कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
| ३४६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) तन्तुवाया दशैकादशिकं सूत्रं वर्धयेयुः। वृद्धिच्छेदे छेदद्विगुणो दण्डः।
(२) सूत्रमूल्यं वानवेतनम्। क्षौमकौशेयानामध्यर्धगुणम्। पत्रोर्णा-कम्बलदुकूलानां द्विगुणम्।
(३) मानहीने हीनावहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः। तुलाहीने हीन-चतुर्गुणो दण्डः। सूत्रपरिवर्तने मूल्यद्विगुणः। तेन द्विपटवानं व्याख्यातम्।
(४) ऊर्णातुलायाः पञ्चपलिको विहननच्छेदो रोमच्छेदश्च।
(५) रजकाः काष्ठफलकश्लक्ष्णशिलासु वस्त्राणि नेनिज्युः। अन्यत्र नेनिजतो वस्त्रोपघातं षट्पणं च दण्डं दद्युः।
(६) मुद्गराङ्कादन्यद् वासः परिदधानास्त्रिपणं दण्डं दद्युः। परवस्त्र-विक्रयावक्रयाधानेषु च द्वादशपणो दण्डः। परिवर्तने मूल्यद्विगुणो वस्त्र-दानं च।
( १ ) जुलाहा : जुलाहा (तंतुवाय) को चाहिए कि वह प्रति दस पल पर एक पल अधिक सूत, कपड़ा बुनने के लिए ले। यदि वह इस से अधिक छीजन निकाले तो उस पर छीजन का दुगुना जुरमाना किया जाय।
( २ ) जितने कीमत का सूत हो उतनी ही उसकी बुनाई भी देनी चाहिए; जूट और रेशमी कपड़ों की बुनाई सूत से ड्योढ़ी दी जाय। धुले हुए रेशमी कपड़ों (पत्रोर्ण), ऊनी कंबलों और दुशालों की बुनाई सूती कपड़े से दुगुनी देनी चाहिए।
( ३ ) जितने नाप का कपड़ा बुनने को दिया गया हो यदि बुनकर उतना न निकले तो उसी हिसाब से जुलाहे की मजदूरी काटी जाय और उस पर उस कम बुनाई का दुगुना जुरमाना किया जाय। यदि सूत तौलकर दिया गया हो तो बुने हुए कपड़े में जितनी कमी निकले उसका चौगुना दण्ड जुलाहे को दिया जाय। यदि वह सूत को ही बदल दे तो उस पर मूल्य से दुगुना दण्ड किया जाय। इसी आधार पर दुसूती कपड़ों की बुनाई भी समझ लेनी चाहिए।
( ४ ) सौ पल वजनी ऊन में से पाँच पल ऊन पिंजाई-धुनाई में कम हो जाता है और पाँच पल ऊन बुनाई के समय रूओं के रूप में उड़ जाती है; अर्थात् धुनाई-बुनाई के समय प्रति सैकड़ा दस पल ऊन कम हो जाती है, इससे अधिक नहीं।
( ५ ) धोबी और दर्जी : धोबियों (रजकों) को चाहिए कि वे लकड़ी के फटे पर या साफ पत्थर पर ही कपड़ों को साफ करें। दूसरी जगह धोने पर यदि कपड़ा फट जाय तो वे उसका नुकसान भरें और दण्ड रूप में छह पण भी अदा करें।
( ६ ) धोबियों के अपने पहिनने के कपड़ों पर मुद्गर का निशान होना चाहिए; जिस धोबी के कपड़ों पर यह निशान न रहे उस पर तीन पण दण्ड किया जाय। जो
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३४७
(१) मुकुलावदातं शिलापट्टशुद्धं धौतसूत्रवर्णं प्रमृष्टश्वेतं चैकरात्रोत्तरं दद्युः ।
(२) पञ्चरात्रिकं तनुरागं, षड्रात्रिकं नीलं, पुष्पलाक्षामञ्जिष्ठारक्तं, गुरुपरिकर्म यत्नोपचार्यं जात्यं वासः सप्तरात्रिकम् । ततः परं वेतनहानिं प्राप्नुयुः ।
(३) श्रद्धेया रागविवादेषु वेतनं कुशलाः कल्पयेयुः ।
(४) पराध्यानां पणो वेतनं मध्यमानामर्धपणः, प्रत्यवराणां पादः ।
(५) स्थूलकानां माषद्विमाषकं द्विगुणं रक्तकानाम् । प्रथमनेजने चतुर्भागः क्षयः । द्वितीये पञ्चभागः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(६) रजकैस्तुन्नवाया व्याख्याताः ।
(७) सुवर्णकाराणामशुचिहस्ताद्रूप्यं सुवर्णमनाख्याय सरूपं क्रीणतां
धोबी धुलाई के कपड़ों को बेचे, किराये पर दे या गिरवी रखे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । कपड़ा बदल जाने पर वह कपड़े के मूल्य का दुगुना दण्ड और कपड़ा भी वापस दे ।
( १ ) धोबी को चाहिए कि वह अधखिली पुष्पकली के समान स्वच्छ-श्वेत कपड़े को धोकर एक दिन में ही वापस करे, शिलापट्ट के समान स्वच्छ कपड़े को दो दिन में, धुले हुए सूत की तरह श्वेत कपड़े को तीन दिन में और अत्यंत श्वेत कपड़े को चार दिन में धोकर वापस करे ।
( २ ) इसी प्रकार हलके रंग वाले कपड़े को पांच दिन में, नीले, गाढ़े रंग के, हरसिंगार, लाख तथा मजीठ आदि में रंगे कपड़े को छह दिन में, रेशम, पशम, वेल-बूटेदार जैसे कठिनाई से धुले जाने योग्य उत्तम कपड़ों को सात दिन में धोकर वापस करे । इसके बाद वापस करने पर उसकी धुलाई न दी जाय ।
( ३ ) यदि रंगीन कपड़ों की धुलाई देने में झगड़ा हो जाय तो उसका फैसला रंगों को ठीक-ठीक समझने वाले कुशल व्यक्ति करें ।
( ४ ) बढ़िया रंगीन कपड़ों की धुलाई एक पण, मध्यम दर्जे के रंगीन कपड़ों की धुलाई आधा पण और मामूली रंगीन कपड़ों की धुलाई चौथाई पण दी जानी चाहिए ।
( ५ ) इसी प्रकार मोटे कपड़ों की धुलाई एक या दो माष और रंगे हुए कपड़ों की धुलाई इससे दुगुनी देनी चाहिए । कपड़े की पहिली धुलाई में उसकी चौथाई कीमत कम हो जाती है । दूसरी धुलाई में शेष मूल्य का पांचवां हिस्सा कम हो जाता है; और तीसरी धुलाई में उस शेष मूल्य का छठा हिस्सा कम हो जाता है ।
( ६ ) धोबियों के समान दर्जियों (तुन्नवाय) के नियम भी समझ लेना चाहिए ।
( ७ ) सुनार : यदि सुनार निम्नकोटि के नौकर-चाकरों (अशुचिहस्त) के हाथ
३४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
द्वादशपणो दण्डः, विरूपं चतुर्विंशतिपणः, चोरहस्तादष्टचत्वारिंशत्पणः । प्रच्छन्नविरूपमूल्यहीनक्रयेषु स्तेयदण्डः । कृतभाण्डोपधौ च ।
(१) सुवर्णान्माषकमपहरतो द्विशतो दण्डः । रूप्यधरणान्माषकमपहरतो द्वादशपणः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(२) वर्णोत्कर्षमसारणां योगं वा साधयतः पञ्चशतो दण्डः । तयोरपचरणे रागस्यापहारं विद्यात् ।
