कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
About this granth
The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.
This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.
| ३४० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) जितद्रव्यादध्यक्षः पञ्चकं शतमाददीत, काकण्यक्षारलाशलाकाव-
क्रयमुदकभूमिकर्मक्रयं च । द्रव्याणामाधानं विक्रयं च कुर्यात् । अक्षभूमि-
हस्तदोषाणां चाप्रतिषेधने द्विगुणो दण्डः ।
(२) तेन समाह्वयो व्याख्यातः अन्यत्र विद्याशिल्पसमाह्वयादिति ।
(३) प्रकीर्णकं तु । याचितकापक्रीतकाहितकनिक्षेपकाणां यथादेश-
कालमदाने, यामच्छायासमुपवेशसंस्थितीनां वा देशकालातिपातने, गुल्म-
तरदेयं ब्राह्मणं साधयतः प्रतिवेशानुवेशयोरुपरि निमन्त्रणे च द्वादशपणो
दण्डः ।
(४) सन्दिष्टमर्थमप्रयच्छतो, भ्रातृभार्यां हस्तेन लङ्घयतो, रूपाजीवा-
मन्योपरुद्धां गच्छतः, परवक्तव्यं पण्यं क्रीणानस्य, समुद्रं गृहमूद्भिन्दतः,
सामन्तचत्वारिंशत्कुल्याबाधामाचारतश्चाष्टचत्वारिंशत्पणो दण्डः ।
(५) कुलनीवीग्राहकस्यापव्ययने, विधवां च्छन्दवासिनीं प्रसह्याधि-
( १ ) जीतने वाले जुआरी से द्यूताध्यक्ष पाँच प्रतिशत सरकारी कर ले और कौड़ी, पाँसे, अरल ( पाँसे फेंके जाने के लिए चमड़े की चौकी ), शलाका, जल तथा जमीन का किराया भी वसूल करे जुआरियों को चीजें बेचने और गिरवी रखने को इजाजत भी दे दे । यदि अध्यक्ष, जुआरियों को पाँसे, जमीन, हाथ की सफाई आदि से न रोके तो जितना धन वह जुआरियों से वसूल करे, उससे दुगुना जुरमाना उस पर किया जाय ।
( २ ) यही नियम उन लोगों के सम्बन्ध में भी समझने चाहिएँ, जो मुर्गा, तीतर, भेड़ आदि की लड़ाई में बाजी लगाते हैं; किन्तु विद्या और शिल्प की बाजी लगाने वाले जुआरियों के लिए ये नियम नहीं हैं ।
( ३ ) प्रकीर्णक : इस प्रसंग में जिन विषयों के सम्बन्ध में कहना शेष रह गया है उन विषयों को प्रकीर्णक कहते हैं । यदि कोई पुरुष उधार ली हुई ( याचितक ), किराये पर ली हुई ( अवक्रीतक ) और धरोहर के तौर पर रखी हुई ( आहितक ) वस्तु एवं जेवर बनाने के लिए सुवर्ण आदि को ठीक स्थान तथा ठीक समय पर वापिस न करे; निश्चित समय एवं स्थान का वायदा कर फिर न मिले; बेड़ा आदि के द्वारा पार कराके ब्राह्मण से किराया माँगे; पड़ोसी श्रोत्रिय को छोड़कर बाहरी श्रोत्रिय को निमंत्रण दे; तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय ।
( ४ ) वायदा किए धन को न देने वाले; भौजाई का हाथ पकड़कर झटका देने वाले; दूसरे की रखेल वेश्या के यहाँ जाने वाले; दूसरे के हाथ बिके पदार्थ को खरीदने वाले; सरकारी चिह्नों से युक्त मकान को गिराने वाले और सामन्तों के चालीस कुलों तक बाधा पहुँचाने वाले; व्यक्ति पर अड़तालीस पण दण्ड किया जाय ।
( ५ ) जो व्यक्ति वंशानुक्रम से भोगी जाने वाली सर्वसाधारण सम्पत्ति का
प्र० ७४-७५ : अ० २० ] द्यूतसमाह्वय और प्रकीर्णक ३४१
चरतः, चण्डालस्यार्यां स्पृशतः, प्रत्यासन्नमापद्यनमभिधावतो, निष्कारणमभिधावनं कुर्वतः, शाक्यजीवकादीन् वृषलप्रव्रजितान् देवपितृकार्येषु भोजयतः शत्यो दण्डः ।
(१) शपथवाक्यानुयोगमनिसृष्टं कुर्वतो, युक्तकर्म चायुक्तस्य, क्षुद्रपशुवृषाणां पुंस्त्वोपघातिनो, दास्या गर्भमौषधेन पातयतश्च पूर्वः साहसदण्डः ।
(२) पितापुत्रयोर्दम्पत्योर्भ्रातृभगिन्योर्मातुलभागिनेययोः शिष्याचार्ययोर्वा परस्परमपतितं त्यजतः सार्थाभिप्रयातं ग्राममध्ये वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः । कान्तारे मध्यमः । तन्निमित्तं भ्रेषयत उत्तमः । सहप्रस्थायिष्वन्येष्वर्धदण्डः ।
(३) पुरुषमबन्धनीयं बध्नतो बन्धयतो बन्धं वा मोक्षयतो बालमप्राप्तव्यवहारं बध्नतो बन्धयतो वा सहस्रदण्डः । पुरुषापराधविशेषेण दण्डविशेषः कार्यः ।
(४) तीर्थकरस्तपस्वी व्याधितः क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तस्तिरोजनपदो दण्डखेदी निष्किञ्चनश्चानुग्राह्याः ।
अपव्यय करे; स्वतन्त्र रहनेवाली विधवा के साथ बलात्कार करे; चाण्डाल होकर आर्या स्त्री को छूए; पड़ोसी की आपत्ति पर सहायता न करे; बिना कारण पड़ोसी के यहाँ जाये आये और बौद्ध भिक्षुओं तथा शूद्रा संन्यासियों को यज्ञादि देवकर्मों तथा श्राद्धादि पितृकर्मों में भोजन कराये; उस पर सौ पण दण्ड दिया जाय ।
