अथवा रसोइया तथा हलवाई आदि पकी चीजों में विष मिलाकर उस महामात्र को मार डाले । यहाँ तक गुप्त रूप से दूष्यों के निग्रह के ढंग बताये गये ।
( २ ) दो दूष्य पुरुषों को किस प्रकार एक ही साथ विनष्ट किया जा सकता है, अब इसका उपाय बताया जाता है । जहाँ एक दूष्य को काबू में करना हो, वहाँ दूसरे दूष्य के साथ थोड़ी-सी सेना और कुछ तीक्ष्ण पुरुष भेजे । उस दूष्य से यह कहा जाय कि अमुक किले या प्रान्त में जाकर वह सेना के लिए योग्य व्यक्तियों की भर्ती करे । अथवा उसको आज्ञा दी जाय कि वह सुवर्ण या धन जमा करे या अमुक अध्यक्ष का धन चुराये, या अमुक अध्यक्ष की कन्या को बलात् चुरा ले, या अमुक स्थान पर मकान तथा दुर्ग बनाये, व्यापारियों के मार्ग को ठीक करे, या जंगल में मकान बनाये, अथवा अमुक खानों या लकड़ी-हाथी के जंगलों में ऐसा कार्य करे, या राष्ट्रपाल अथवा अंतपाल के कार्यों को करे । उसे यह भी ससभा दिया जाय कि यदि उसके इन कार्यों में कोई रुकावट डाले या सहयोग न दे तो उसे गिरफ्तार किया जाय । इसी प्रकार दूसरे दूष्यों को मौखिक सूचना भेजी जाय कि वे अमुक व्यक्ति की उद्दण्डता को रोकें । इस प्रकार उनमें परस्पर विवाद पैदा होने पर झगड़ैल दूष्य को तीक्ष्ण नामक गुप्तचर गुप्तरूप से मार डालें । तदनंतर राजा के पुरुष उस हत्या का दोष दूसरे दूष्य पर आरोपित करके उसे भी मरवा दें ।
( ३ ) राजद्रोही नगरों, गांवों, कुलों की सीमाओं, खेत, खलिहान, मकानों की सीमा, सुवर्ण, वस्त्र, अन्न तथा सवारी आदि का नाश कर देने से, तमाशों-उत्सवों में
४१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पांचवां अधिकरण
४१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पांचवां अधिकरण
रुत्पादिते वा तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा ब्रूयुः—‘एवं क्रियन्ते येऽमुना कलहायन्ते’ इति। तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः।
(१) येषां वा दूष्याणां जातमूलाः कलहाः तेषां क्षेत्रखलवेश्मान्यादीपयित्वा बन्धुसम्बन्धिषु वाहनेषु वा तीक्ष्णाः शस्त्रं पातयित्वा तथैव ब्रूयुः—‘अमुना प्रयुक्ताः स्मः’ इति। तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः।
(२) दुर्गराष्ट्रदूष्यान् वा सत्रिणः परस्परस्यावेशनिकान् कारयेयुः। तत्र रसदा रसं दद्युः। तेन दोषेणेतरे नियन्तव्याः।
(३) भिक्षुकी वा दूष्यराष्ट्रमुख्यं दूष्यराष्ट्रमुख्यस्य भार्या स्नुषा दुहिता वा कामयत इत्युपजपेत्। प्रतिपन्नस्याभरणमादाय स्वामिने दर्शयेत्—असौ ते मुख्यो यौवनोत्सिक्तो भार्यां स्नुषां दुहितरं वाभिमन्यते इति। तयोः कलहो रात्रौ इति समानम्।
(४) दूष्यदण्डोपनतेषु तु युवराजः सेनापतिर्वा किञ्चिदुपकृत्यापक्रान्तो
झगड़ा होने पर, दूष्य नगरों में झगड़ा होने पर; तीक्ष्ण गुप्तचर ही दूष्यों को मार डाले और उस हत्या का आरोप दूसरे दूष्यों पर थोप दें। जो भी लड़ाई-झगड़ा करेंगे, उन्हें इसी प्रकार मरवा दिया जायेगा, ऐसा कहकर दूसरे दूष्यों को भी मरवा दिया जाय।
(१) तीक्ष्ण गुप्तचरों को चाहिए कि वे ‘आपस में पुरानी दुश्मनी को लेकर आने वाले दूष्य पुरुषों के खेत, खलिहान, मकान आदि को जलाकर, उनके बंधु-बांधवों, साथियों और पशुओं को हथियार से मार करके यह प्रचारित करें कि ‘अमुक व्यक्ति ने हमें ऐसा कार्य करने के लिए कहा था।’ उसके बाद वे बताये गए लोग गिरफ्तार कर शूली पर चढ़ाये जांय।
(२) सभी गुप्तचर आपसी दुश्मनी रखने वाले दूष्यों को परस्पर मिलाकर एक-दूसरे के घर में उन्हें निमंत्रण दिलवायें और तीक्ष्ण गुप्तचर भोजन में विष डालकर उनमें से एक को मार दें, दूसरे को हत्या के अपराध में गिरफ्तार कर फाँसी दी जाय।
(३) अथवा गुप्तचर भिक्षुकी राष्ट्र के किसी उच्चपदस्थ दूष्य से कहे कि ‘अमुक दूष्य की पत्नी, पुत्रवधू या लड़की उस पर अनुरक्त है।’ यदि वह विश्वास कर ले तो उससे कोई आभूषण आदि लेकर दूष्य को दिखलाये और ‘वह अमुक महाधिकारी जवानी में मतवाला हो कर तुम्हारी पत्नी, पुत्रवधू आदि को चाहता है।’ इस प्रकार उनका आपस में झगड़ा हो जाने के बाद रात में तीक्ष्ण या चर एक को मार डाले और फैला दे कि उसको अमुक दूष्य ने मारा है, इसी अपराध में उस दूसरे दूष्य को भी गिरफ्तार किया जाय।
(४) दण्डोपरान्त (सेना द्वारा या में किये गये) दूष्यों के साथ युवराज या
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में दण्डकर्मिक नामक
प्र० ८९ : अ० १ ] राजद्रोही अधिकारियों हेतु दण्ड-विधि ४११
विक्रमेत । ततो राजा दूष्यदण्डोपनतानेव प्रेषयेत् । फल्गुबलतीक्ष्णयुक्ता-
निति समानाः सर्व एव योगाः ।
(१) तेषां च पुत्रेष्वनुक्षिपत्सु यो निर्विकारः स पितृदायं लभेत । एव-
मस्य पुत्रपौत्राननुवर्तते राज्यमपास्तपुरुषदोषमिति ।
(२) स्वपक्षे परपक्षे वा तूष्णीं दण्डं प्रयोजयेत् ।
आयत्यां च तदात्वे च क्षमावानविशङ्कितः ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमाधिकरणे दाण्डकार्मिकं नाम प्रथमोऽध्यायः,
आदितो नवतितमः ।
—: ० :—
सेनापति पहिले कुछ उपकार करे और बाद में उनसे अलग होकर उनसे झगड़ा करता रहे । तदनंतर राजा कुछ सेना के साथ उन्हें दूसरे द्रोहियों को शांत करने के लिए भेजे । तदनंतर उनके साथ पूर्ववत् व्यवहार किया जाय ।
( १ ) वध किये गये द्रोही महामात्रों में वही पुत्र उत्तराधिकारी हो सकता है जो राजा की निन्दा न करे और जो राजा से पिता की हत्या का बदला लेने का ख्याल न करे । यदि कोई पुरुष राजा के विरुद्ध कोई संकल्प मन में न करे तो उसके पुत्र-पौत्र आदि बेखटके अपनी पैतृक संपति को भोग सकते हैं ।