(३) माषको वेतनं रूप्यधरणस्य । सुवर्णस्याष्टभागः । शिक्षाविशेषेण द्विगुणा वेतनवृद्धिः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(४) ताम्रवृत्तकंसवैकृन्तकारकूटानां पञ्चकं शतं वेतनम् । ताम्रपिण्डो दशभागक्षयः । पलहीने हीनद्विगुणो दण्डः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
से, सोने-चाँदी के बने हुए जेवर ( सरूप ); सुवर्णाध्यक्ष को सूचित किए बिना ही खरीद ले तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय; यदि बिना गहने की सोना-चाँदी खरीदे तो चौबीस पण; चोर के हाथ से खरीदे तो अठतालीस पण और दूसरों से छिपाकर गहने आदि को तोड़-मरोड़ कर थोड़ी कीमत में खरीदे तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय । बनाये हुए माल को बदल देने वाले सुनार को भी चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( १ ) यदि सुनार सोने में से एक माष सोना चुरा ले तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि एक धरण चाँदी में से एक माष चाँदी चुरा ले तो उस पर बारहपण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिकाधिक चोरी के अनुसार अधिकाधिक दण्ड की व्यवस्था समझ लेनी चाहिए ।
( २ ) यदि कोई सुनार खोटे सोने-चाँदी पर नकली रंग चढ़ा दे या शुद्ध सोना-चाँदी में नकली धातु मिला दे तो उस पर पाँच सौ पण दण्ड किया जाय । सोने-चाँदी के खरे-खोटे की जाँच आग में तपाकर करनी चाहिए ।
( ३ ) एक धरण मान चाँदी के गहने आदि की बनवाई एक माषक दी जानी चाहिए । जितने तौल की सोने की चीज बनवायी जाय उसका आठवां हिस्सा बनवाई देनी चाहिए । विशेष कारीगरी के लिए दुगुनी बनवाई देनी चाहिए । इसी के अनुसार अधिक कार्य करवाने की मजदूरी समझनी चाहिए ।
( ४ ) ताँबा, सीसा, काँसा, लोहा, रांगा और पीतल इनकी बनवाई पांच प्रति सैकड़ा दी जानी चाहिए । ताँबे का दसवाँ हिस्सा, बनाते समय छीजन के लिए छोड़ देना चाहिए । इससे एक पल भी कम हो जाने पर नुकसान का दण्ड देना चाहिए । इसी प्रकार अधिक हानि के अनुपात से दण्ड का विधान समझना चाहिए ।
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३४९
(१) सीसत्रपुपिण्डो विंशतिभागक्षयः । काकणी चास्य पलवेतनम् ।
(२) कालायसपिण्डः पञ्चभागक्षयः । काकणीद्वयं चास्य पलवेतनम् । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(३) रूपदर्शकस्य स्थितां पणयात्रामकोप्यां कोपयतः कोप्यामकोपयतो द्वादशपणो दण्डः ।
(४) व्याजीपरिशुद्धा पणयात्रा । पणान्माषकमुपजीवतो द्वादशपणो दण्डः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(५) कूटरूपं कारयतः प्रतिगृह्णतो निर्यातयतो वा सहस्रं दण्डः । कोशे प्रक्षिपतो वधः ।
(६) सरकपांसुधावकाः सारत्रिभागं लभेरन् । द्वौ राजा रत्नं च । रत्नापहार उत्तमो दण्डः ।
(७) खनिरत्ननिधिनिवेदनेषु षष्ठमंशं निवेत्ता लभेत । द्वादशमंशं भृतकः ।
( १ ) सीसे और रांगे की चीजों में बीसवाँ हिस्सा छीजन में निकल जाता है। इनके एक पल की बनवाई का एक कांकड़ी वेतन देना चाहिए।
( २ ) कलायस ( काला लोहा ) की चीजों में पाँचवाँ हिस्सा छीजन में निकल जाता है। उसकी बनवाई दो काँकड़ी वेतन देना चाहिए। इसी अनुपात से बनवाई देनी चाहिए।
( ३ ) यदि सिक्कों का पारखी ( रुपदर्शक ) चलते हुए खरे पण खोटा और खोटे पण को खरा बताये तो उस पर बारह पण जुर्माना किया जाय।
( ४ ) पाँच प्रति सैकड़ा टैक्स ( व्याजी ) सरकार को देकर पण चलाया जा सकता है। एक पण के चलाने के लिए माषक रिश्वत लेने वाले लक्षणाध्यक्ष को बारह पण दंड किया जाय। इसी क्रम से इसका दण्ड-विधान समझना चाहिए।
( ५ ) यदि छिपकर कोई जाली सिक्के बनवाये या जाली सिक्कों को स्वीकार करे अथवा उनका निर्यात करे, उस पर एक हजार पण दण्ड किया जाय। खजाने में अच्छे सिक्कों की जगह जाली सिक्के रखने वाले को मृत्यु दण्ड दिया जाय।
( ६ ) खान से निकले हुए रत्नों को साफ करने वाले कर्मचारी, टूटे-फूटे सारभूत माल का तीसरा हिस्सा ले लें। बाकी दो हिस्से तथा रत्नों को राजकोष के लिए रखा जाय। रत्न चुराने वाले कर्मचारी को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।
( ७ ) जो व्यक्ति राजा को रत्नों की खान तथा गड़े हुए खजाने का पता दे उस व्यक्ति को उसमें से छठा हिस्सा दिया जाय। यदि वह इसी कार्य के लिए राजा की ओर से नियुक्त हो तब उसे बारहवां हिस्सा दिया जाय।
३५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) शतसहस्रादूर्ध्वं राजगामी निधिः । ऊने षष्ठमंशं दद्यात् ।
(२) पूर्वपौरुषिकं निधिं जानपदः शुचिः स्वकरणेन समग्रं लभेत । स्वकरणाभावे पंचशतो दण्डः । प्रच्छन्नादाने सहस्रम् ।
(३) भिषजः प्राणाबाधिकमनाख्यायोपक्रममाणस्य विपत्तौ पूर्वः साहसदण्डः । कर्मापराधेन विपत्तौ मध्यमः । मर्मवेधवैगुण्यकरणे दण्डपारुष्यं विद्यात् ।
(४) कुशीलवा वर्षारात्रिमेकस्था वसेयुः । कामदानमतिमात्रमेकस्यातिवादं च वर्जयेयुः । तस्यातिक्रमे द्वादशपणो दण्डः । कामं देशजातिगोत्रचरणमैथुनापहाने नर्मयेयुः ।
( १ ) गड़ा हुआ खजाना यदि एक लाख पण से अधिक निकले तब उसका स्वामी राजा होता है । अन्यथा वह पता देने वाले व्यक्ति को ही दिया जाय; किन्तु उनमें से छठा हिस्सा वह राजा को अवश्य दे ।
( २ ) साक्षी और लेख आदि के प्रमाण से यदि यह साबित हो जाय कि खजाना पाने वाले व्यक्ति के पूर्वजों का है; यदि वह व्यक्ति सदाचारी है तो उस खजाने का स्वामी वही समझा जाय । यदि वह साक्षी और लेख आदि के बिना ही उस खजाने पर अधिकार जमाने लगे तो उसपर पाँच-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि कोई छिपकर चुपचाप ही अपना कब्जा कर ले तो उस पर एक हजार पण दण्ड किया जाय ।