( १ ) न्यायाधीश ( धर्मस्थ ) की आज्ञा के बिना ही साक्षी के तौर पर शपथ खाने वाले; अनधिकारी को अधिकार देने वाले; छोटे-छोटे पशुओं को बधिया बना देने वाले और दवा देकर दासी के गर्भ को गिरा देने वाले; व्यक्ति को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( २ ) पिता-पुत्र, भाई-बहिन, मामा-भांजा और गुरु-शिष्य आदि में से कोई भी किसी को बिना पतित हुए त्याग दे; या किसी व्यापारी काफिले का मुखिया अपने साथ के किसी बीमार व्यक्ति को रास्ते के किसी गाँव में ही छोड़ दे; उनको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि किसी बीहड़ वन में छोड़ दे तो मध्यम साहस दण्ड दिया जाय और यदि मार डाले तो उस व्यापारी को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय तथा उसके साथ जितने लोग हों, उन पर इसी अपराध में आधा दण्ड किया जाय ।
( ३ ) जो व्यक्ति किसी बेगुनाह व्यक्ति को बाँधे या बँधवाये, अथवा किसी कैदी को छोड़ दे या किसी नाबालिग बच्चे को बांधे, बँधवाये उस पर हजार पण दण्ड किया जाय । निष्कर्ष यह है कि किसी भी व्यक्ति को अपराध के अनुसार ही दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ४ ) दानी, तपस्वी, बीमार, भूखा, प्यासा, रास्ते का थका, परदेशी, अनेक बार दण्ड पाने से दुःखी और निर्बल-निर्धन व्यक्तियों पर सदा अनुग्रह रखना चाहिए ।
| ३४२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) देवब्राह्मणतपस्विस्त्रीबालवृद्धव्याधितानामनाथानामनभिसरतां धर्मस्थाः कार्याणि कुर्युः । न च देशकालभोगच्छलेनातिहरेयुः ।
(२) पूज्या विद्याबुद्धिपौरुषाभिजनकर्मतिशयतश्च पुरुषाः ।
(३) एवं कार्याणि धर्मस्थाः कुर्युरच्छलदर्शिनः ।
समाः सर्वेषु भावेषु विश्वास्या लोकसम्प्रियाः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे द्यूत-समाह्वय-प्रकीर्णकं नाम विंशोऽध्यायः;
आदितः षट्सप्ततितमः ।
समाप्तमिदं धर्मस्थीयं तृतीयमधिकरणम् ।
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(१) धर्मस्थ अधिकारियों को चाहिए कि वे देव, ब्राह्मण, तपस्वी, स्त्री, बालक, बूढ़ा, बीमार और अपने दुःखों को कहने के लिए न जाने वाले अनाथों का कार्य खुद ही कर दिया करें। स्थान तथा समय का बहाना लगाकर उनके धन का अपहरण न किया जाय; अथवा देश, काल के बहाने उनको तंग न किया जाय ।
(२) जो व्यक्ति विद्या, बुद्धि, पौरुष, कुल और सत्कार्यों के कारण आदरयोग्य हों, उनकी सदा प्रतिष्ठा की जाय ।
(३) इस प्रकार धर्मस्थ अधिकारियों को चाहिए कि छल-कपट से विलग होकर वे अपने कार्यों को सम्पन्न करें और सबको एक समान निगाह में रखकर एवं जनता के विश्वासपात्र बनकर लोकप्रियता प्राप्त करें ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में द्यूतसमाह्वयप्रकीर्णक नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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चौथा अधिकरण
चौथा अधिकरण
कण्टकशोधन
प्रकरण ७६
अध्याय १
कारुकरक्षणम्
(१) प्रदेष्टारस्त्रयस्त्रयोऽमात्याः कण्टकशोधनं कुर्युः ।
(२) अर्थ्यप्रकाराः कारुशासितारः सन्निक्षेप्तारः स्ववित्तकारवः श्रेणीप्रमाणा निक्षेपं गृह्णीयुः । विपत्तौ श्रेणी निक्षेपं भजेत । निर्दिष्टदेशकालकार्यं च कर्म कुर्युः । अनिर्दिष्टदेशकालकार्यापदेशम् ।
(३) कालातिपातने पादहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः । अन्यत्र भ्रेशोपनिपाताभ्यां नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेयुः । कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशस्तद्द्विगुणश्च दण्डः ।
शिल्पियों से प्रजा की रक्षा
( १ ) सामान्य कारीगर : तीन कमिश्नर ( प्रदेष्टा ) या तीन मंत्री प्रजा-पीड़क व्यक्तियों से प्रजा की रक्षा ( कंटक शोधन ) करें ।
( २ ) अच्छे स्वभाववाले शिल्पियों के मुखिया; सबके सामने लेन-देन का कार्य करने वाले; अपने ही धन से गहने आदि बनाने वाले और साझीदारों में विश्वसनीय, शिल्पी लोग ही किसी के धन को गिरवी ( निक्षेप ) रख सकते हैं । गिरवी रखने वाला यदि मर जाय या विदेश चला जाय तो उसके साझीदार मिल-जुल कर उस गिरवी रखे हुए धन को अदा करें । कारीगर लोग स्थान, समय और कार्य आदि का निश्चय करके ही किसी कार्य को आरम्भ करें । कोई बहाना बनाकर समय और कार्य आदि का निश्चय न करके किसी कार्य को आरंभ न करें ।
( ३ ) जो शिल्पी ठीक समय पर काम पर हाजिर न हों उनका चौथाई वेतन काट लिया जाय और उन पर उससे दुगुना जरमाना किया जाय । किन्तु किसी हिंसक प्राणी द्वारा बाधा उत्पन्न हो जाने या किसी आकस्मिक आपत्ति के आ जाने के कारण यदि वह ठीक समय से काम पर हाजिर न हो सका हो तो उसे अपराधी न समझा जाय । यदि कारीगर से कोई कार्य बिगड़ जाय तो वह उसके नुकसान को भरे; किन्तु किसी विपत्ति के कारण यदि ऐसा हुआ हो तो उसको अपराधी न समझा जाय । यदि कारीगर काम बिगाड़ दें तो उनको मजदूरी न दी जाय; बल्कि उन पर वेतन का दुगुना जरमाना किया जाय ।