( २ ) इस प्रकार क्षमाशील राजा को चाहिए कि वह वर्तमान और भविष्य में बिना किसी शंका के उचित रूप से अपने तथा दूसरे के पक्ष में इस गूढ़ दण्ड का प्रयोग करे ।
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में दण्डकर्मिक नामक
पहला अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ९० | ## कोशाभिसंहरणम् |
|---|---|
| अध्याय २ |
(१) कोशमकोशः प्रत्युत्पन्नार्थकृच्छ्रः संगृह्णीयात्।
(२) जनपदं महान्तमल्पप्रमाणं वा देवमातृकं प्रभूतधान्यं धान्यस्यांशं तृतीयं चतुर्थं वा याचेत। यथासारं मध्यमवरं वा।
(३) दुर्गसेतुकर्मवणिक्पथशून्यनिवेशखनिद्रव्यहस्तिवनकर्मोपकारिणं प्रत्यन्तमल्पप्रमाणं वा न याचेत।
(४) धान्यपशुहिरण्यादिनिविशमानाय दद्यात्। चतुर्थमंशं धान्यानां बीजभक्तशुद्धं च हिरण्येन क्रीणीयात्।
(५) अरण्यजातं श्रोत्रियस्वं च परिहरेत्। तदप्यनुग्रहणे क्रीणीयात्।
कोष का अधिकाधिक संग्रह
(१) खजाने के कम हो जाने या अकस्मात् ही अर्थसङ्कट उपस्थित हो जाने पर राजा को कोष-सञ्चय करना चाहिए।
(२) बड़े या छोटे ऐसे जनपदों से अन्न का तीसरा या चौथा हिस्सा राज्यकर प्रजा की अनुमति से वसूल किया जाय, जहाँ का जीवन वृष्टि पर निर्भर हो और जहाँ काफी अनाज पैदा होता हो। इसी प्रकार मध्यम श्रेणी के या छोटे जनपदों से भी अन्न संग्रह किया जाय।
(३) किन्तु जो जनपद मिलों, मकानों व्यापारिक मार्गों, खाली मैदानों, खानों और लकड़ी-हाथी के जंगलों द्वारा राजा तथा प्रजा का उपकार करते हों, जो प्रदेश राज्य की सीमा पर हों और जिनके पास अन्न आदि बहुत थोड़ा हो, उनसे यह राज्य-कर न लिया जाय।
(४) नये बसने वाले किसानों को अन्न, बैल, पशु और धन सरकार की ओर से सहायतार्थ दिया जाय। इस तरह के किसानों से राजा उनकी उपज का चौथा हिस्सा खरीद ले और फिर बीज तथा उनके गुजारे लायक छोड़कर बाकी भी खरीद ले।
(५) जंगल में पैदा हुए तथा श्रोत्रिय द्वारा पैदा किये अन्न में राजा हिस्सा न ले। बीज और खाने योग्य अन्न को छोड़कर उसमें से भी राजा खरीद सकता है।
प्र० १० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१३
(१) तस्याकरणे वा समाहर्तृपुरुषा ग्रीष्मे कर्षकाणामुद्ध्वापं कारयेयुः । प्रमादावस्कन्नस्यात्ययं द्विगुणमुताहरन्तो बीजकाले बीजलेख्यं कुर्युः । निष्पन्ने हरितपक्वादानं वारयेयुः । अन्यत्र शाककटभङ्गमुष्टिभ्यां देवपितृ-पूजादानार्थं गवार्थं वा भिक्षुकग्रामभृतकार्थं च राशिमूलं परिहरेयुः ।
(२) स्वसस्यापहारिणः प्रतिपातोऽष्टगुणः । परसस्यापहारिणः पञ्चा-शद्गुणः सीतात्ययः स्ववर्गस्य बाह्यस्य तु वधः ।
(३) चतुर्थमंशं धान्यानां षष्ठं वन्यानां तूललाक्षाक्षौमवल्ककार्पास-रोमकौशेयकौषधगन्धपुष्पफलशाकपण्यानां काष्ठवेणुमांसवल्लूराणां च गृह्णीयुः । दन्ताजिनस्यार्धम् । अनिसृष्टं विक्रीणानस्य पूर्वः साहसदण्डः ।
(४) इति कर्षकेषु प्रणयः ।
(५) सुवर्णरजतवज्रमणिमुक्ताप्रवालाश्वहस्तिपण्याः पञ्चाशत्कराः ।
(१) यदि श्रोत्रिय खेती न करे तो समाहर्ता आदि अधिकारियों को चाहिए कि उस जमीन को वे गरमी की जुताई-बुआई के लिये दूसरे किसानों को दे दें । यदि किसान की लापरवाही से बीज नष्ट हो जाय तो समाहर्ता उस पर दुगुना जुर्माना करे और दूसरी फसल पर उस सारी कार्यवाही को रजिस्टर में दर्ज कर दे । फसल की तैयारी होने पर किसानों को कच्चा-पक्का अन्न लाने के लिए रोक दिया जाय । किन्तु वे देवपूजा, पितृपूजा या गाय के लिये मुट्ठी भर अनाज या मुट्ठी भर पुआल ला सकते हैं । किसानों को चाहिए कि वे भिखारी तथा गाँव के नाई, धोबी, कुम्हार आदि के लिए खलिहान में अन्न-राशि के नीचे का हिस्सा छोड़ दे ।
(२) सरकार को पैदावार की कमी दिखाने के लिए यदि किसान अपने ही खेत में चोरी करे तो उससे, चोरी किए हुए अन्न का, अठगुना दण्ड वसूल किया जाय । यदि कोई व्यक्ति अपने ही गाँव में खड़ी फसल की चोरी करे तो उसे चोरी के माल का पचास गुना दण्ड दिया जाय । यदि वह दूसरे गाँव का हो तो उसे प्राण दण्ड की सजा दी जाय ।
(३) धान्यों का चौथा हिस्सा और वन में होने वाले अन्न का तथा रूई, लाख, जूट, छाल, कपास, ऊन, रेशम, औषधि, गन्ध, पुष्प, फल, शाक, लकड़ी, बाँस, सूखा, मांस, आदि का छठा हिस्सा राजकर के रूप में लिया जाय । हाथी दाँत और गाय आदि के चमड़े का आधा हिस्सा राजकर में लिया जाय । जो व्यक्ति इन वस्तुओं को छिपाकर बेचे, उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
(४) यहाँ तक किसानों के प्रति राजा की ओर से कर की याचना के सम्बन्ध में विधान किया गया ।
(५) राजकर : सोना, चाँदी, हीरा, मणि, मोती, मूंगा, घोड़े और हाथी
४१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पांचवां अधिकरण
सूत्रवस्त्रताम्रवृत्तकंसगन्धभैषज्यशीधुपण्याश्चत्वारिंशत्कराः । धान्यरसलोहपण्याः शकटव्यवहारिणश्च त्रिंशत्कराः । काचव्यवहारिणो महाकारवश्च विंशतिकराः । क्षुद्रकारवो बन्धकीपोषकाश्च दशकराः । काष्ठवेणुपाषाणमृद्भाण्डपक्वान्नहरितपण्याः पञ्चकराः ।
(१) कुशीलवा रूपाजीवाश्च वेतनार्धं दद्युः ।
(२) हिरण्यकरभकर्मण्यानाहारयेयुः । न चैषां कञ्चिदपराधं परिहरेयुः ते ह्यपरगृहीतमभानीय विक्रीणीरन् ।
(३) इति व्यवहारिषु प्रणयः ।