( ३ ) वैद्य : राजा को बिना सूचित किये यदि कोई वैद्य किसी ऐसे रोगी का इलाज करे, जिसके मरने की संभावना है, और दवा देने के दौरान में ही उसकी मृत्यु हो जाय तो उस वैद्य को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि इलाज में भूल हो जाने के कारण मृत्यु हुई हो तो माध्यम साहस दण्ड दिया जाय । शरीर के किसी विशेष अङ्ग का गलत ऑपरेशन होने के कारण यदि रोगी का वह अंग जाता रहे, या दूसरी तरह की हानि हो जाय तो वैद्य को दण्ड-पारुष्य प्रकरण के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाय ।
( ४ ) नट-नर्त्तक : वर्षा ऋतु में नट नर्त्तक आदि एक ही स्थान पर निवास करें । उनकी कला से प्रसन्न होकर यदि कोई व्यक्ति उन्हें उचित मात्रा से अधिक पुरस्कार दे तो वे उसे स्वीकार न करें, अपनी अधिक तारीफ को भी वे पसन्द न करें । इस नियम का उल्लंघन करने पर बारह पण दण्ड दिया जाय । किसी खास देश, जाति, गोत्र या चरण के मजाक या निन्दा को छोड़कर तथा मैथुन संबन्धी कर्तव्यों को छोड़कर नट लोग जो चाहें अपने इच्छानुसार खेल दिखाकर दर्शकों को खुश कर सकते हैं ।
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३५१
(१) कुशीलवैश्चारण भिक्षुकाश्च व्याख्याताः । तेषामयश्शूलेन यावतः पणानभिवदेयुः, तावन्तः शिफाप्रहारा दण्डाः ।
(२) शेषाणां कर्मणां निष्पत्तिवेतनं शिल्पिनां कल्पयेत् ।
(३) एवं चोरानचोराख्यान् वणिक्कारुकुशीलवान् ।
भिक्षुकान् कुहकांश्चान्यान् वारयेद्देशपीडनात् ॥इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे कारुकरक्षणं नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितः सप्तसप्ततितमः ।
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(१) नटों के ही अनुसार नाचने-गाने वालों और भिक्षुकों के नियम समझने चाहिए । दूसरों के मर्म को पीड़ा पहुँचाने पर इन लोगों को अपराध के अनुसार जितना पण दण्ड दिया जाय, यदि वे उसको अदा न कर सकें तो उनपर उतने ही कोड़े लगवाये जाँय ।
(२) जो कार्य पहिले बताये गये हैं, उनके अतिरिक्त कार्यों की मजदूरी, अन्दाज से लगा लेनी चाहिए ।
(३) इस प्रकार वनावटी साधु, बनिये, कारीगर, नट, भिखारी और ऐंद्रजालिक आदि चोरों को तथा इसी प्रकार के अन्य पुरुषों को देश में पीड़ा, पहुँचाने से रोका जाय ।
कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कारुक रक्षण नामक पहला अध्याय समाप्त ।
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प्रकरण ७७ | वैदेहकरक्षणम्
अध्याय २ |
(१) संस्थाध्यक्षः पण्यसंस्थायां पुराणभाण्डानां स्वकरणविशुद्धानामा-धानं विक्रयं वा स्थापयेत् । तुलामानभाण्डानि चावेक्षेत, पौतवापचारात् ।
(२) परिमाणीद्रोणयोरर्धपलहीनातिरिक्तमदोषः । पलहीनातिरिक्ते द्वादशपणो दण्डः । तेन पलोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(३) तुलायाः कर्षहीनातिरिक्तमदोषः । द्विकर्षहीनातिरिक्ते षट्पणो दण्डः । तेन कर्षोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(४) आढकस्यार्धकर्षहीनातिरिक्तमदोषः । कर्षहीनातिरिक्ते त्रिपणो दण्डः । तेन कर्षोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(५) तुलामानविशेषाणामतोऽन्येषामनुमानं कुर्यात् ।
व्यापारियों से प्रजा की रक्षा
( १ ) बाजार के अध्यक्ष ( संस्थाध्यक्ष ) को चाहिए कि वह, पुराने अन्न आदि के तथा दुकानदारों के स्वाधिकृत ( स्वकरण विशुद्ध ) माल के आयातनिर्यात का यथोचित प्रबन्ध करे । उसका यह भी कर्त्तव्य है कि तराजू, बाट और माप के वर्त्तनों का भी वह अच्छी तरह निरीक्षण करे, जिससे माप-तौल में कोई गड़बड़ी न होने पावे ।
( २ ) परिमाणी और द्रोण में यदि आधा पल कम-ज्यादा हो जाय तो कोई बात नहीं; किन्तु एक पल कम-ज्यादा होने पर बारह पण दण्ड दिया जाय । पल की कमी-ज्यादा के अनुसार ही दण्ड की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
( ३ ) तराजू में यदि एक कर्ष कम-ज्यादा हो तो कोई हर्ज नहीं । यदि दो कर्ष कम-ज्यादा निकले तो छह पण दण्ड दिया जाय । इसी प्रकार कर्ष के अनुपात से दण्ड वृद्धि समझनी चाहिए ।
( ४ ) आढक में यदि आधे कर्ष की कमी-वेशी हो तो कोई बात नहीं । यदि कमीवेशी एक कर्ष की तो तीन पण दण्ड दिया जाय । इसी अनुपात से दण्ड बढाया जाय ।
( ५ ) जिस तुला तथा माप की कमी-वेशी के संबन्ध में नहीं कहा गया है उनकी भी यही दण्ड-व्यवस्था समझनी चाहिए ।
प्र० ७७ : अ० २ ] व्यापारियों सम्बन्धी नियम ३५३
(१) तुलामानाभ्यामतिरिक्ताभ्यां क्रीत्वा हीनाभ्यां विक्रीणानस्य त एव द्विगुणा दण्डाः ।
(२) गण्यपण्येष्वष्टभागं पण्यमूल्येष्वपहरतः षण्णवतिर्दण्डः ।
(३) काष्ठलोहमणिमयं रज्जुचर्ममृन्मयं सूत्रवल्करोममयं वा जात्यमित्यजात्यं विक्रयाधानं नयतो मूल्याष्टगुणो दण्डः ।
(४) सारभाण्डमित्यसारभाण्डं, तज्जातमित्यतज्जातं, राधायुक्तमुपधियुक्तं समुद्गपरिवर्तिमं वा विक्रयाधानं नयतो हीनमूल्यं चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः, पणमूल्यं द्विगुणः, द्विपणमूल्यं द्विशतः । तेनार्घवृद्धौ दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(५) कारुशिल्पिनां कर्मगुणापकर्षमाजीवं विक्रयक्रयोपघातं वा सम्भूय समुत्थापयतां सहस्रं दण्डः ।
(६) वैदेहकानां वा सम्भूय पण्यमवरुन्धतामनर्घेण विक्रीणतां क्रीणतां वा सहस्रं दण्डः ।