| ३४६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) तन्तुवाया दशैकादशिकं सूत्रं वर्धयेयुः। वृद्धिच्छेदे छेदद्विगुणो दण्डः।
(२) सूत्रमूल्यं वानवेतनम्। क्षौमकौशेयानामध्यर्धगुणम्। पत्रोर्णा-कम्बलदुकूलानां द्विगुणम्।
(३) मानहीने हीनावहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः। तुलाहीने हीन-चतुर्गुणो दण्डः। सूत्रपरिवर्तने मूल्यद्विगुणः। तेन द्विपटवानं व्याख्यातम्।
(४) ऊर्णातुलायाः पञ्चपलिको विहननच्छेदो रोमच्छेदश्च।
(५) रजकाः काष्ठफलकश्लक्ष्णशिलासु वस्त्राणि नेनिज्युः। अन्यत्र नेनिजतो वस्त्रोपघातं षट्पणं च दण्डं दद्युः।
(६) मुद्गराङ्कादन्यद् वासः परिदधानास्त्रिपणं दण्डं दद्युः। परवस्त्र-विक्रयावक्रयाधानेषु च द्वादशपणो दण्डः। परिवर्तने मूल्यद्विगुणो वस्त्र-दानं च।
( १ ) जुलाहा : जुलाहा (तंतुवाय) को चाहिए कि वह प्रति दस पल पर एक पल अधिक सूत, कपड़ा बुनने के लिए ले। यदि वह इस से अधिक छीजन निकाले तो उस पर छीजन का दुगुना जुरमाना किया जाय।
( २ ) जितने कीमत का सूत हो उतनी ही उसकी बुनाई भी देनी चाहिए; जूट और रेशमी कपड़ों की बुनाई सूत से ड्योढ़ी दी जाय। धुले हुए रेशमी कपड़ों (पत्रोर्ण), ऊनी कंबलों और दुशालों की बुनाई सूती कपड़े से दुगुनी देनी चाहिए।
( ३ ) जितने नाप का कपड़ा बुनने को दिया गया हो यदि बुनकर उतना न निकले तो उसी हिसाब से जुलाहे की मजदूरी काटी जाय और उस पर उस कम बुनाई का दुगुना जुरमाना किया जाय। यदि सूत तौलकर दिया गया हो तो बुने हुए कपड़े में जितनी कमी निकले उसका चौगुना दण्ड जुलाहे को दिया जाय। यदि वह सूत को ही बदल दे तो उस पर मूल्य से दुगुना दण्ड किया जाय। इसी आधार पर दुसूती कपड़ों की बुनाई भी समझ लेनी चाहिए।
( ४ ) सौ पल वजनी ऊन में से पाँच पल ऊन पिंजाई-धुनाई में कम हो जाता है और पाँच पल ऊन बुनाई के समय रूओं के रूप में उड़ जाती है; अर्थात् धुनाई-बुनाई के समय प्रति सैकड़ा दस पल ऊन कम हो जाती है, इससे अधिक नहीं।
( ५ ) धोबी और दर्जी : धोबियों (रजकों) को चाहिए कि वे लकड़ी के फटे पर या साफ पत्थर पर ही कपड़ों को साफ करें। दूसरी जगह धोने पर यदि कपड़ा फट जाय तो वे उसका नुकसान भरें और दण्ड रूप में छह पण भी अदा करें।
( ६ ) धोबियों के अपने पहिनने के कपड़ों पर मुद्गर का निशान होना चाहिए; जिस धोबी के कपड़ों पर यह निशान न रहे उस पर तीन पण दण्ड किया जाय। जो
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३४७
(१) मुकुलावदातं शिलापट्टशुद्धं धौतसूत्रवर्णं प्रमृष्टश्वेतं चैकरात्रोत्तरं दद्युः ।
(२) पञ्चरात्रिकं तनुरागं, षड्रात्रिकं नीलं, पुष्पलाक्षामञ्जिष्ठारक्तं, गुरुपरिकर्म यत्नोपचार्यं जात्यं वासः सप्तरात्रिकम् । ततः परं वेतनहानिं प्राप्नुयुः ।
(३) श्रद्धेया रागविवादेषु वेतनं कुशलाः कल्पयेयुः ।
(४) पराध्यानां पणो वेतनं मध्यमानामर्धपणः, प्रत्यवराणां पादः ।
(५) स्थूलकानां माषद्विमाषकं द्विगुणं रक्तकानाम् । प्रथमनेजने चतुर्भागः क्षयः । द्वितीये पञ्चभागः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(६) रजकैस्तुन्नवाया व्याख्याताः ।
(७) सुवर्णकाराणामशुचिहस्ताद्रूप्यं सुवर्णमनाख्याय सरूपं क्रीणतां
धोबी धुलाई के कपड़ों को बेचे, किराये पर दे या गिरवी रखे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । कपड़ा बदल जाने पर वह कपड़े के मूल्य का दुगुना दण्ड और कपड़ा भी वापस दे ।
( १ ) धोबी को चाहिए कि वह अधखिली पुष्पकली के समान स्वच्छ-श्वेत कपड़े को धोकर एक दिन में ही वापस करे, शिलापट्ट के समान स्वच्छ कपड़े को दो दिन में, धुले हुए सूत की तरह श्वेत कपड़े को तीन दिन में और अत्यंत श्वेत कपड़े को चार दिन में धोकर वापस करे ।
( २ ) इसी प्रकार हलके रंग वाले कपड़े को पांच दिन में, नीले, गाढ़े रंग के, हरसिंगार, लाख तथा मजीठ आदि में रंगे कपड़े को छह दिन में, रेशम, पशम, वेल-बूटेदार जैसे कठिनाई से धुले जाने योग्य उत्तम कपड़ों को सात दिन में धोकर वापस करे । इसके बाद वापस करने पर उसकी धुलाई न दी जाय ।
( ३ ) यदि रंगीन कपड़ों की धुलाई देने में झगड़ा हो जाय तो उसका फैसला रंगों को ठीक-ठीक समझने वाले कुशल व्यक्ति करें ।
( ४ ) बढ़िया रंगीन कपड़ों की धुलाई एक पण, मध्यम दर्जे के रंगीन कपड़ों की धुलाई आधा पण और मामूली रंगीन कपड़ों की धुलाई चौथाई पण दी जानी चाहिए ।