(४) कुक्कुटसूकरमर्धं दद्यात् । क्षुद्रपशवः षड्भागम् । गोमहिषाश्वतरखरोष्ट्राश्च दशभागम् । बन्धकीपोषका राजप्रेष्याभिः परमरूपयौवनाभिः कोशं संहरेयुः ।
(५) इति योनिपोषकेषु प्रणयः ।
आदि व्यापारिक वस्तुओं पर उनकी लागत का पचासवाँ हिस्सा टैक्स लिया जाय । इसी प्रकार सूत, कपड़ा; ताँबा, पीतल, काँसा, गन्ध, जड़ी-बूटी और शराब पर चालीसवाँ हिस्सा, गेहूं, धान आदि अन्न, तेल, घी, लोहा और बैलगाड़ियों पर तीसवाँ हिस्सा, काँच के व्यापारी तथा बड़े-बड़े कारीगरों पर बीसवाँ हिस्सा छोटे-छोटे कारीगरों तथा कुलटा स्त्रियों को घर में रखने वालों से दसवाँ हिस्सा, और लकड़ी, बांस, पत्थर, मिट्टी के वर्तन, पकवान तथा हरे शाक आदि पर पांचवाँ हिस्सा सरकारी टैक्स लिया जाय ।
(१) नट, नर्तक, गायक तथा वेश्यायें अपनी कमाई का आधा हिस्सा राजकर दें ।
(२) व्यापारियों से प्रति पुरुष के हिसाब से कुछ नकदी कर रूप में ली जाय और इस भय से व्यापार छोड़ देने पर भी उसका कर वसूला जाय । क्योंकि ऐसे लोगों से यह भी सम्भव हो सकता है कि वे अपनी वस्तु को दूसरे की कहकर बेचें, जिससे कि टैक्स से बच जाँय ।
(३) यहाँ तक व्यापारियों से राज्यकर लेने के सम्बन्ध में कहा गया ।
(४) मुर्गे और सूअर पालने वाले, उनकी आमद का आधा हिस्सा टैक्स दें । इसी प्रकार भेड़-बकरी पालने वाले छठा हिस्सा, गाय, भैंसे, खच्चर, गधा तथा ऊँट पालने वाले दसवाँ हिस्सा राजकर दें । वेश्याओं के जमादारों को चाहिए कि वे राज-अनुमत रूपवती वेश्याओं द्वारा राजकोष के लिए धन जमा करें ।
(५) यहाँ तक जानवर पालने वालों से राज्यकर लेने के सम्बन्ध में कहाँ गया ।
प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१५
(१) सकृदेव न द्विः प्रयोज्यः । तस्याकरणे वा समाहर्ता कार्यमपदिश्य पौरजानपदान् भिक्षेत । योगपुरुषाश्चात्र पूर्वमतिमात्रं दद्युः । एतेन प्रदेशेन राजा पौरजानपदान् भिक्षेत । कापटिकाश्चैनानल्पं प्रयच्छतः कुत्सयेयुः । सारतो वा हिरण्यमाढ्यान् याचेत ।
(२) यथोपकारं वा स्ववशा वा यदुपहरेयुः । स्थानच्छत्रवेष्टनविभूषाश्चैषां हिरण्येन प्रयच्छेत् । पाषण्डसंघद्रव्यमश्रोत्रियभोग्यं देवद्रव्यं वा कृत्यकराः प्रेतस्य दग्धगृहस्य वा हस्ते न्यस्तमित्युपहरेयुः ।
(३) देवताध्यक्षो दुर्गराष्ट्रदेवतानां यथास्वमेकस्थं कोशं कुर्यात् । तथैव चाहरेत् । दैवतचैत्यं, सिद्धपुण्यस्थानभौमवादिकं वा रात्रावुत्थाप्य यात्रासमाजाभ्यामाजीवेत् । चैत्योपवनवृक्षेण वा देवताभिगमनमनातर्वपुष्पफलयुक्तेन ख्यापयेत् । मनुष्यकरं वा वृक्षे रक्षोभयं रूपयित्वा सिद्धव्यञ्जनाः
( १ ) राज्यकर एक बार ही लेना चाहिए, दुबारा नहीं । यदि एक वार कर लेने में खजाने को न बढ़ाया जा सके तो समाहर्त्ता को चाहिए कि किसी कार्य का बहाना बनाकर वह नगरवासियों और प्रदेशवासियों से धन की याचना करे । इस योजना में मिले हुए लोग जनता को दिखाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा धन दें । इसी बहाने से राजा अपनी प्रजा से धन की याचना करे । यदि कोई थोड़ा धन दे तो राजा के गुप्तचर उसकी निंदा समाज में फैलायें । धनी व्यक्तियों से उनकी हैसियत के अनुसार धन लिया जाय ।
( २ ) राज्य की ओर से उपकृत लोगों पर उपकार के अनुपात से या जितना धन मिले हुए लोग दें, उतनी ही रकम देने को धनवानों से आग्रह किया जाय । और इस प्रकार उन सहायता देने वाले धनी पुरुषों को अधिकार, उच्चासन, छत्र, वेष्टन ( पगड़ी ) तथा आभूषण आदि देकर संमानित किया जाय । किसी पाखंडी या पाखंडी समूह की सम्पत्ति को तथा उस मन्दिर की सम्पति को जिसका कोई भी अंश श्रोत्रिय के पास नहीं जाता है तथा मरे हुए एवं घर जले हुए की सम्पत्ति को, उनका कर्म कराने के बहाने, राजकोष में जमा कर लिया जाय ।
( ३ ) देवताध्यक्ष ( देव मन्दिरों का अधिकारी ) को चाहिए कि वह दुर्ग तथा राष्ट्र के देवमन्दिरों की आमदनी को एक स्थान पर जमा करके रखे । उसको फिर राजा को दे दे । किसी प्रसिद्ध पवित्र स्थान में 'भूमि को फाड़ कर देवता प्रकट हुआ है' ऐसी अफवाह फैलाकर रात में वहाँ देवता की एक वेदी बनवा दी जाय और मेला लगवा कर यात्रियों तथा दर्शकों से वहाँ खूब भेंट चढ़वाई जाय, उसको राजा ले ले । बिना मौसम किसी मन्दिर या उपवन में किसी पेड़ पर फल या फूल पैदा कराके यह प्रसिद्धि करवा दी जाय कि वह तो देव-महिमा है । अथवा सिद्धों के वेष में घूमने
४१६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवाँ अधिकरण
पौरजानपदानां हिरण्येन प्रतिकुर्य्युः । सुरुङ्गायुक्ते वा कूपे नागमनियतशि-
रस्कं हिरण्योपहारेण दर्शयेद् नागप्रतिमायामन्तश्छिद्रायाम् । चैत्यच्छिद्रे
वल्मीकच्छिद्रे वा सर्पदर्शन आहारेण प्रतिबद्धसंज्ञं कृत्वा श्रद्दधानानादर्शयेत् ।
अश्रद्दधानानामाचमनप्रोक्षणेषु रसमवपाय्य देवताभिशपं ब्रूयात् । अभि-
त्यक्तं वा दंशयित्वा योगदर्शनप्रतीकारेण वा कोषाभिसंहरणं कुर्यात् ।(१) वैदेहकव्यञ्जनो वा प्रभूतपण्यान्तेवासी व्यवहरेत् । स यदा पण्य-
मूल्ये निक्षेपप्रयोगैरुपचितः स्यात् तदैनं रात्रौ मोषयेत् । एतेन रूपदर्शकः
सुवर्णकारश्च व्याख्यातौ ।(२) वैदेहकव्यञ्जनो वा प्रख्यातव्यवहारः प्रवहणनिमित्तं याचित-
कमवक्रीतकं वा रूप्यसुवर्णभाण्डमनेकं गृह्णीयात् । समाजे वा सर्वपण्य-