( १ ) जो बनिया अधिक वजन के तराजू-बाट से माल खरीद कर हल्के तौल से उसे बेचे उसको दुगुना २४ पण दण्ड दिया जाय ।
( २ ) गिनकर बेची जाने वाली चीजों में बनिया यदि आठवाँ हिस्सा चुरा ले तो उस पर छियानवे पण जुरमाना किया जाय ।
( ३ ) जो बनिया लकड़ी, लोहा, मणि, रस्सी, चमड़ा, मिट्टी, सूत, छाल और ऊन से बने हुए घटिया माल को बढ़िया कह कर रखता या बेचता हो उस पर वस्तु की कीमत का आठ गुना जुरमाना किया जाय ।
( ४ ) बनावटी कस्तूर, कपूर आदि वस्तुओं को असली कह कर; दूसरे देश में पैदा हुई कमसल वस्तु को असली देश की बताकर; चमकदार बनावटी मोती को को; मिलावटी वस्तु को; अच्छे माल की पेटी को दिखाकर रद्दी माल की पेटी को देने पर; व्यापारी को चौवन पण दण्ड दिया जाय । यदि वह माल एक पण मूल्य का हो तो पहिले से दुगुना दण्ड और दो पण कीमत का हो तो दो-सौ पण दण्ड दिया जाय । इसी प्रकार अधिक मूल्य के माल पर अधिक दण्ड किया जाय ।
( ५ ) जो लुहार, बढ़ई आदि कारीगर आर्डर के अनुसार कार्य न करें, एक पण की जगह दो पण मजदूरी लें, किसी वस्तु को बेचते समय अधिक दाम और खरीदते समय कम दाम कहकर खरीद फरोख्त में विघ्न डालें, उनमें से प्रत्येक को एक-एक हजार पण दण्ड दिया जाय ।
( ६ ) जो व्यापारी आपस में मिलकर किसी वस्तु को बेचने से रोक दें और फिर उसी वस्तु को अनुचित मूल्य पर बेचें या खरीदें उनमें प्रत्येक को एक एक हजार पण जुरमाना किया जाय ।
२३ कौ०
| ३५४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) तुलामानान्तरमर्घवर्णन्तरं वा । धरकस्य मायकस्य वा पणमूल्या-दष्टभागं हस्तदोषेणाचरतो द्विशतो दण्डः । तेन द्विशतोत्तरा दण्डवृद्धि-र्व्याख्याता ।
(२) धान्यस्नेहक्षारलवणगन्धभैषज्यद्रव्याणां समवर्णोपधाने द्वादश-पणो दण्डः ।
(३) यन्निस्सृष्टमुपजीवेयुः, तदेषां दिवससञ्जातं सङ्ख्याय वणिक् स्थापयेत् । क्रेतृविक्रेतोरन्तरपतितमदायादन्यं भवति । तेन धान्यपण्य-निचयांश्चानुज्ञाताः कुर्युः । अन्यथानिश्चितमेषां पण्याध्यक्षो गृह्णीयात् । तेन धान्यपण्यविक्रये व्यवहरेतानुग्रहेण प्रजानाम् ।
(४) अनुज्ञातक्रयादुपरि चैषां स्वदेशीयानां पण्यानां पञ्चकं शतमाजीवं स्थापयेत् । परदेशीयानां दशकम् । ततः परमर्घं वर्धयतां क्रये विक्रये वा भावयतां पणशते पञ्चपणाद् द्विशतो दण्डः । तेनार्घवृद्धौ दण्डवृद्धिर्व्या-ख्याता ।
( १ ) तुला, बाट और मूल्य में अन्तर हो जाने के कारण जो लाभ हो उसे बही-खाते में दर्ज कर लिया जाय । तोलने वाला या मापने वाला अपने हाथ की सफाई से यदि एक पण मूल्य की वस्तु में आठवाँ हिस्सा कम कर दे तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिक हिस्सा कम कर देने पर अधिक दण्ड की व्यवस्था की जाय ।
( २ ) अनाज, तेल, खार, नमक, गन्ध और दवाइयों में कम कीमत की वस्तुओं को मिलाकर बेचने वाले पर बारह पण दण्ड किया जाय ।
( ३ ) दूकानदारों को प्रतिदिन जितना लाभ हो उसे बाजार का चौधरी (संस्था-ध्यक्ष) अपनी बही में गिनकर दर्ज कर ले । जिस वस्तु की खरीद-फरोख्त की व्यवस्था संस्थाध्यक्ष स्वयं करता है उसका लाभ राजकोष में जमा किया जाय । इस दृष्टि से व्यापारियों को उचित है कि वे संस्थाध्यक्ष की आज्ञा से ही धान्य आदि विक्रेय वस्तुओं का संचय करें । अनुमति न लेने पर संस्थाध्यक्ष को अधिकार है कि वह अनधिकृत वस्तुओं को अपने कब्जे में कर ले । संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह संगृहीत वस्तुओं के बिकने की ऐसी सुव्यवस्था करे, जिससे प्रजा का उपकार होता रहे ।
( ४ ) संस्थाध्यक्ष जिन वस्तुओं को बेचने की अनुमति दे, यदि वे वस्तुएँ स्वदेशी हों तो, उन पर व्यापारी नियत मूल्य से प्रति सैकड़ा पाँच पण लाभ ले सकता है । यदि वे विदेशी हों तो प्रति सैकड़ा दस पण लाभ ले । इससे अधिक मूल्य बढ़ाने तथा अधिक लाभ लेने पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिकाधिक लाभ पर अधिकाधिक दण्ड दिया जाय ।
प्र० ७७ : अ० २ ] व्यापारियों सम्बन्धी नियम ३५५
(१) सम्भूयक्रये चैषामविक्रीते नान्यं सम्भूयक्रयं दद्यात् । पण्योपघाते चैषामनुग्रहं कुर्यात् पण्यबाहुल्यात् ।
(२) पण्याध्यक्षः सर्वपण्यान्येकमुखानि विक्रीणीत । तेष्वविक्रीतेषु नान्ये विक्रीणीरन् । तानि दिवसवेतनेन विक्रीणीरन् अनुग्रहेण प्रजानाम् ।
(३) देशकालान्तरितानां तु पण्यानां—
प्रक्षेपं पण्यनिष्पत्तिं शुल्कं वृद्धिमवक्रयम् ।
व्ययानन्यांश्च संख्याय स्थापयेदर्घमर्घवित् ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे वैदेहकरक्षणं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदितोऽष्टसप्ततितमः ।
—: ० :—
( १ ) यदि संस्थाध्यक्ष से थोक भाव कर खरीदा हुआ माल न बिके तो दूसरे व्यापारियों को थोक भाव पर माल न दिया जाय । यदि आकस्मिक आपात के कारण किसी व्यापारी का माल नष्ट हो जाय तो संस्थाध्यक्ष दूसरा माल देकर उसकी सहायता करे ।
( २ ) संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह सारी विक्रेय वस्तुओं को किसी एक व्यापारी द्वारा बिकवाये । यदि एक व्यापारी के द्वारा वह न बिक सके तो अन्य व्यापारी उस तरह का माल न बेचें । उन वस्तुओं को दैनिक मजदूरी देकर इस ढंग से बिकवाया जाय, जिससे प्रजा का हित हो ।
( ३ ) संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह दूसरे देश तथा दूसरे समय में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं का मूल्य, बनवाई का समय, वेतन, ब्याज, भाड़ा, और इसी प्रकार के ऊपरी खर्चों को जोड़ कर ऐसा भाव तय करे, जिससे वे बिक जाँय ।
कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में वैदेहकरक्षण नामक
दूसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७८ | ## उपनिपातप्रतीकारः |
|---|---|
| अध्याय ३ |
(१) दैवान्यष्टौ महाभयानि—अग्निरुदकं व्याधिर्दुर्भिक्षं मूषिका व्यालाः सर्पा रक्षांसीति । तेभ्यो जनपदं रक्षेत् ।
(२) ग्रीष्मे बहिरधिश्रयणं ग्रामाः कुर्युः । दशकुलिसंग्रहेणाधिष्ठिता वा ।
(३) नागरिकप्रणिधावग्निप्रतिषेधो व्याख्यातः । निशान्तप्रणिधौ राजपरिग्रहे च ।
(४) बलिहोमस्वस्तिवाचनैः पर्वसु चाग्निपूजाः कारयेत् ।
(५) वर्षारात्रमनूपग्रामाः पूरवेलामुत्सृज्य वसेयुः । काष्ठवेणुनावश्चावगृह्णीयुः ।
(६) उह्यमानमलाबुदृतिप्लवगण्डिकावेणिकाभिस्तारयेयुः । अनभिसरतां द्वादशपणो दण्डः । अन्यत्र प्लवहीनेभ्यः ।
दैवी आपत्तियों से प्रजा की रक्षा के उपाय
( १ ) दैवयोग से होने वाली आठ महाविपत्तियों के नाम हैं : १. अग्नि, २. जल ३. बीमारी, ४. दुर्भिक्ष, ५. चूहे, ६. व्याघ्र, ७. सांप और ८. राक्षस । राजा को चाहिए कि इन महाविपदाओं से वह प्रजा की रक्षा करे ।
( २ ) आग से रक्षा : ग्रामवासियों को चाहिए कि गरमी की ऋतु में वे भोजन आदि की व्यवस्था घर से बाहर करें । अथवा दशकुली का रक्षक गोप नामक अधिकारी जिस स्थान को उपयुक्त बताये वहीं पर भोजन आदि की व्यवस्था करें ।
( ३ ) आग से बचने के उपाय नागरिक प्रणिधि नामक प्रकरण में बताये गये हैं । राजपरिग्रह के अन्तर्गत निशांत प्राणिधि नामक प्रकरण में भी अग्नि-रक्षा के उपाय बताये गए हैं ।
( ४ ) अग्नि-रक्षा के लिए पूर्णमासी आदि पर्व तिथियों पर बलि, होम और स्वस्तिवाचन द्वारा अग्नि की पूजा कराई जाय ।
( ५ ) पानी से रक्षा : नदी के किनारे बसे हुए ग्रामवासियों को चाहिए कि वर्षा ऋतु की रातों में वे घरों को छोड़कर दूर जा बसें । लकड़ी, बाँस के बेड़े और नाव आदि साधन हर समय वे संग्रह करके रखें ।
( ६ ) नदी के प्रवाह में बहते या डूबते हुए आदमी को तूंबी ( अलाबु ), मशक
प्र० ७८ : अ० ३ ] दैवी आपत्तियों का प्रतीकार ३५७
(१) पर्वसु च नदीपूजाः कारयेत् ।
(२) मायायोगविदो वेदविदो वर्षमभिचरेयुः ।
(३) वर्षाविग्रहे शचीनाथगङ्गापर्वतमहाकच्छपूजाः कारयेत् ।
(४) व्याधिभयमौपनिषदिकैः प्रतीकारैः प्रतिकुर्युः । औषधैश्चिकित्सकाः शान्तिप्रायश्चित्तैर्वा सिद्धतापसाः ।
(५) तेन मरको व्याख्यातः । तीर्थाभिषेचनं महाकच्छवर्धनं गवां श्मशानावदोहनं कबन्धदहनं देवरात्रिं च कारयेत् ।
(६) पशुव्याधिमरके स्थानान्यर्थनीराजनं स्वदैवतपूजनं च कारयेत् ।
(७) दुर्भिक्षे राजा बीजभक्तोपग्रहं कृत्वाऽनुग्रहं कुर्यात् । दुर्गसेतुकर्म वा भक्तानुग्रहेण । भक्तसंविभागं वा । देशनिक्षेपं वा । मित्राणि वा व्यपाश्रयेत । कर्शनं वमनं वा कुर्यात् ।
( दृति ), तमेड़ ( प्लव ), लकड़ या लकड़ी के बेड़े से बचाया जाय । जो व्यक्ति डूबते हुए आदमी को बचाने का यत्न न करे उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; किन्तु उसके पास यदि तैरने के उक्त साधन न हों तो उसको अपराधी न समझा जाय ।
( १ ) पूर्णमासी आदि पर्व तिथियों में नदियों की पूजा करायी जाय ।
( २ ) मंत्रविद् एवं अथर्व वेद के ज्ञाताओं से अतिवृष्टि की शान्ति के लिए जप, होम, यज्ञ आदि अनुष्ठान कराये जांय ।
( ३ ) वर्षा के शान्त हो जाने पर इन्द्र, गंगा, पर्वत और समुद्र की पूजा करायी जाय ।
( ४ ) बीमारी से रक्षा : औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा कृत्रिम बीमारियों को रोका जाय । अकृत्रिम बीमारियों को वैद्य लोग चिकित्सा द्वारा और सिद्ध एवं तपस्वी लोग शान्तिकर्म, व्रत, उपवास आदि अनुष्ठानों से दूर करें ।
( ५ ) हैजा, प्लेग, चेचक आदि संक्रामक व्याधियों को दूर करने के लिए भी इसी प्रकार के उपाय किये जायें । इसके अलावा गंगास्नान, समुद्रपूजन, श्मशान में गायों का दोहन, चावल तथा सत्तू से बने सिर रहित पुतले का श्मशान में दाह और रात्रि जागरण करके ग्राम देवता की पूजा आदि का उपाय किये जांय ।
( ६ ) यदि पशुओं में बीमारी या महामारी फैल जाय तो गाँव-गांव में रोगशांति के लिए शांतिकर्म करवाये जायें और पशुओं के अधिष्ठाता देवता, जैसे हाथी के सुब्रह्मण्य, घोड़ा के अश्विनी, गौ के पशुपति, भैंस के वरुण तथा बकरी के अग्नि आदि देवताओं की पूजा करायी जाय ।
( ७ ) दुर्भिक्ष से रक्षा : राज्य में दुर्भिक्ष पड़ जाने पर राजा की ओर से बीज और अन्न वितरण करके जनता पर अनुग्रह किया जाय । अथवा दुर्भिक्षपीड़ितों को
३५८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण
(१) निष्पन्नसस्यमन्यविषयं वा सजनपदो यायात् । समुद्रसरस्तटाकानि वा संश्रयेत । धान्यशाकमूलफलावापान् सेतुषु कुर्वीत । मृगपशुपक्षिव्यालमत्स्यारम्भान् वा ।
(२) मूषिकभये मार्जारनकुलोत्सर्गः । तेषां ग्रहणहिंसाया द्वादशपणो दण्डः । शुनामनिग्रहे च अन्यत्रारण्यचरेभ्यः ।
(३) स्नुहीक्षीरलिप्तानि धान्यानि विसृजेत् । उपनिषद्योगयुक्तानि वा । मूषिककरं वा प्रयुञ्जीत । शान्तिं वा सिद्धतापसाः कुर्युः । पर्वसु च मूषिकपूजाः कारयेत् ।
(४) तेन शलभपक्षिकृमिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(५) व्यालभये मदनरसयुक्तानि पशुशवानि प्रसृजेत् । मदनकोद्रवपूर्णान्यौदर्याणि वा ।
उचित वेतन देकर उनसे दुर्ग या सेतु आदि का निर्माण कराया जाय । काम करने में असमर्थ लोगों को केवल अन्न दिया जाय; अथवा उनको समीप के दूसरे दुर्भिक्ष रहित देश तक पहुँचाने का प्रबन्ध कर दिया जाय । अथवा मित्र राजा से सहायता ली जाय । अपने देश के धनवान् व्यक्तियों पर विशेष कर लगाकर तथा उनसे एकमुश्त रकम लेकर आपत्ति का प्रतीकार किया जाय ।