( ५ ) इसी प्रकार मोटे कपड़ों की धुलाई एक या दो माष और रंगे हुए कपड़ों की धुलाई इससे दुगुनी देनी चाहिए । कपड़े की पहिली धुलाई में उसकी चौथाई कीमत कम हो जाती है । दूसरी धुलाई में शेष मूल्य का पांचवां हिस्सा कम हो जाता है; और तीसरी धुलाई में उस शेष मूल्य का छठा हिस्सा कम हो जाता है ।
( ६ ) धोबियों के समान दर्जियों (तुन्नवाय) के नियम भी समझ लेना चाहिए ।
( ७ ) सुनार : यदि सुनार निम्नकोटि के नौकर-चाकरों (अशुचिहस्त) के हाथ
३४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
द्वादशपणो दण्डः, विरूपं चतुर्विंशतिपणः, चोरहस्तादष्टचत्वारिंशत्पणः । प्रच्छन्नविरूपमूल्यहीनक्रयेषु स्तेयदण्डः । कृतभाण्डोपधौ च ।
(१) सुवर्णान्माषकमपहरतो द्विशतो दण्डः । रूप्यधरणान्माषकमपहरतो द्वादशपणः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(२) वर्णोत्कर्षमसारणां योगं वा साधयतः पञ्चशतो दण्डः । तयोरपचरणे रागस्यापहारं विद्यात् ।
(३) माषको वेतनं रूप्यधरणस्य । सुवर्णस्याष्टभागः । शिक्षाविशेषेण द्विगुणा वेतनवृद्धिः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(४) ताम्रवृत्तकंसवैकृन्तकारकूटानां पञ्चकं शतं वेतनम् । ताम्रपिण्डो दशभागक्षयः । पलहीने हीनद्विगुणो दण्डः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
से, सोने-चाँदी के बने हुए जेवर ( सरूप ); सुवर्णाध्यक्ष को सूचित किए बिना ही खरीद ले तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय; यदि बिना गहने की सोना-चाँदी खरीदे तो चौबीस पण; चोर के हाथ से खरीदे तो अठतालीस पण और दूसरों से छिपाकर गहने आदि को तोड़-मरोड़ कर थोड़ी कीमत में खरीदे तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय । बनाये हुए माल को बदल देने वाले सुनार को भी चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( १ ) यदि सुनार सोने में से एक माष सोना चुरा ले तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि एक धरण चाँदी में से एक माष चाँदी चुरा ले तो उस पर बारहपण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिकाधिक चोरी के अनुसार अधिकाधिक दण्ड की व्यवस्था समझ लेनी चाहिए ।
( २ ) यदि कोई सुनार खोटे सोने-चाँदी पर नकली रंग चढ़ा दे या शुद्ध सोना-चाँदी में नकली धातु मिला दे तो उस पर पाँच सौ पण दण्ड किया जाय । सोने-चाँदी के खरे-खोटे की जाँच आग में तपाकर करनी चाहिए ।
( ३ ) एक धरण मान चाँदी के गहने आदि की बनवाई एक माषक दी जानी चाहिए । जितने तौल की सोने की चीज बनवायी जाय उसका आठवां हिस्सा बनवाई देनी चाहिए । विशेष कारीगरी के लिए दुगुनी बनवाई देनी चाहिए । इसी के अनुसार अधिक कार्य करवाने की मजदूरी समझनी चाहिए ।
( ४ ) ताँबा, सीसा, काँसा, लोहा, रांगा और पीतल इनकी बनवाई पांच प्रति सैकड़ा दी जानी चाहिए । ताँबे का दसवाँ हिस्सा, बनाते समय छीजन के लिए छोड़ देना चाहिए । इससे एक पल भी कम हो जाने पर नुकसान का दण्ड देना चाहिए । इसी प्रकार अधिक हानि के अनुपात से दण्ड का विधान समझना चाहिए ।
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३४९
(१) सीसत्रपुपिण्डो विंशतिभागक्षयः । काकणी चास्य पलवेतनम् ।
(२) कालायसपिण्डः पञ्चभागक्षयः । काकणीद्वयं चास्य पलवेतनम् । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(३) रूपदर्शकस्य स्थितां पणयात्रामकोप्यां कोपयतः कोप्यामकोपयतो द्वादशपणो दण्डः ।
(४) व्याजीपरिशुद्धा पणयात्रा । पणान्माषकमुपजीवतो द्वादशपणो दण्डः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
(५) कूटरूपं कारयतः प्रतिगृह्णतो निर्यातयतो वा सहस्रं दण्डः । कोशे प्रक्षिपतो वधः ।
(६) सरकपांसुधावकाः सारत्रिभागं लभेरन् । द्वौ राजा रत्नं च । रत्नापहार उत्तमो दण्डः ।
(७) खनिरत्ननिधिनिवेदनेषु षष्ठमंशं निवेत्ता लभेत । द्वादशमंशं भृतकः ।
( १ ) सीसे और रांगे की चीजों में बीसवाँ हिस्सा छीजन में निकल जाता है। इनके एक पल की बनवाई का एक कांकड़ी वेतन देना चाहिए।
( २ ) कलायस ( काला लोहा ) की चीजों में पाँचवाँ हिस्सा छीजन में निकल जाता है। उसकी बनवाई दो काँकड़ी वेतन देना चाहिए। इसी अनुपात से बनवाई देनी चाहिए।
( ३ ) यदि सिक्कों का पारखी ( रुपदर्शक ) चलते हुए खरे पण खोटा और खोटे पण को खरा बताये तो उस पर बारह पण जुर्माना किया जाय।
( ४ ) पाँच प्रति सैकड़ा टैक्स ( व्याजी ) सरकार को देकर पण चलाया जा सकता है। एक पण के चलाने के लिए माषक रिश्वत लेने वाले लक्षणाध्यक्ष को बारह पण दंड किया जाय। इसी क्रम से इसका दण्ड-विधान समझना चाहिए।