वाले गुप्तचर रात में किसी पेड़ पर बैठ कर 'मुझे प्रतिदिन एक-एक मनुष्य चाहिए। नहीं तो सबको एक ही साथ खा जाऊँगी' ऐसा राक्षस का वानिक बनाया जाय, उसके प्रतिकार के लिए जनता से धन-संग्रह किया जाय और वह धन राजकोष में रखा जाय। अथवा किसी सुरङ्ग वाले कुँएँ में तीन या पाँच शिर वाले बनावटी नाग को दिखाया जाय और उसको दिखाने के बदले में दर्शकों से धन लिया जाय, फिर उस धन को राजकोष में जमा कर दिया जाय। या किसी मन्दिर तथा वल्मीक में साँप को अचानक दिखा कर उसे मन्त्र या औषधि से वश में कर लिया जाय, और तब यह कहते हुए श्रद्धालु भक्तों को उसके दर्शन कराये जाँय कि 'देखो, देवता की कैसी महिमा है?'। जो व्यक्ति इस पर विश्वास न करें उन्हें चरणामृत के साथ इतना विष दिया जाय, जिससे वे बेहोश हो जायें, और फिर यह प्रसिद्धि की जाय कि 'यह नाग देवता का शाप है।' जो व्यक्ति देवता की निन्दा करे उन्हें साँप से कटवा दिया जाय और उसको भी देवता का ही शाप कहा जाय। फिर बाद में औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट रीति से चिकित्सा कर उसके विष को दूर कर दिया जाय। इस प्रकार धन संचय करके राजा अपने खजाने को बढ़ाये।
(१) अथवा व्यापारी के वेष में वैदेहक नामक गुप्तचर प्रचुर वस्तुओं और अनेक सहायकों को लेकर व्यापार करना आरम्भ कर दें। लोगों के बीच जब उसकी साख बन जाय और अमानत के रूप में तथा ब्याज आदि के लिए लोग उसके पास जब काफी पूंजी जमा कर दें, तब अचानक ही वह चोरी हो जाने का ढिंढोरा कर सारा माल राजा के लिए हड़प ले।
(२) इसी प्रकार सरकार द्वारा नियुक्त सिक्कों का पारखी और सुनार भी छल-कपट से राजकोष के लिए धन एकत्र करें। अथवा व्यापारी के वेष में राजा के गुप्तचर जब लेन-देन में खूब प्रसिद्ध हो जायें तो एक दिन वे सहभोज के बहाने पास-
प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१७
सन्दोहेन प्रभूतं हिरण्यसुवर्णमृणं गृह्णीयात् । प्रतिभाण्डमूल्यं च । तदुभयं रात्रौ मोषयेत् ।
(१) साध्वीव्यञ्जनाभिः स्त्रीभिर्दूष्यानुन्मादयित्वा तासामेव वेश्म-स्वभिगृह्य सर्वस्वान्याहरेयुः ।
(२) दूष्यकुल्यानां वा विवादे प्रत्युत्पन्ने रसदाः प्रणिहिता रसं दद्युः । तेन दोषणेतरे पर्यादातव्याः ।
(३) दूष्यमभित्यक्तो वा श्रद्धेयापदेशं पण्यं हिरण्यनिक्षेपमृणप्रयोगं दायं वा याचेत । दासशब्देन वा दूष्यमालम्बेत । भार्यामस्य स्नुषां दुहितरं वा दासीशब्देन वा भार्याशब्देन । तं दूष्यगृहप्रतिद्वारि रात्रावुपशयानमन्यत्र वा वसन्तं तीक्ष्णो हत्वा ब्रूयात्—'हतोऽयमित्थं कामुक' इति । तेन दोषेणेतरे पर्यादातव्याः ।
(४) सिद्धव्यञ्जनो वा दूष्यं जम्भकविद्याभिः प्रलोभयित्वा ब्रूयात्—'अक्षयं हिरण्यं राजद्वारिकं स्त्रीहृदयमरिव्याधिकरमायुष्यं पुत्रीयं वा कर्म
पड़ोस के लोगों से माँगकर या भाड़े पर सोने-चाँदी आदि के बर्तन ले आवें या अपना माल रखकर उसके बदले में अनेक व्यक्तियों की उपस्थिति में किसी से रुपया या सोना ऋण ले आवें, और दूसरे दिन जिनसे अपनी वस्तुएँ बेचनी है उनसे प्रतिवस्तु का दाम ले आवें । इन दोनों प्रकार के लाये हुए मालों की वह रात्रि में चोरी करवा दे; इस प्रकार राजकोष को भरने का यत्न करे ।
( १ ) कुलीन वेष में रहने वाली गुप्तचर स्त्रियों के द्वारा दूष्य पुरुषों को उत्साही बनाकर उन स्त्रियों के घरों में ही उनको गिरफ्तार किया जाय और तब उनका सर्वस्व छीन लिया जाय ।
( २ ) दूष्य पुरुषों के आपसी झगड़े के समय गुप्तचरों को चाहिए कि उनके पास रहते हुए किसी एक को वे विष देकर मार दें । दूसरे दूष्य का धन अपराध में अपहरण किया जाय ।
( ३ ) कोई पदच्युत या जातिच्युत व्यक्ति माल, सोने का अमानत, ऋण अथवा दायभाग आदि को दूष्य से इस प्रकार माँगे जिससे कि लोगों को विश्वास हो जाय कि इनका आपस में घनिष्ठ संबन्ध है । अथवा वह दूष्य को दास कह कर तथा उसकी स्त्री, पुत्री आदि को दासी या पत्नी आदि कह कर गाली दे । उस रात वह उसके ही द्वार पर या अन्यत्र कहीं सो जाय; फिर तीक्ष्ण पुरुष जाकर उसको मार दें और यह अफवाह फैला दें कि 'यह कामी पुरुष दूष्य के साथ इस प्रकार झगड़ा करते हुए मारा गया ।' इसी अपराध में राजा, दूष्य का सर्वस्व हर ले ।
( ४ ) अथवा सिद्ध के वेष में गुप्तचर दूष्य को ऐसा कह कर प्रलोभन दे कि
२७ कौ०
४१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवाँ अधिकरण
जानामि' इति । प्रतिपन्नं चैत्यस्थाने रात्रौ प्रभूतसुरामांसगन्धमुपहारं कारयेत् । एकरूपं चात्र हिरण्यं पूर्वनिखातम् । प्रेताङ्गं प्रेतशिशुर्वा यत्र निहितः स्यात् । ततो हिरण्यस्य दर्शयेदत्यल्पमिति च ब्रूयात्—'प्रभूतहिरण्यहेतोः पुनरुपहारः कर्तव्यः' इति । स्वयमेवैतेन हिरण्येन श्वोभूते प्रभूतमौपहारिकं क्रीणीहि' इति । तेन हिरण्येनौपहारिकक्रये गृह्येत् ।
(१) मातृव्यञ्जनया वा 'पुत्रो मे त्वया हतः' इत्यवरूपितः स्यात् । संसिद्धमेवास्य रात्रियागे वनयागे वनक्रीडायां वा प्रवृत्तायां तीक्ष्णा विशस्याभित्यक्तमतिनयेयुः ।
(२) दूष्यस्य वा भृतकव्यञ्जनो वेतनहिरण्ये कूटरूपं प्रक्षिप्य प्ररूपयेत् ।
(३) कर्मकारव्यञ्जनो वा गृहे कर्म कुर्वाणः स्तेनकूटरूपकारकोपकरणमपनिदध्यात् । चिकित्सकव्यञ्जनो वा गरमगरापदेशेन ।
'मैं अपार हिरण्य के खजाने को देखना, राजा को वश में करना, स्त्री को वश में करना, दुश्मन को बीमार करना, आयु को बढ़ाना और सन्तान को पैदा करना आदि चमत्कार जानता हूँ।' जब दूष्य राजी हो जाय तो रात में किसी देवस्थान के पास ले जाकर गुप्तचर उसको खूब मदिरा, मांस, गन्ध आदि देवता को चढ़ाने के लिए कहे; तदनन्तर जहाँ मुर्दे का कोई अङ्ग या मरा हुआ बच्चा गड़ा हो वहाँ से, पहिले गाड़ा हुआ, पुराना सिक्का निकाल कर उससे कहे कि 'यह बहुत कम है, क्योंकि तुमने कम भेंट चढ़ाई थी । यदि तुम अधिक भेंट चढ़ाना चाहते हो तो यह सोना लो और कल अधिक सामग्री लाकर देवता को अधिक से अधिक भेंट चढ़ाना । जब दूसरे दिन दूष्य उस सुवर्ण का सामान खरीदने लगे तभी उसको गिरफ्तार करके उसका सर्वस्व अपहरण किया जाय ।