(१) या तो जो देश धन-धान्य संपन्न दीखे वहीं प्रजा सहित चला जाय । अथवा समुद्र के किनारे या बड़े-बड़े तालाबों के पास जाकर बसा जाय, जहाँ पर कि धान्य, शाक, मूल, फल आदि की खेती की जा सके । अथवा मृग, पशु, पक्षी, व्याघ्र और मछली आदि का शिकार कर प्राण-रक्षा की जाय ।
(२) चूहों से रक्षा : चूहों का उत्पात बढ़ जाने पर जगह-जगह बिल्ली और नेवला छोड़ दिए जायें । जो उनको पकड़े या मारे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । उन लोगों पर भी बारह पण दण्ड किया जाय, जो दूसरों का नुकसान करने वाले पालतू कुत्तों को रोक कर न रखें । जंगली कुत्तों को न पकड़ने पर कोई अपराध न माना जाय ।
(३) चूहों के प्रतीकार के लिए सेंहुड़ के दूध में साने हुए अनाज को या औपनिषदिक अधिकरण में निर्दिष्ट औषधियों से मिले हुए अनाज को इधर-उधर बखेर दिया जाय । अथवा चूहादानी द्वारा चूहों को पकड़ने का प्रबन्ध किया जाय । अथवा सिद्ध या तपस्वियों द्वारा चूहों को नष्ट करने के लिए शान्तिकर्म करवाये जांय । पर्व तिथियों पर मूषक-पूजा कराई जाय ।
(४) इसी के अनुसार कीट, पतङ्ग, पक्षी आदि द्वारा उत्पन्न उत्पातों का प्रतीकार कराया जाय ।
(५) व्याघ्र से रक्षा : व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं का भय बढ़ जाय तो औप-
प्र० ७८ : अ० ३ ] दैवी आपत्तियों का प्रतीकार ३५९
(१) लुब्धकाः श्वगणिनो वा कूटपञ्जरावापातैश्चरेयुः । आवरणिनः शस्त्रपाणयो व्यालानभिहन्युः । अनभिसर्तुर्द्वादशपणो दण्डः । स एव लाभो व्यालघातिनः ।
(२) पर्वसु च पर्वतपूजाः कारयेत् । तेन मृगपक्षिसङ्घग्राहप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(३) सर्पभये मन्त्रौषधिभिश्च जाङ्गलीविदश्चरेयुः । सम्भूय वोपसर्पान् हन्युः । अथर्ववेदविदो वाभिचरेयुः । पर्वसु च नागपूजाः कारयेत् । तेनोदकप्राणिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(४) रक्षोभये रक्षोघ्नान्यथर्ववेदविदो मायायोगविदो वा कर्माणि कुर्युः । पर्वसु च वितर्दिच्छत्रोल्लोपिकाहस्तपताकाच्छागोपहारैश्चैत्यपूजाः कारयेत् । चरूं वश्चराम इत्येवं सर्वभयेष्वहोरात्रं चरेयुः ।
निषदिक अधिकरण में निर्दिष्ट मदनसंयुक्त मृत-पशुओं की लाशें जङ्गल में छुड़वा दी जायें । अथवा धतूरा और जङ्गली कोदो ( कोहव ) को मिलाकर पशुओं की लाशों में भर कर उन्हें जङ्गल में रखवा दिया जाय ।
( १ ) व्याघ्र-विपत्ति को दूर करने के लिए शिकारी और बहेलिये गढों में छिप-कर उनको मारें । कवच पहिन कर हथियारों से बाघ को मारा जाय । बाघ आदि हिंसक पशुओं से घिरे हुए आदमी की जो सहायता न करे उसको बारह पण दण्ड किया जाय । जो व्याघ्र आदि का शिकार करे उसे बारह पण इनाम दिया जाय ।
( २ ) व्याघ्र आदि से रक्षा के लिए पर्व तिथियों पर पर्वतों की पूजा कराई जाय । अन्य जङ्गली पशु-पक्षियों के प्रतीकार के लिए भी यही नियम समझने चाहिएँ ।
( ३ ) साँप से रक्षा : मन्त्र तथा जड़ी-बूटियों को जानने वाले विषवैद्यों को चाहिए कि वे सर्प-भय का प्रतीकार करें । अथवा नगरवासी जहाँ भी साँप देखें उसको मार डालें । अथवा अथर्व वेद के ज्ञाता अभिचार क्रियाओं द्वारा सापों को मार डालें । सर्प-भय से बचने के लिए पर्व तिथियों पर उनकी पूजा की जाय । इसी प्रकार जलचर जीवों द्वारा होने वाले भयों का प्रतीकार समझना चाहिए ।
( ४ ) राक्षसों से रक्षा : राक्षसों का भय पैदा हो जाने पर तन्त्र और अथर्व वेद के ज्ञाता अभिचारक तथा मायायोग क्रियाओं द्वारा उसका प्रतीकार करें । कृष्ण चतुर्दशी तथा अष्टमी आदि पर्व तिथियों पर वेदी, छाता, खाद्य सामग्री, छोटी झंडी और बलि के लिए बकरा लेकर श्मशान भूमि में राक्षसों की पूजा करायी जाय । प्रत्येक भय पर ‘हम तुम्हारे लिए हवि पकाते हैं’ ( चरुं वश्चरामः ), इस प्रकार कहते हुए दिन-रात घूमें ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में उपनिपातप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त
३६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) सर्वत्र चोपहतान् पितेवानुगृह्णीयात् ।
(२) मायायोगविदस्तस्माद्विषये सिद्धतापसाः ।
वसेयुः पूजिता राज्ञा दैवापत्प्रतिकारिणः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे उपनिपातप्रतीकारो नाम तृतीयोऽध्यायः; आदित एकोनाशीतितमः ।
—: ० :—
( १ ) इस प्रकार के भयों के उपस्थित होने पर सव तरह से राजा, प्रजा की रक्षा अपनी सन्तान की तरह करे ।
( २ ) इसलिए राजा को चाहिए कि वह दैवी विपदाओं का प्रतीकार करने वाले अथर्व वेद के ज्ञाता तान्त्रिकों, सिद्धों और तपस्वियों को अपने देश में सम्मानपूर्वक रखें ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में उपनिपातप्रतीकार नामक तीसरा अध्याय समाप्त
—: ० :—
| प्रकरण ७९ |
|---|
| अध्याय ४ |
गूढाजीविनां रक्षा
(१) समाहर्तृप्रणिधौ जनपदरक्षणमुक्तम् । तस्य कण्टकशोधनं वक्ष्यामः।
(२) समाहर्ता जनपदे सिद्धतापसप्रव्रजितचक्रचरचारणकुहकप्रच्छन्द-
ककार्तिकनैमित्तिकमौहूर्तिकचिकित्सकोन्मत्तमूकबधिरजडान्धवैदेहक-
कारुशिल्पिकुशीलववेशशौण्डिकापूपिकपाक्वमांसिकौदनिकव्यञ्जनान् प्रणि-
दध्यात् । ते ग्रामाणामध्यक्षाणां च शौचाशौचं विद्युः । यं चात्र गूढाजीविनं
शङ्केत, सत्रिणसवर्णेनापसर्पयेत् । धर्मस्थं प्रदेष्टारं वा विश्वासोपागतं सत्री
ब्रूयात्—'असौ मे बन्धुरभियुक्तः, तस्यायमनर्थः प्रतिक्रियताम् । अयं चार्थः