( ५ ) यदि छिपकर कोई जाली सिक्के बनवाये या जाली सिक्कों को स्वीकार करे अथवा उनका निर्यात करे, उस पर एक हजार पण दण्ड किया जाय। खजाने में अच्छे सिक्कों की जगह जाली सिक्के रखने वाले को मृत्यु दण्ड दिया जाय।
( ६ ) खान से निकले हुए रत्नों को साफ करने वाले कर्मचारी, टूटे-फूटे सारभूत माल का तीसरा हिस्सा ले लें। बाकी दो हिस्से तथा रत्नों को राजकोष के लिए रखा जाय। रत्न चुराने वाले कर्मचारी को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।
( ७ ) जो व्यक्ति राजा को रत्नों की खान तथा गड़े हुए खजाने का पता दे उस व्यक्ति को उसमें से छठा हिस्सा दिया जाय। यदि वह इसी कार्य के लिए राजा की ओर से नियुक्त हो तब उसे बारहवां हिस्सा दिया जाय।
३५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) शतसहस्रादूर्ध्वं राजगामी निधिः । ऊने षष्ठमंशं दद्यात् ।
(२) पूर्वपौरुषिकं निधिं जानपदः शुचिः स्वकरणेन समग्रं लभेत । स्वकरणाभावे पंचशतो दण्डः । प्रच्छन्नादाने सहस्रम् ।
(३) भिषजः प्राणाबाधिकमनाख्यायोपक्रममाणस्य विपत्तौ पूर्वः साहसदण्डः । कर्मापराधेन विपत्तौ मध्यमः । मर्मवेधवैगुण्यकरणे दण्डपारुष्यं विद्यात् ।
(४) कुशीलवा वर्षारात्रिमेकस्था वसेयुः । कामदानमतिमात्रमेकस्यातिवादं च वर्जयेयुः । तस्यातिक्रमे द्वादशपणो दण्डः । कामं देशजातिगोत्रचरणमैथुनापहाने नर्मयेयुः ।
( १ ) गड़ा हुआ खजाना यदि एक लाख पण से अधिक निकले तब उसका स्वामी राजा होता है । अन्यथा वह पता देने वाले व्यक्ति को ही दिया जाय; किन्तु उनमें से छठा हिस्सा वह राजा को अवश्य दे ।
( २ ) साक्षी और लेख आदि के प्रमाण से यदि यह साबित हो जाय कि खजाना पाने वाले व्यक्ति के पूर्वजों का है; यदि वह व्यक्ति सदाचारी है तो उस खजाने का स्वामी वही समझा जाय । यदि वह साक्षी और लेख आदि के बिना ही उस खजाने पर अधिकार जमाने लगे तो उसपर पाँच-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि कोई छिपकर चुपचाप ही अपना कब्जा कर ले तो उस पर एक हजार पण दण्ड किया जाय ।
( ३ ) वैद्य : राजा को बिना सूचित किये यदि कोई वैद्य किसी ऐसे रोगी का इलाज करे, जिसके मरने की संभावना है, और दवा देने के दौरान में ही उसकी मृत्यु हो जाय तो उस वैद्य को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि इलाज में भूल हो जाने के कारण मृत्यु हुई हो तो माध्यम साहस दण्ड दिया जाय । शरीर के किसी विशेष अङ्ग का गलत ऑपरेशन होने के कारण यदि रोगी का वह अंग जाता रहे, या दूसरी तरह की हानि हो जाय तो वैद्य को दण्ड-पारुष्य प्रकरण के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाय ।
( ४ ) नट-नर्त्तक : वर्षा ऋतु में नट नर्त्तक आदि एक ही स्थान पर निवास करें । उनकी कला से प्रसन्न होकर यदि कोई व्यक्ति उन्हें उचित मात्रा से अधिक पुरस्कार दे तो वे उसे स्वीकार न करें, अपनी अधिक तारीफ को भी वे पसन्द न करें । इस नियम का उल्लंघन करने पर बारह पण दण्ड दिया जाय । किसी खास देश, जाति, गोत्र या चरण के मजाक या निन्दा को छोड़कर तथा मैथुन संबन्धी कर्तव्यों को छोड़कर नट लोग जो चाहें अपने इच्छानुसार खेल दिखाकर दर्शकों को खुश कर सकते हैं ।
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३५१
(१) कुशीलवैश्चारण भिक्षुकाश्च व्याख्याताः । तेषामयश्शूलेन यावतः पणानभिवदेयुः, तावन्तः शिफाप्रहारा दण्डाः ।
(२) शेषाणां कर्मणां निष्पत्तिवेतनं शिल्पिनां कल्पयेत् ।
(३) एवं चोरानचोराख्यान् वणिक्कारुकुशीलवान् ।
भिक्षुकान् कुहकांश्चान्यान् वारयेद्देशपीडनात् ॥इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे कारुकरक्षणं नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितः सप्तसप्ततितमः ।
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(१) नटों के ही अनुसार नाचने-गाने वालों और भिक्षुकों के नियम समझने चाहिए । दूसरों के मर्म को पीड़ा पहुँचाने पर इन लोगों को अपराध के अनुसार जितना पण दण्ड दिया जाय, यदि वे उसको अदा न कर सकें तो उनपर उतने ही कोड़े लगवाये जाँय ।
(२) जो कार्य पहिले बताये गये हैं, उनके अतिरिक्त कार्यों की मजदूरी, अन्दाज से लगा लेनी चाहिए ।
(३) इस प्रकार वनावटी साधु, बनिये, कारीगर, नट, भिखारी और ऐंद्रजालिक आदि चोरों को तथा इसी प्रकार के अन्य पुरुषों को देश में पीड़ा, पहुँचाने से रोका जाय ।
कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कारुक रक्षण नामक पहला अध्याय समाप्त ।
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प्रकरण ७७ | वैदेहकरक्षणम्
अध्याय २ |
