कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ७७ : अ० २ ] व्यापारियों सम्बन्धी नियम ३५५
(१) सम्भूयक्रये चैषामविक्रीते नान्यं सम्भूयक्रयं दद्यात् । पण्योपघाते चैषामनुग्रहं कुर्यात् पण्यबाहुल्यात् ।
(२) पण्याध्यक्षः सर्वपण्यान्येकमुखानि विक्रीणीत । तेष्वविक्रीतेषु नान्ये विक्रीणीरन् । तानि दिवसवेतनेन विक्रीणीरन् अनुग्रहेण प्रजानाम् ।
(३) देशकालान्तरितानां तु पण्यानां—
प्रक्षेपं पण्यनिष्पत्तिं शुल्कं वृद्धिमवक्रयम् ।
व्ययानन्यांश्च संख्याय स्थापयेदर्घमर्घवित् ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे वैदेहकरक्षणं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदितोऽष्टसप्ततितमः ।
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( १ ) यदि संस्थाध्यक्ष से थोक भाव कर खरीदा हुआ माल न बिके तो दूसरे व्यापारियों को थोक भाव पर माल न दिया जाय । यदि आकस्मिक आपात के कारण किसी व्यापारी का माल नष्ट हो जाय तो संस्थाध्यक्ष दूसरा माल देकर उसकी सहायता करे ।
( २ ) संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह सारी विक्रेय वस्तुओं को किसी एक व्यापारी द्वारा बिकवाये । यदि एक व्यापारी के द्वारा वह न बिक सके तो अन्य व्यापारी उस तरह का माल न बेचें । उन वस्तुओं को दैनिक मजदूरी देकर इस ढंग से बिकवाया जाय, जिससे प्रजा का हित हो ।
( ३ ) संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह दूसरे देश तथा दूसरे समय में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं का मूल्य, बनवाई का समय, वेतन, ब्याज, भाड़ा, और इसी प्रकार के ऊपरी खर्चों को जोड़ कर ऐसा भाव तय करे, जिससे वे बिक जाँय ।
कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में वैदेहकरक्षण नामक
दूसरा अध्याय समाप्त ।
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