प्रतिगृह्यताम्' इति । स चेत् तथा कुर्यात्, उपग्राहक इति प्रवास्येत ।
(३) तेन प्रदेष्टारो व्याख्याताः ।
(४) ग्रामकूटमध्यक्षं वा सत्री ब्रूयात्—'असौ जाल्मः प्रभूतद्रव्यः,
गुप्त षडयंत्रकारियों से प्रजा की रक्षा के उपाय
(१) जनपद की रक्षा के उपाय समाहर्तृ प्रचार नामक प्रकरण में बताये जा चुके हैं । अब जनपद में गुप्त कण्टकों के प्रतीकार का उपाय बताया जा रहा है ।
(२) समाहर्ता को चाहिए कि वह गुप्त षडयंत्र कार्यों को जानने के लिए सारे देश में सिद्ध, तपस्वी, सन्यासी, परिव्राजक, भाट, जादूगर, स्वेच्छाचारी, यमपट को को दिखाकर जीविका चलाने वाले, शकुन बताने वाले, ज्योतिषी, वैद्य, उन्मत्त, गूं गे, बहरे, मूर्ख, व्यापारी, कारीगर, नट, भांड, कलवार, हलवाई, पक्का माँस बेचने वाले और रसोइया आदि के वेष में गुप्तचरों को नियुक्त करे । उन गुप्तचरों को चाहिए कि वे ग्रामीणों तथा ग्राम-प्रधानों की ईमानदारी और बेईमानी का पता लगाएँ । जिन्हें वे गूढाजीवी समझें उन्हें सत्री नामक गुप्तचर के साथ न्यायाधीश (धर्मस्थ) के पास भेज दें । विश्वस्त धर्मस्थ से सत्री यों कहे 'यह मेरा भाई है इसने ऐसा अपराध किया है । इसके इस अपराध को माफ कर दीजिए और इसके बदले में इतना धन ले लीजिए' । यदि न्यायाधीश उस धन को लेकर अपराधी को छोड़ दे तो उस पर घूस-खोरी का जुर्म लगाकर उसे बर्खास्त किया जाय ।
(३) यही नियम प्रदेष्टा (कण्टकशोधन का कमिश्नर) के संबंध में भी समझने चाहिएँ ।
(४) गाँव के लोगों से या गाँव के मुखिया से सत्री कहे कि 'यह पापी बड़ा सम्पत्तिशाली है; इस समय इस पर ऐसी आपत्ति आई है इसलिए चलो आपत्ति के
| ३६२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
|---|
तस्यायमनर्थः। तेनैनमाहारयस्व' इति। स चेत्तथा कुर्यादुत्कोचक इति प्रवास्येत।
(१) कृतकाभियुक्तो वा कूटसाक्षिणोऽभिजातानर्थवैपुल्येन आरभेत। ते चेत्तथा कुर्युः, कूटसाक्षिण इति प्रवास्येरन्।
(२) तेन कूटश्रावणकारका व्याख्याताः।
(३) यं वा मन्त्रयोगमूलकर्मभिः श्माशानीकैर्वा संवननकारकं मन्येत, तं सत्री ब्रूयात्—'अमुष्य भार्यां स्नुषां दुहितरं वा कामये। सा मां प्रतिकामयताम्, अयं चार्थः प्रतिगृह्यताम्' इति। स चेत्तथा कुर्यात्, संवननकारक इति प्रवास्येत।
(४) तेन कृत्याभिचारशीलौ व्याख्यातौ।
(५) यं वा रसस्य वक्तारं क्रेतारं विक्रेतारं भैषज्याहारव्यवहारिणं वा रसदं मन्येत, तं सत्री ब्रूयात्—'असौ मे शत्रुस्तस्योपघातः क्रियताम्, अयं चार्थः प्रतिगृह्यताम्' इति। स चेत्तथा कुर्याद्, रसद इति प्रवास्येत।
बहाने इसकी सारी सम्पत्ति लूट लें।' यदि गाँव के लोग या मुखिया वैसा ही करें तो उन्हें उत्कोचक (जनता को कष्ट देकर अपहरण करने वाला) समझकर प्रवासित कर दिया जाय।
(१) बनावटी तौर पर अभियुक्त बना हुआ सत्री संदिग्ध गवाहों को बहुत-सा धन देने का लोभ देकर अपनी ओर से उन्हें झूठी गवाही देने के लिए फुसलायें। यदि वे लोभ में आ जाँय तो उन्हें झूठा साक्षी समझकर प्रवासित किया जाय।
(२) यही नियम झूठे दस्तावेज आदि बनाने वालों के सम्बन्ध में भी समझने चाहिएँ।
(३) जिसको यह समझ लिया जाय कि यह व्यक्ति मन्त्रों, औषधियों या श्मशान की क्रियाओं द्वारा वशीकरण का कार्य करता है, उससे सत्री इस प्रकार कहे कि 'मैं अमुक व्यक्ति की स्त्री' पुत्रवधू या लड़की से प्रेम करता हूँ; इसलिए ऐसा उपाय बताओ कि जिससे वह मेरे वश में हो जाय बदले में इतना धन ले लो।' यदि वह लोभवश वैसा करने को तैयार हो जाय तो उसे वशीकरण करने वाला समझकर प्रवासित कर दिया जाय।
(४) यही नियम उन लोगों के सम्बन्ध से भी समझना चाहिए जो अपने ऊपर देवी-देवता, भूत-प्रेत-पिशाच आदि को बुलाकर प्रजा को कष्ट देते हैं और तन्त्र-मन्त्र आदि प्रयोगों द्वारा लोगों को मारते हैं।
(५) विष के बनाने वाले, खरीदने वाले, बेचने वाले तथा ओषधियों एवं भोज्य सामग्री का व्यापार करने वाले किसी व्यक्ति पर यदि किसी को विष देने का सन्देह हो जाय तो सत्री उससे कहे कि 'अमुक पुरुष मेरा शत्रु है उसे आप विष देकर मार डालिये और बदले में इतना धन ले लीजिए'। यदि वह पुरुष ऐसा ही करे तो उसे विष देने के अभियोग में प्रवासित कर दिया जाय।
प्र० ७६ : अ० ४ ] गुप्त षड्यन्त्रों का प्रतीकार ३६३
(१) तेन मदनयोगव्यवहारी व्याख्यातः ।
(२) यं वा नानालोहक्षाराणामङ्गारभस्त्रासन्दंशमुष्टिकाधिकरण-बिम्बटङ्कमूषाणामभीक्ष्णं क्रेतारं मषीभस्मधूमदिग्धहस्तवस्त्रलिङ्गं कर्मारोपकरणसंवर्गं कूटरूपकारकं मन्येत, तं सत्री शिष्यत्वेन संव्यवहारेण चानुप्रविश्य प्रज्ञापयेत् । प्रज्ञातः कूटरूपकारक इति प्रवास्येत ।
(३) तेन रागस्यापहर्ता कूटसुवर्णव्यवहारी च व्याख्यातः ।
(४) आरब्धारस्तु हिंसायां गूढाजीवास्त्रयोदश ।
प्रवास्या निष्क्रयार्थं वा दद्युर्दोषविशेषतः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे गूढाजीविनां रक्षा नाम चतुर्थोऽध्यायः, आदितोऽशीतितमः ।
—: ० :—
( १ ) यही नियम उन व्यापारियों के संबन्ध में भी समझने चाहिएँ जो बेहोश करने वाली दवाइयों को बेचते हैं ।
( २ ) जो व्यक्ति अनेक प्रकार का लोहा, खाद, कोयला, धौंकनी, सनसी, हथौड़ी निहाई ( अधिकरणी ), तस्वीर, छेनी और मूषा आदि पदार्थों को अधिक संख्या में खरीदे; जिसके हाथ या कपड़ों पर स्याही, राख तथा धूएँ के चिह्न हों, जो लोहार तथा सोनार के सभी औजार रखता हो; ऐसे व्यक्ति के ऊपर यदि छिपकर जाली सिक्का बनाने का सन्देह पैदा हो जाय तो सत्री उसका शिष्य बनकर एवं उससे अच्छी तरह मेल-जोल बढ़ाकर उसके रहस्यों की पूरी जानकारी राजा को दे । इस बात का निश्चय हो जाने पर कि वह छिपकर जाली सिक्का बनाता है, उसे प्रवासित कर दिया जाय ।