(१) संस्थाध्यक्षः पण्यसंस्थायां पुराणभाण्डानां स्वकरणविशुद्धानामा-धानं विक्रयं वा स्थापयेत् । तुलामानभाण्डानि चावेक्षेत, पौतवापचारात् ।
(२) परिमाणीद्रोणयोरर्धपलहीनातिरिक्तमदोषः । पलहीनातिरिक्ते द्वादशपणो दण्डः । तेन पलोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(३) तुलायाः कर्षहीनातिरिक्तमदोषः । द्विकर्षहीनातिरिक्ते षट्पणो दण्डः । तेन कर्षोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(४) आढकस्यार्धकर्षहीनातिरिक्तमदोषः । कर्षहीनातिरिक्ते त्रिपणो दण्डः । तेन कर्षोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(५) तुलामानविशेषाणामतोऽन्येषामनुमानं कुर्यात् ।
व्यापारियों से प्रजा की रक्षा
( १ ) बाजार के अध्यक्ष ( संस्थाध्यक्ष ) को चाहिए कि वह, पुराने अन्न आदि के तथा दुकानदारों के स्वाधिकृत ( स्वकरण विशुद्ध ) माल के आयातनिर्यात का यथोचित प्रबन्ध करे । उसका यह भी कर्त्तव्य है कि तराजू, बाट और माप के वर्त्तनों का भी वह अच्छी तरह निरीक्षण करे, जिससे माप-तौल में कोई गड़बड़ी न होने पावे ।
( २ ) परिमाणी और द्रोण में यदि आधा पल कम-ज्यादा हो जाय तो कोई बात नहीं; किन्तु एक पल कम-ज्यादा होने पर बारह पण दण्ड दिया जाय । पल की कमी-ज्यादा के अनुसार ही दण्ड की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
( ३ ) तराजू में यदि एक कर्ष कम-ज्यादा हो तो कोई हर्ज नहीं । यदि दो कर्ष कम-ज्यादा निकले तो छह पण दण्ड दिया जाय । इसी प्रकार कर्ष के अनुपात से दण्ड वृद्धि समझनी चाहिए ।
( ४ ) आढक में यदि आधे कर्ष की कमी-वेशी हो तो कोई बात नहीं । यदि कमीवेशी एक कर्ष की तो तीन पण दण्ड दिया जाय । इसी अनुपात से दण्ड बढाया जाय ।
( ५ ) जिस तुला तथा माप की कमी-वेशी के संबन्ध में नहीं कहा गया है उनकी भी यही दण्ड-व्यवस्था समझनी चाहिए ।
प्र० ७७ : अ० २ ] व्यापारियों सम्बन्धी नियम ३५३
(१) तुलामानाभ्यामतिरिक्ताभ्यां क्रीत्वा हीनाभ्यां विक्रीणानस्य त एव द्विगुणा दण्डाः ।
(२) गण्यपण्येष्वष्टभागं पण्यमूल्येष्वपहरतः षण्णवतिर्दण्डः ।
(३) काष्ठलोहमणिमयं रज्जुचर्ममृन्मयं सूत्रवल्करोममयं वा जात्यमित्यजात्यं विक्रयाधानं नयतो मूल्याष्टगुणो दण्डः ।
(४) सारभाण्डमित्यसारभाण्डं, तज्जातमित्यतज्जातं, राधायुक्तमुपधियुक्तं समुद्गपरिवर्तिमं वा विक्रयाधानं नयतो हीनमूल्यं चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः, पणमूल्यं द्विगुणः, द्विपणमूल्यं द्विशतः । तेनार्घवृद्धौ दण्डवृद्धिर्व्याख्याता ।
(५) कारुशिल्पिनां कर्मगुणापकर्षमाजीवं विक्रयक्रयोपघातं वा सम्भूय समुत्थापयतां सहस्रं दण्डः ।
(६) वैदेहकानां वा सम्भूय पण्यमवरुन्धतामनर्घेण विक्रीणतां क्रीणतां वा सहस्रं दण्डः ।
( १ ) जो बनिया अधिक वजन के तराजू-बाट से माल खरीद कर हल्के तौल से उसे बेचे उसको दुगुना २४ पण दण्ड दिया जाय ।
( २ ) गिनकर बेची जाने वाली चीजों में बनिया यदि आठवाँ हिस्सा चुरा ले तो उस पर छियानवे पण जुरमाना किया जाय ।
( ३ ) जो बनिया लकड़ी, लोहा, मणि, रस्सी, चमड़ा, मिट्टी, सूत, छाल और ऊन से बने हुए घटिया माल को बढ़िया कह कर रखता या बेचता हो उस पर वस्तु की कीमत का आठ गुना जुरमाना किया जाय ।
( ४ ) बनावटी कस्तूर, कपूर आदि वस्तुओं को असली कह कर; दूसरे देश में पैदा हुई कमसल वस्तु को असली देश की बताकर; चमकदार बनावटी मोती को को; मिलावटी वस्तु को; अच्छे माल की पेटी को दिखाकर रद्दी माल की पेटी को देने पर; व्यापारी को चौवन पण दण्ड दिया जाय । यदि वह माल एक पण मूल्य का हो तो पहिले से दुगुना दण्ड और दो पण कीमत का हो तो दो-सौ पण दण्ड दिया जाय । इसी प्रकार अधिक मूल्य के माल पर अधिक दण्ड किया जाय ।
( ५ ) जो लुहार, बढ़ई आदि कारीगर आर्डर के अनुसार कार्य न करें, एक पण की जगह दो पण मजदूरी लें, किसी वस्तु को बेचते समय अधिक दाम और खरीदते समय कम दाम कहकर खरीद फरोख्त में विघ्न डालें, उनमें से प्रत्येक को एक-एक हजार पण दण्ड दिया जाय ।
( ६ ) जो व्यापारी आपस में मिलकर किसी वस्तु को बेचने से रोक दें और फिर उसी वस्तु को अनुचित मूल्य पर बेचें या खरीदें उनमें प्रत्येक को एक एक हजार पण जुरमाना किया जाय ।
२३ कौ०
| ३५४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) तुलामानान्तरमर्घवर्णन्तरं वा । धरकस्य मायकस्य वा पणमूल्या-दष्टभागं हस्तदोषेणाचरतो द्विशतो दण्डः । तेन द्विशतोत्तरा दण्डवृद्धि-र्व्याख्याता ।
(२) धान्यस्नेहक्षारलवणगन्धभैषज्यद्रव्याणां समवर्णोपधाने द्वादश-पणो दण्डः ।