( १ ) अथवा माता-पिता के भेष में कोई गुप्तचर स्त्री दूष्य पर यह दोषारोपण करे कि 'तूने मेरा लड़का मारा है' । जब दूष्य पुरुष रात्रिहवन, वनयज्ञ और वनक्रीड़ा को प्रस्थान करे तो तीक्ष्ण लोग किसी नियुक्त किए पुरुष को मारकर दूष्य के रात्रि-हवन आदि के पास उसको गाड़ दें; और इसी अपराध में दूष्य को गिरफ्तार कर उसका सर्वस्व अपहरण किया जाय ।
( २ ) अथवा दूष्य के पास नौकर के रूप में रहने वाला कोई खुफिया वेतन में जाली सिक्का मिलाकर उसकी सूचना राजा को कर दे ।
( ३ ) अथवा चारक के वेष में दूष्य के घर कार्य करता हुआ कोई खुफिया छिपे तौर पर जाली सिक्का बनाने के सब साधन वहाँ रख दे । अथवा कोई खुफिया वैद्य दूष्य को औषधि की जगह विष दे दे ।
प्र० ९० : अ० २ ] कोष का अधिकाधिक संग्रह ४१९
(१) प्रत्यासन्नो वा दूष्यस्य सत्त्री प्रणिहितमभिषेकभाण्डममित्रशासनं च । कापटिकमुखेन आचक्षीत, कारणं च ब्रूयात् ।
(२) एवं दूष्येष्वधार्मिकेषु च वर्तेत । नेतरेषु ।
(३) पक्वं पक्वमिवारामात् फलं राज्यादवाप्नुयात् ।
आत्मच्छेदभयादामं वर्जयेत् कोपकारकम् ॥इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे कोषाभिसंहरणं नाम द्वितीयोऽध्यायः,
आदित एकनवतितमः ।
—: ० :—
( १ ) अथवा दूष्य के पास रहता हुआ सत्त्री नामक गुप्तचर दूष्य के घर में रखे राज्याभिषेक तथा शत्रु के लेख की सूचना कापटिक गुप्तचर के द्वारा राजा तक पहुँचा दे । उसका कारण यह सिद्ध किया जाय कि वह दूष्य राजा को मारकर उसकी जगह अपना अभिषेक कराना चाहता है । इसी अपराध में उसका सब कुछ ले लिया जाय ।
( २ ) अपने कोष की वृद्धि के लिए राजा इस प्रकार के उपायों का प्रयोग दूष्यों और अधार्मिक व्यक्ति पर ही करे, दूसरों पर नहीं ।
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह दुष्ट पुरुषों का धन उसी प्रकार ले ले जिस प्रकार वाटिका से पके हुए फल को लिया जाता है; किन्तु धर्मात्मा पुरुषों का धन वह उसी प्रकार छोड़ दे जैसे कच्चे फल को छोड़ दिया जाता है । कच्चे फल के समान धर्मात्मा पुरुषों से वसूला गया धन प्रजा के कोप का कारण बन जाता है ।
योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में कोषाभिसंहरण नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ९१ | भृत्यभरणीयम् |
|---|---|
| अध्याय ३ |
(१) दुर्गजनपदशक्त्या भृत्यकर्म समुदयपादेन स्थापयेत् । कार्यसाधनसहेन वा भृत्यलाभेन शरीरमवेक्षेत, न धर्मार्थौ पीडयेत् ।
(२) ऋत्विगाचार्यमन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजराजमातृराजमहिष्योऽष्टचत्वारिंशत्साहस्राः । एतावता भरणे नानास्वाद्यत्वमकोपकं चैषां भवति ।
(३) दौवारिकान्तर्वंशिकप्रशास्तृसमाहर्तृसन्निधातारश्चतुर्विंशतिसाहस्राः । एतावता कर्मण्या भवन्ति ।
(४) कुमारकुमारमातृनायकपौरव्यावहारिककार्मान्तिकमन्त्रिपरिषद्राष्ट्रपालान्तपालाश्च द्वादशसाहस्राः । स्वामिपरिबन्धबलसहाया ह्येतावता भवन्ति ।
भृत्यों का भरण पोषण
(१) दुर्ग और जनपद की शक्ति के अनुसार नौकरों को रखा जाय और राज्य की आय का चौथा भाग उनके भरण-पोषण पर व्यय किया जाय । अथवा कार्य कुशल भृत्य जितने भी वेतन पर मिलें, उन्हें नियुक्त किया जाय, किन्तु आमदनी के स्तर पर अवश्य ध्यान रखा जाय । कहीं ऐसा न हो कि आमदनी कम और खर्चा अधिक हो जाय । ऐसा कोई भी कार्य न किया जाय जिससे धर्म और अर्थ की व्यर्थ क्षति हो ।
(२) ऋत्विक्, आचार्य, मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, राजमाता और पटरानी, इन्हें प्रतिवर्ष अठतालीस हजार पण वेतन (वृत्ति) दिया जाय । इनके भरण-पोषण के लिए इतना यथेष्ट है और ऐसी स्थिति में राजा के लिए भारस्वरूप बन कर उसके कोप का कारण भी नहीं हो सकते हैं ।
(३) द्वारपाल (दौवारिक), अंतःपुर रक्षक (अन्तर्वंशिक), आयुधाध्यक्ष (प्रशास्ता), कर वसूल करने वाला अधिकारी (समाहर्त्ता) और भांडागाराध्यक्ष (सन्निधाता), इनको प्रति वर्ष चौबीस हजार पण वेतन दिया जाय । इतना वेतन देने में ये अपने कार्यों को भली भाँति करते रहेंगे ।
(४) युवराज के भाई (कुमार), उन भाइयों की मातायें या धाय (कुमार
प्र० ९१ : अ० ३ ] भृत्यों का भरण-पोषण ४२१
(१) श्रेणीमुख्या हस्त्यश्वरथमुख्याः प्रदेष्टारश्च अष्टसाहस्राः । स्वव-
र्गानुकर्षणो ह्येतावता भवन्ति ।
(२) पत्त्यश्वरथहस्त्यध्यक्षाः द्रव्यहस्तिवनपालाश्च चतुःसाहस्राः ।
(३) रथिकानीकस्थचिकितसकाश्वदमकवर्धकयो योनिपोषकाश्च द्वि-
साहस्राः ।
(४) कार्तान्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकपौराणिकसूतमागधाः पुरोहित-
पुरुषाः सर्वाध्यक्षाश्च साहस्राः ।
(५) शिल्पवन्तः पादाताः संख्यायकलेखकादिवर्गाः पञ्चशताः ।
(६) कुशीलवास्त्वर्धतृतीयशताः । द्विगुणवेतनाश्चैषां तूर्यकराः ।
(७) कारुशिल्पिनो विंशतिशतिकाः ।
(८) चतुष्पदद्विपदपरिचारकपारिकर्मिकौपस्थायिकपालकविष्टिवन्ध-
काः षष्टिवेतनाः ।