( ३ ) सोने आदि का रंग उड़ा देने वाले तथा बनावटी सोने के संबन्ध में भी भी यही नियम समझने चाहिएँ ।
( ४ ) धर्मस्थ, प्रदेष्टा, गाँव का मुखिया, गाँव का अध्यक्ष, कूट साक्षी, कूट श्रावक, वशीकरण कर्ता, क्रियाशील अभिचारशील, विष देने वाला, मदनयोग व्यापारी, कूटरूप कर्ता और कूट सुवर्ण व्यापारी; ये तेरह प्रकार के लोक के उपद्रव करने वाले गूढ़जीवी ऊपर बताए गये हैं। इन्हें देशनिकाला दिया जाय या अपराध के अनुसार दण्डित किया जाय ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में गूढ़जीवियोंकी रक्षा नामक चौथा अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ८० | # सिद्धव्यञ्नैर्माणवप्रकाशनम् |
|---|---|
| अध्याय ५ |
(१) सत्रिप्रयोगादूर्ध्वं सिद्धव्यञ्जना माणवा माणवविद्याभिः प्रलोभयेयुः। प्रस्वापनान्तर्धानद्वारापोहमन्त्रेण प्रतिरोधकान्, संवननमन्त्रेण पारतल्पिकान्।
(२) तेषां कृतोत्साहानां महासंघमादाय रात्रावन्यं ग्राममुद्दिश्यान्यं ग्रामं कृतकस्त्रीपुरुषं गत्वा ब्रूयुः—'इहैव विद्याप्रभावो दृश्यताम्। कृच्छ्रः परग्रामो गन्तुम्' इति। ततो द्वारापोहमन्त्रेण द्वाराण्यपोह्य 'प्रविश्यताम्' इति ब्रूयुः। अन्तर्धानमन्त्रेण जाग्रतामारक्षिणां मध्येन माणवानतिक्रामयेयुः। प्रस्वापनमन्त्रेण प्रस्वापयित्वा रक्षिणः शय्याभिर्माणवैः संचारयेयुः। संवननमन्त्रेण भार्याव्यञ्जनाः परेषां माणवैः संमोदयेयुः।
(३) उपलब्धविद्याप्रभावाणां पुरश्चरणाद्यादिशयुरभिज्ञानार्थम्।
सिद्धवेशधारी गुप्तचरों द्वारा दुष्टों का दमन
(१) गुप्तचरों के प्रयोग के बाद सिद्धों के वेश में रहने वाले गूढ़ पुरुष चोरों, व्यभिचारियों के समूहों में रहकर सम्मोहनी विद्याओं के द्वारा प्रजा को कष्ट देने वाले दुष्टों को प्रलोभन दें; छिपाने, संकेत से दरवाजा खोलने आदि के मायिक प्रयोगों से चोरों को और वशीकरण संबन्धी मंत्रों के प्रयोगों से व्यभिचारियों को अपने काबू में करें।
(२) चोरों और व्यभिचारियों के बड़े भारी समूह को उत्साहित कर, पहिले से रात में जिस गाँव को जाने का प्रोग्राम बनाया हो, उससे दूसरे ही गाँव में जहाँ लोगों को पहिले से समझा-बुझा दिया है, चोरों, व्यभिचारियों को ले जाकर सिद्धवेशधारी गुप्त पुरुष उनसे कहें 'आप लोग यहीं पर आज हमारी विद्या का प्रभाव देखें; आज दूसरे गाँव जाना तो संभव न हो सकेगा।' इसके बाद द्वारापोह मंत्र से दरवाजों को खोलकर उन चोरों को भीतर घुस जाने को कहें; अन्तर्धान मन्त्र के द्वारा जागते पहरेदारों के बीच से चोरों को निकाल दें, प्रस्वापन मन्त्र पढ़ने का अभिनय कर पहरेदारों को सुलाकर उनकी चारपाइयों के पास से ही चोरों को ले जांय और अन्त में वशीकरण मन्त्र का दिखावा कर दूसरों की बनावटी स्त्रियों के साथ उनको संभोग सुख दिलावें।
(३) जब उन चोरों-व्यभिचारियों को सिद्ध पुरुषों की मन्त्रविद्या पर पूरा भरोसा हो जाय तब उन्हें मन्त्रों के पुरश्चरण (प्रयोग) के लिए प्रेरित करें।
प्र० ८० : अ० ५ ] गुप्तविधि से दुष्टों का दमन ३६५
(१) कृतलक्षणद्रव्येषु वा वेश्मसु कर्म कारयेयुः । अनुप्रविष्टान् वैकत्र ग्राहयेयुः ।
(२) कृतलक्षणद्रव्यक्रयविक्रयाधानेषु योगसुरामत्तान् वा ग्राहयेयुः । गृहीतान् पूर्वपदानसहायाननुयुञ्जीत ।
(३) पुराणचोरव्यञ्जना वा चोराननुप्रविष्टास्तथैव कर्म कारयेयुर्ग्राहयेयुश्च ।
(४) गृहीतान् समाहर्ता पौरजानपदानां दर्शयेत्—'चोरग्रहणीं विद्यामधीते राजा; तस्योपदेशादिमे चोरा गृहीताः, भूयश्च ग्रहीष्यामि । वारयितव्यो वा स्वजनः पापाचार' इति ।
(५) यं चात्रापसर्पोपदेशेन शम्याप्रतोदादीनामपहर्तारं जानीयात्तमेषां प्रत्यादिशेद्—एष राज्ञः प्रभाव, इति ।
(६) पुराणचोरगोपालकव्याधश्वगणिनश्च, वनचोराटविकाननुप्रविष्टाः प्रभूतकूटहिरण्यकुप्यभाण्डेषु सार्थव्रजग्रामेष्वेनानभियोजयेयुः । अभियोगे
( १ ) फिर जिन घरों में पहिले ही से चिह्न लगी वस्तुएँ रखी गई हों वहाँ उनको चोरी करने के लिए भेजें । अन्त में किसी एक घर में घुसे हुए उन सबको एक साथ गिरफ्तार करवा लें ।
( २ ) अथवा चिह्नित वस्तुओं को बेचते खरीदते, गिरवी रखते समय या मद्य-पान की बेसुध दशा में उन्हें गिरफ्तार करा लें । तब उनके द्वारा पहिले की चोरियों तथा चोरी करने में सहायता देने वाले लोगों के सम्बन्ध में पता लगाया जाय ।
( ३ ) अथवा पुराने अनुभवी चोरों का वेश बनाकर गुप्तचर उनकी मण्डली में मिल जायें और उनसे चोरी कराकर उन्हें धोखे में गिरफ्तार करा दें ।
( ४ ) समाहर्त्ता को चाहिए कि वह उन गिरफ्तार किए गए चोरों को नगर-वासियों के सामने खड़ा कर उनसे कहे 'राजा, चोरों को पकड़ने की विद्या में बहुत निपुण थे । उसी की आज्ञा से इन चोरों को पकड़ा गया है । जो भी ऐसा कार्य करेंगे उनको मैं इसी तरह गिरफ्तार करूँगा । इसलिए तुम लोग अपने अपने स्वजनों को ताकीद कर दो कि वे ऐसा आचरण कदापि न करें ।'
( ५ ) गुप्तचरों की कारामात से गिरफ्तार किये खुरपी, रस्सी, सैल आदि कृषि योग्य छोटी-छोटी वस्तुओं को चुराने वालों से जनता के सामने कहा जाय 'देखो, राजा का ही यह प्रभाव है कि इतनी छोटी-छोटी वस्तुओं की चोरी भी उससे छिपी नहीं रह सकती है ।'
( ६ ) पुराने चोर, शिकारी, बहेलिये एवं चरवाहे के वेश में गुप्तचर, जंगली चोरों और कोलभीलों के समूह में घुल-मिल जायें, तब उन्हें ऐसे गाँव में डाका