(३) यन्निस्सृष्टमुपजीवेयुः, तदेषां दिवससञ्जातं सङ्ख्याय वणिक् स्थापयेत् । क्रेतृविक्रेतोरन्तरपतितमदायादन्यं भवति । तेन धान्यपण्य-निचयांश्चानुज्ञाताः कुर्युः । अन्यथानिश्चितमेषां पण्याध्यक्षो गृह्णीयात् । तेन धान्यपण्यविक्रये व्यवहरेतानुग्रहेण प्रजानाम् ।
(४) अनुज्ञातक्रयादुपरि चैषां स्वदेशीयानां पण्यानां पञ्चकं शतमाजीवं स्थापयेत् । परदेशीयानां दशकम् । ततः परमर्घं वर्धयतां क्रये विक्रये वा भावयतां पणशते पञ्चपणाद् द्विशतो दण्डः । तेनार्घवृद्धौ दण्डवृद्धिर्व्या-ख्याता ।
( १ ) तुला, बाट और मूल्य में अन्तर हो जाने के कारण जो लाभ हो उसे बही-खाते में दर्ज कर लिया जाय । तोलने वाला या मापने वाला अपने हाथ की सफाई से यदि एक पण मूल्य की वस्तु में आठवाँ हिस्सा कम कर दे तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिक हिस्सा कम कर देने पर अधिक दण्ड की व्यवस्था की जाय ।
( २ ) अनाज, तेल, खार, नमक, गन्ध और दवाइयों में कम कीमत की वस्तुओं को मिलाकर बेचने वाले पर बारह पण दण्ड किया जाय ।
( ३ ) दूकानदारों को प्रतिदिन जितना लाभ हो उसे बाजार का चौधरी (संस्था-ध्यक्ष) अपनी बही में गिनकर दर्ज कर ले । जिस वस्तु की खरीद-फरोख्त की व्यवस्था संस्थाध्यक्ष स्वयं करता है उसका लाभ राजकोष में जमा किया जाय । इस दृष्टि से व्यापारियों को उचित है कि वे संस्थाध्यक्ष की आज्ञा से ही धान्य आदि विक्रेय वस्तुओं का संचय करें । अनुमति न लेने पर संस्थाध्यक्ष को अधिकार है कि वह अनधिकृत वस्तुओं को अपने कब्जे में कर ले । संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह संगृहीत वस्तुओं के बिकने की ऐसी सुव्यवस्था करे, जिससे प्रजा का उपकार होता रहे ।
( ४ ) संस्थाध्यक्ष जिन वस्तुओं को बेचने की अनुमति दे, यदि वे वस्तुएँ स्वदेशी हों तो, उन पर व्यापारी नियत मूल्य से प्रति सैकड़ा पाँच पण लाभ ले सकता है । यदि वे विदेशी हों तो प्रति सैकड़ा दस पण लाभ ले । इससे अधिक मूल्य बढ़ाने तथा अधिक लाभ लेने पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिकाधिक लाभ पर अधिकाधिक दण्ड दिया जाय ।
प्र० ७७ : अ० २ ] व्यापारियों सम्बन्धी नियम ३५५
(१) सम्भूयक्रये चैषामविक्रीते नान्यं सम्भूयक्रयं दद्यात् । पण्योपघाते चैषामनुग्रहं कुर्यात् पण्यबाहुल्यात् ।
(२) पण्याध्यक्षः सर्वपण्यान्येकमुखानि विक्रीणीत । तेष्वविक्रीतेषु नान्ये विक्रीणीरन् । तानि दिवसवेतनेन विक्रीणीरन् अनुग्रहेण प्रजानाम् ।
(३) देशकालान्तरितानां तु पण्यानां—
प्रक्षेपं पण्यनिष्पत्तिं शुल्कं वृद्धिमवक्रयम् ।
व्ययानन्यांश्च संख्याय स्थापयेदर्घमर्घवित् ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे वैदेहकरक्षणं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदितोऽष्टसप्ततितमः ।
—: ० :—
( १ ) यदि संस्थाध्यक्ष से थोक भाव कर खरीदा हुआ माल न बिके तो दूसरे व्यापारियों को थोक भाव पर माल न दिया जाय । यदि आकस्मिक आपात के कारण किसी व्यापारी का माल नष्ट हो जाय तो संस्थाध्यक्ष दूसरा माल देकर उसकी सहायता करे ।
( २ ) संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह सारी विक्रेय वस्तुओं को किसी एक व्यापारी द्वारा बिकवाये । यदि एक व्यापारी के द्वारा वह न बिक सके तो अन्य व्यापारी उस तरह का माल न बेचें । उन वस्तुओं को दैनिक मजदूरी देकर इस ढंग से बिकवाया जाय, जिससे प्रजा का हित हो ।
( ३ ) संस्थाध्यक्ष को चाहिए कि वह दूसरे देश तथा दूसरे समय में उत्पन्न होने वाली वस्तुओं का मूल्य, बनवाई का समय, वेतन, ब्याज, भाड़ा, और इसी प्रकार के ऊपरी खर्चों को जोड़ कर ऐसा भाव तय करे, जिससे वे बिक जाँय ।
कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में वैदेहकरक्षण नामक
दूसरा अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७८ | ## उपनिपातप्रतीकारः |
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| अध्याय ३ |
(१) दैवान्यष्टौ महाभयानि—अग्निरुदकं व्याधिर्दुर्भिक्षं मूषिका व्यालाः सर्पा रक्षांसीति । तेभ्यो जनपदं रक्षेत् ।
(२) ग्रीष्मे बहिरधिश्रयणं ग्रामाः कुर्युः । दशकुलिसंग्रहेणाधिष्ठिता वा ।
(३) नागरिकप्रणिधावग्निप्रतिषेधो व्याख्यातः । निशान्तप्रणिधौ राजपरिग्रहे च ।
(४) बलिहोमस्वस्तिवाचनैः पर्वसु चाग्निपूजाः कारयेत् ।
(५) वर्षारात्रमनूपग्रामाः पूरवेलामुत्सृज्य वसेयुः । काष्ठवेणुनावश्चावगृह्णीयुः ।
(६) उह्यमानमलाबुदृतिप्लवगण्डिकावेणिकाभिस्तारयेयुः । अनभिसरतां द्वादशपणो दण्डः । अन्यत्र प्लवहीनेभ्यः ।
दैवी आपत्तियों से प्रजा की रक्षा के उपाय