माता ), सूबेदार मेजर ( नायक ), शहर कोतवाल ( पौर ), व्यापार का अध्यक्ष ( व्यावहारिक ) कृषि आदि का अध्यक्ष ( कर्मांतिक ), मंत्रिपरिषद के पूर्वोक्त बारह सदस्य, पुलिस सुपरिटेंडेण्ट ( राष्ट्रपाल ) और सीमा-निरीक्षक ( अन्तपाल ), इनको बारह हजार पण वेतन प्रति वर्ष दिया जाय । इतना वेतन देने से ये लोग सदा राजा के अनुकूल बने रहेंगे और उसकी सहायता के लिए हर समय तैयार रहेंगे ।
( १ ) इंजीनियर ( श्रेणीमुख्य ), हाथी-घोड़े-रथों के अध्यक्ष और कंटक शोधन अधिकारी ( प्रदेष्टा ), इनको आठ सौ पण वार्षिक वेतन दिया जाय । इतना वेतन दिये जाने पर ये अपने वर्ग ( डिपार्टमेंट ) के कर्मचारियों के सदा अनुकूल बने रहेंगे ।
( २ ) पैदल सेना का अध्यक्ष, अश्वसेना, रथसेना तथा गजसेना के अध्यक्ष और लकड़ी-हाथियों के जंगल के अध्यक्षों को चार हजार पण प्रतिवर्ष वेतन दिया जाय ।
( ३ ) रथ-शिक्षक, गज-शिक्षक, चिकित्सक, अश्व-शिक्षक और मुर्गा, सूअर आदि के पालने वालों का अध्यक्ष, इन सब को दो हजार पण वार्षिक दिया जाय ।
( ४ ) सामुद्रिक ( कार्तान्तिक ), सकुन बताने वाले ( नैमित्तिक ) ज्योतिषी, कथावाचक, स्तुति-वाचक ( मागध ), पुरोहित के नौकर और सुरा आदि के अध्यक्ष, इनको एक हजार वेतन प्रतिवर्ष दिया जाय ।
( ५ ) चित्रकार, पादाता ( खिलाड़ी ), गणक ( संख्यायक ) और लेखक वर्ग के कर्मचारियों को पाँच सौ पण प्रतिवर्ष दिया जाय ।
( ६ ) कुशीलव ( नट, नर्तक, गायक ) आदि को ढाई सौ पण और उनमें जो अच्छा बाजा बजाता है, उन्हें पाँच सौ पण वेतन प्रतिवर्ष दिया जाय ।
( ७ ) दूसरे साधारण कारीगरों को एक सौ बीस पण वेतन दिया जाय ।
( ८ ) वेटनरी डाक्टर, डाक्टर या सिविल सर्जनों, परिचारक, गोरक्षक ( ग्वालों ) और वेगारियों ( विष्टिबंधक ) आदि को ६० पण वार्षिक वेतन दिया जाय ।
४२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
४२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
(१) आर्ययुक्तारोहकमाणवकशैलखनकाः सर्वोपस्थायिन आचार्या विद्यावन्तश्च पूजावेतनानि यथार्हं लभेरन् पञ्चशतावरं सहस्रपरम् ।
(२) दशपणिको योजने दूतो मध्यमः । दशोत्तरे द्विगुणवेतन आयोजन-शतादिति ।
(३) समानविद्येभ्यस्त्रिगुणवेतनॊ राजा राजसूयादिषु ऋतुषु राज्ञः सारथिः साहस्रः ।
(४) कापटिकोदास्थितगृहपतिकवैदेहकतापसव्यञ्जनाः साहस्राः ।
(५) ग्रामभृतकसत्रीतीक्ष्णरसदभिक्षुक्यः पञ्चशताः ।
(६) चारसञ्चारिणोऽर्धतृतीयशताः । प्रयासवृद्धवेतना वा ।
(७) शतवर्गसहस्रवर्गाणामध्यक्षा भक्तवेतनलाभमादेशं विक्षेपं च कुर्युः । अविक्षेपे राजपरिग्रहदुर्गराष्ट्ररक्षावेक्षणेषु च नित्यमुख्याः स्युरनेकमुख्याश्च ।
( १ ) आर्य ( सत्पुरुष ), युक्तारोहक ( विगड़ैल घोड़े का सवार ), माणवक ( वेदाध्यायी विद्यार्थी ) शैलखनक ( पत्थर आदि पर नक्काशी करने वाला ), सर्वोपस्थायिन आचार्य ( निपुण गायनाचार्य ) और विद्वान्, इन लोगों को योग्यतानुसार पाँच सौ से हजार पण तक वेतन प्रति वर्ष दिया जाय ।
( २ ) मध्यगति से एक योजन तक जाने-आने वाले दूत को दस पण वेतन दिया जाय । दस योजन से सौ योजन तक चलने वाले को बीस पण वेतन दिया जाय ।
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह राजसूय आदि यज्ञों पर मंत्री, पुरोहित आदि को उनके निर्धारित वेतन से तिगुना वेतन दे; इसी प्रकार राजा को यज्ञ स्थान में लाने वाले सारथि को एक हजार पण वेतन दिया जाय ।
( ४ ) कापटिक, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक, और तापस आदि के वेश में कार्य करने वाले गुप्तचरों को प्रतिवर्ष हजार पण वेतन दिया जाय ।
( ५ ) धोबी, नाई आदि गाँव के नौकर, गाँव के मुखिया, खत्री, तीक्ष्ण तथा भिक्षुकी आदि के वेश में काम करने वाले गुप्तचरों को पाँच सौ पण वेतन दिया जाय ।
( ६ ) गुप्तचरों को इधर-उधर भेजने वाले कर्मचारियों को ढाई सौ पण वेतन दिया जाय । अथवा मेहनत के अनुसार सबको अधिक वेतन दिया जाय ।
( ७ ) शतवर्ग के या सहस्रवर्ग के अध्यक्षों को चाहिए कि वे नौकरों को यथोचित वेतन दिलायें, उनसे राजाज्ञा का पालन करायें, और आवश्यकतानुसार उनकी नियुक्ति तथा उनका स्थानान्तरण ( विक्षेप ) करायें । विभागीय अध्यक्षों को चाहिए कि वे जिस विभाग में ठीक तरह से कार्य न होता हो, वहाँ के लिए अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति करें; और प्रत्येक विभाग के कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपने
प्र० ९१ : अ० ३ ] भृत्यों का भरण-पोषण ४२३
(१) कर्मसु भृतानां पुत्रदारा भक्तवेतनं लभेरन् । बालवृद्धव्याधिताश्चैषामनुग्राह्याः । प्रेतव्याधितसूतिकाकृत्येषु चैषामर्थमानकर्म कुर्यात् ।
(२) अल्पकोशः कुप्यपशुक्षेत्राणि दद्यात् । अल्पं च हिरण्यम् । शून्यं वा निवेशयितुमभ्युत्थितो हिरण्यमेव दद्यात्, न ग्रामं ग्रामसञ्जातव्यवहारस्थापनार्थम् ।
(३) एतेन भृतानामभृतानां च विद्याकर्मभ्यां भक्तवेतनविशेषं च कुर्यात् । षष्टिवेतनस्याढकं कृत्वा हिरण्यानुरूपं भक्तं कुर्यात् ।
(४) पत्त्यश्वरथद्विपाः सूर्योदये बहिः सन्धिदिवसवज्र्जं शिल्पयोग्याः कुर्युः । तेषु राजा नित्ययुक्तः स्यात् । अभीक्ष्णं चैषां शिल्पदर्शनं कुर्यात् । कृतनरेन्द्राङ्कं शस्त्रावरणमायुधागारं प्रवेशयेत् । अशस्त्राश्चरेयुरन्यत्र मुद्रानुज्ञातात् । नष्टं विनष्टं वा द्विगुणं दद्यात् । विध्वस्तगणनां च कुर्यात् ।
अध्यक्ष के अनुशासन में रह कर ठीक तरह से कार्यों को करें । अध्यक्ष भी अनेक होने चाहिए ।
( १ ) यदि कार्य करते हुए किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाय तो उसका वेतन उसके पुत्र-पत्नी ले लें । अपने मृत कर्मचारियों के बालकों, वृद्धों और बीमार परिजनों पर राजा कृपा-दृष्टि बनाये रखे । उनके घरों पर मृत्यु; बीमारी या बच्चा हो जाने पर उसकी आर्थिक तथा मौखिक सहायता करता रहे ।
( २ ) यदि खजाने में कमी हो तो आर्थिक सहायता की जगह राजा कुप्य, पशु तथा जमीन आदि से अपने कृपार्थियों की सहायता करे । ऐसी अवस्था में वह सुवर्ण आदि बहुत थोड़ी मात्रा में दे किन्तु राजा यदि निर्जन मैदानों को आबाद करना चाहे तो सुवर्ण ही अधिक दे, जमीन आदि न दे, जिससे बसे हुए गाँव के मूल्य आदि का निर्णय, व्यवहार की स्थापना के लिए ठीक तौर पर किया जा सके ।
( ३ ) इसी प्रकार स्थायी या अस्थायी कर्मचारियों की योग्यता और कार्यक्षमता के अनुसार कम या ज्यादा वेतन भत्ता दिया जाय । सामान्यतया साठ पण वेतन पाने वालों को एक आढक भर अन्न दिया जाय । इसी क्रम से भक्त भत्ता न्यून या अधिक दिया जाय ।
( ४ ) अमावस्या-पूर्णमासी आदि संधिदिनों को छोड़कर सूर्योदय के बाद पैदल, अश्वारोही, रथारोही और गजारोही सेनाओं को कवायद (शिल्पदर्शन) सिखायी जाय । राजा को चाहिए कि वह सेनाओं पर बराबर ध्यान रखे और उनकी कवायद का भी निरीक्षण करता रहे । उसके बाद हथियारों और कवचों को राजमुद्रा से चिह्नित करके ही आयुधागार में प्रविष्ट किया जाय । लाइसेंस ( मुद्रानुज्ञात ) सुदा हथियार-बंदों के अलावा कोई भी सिपाही हथियार लिये इधर-उधर न घूमें । जिससे जो हथि-
४२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
(१) सार्थिकानां शस्त्रावरणमन्तपाला गृह्णीयुः, समुद्रमवचारयेयुर्वा । यात्रामभ्युत्थितो वा सेनामुद्योजयेत् । ततो वैदेहकव्यञ्जनाः सर्वपण्यान्यायुधीयेभ्यो यात्राकाले द्विगुणप्रत्यादेयानि दद्युः । एवं राजपण्यविक्रयो वेतनप्रत्यादानं च भवति ।
(२) एवमवेक्षितायव्ययः कोशदण्डव्यसनं नावाप्नोति ।
(३) इति भक्तवेतनविकल्पः ।
(४) सत्रिणश्चायुधीयाना वेश्याः कारुकुशीलवाः ।
दण्डवृद्धाश्च जानीयुः शौचाशौचमतन्द्रिताः ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे भृत्यभरणीयं नाम तृतीयोऽध्यायः, आदितः त्रिनवतितमः ।
—: ० :—
यार खो जाय या टूट जाय उससे उसका दुगुना मूल्य वसूल किया जाय । आयुधागार में टूटे एवं नष्ट हुए हथियारों का पूरा रिकार्ड रहना चाहिए ।
(१) विदेश से आने वाले व्यापारियों के हथियार सीमा-निरीक्षक अंतपाल ले ले । जिनके पास लाइसेंस हों उन्हें हथियार साथ रखकर प्रविष्ट होने दे । चढ़ाई करने वाले राजा को चाहिए कि अपनी सेना को वह संगठित कर ले । युद्ध के समय व्यापारियों के वेष में फौजियों को दुगुने दाम पर रसद दी जाय । इस प्रकार सरकारी वस्तुएँ भी विक जायेंगी और सिपाहियों को दिये गए वेतन में से कुछ धन खजाने में वापिस मिल जायेगा ।
(२) इस प्रकार आय-व्यय पर ध्यान रखने वाले राजा पर कभी भी आर्थिक या सैनिक आपत्तियाँ नहीं आ पातीं ।
(३) यहाँ तक भत्ता व वेतन के संबंध में बारीकी से विचार किया गया ।
(४) सत्री, वेश्या, कारीगर और वृद्ध सिपाहियों को चाहिए कि वे पूरी सावधानी के साथ सैनिकों के अच्छे बुरे कार्यों का सदा निरीक्षण करते रहें ।
योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में भृत्यभरणीय नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ९२ |
|---|
| अध्याय ४ |
अनुजीविवृत्तम्
(१) लोकयात्राविद् राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणा-
श्रयेत् । यं वा मन्येत–यथाहमाश्रयेप्सुरेवमसौ विनयेप्सुरभिगामिकगुणयुक्त
इति, द्रव्यप्रकृतिहीनमप्येनमाश्रयेत ।
(२) न त्वेवानात्मसम्पन्नम् । अनात्मवान् हि नीतिशास्त्रद्वेषादनर्थ-
संयोगाद्वा प्राप्यापि महदैश्वर्यं न भवति ।
(३) आत्मवति लब्धावकाशः शास्त्रानुयोगं दद्यात् । अविसंवादाद्धि
स्थानस्थैर्यमवाप्नोति । मतिकर्मसु पृष्टः तदात्वे च आयत्यां च धर्मार्थ-
संयुक्तं समर्थं प्रवीणवदपरिषद्भीरुः कथयेत् । ईप्सितः पणेत—धर्मार्थानु-
योगम् अविशिष्टेषु बलवत्संयुक्तेषु दण्डधारणं मत्संयोगे तदात्वे च दण्ड-
राजकर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार
( १ ) जो व्यक्ति सांसारिक व्यवहारों में कुशल हों उनको चाहिए कि वे राजा के प्रिय एवं हितैषी व्यक्तियों के द्वारा, सत्कुलीन, बुद्धिमान् एवं योग्य अमात्यों से सम्पन्न राजा का आश्रय प्राप्त करें । यदि ऐसा राजा न मिले तो योग्य व्यक्तियों की तलाश करने वाले आत्मसम्पन्न राजा का आश्रय ग्रहण करें ।
( २ ) भले ही आत्म-सम्पन्न राजा के सुयोग्य आमात्य न हों, तब भी उसी का आश्रय लेना चाहिए, किन्तु सुयोग्य अमात्य आदि से सम्पन्न आत्मसंपत्तिरहित राजा का आश्रय कदापि न लेना चाहिए ! क्योंकि आत्म-संपत्ति शून्य राजा नीतिशास्त्र को न जानने के कारण अथवा अनर्थकारी मृगयाद्यूत आदि का व्यसनी होने के कारण, या इस प्रकार के लोगों की संगति करने के कारण पितृ-पितामह के उपलब्ध महान् ऐश्वर्य को भी नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ।
( ३ ) यदि राजा आत्मसम्पन्न हो तो अवसर आने पर उसको शास्त्रानुकूल संमति दी जाय । शास्त्र के साथ संमति का मिलान जानकर उसको यह विश्वास हो जाता है कि अमुक व्यक्ति नीतिज्ञ है, और तब उसकी नियुक्ति किसी अधिकार पद पर कर दी जाती है । अति आवश्यक विषयों के सम्बन्ध में राजा जब उससे कुछ प्रश्न पूछे तो उस समय या किसी भी समय वह धर्मार्थविद् अति निपुण लोगों की भाँति निर्भीकता-पूर्वक भरी सभा में उत्तर दे । यदि राजा उसको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहे तो राजा के सामने वह इस प्रकार की शर्तें रखे : जो लोग साधारण बुद्धि के हों और धर्म तथा अर्थ के तत्त्वों को न समझते हों, जिज्ञासा के तौर पर भी उनसे कभी भी
४२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
धारणमिति न कुर्याः । पक्षं वृत्तिं गुह्यं च मे नोपहन्याः । संज्ञया च त्वां कामक्रोधदण्डनेषु वारयेयम् इति ।
(१) आयुक्तप्रदिष्टायां भूमावनुज्ञातः प्रविशेत् । उपविशेच्च पार्श्वतः सन्निकृष्टविप्रकृष्टः । वरासनं विगृह्यकथनमसभ्यमप्रत्यक्षमश्रद्धेयमनृतं च वाक्यमुच्चैरनर्मणि हासं वातष्ठीवने च शब्दवती न कुर्यात् । मिथः कथनमन्येन, जनवादे द्वन्द्वकथनं, राज्ञो वेषमुद्धतकुहकानां च, रत्नातिशयप्रकाशाभ्यर्थनम्, एकाक्ष्योष्ठनिर्भोगं, भ्रुकुटीकर्म, वाक्यावक्षेपं च ब्रुवति । बलवत्संयुक्तविरोधं स्त्रीभिः स्त्रीदर्शिभिः सामन्तदूतैर्द्वेष्यापक्षावक्षिप्तार्थैश्च प्रतिसंसर्गमेकार्थचर्यां सङ्घातं च वर्जयेत् ।
(२) अहीनकालं राजार्थं स्वार्थं प्रियहितैः सह ।
परार्थं देशकाले च ब्रूयाद् धर्मार्थसंहितम् ॥
इस विषय में कुछ न पूछा जाय, बलवान् या बलवान् सहायकों वाले शत्रु पर आक्रमण न किया जाय, मेरे सम्बन्ध में भी सहसा दण्ड-प्रयोग न किया जाय, मेरे पक्ष को, मेरे व्यवहार या मेरे जीविका के रहस्यों को कदापि भी न खोला जाय न तो नष्ट ही किया जाय, काम-क्रोध के वशीभूत अनुचित दण्ड देने को प्रस्तुत आपको जब मैं इशारों से वारित करूँगा, तो बुरा न मानते हुए इसका ध्यान रखा जाय । मेरी इन शर्तों को पूरा करना होगा ।
( १ ) जिस अधिकार पद पर राजा उसे नियुक्त करे उसी पर वह कार्य करे और राजा के समीप अगल-बगल में, न तो अधिक दूर और न अधिक नजदीक ही यथोचित आसन पर बैठकर वह कार्य करे । आक्षेप लगाकर, असभ्य, परोक्ष विषयक, अविश्वसनीय और झूठी बात वह कदापि न बोले । बेमौके ऊँची आवाज से न बोले । बोलते हुए खकार या डकार कभी न करे । इसके अतिरिक्त राजा की उपस्थिति में किसी दूसरे से बातचीत करना, किसी अफवाह को निश्चित रूप से हाँ या ना कहना, राजा का या पाखण्डियों का वेष धारण करना, राजा के धारण करने योग्य रत्नों के लिए खुले तौर पर प्रार्थना करना, एक आँख या एक ओठ टेढा करके बोलना, भौं चढ़ाना, राजा की बात को बीच में ही काट देना, बलवान् के सम्बन्धी से झगड़ा करना, स्त्रियों के साथ, स्त्रियों को चाहने वालों के साथ, विदेशी दूतों के साथ एवम् राजा के दुश्मनों-या अनर्थकारी व्यक्तियों के साथ सम्पर्क रखना, एक ही बात को करते रहना, और गुटबाजी बनाकर रहना, इत्यादि सभी कार्यों का परित्याग कर दे ।
( २ ) राजा के मतलब की बात तत्काल ही राजा से कह देनी चाहिए, अपने मतलब की बात राजा के प्रिय तथा हितकारी व्यक्तियों से कहनी चाहिए, दूसरे के मतलब की बात उचित समय एवं स्थान देखकर करनी चाहिए, और जो कुछ भी कहे वह धर्म-अर्थ से समन्वित होना चाहिए ।
प्र० ९२ : अ० ४ ] राजकर्मचारियों का व्यवहार ४२७
(१) पृष्टः प्रियहितं ब्रूयान्न ब्रूयादहितं प्रियम् ।
अप्रियं वा हितं ब्रूयाच्छृण्वतोऽनुमतो मिथः ॥
(२) तूष्णीं वा प्रतिवाक्ये स्याद् द्वेष्यादींश्च न वर्णयेत् ।
अप्रिया अपि दक्षाः स्युस्तद्भावाद् ये बहिष्कृताः ॥
अनर्थ्याश्च प्रिया दृष्टाश्चित्तज्ञानानुवर्तिनः ।
अभिहास्येष्वभिहसेद् घोरहासांश्च वर्जयेत् ॥
(३) परात् संक्रामयेद् घोरं न च घोरं स्वयं वदेत् ।
तितिक्षेतात्मनश्चैव क्षमावान् पृथिवीसमः ॥
(४) आत्मरक्षा हि सततं पूर्वं कार्या विजानता ।
अग्नाविव हि सम्प्रोक्ता वृत्ती राजोपजीविनाम् ॥
एकदेशं दहेदग्निः शरीरं वा परङ्गतः ।
सपुत्रदारं राजा तु घातयेद् वर्धयेत वा ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे अनुजीविवृत्तं नाम चतुर्थोऽध्यायः
आदितस्त्रिनवतितमः ।
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( १ ) राजा के पूछने पर उसकी अनुमति से प्रिय एवं हितकारी बात को कह देनी चाहिए, प्रिय होती हुई भी अहितकारी बात को न कहना चाहिए, किन्तु हितकारी बात अप्रिय भी हो तब भी कह देनी चाहिए ।
( २ ) उत्तर देते समय यदि अप्रिय बात सुनाने में डर मालूम हो तो चुप हो जाना चाहिए, राजा के द्वेष्य पुरुषों से सम्बन्ध भी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि राजा की इच्छा पर न चलने वाले निपुण लोग भी राजा के अप्रिय बन जाते हैं । इसके विपरीत राजा के इच्छानुसार चलने वाले अनर्थकारी लोग भी राजा के प्रिय होते देखे गये हैं । राजा के हँसने पर, काठ की तरह खड़ा न रहकर, हँसना चाहिये, किन्तु अट्टहास पर सदा नियन्त्रण रखना चाहिए ।
( ३ ) किसी भयावह संदेश को स्वयं न कहकर किसी के द्वारा राजा को कहलावे । यदि अपने ही ऊपर ऐसी किसी बात का दायित्व आ जाय तो पृथ्वी के समान क्षमाशील बनकर उसके परिणाम को सहन करे ।
( ४ ) इसलिए समझदार राजकर्मचारी को चाहिए कि सर्वप्रथम वह अपनी रक्षा की सोचे, क्योंकि राज्याश्रित व्यक्तियों की स्थिति आग में खेल करने से बढ़कर खतरनाक कही गई है । क्योंकि अग्नि तो शरीर के एक अङ्ग या पूरे शरीर को ही जलाती है, किन्तु राजा समस्त परिवार को भस्म कर सकता है, और यदि अनुकूल हो गया तो सर्व सम्पन्न भी कर देता है ।
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
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