( १ ) दैवयोग से होने वाली आठ महाविपत्तियों के नाम हैं : १. अग्नि, २. जल ३. बीमारी, ४. दुर्भिक्ष, ५. चूहे, ६. व्याघ्र, ७. सांप और ८. राक्षस । राजा को चाहिए कि इन महाविपदाओं से वह प्रजा की रक्षा करे ।
( २ ) आग से रक्षा : ग्रामवासियों को चाहिए कि गरमी की ऋतु में वे भोजन आदि की व्यवस्था घर से बाहर करें । अथवा दशकुली का रक्षक गोप नामक अधिकारी जिस स्थान को उपयुक्त बताये वहीं पर भोजन आदि की व्यवस्था करें ।
( ३ ) आग से बचने के उपाय नागरिक प्रणिधि नामक प्रकरण में बताये गये हैं । राजपरिग्रह के अन्तर्गत निशांत प्राणिधि नामक प्रकरण में भी अग्नि-रक्षा के उपाय बताये गए हैं ।
( ४ ) अग्नि-रक्षा के लिए पूर्णमासी आदि पर्व तिथियों पर बलि, होम और स्वस्तिवाचन द्वारा अग्नि की पूजा कराई जाय ।
( ५ ) पानी से रक्षा : नदी के किनारे बसे हुए ग्रामवासियों को चाहिए कि वर्षा ऋतु की रातों में वे घरों को छोड़कर दूर जा बसें । लकड़ी, बाँस के बेड़े और नाव आदि साधन हर समय वे संग्रह करके रखें ।
( ६ ) नदी के प्रवाह में बहते या डूबते हुए आदमी को तूंबी ( अलाबु ), मशक
प्र० ७८ : अ० ३ ] दैवी आपत्तियों का प्रतीकार ३५७
(१) पर्वसु च नदीपूजाः कारयेत् ।
(२) मायायोगविदो वेदविदो वर्षमभिचरेयुः ।
(३) वर्षाविग्रहे शचीनाथगङ्गापर्वतमहाकच्छपूजाः कारयेत् ।
(४) व्याधिभयमौपनिषदिकैः प्रतीकारैः प्रतिकुर्युः । औषधैश्चिकित्सकाः शान्तिप्रायश्चित्तैर्वा सिद्धतापसाः ।
(५) तेन मरको व्याख्यातः । तीर्थाभिषेचनं महाकच्छवर्धनं गवां श्मशानावदोहनं कबन्धदहनं देवरात्रिं च कारयेत् ।
(६) पशुव्याधिमरके स्थानान्यर्थनीराजनं स्वदैवतपूजनं च कारयेत् ।
(७) दुर्भिक्षे राजा बीजभक्तोपग्रहं कृत्वाऽनुग्रहं कुर्यात् । दुर्गसेतुकर्म वा भक्तानुग्रहेण । भक्तसंविभागं वा । देशनिक्षेपं वा । मित्राणि वा व्यपाश्रयेत । कर्शनं वमनं वा कुर्यात् ।
( दृति ), तमेड़ ( प्लव ), लकड़ या लकड़ी के बेड़े से बचाया जाय । जो व्यक्ति डूबते हुए आदमी को बचाने का यत्न न करे उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; किन्तु उसके पास यदि तैरने के उक्त साधन न हों तो उसको अपराधी न समझा जाय ।
( १ ) पूर्णमासी आदि पर्व तिथियों में नदियों की पूजा करायी जाय ।
( २ ) मंत्रविद् एवं अथर्व वेद के ज्ञाताओं से अतिवृष्टि की शान्ति के लिए जप, होम, यज्ञ आदि अनुष्ठान कराये जांय ।
( ३ ) वर्षा के शान्त हो जाने पर इन्द्र, गंगा, पर्वत और समुद्र की पूजा करायी जाय ।
( ४ ) बीमारी से रक्षा : औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा कृत्रिम बीमारियों को रोका जाय । अकृत्रिम बीमारियों को वैद्य लोग चिकित्सा द्वारा और सिद्ध एवं तपस्वी लोग शान्तिकर्म, व्रत, उपवास आदि अनुष्ठानों से दूर करें ।
( ५ ) हैजा, प्लेग, चेचक आदि संक्रामक व्याधियों को दूर करने के लिए भी इसी प्रकार के उपाय किये जायें । इसके अलावा गंगास्नान, समुद्रपूजन, श्मशान में गायों का दोहन, चावल तथा सत्तू से बने सिर रहित पुतले का श्मशान में दाह और रात्रि जागरण करके ग्राम देवता की पूजा आदि का उपाय किये जांय ।
( ६ ) यदि पशुओं में बीमारी या महामारी फैल जाय तो गाँव-गांव में रोगशांति के लिए शांतिकर्म करवाये जायें और पशुओं के अधिष्ठाता देवता, जैसे हाथी के सुब्रह्मण्य, घोड़ा के अश्विनी, गौ के पशुपति, भैंस के वरुण तथा बकरी के अग्नि आदि देवताओं की पूजा करायी जाय ।
( ७ ) दुर्भिक्ष से रक्षा : राज्य में दुर्भिक्ष पड़ जाने पर राजा की ओर से बीज और अन्न वितरण करके जनता पर अनुग्रह किया जाय । अथवा दुर्भिक्षपीड़ितों को
३५८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण
(१) निष्पन्नसस्यमन्यविषयं वा सजनपदो यायात् । समुद्रसरस्तटाकानि वा संश्रयेत । धान्यशाकमूलफलावापान् सेतुषु कुर्वीत । मृगपशुपक्षिव्यालमत्स्यारम्भान् वा ।
(२) मूषिकभये मार्जारनकुलोत्सर्गः । तेषां ग्रहणहिंसाया द्वादशपणो दण्डः । शुनामनिग्रहे च अन्यत्रारण्यचरेभ्यः ।
(३) स्नुहीक्षीरलिप्तानि धान्यानि विसृजेत् । उपनिषद्योगयुक्तानि वा । मूषिककरं वा प्रयुञ्जीत । शान्तिं वा सिद्धतापसाः कुर्युः । पर्वसु च मूषिकपूजाः कारयेत् ।
(४) तेन शलभपक्षिकृमिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(५) व्यालभये मदनरसयुक्तानि पशुशवानि प्रसृजेत् । मदनकोद्रवपूर्णान्यौदर्याणि वा ।
उचित वेतन देकर उनसे दुर्ग या सेतु आदि का निर्माण कराया जाय । काम करने में असमर्थ लोगों को केवल अन्न दिया जाय; अथवा उनको समीप के दूसरे दुर्भिक्ष रहित देश तक पहुँचाने का प्रबन्ध कर दिया जाय । अथवा मित्र राजा से सहायता ली जाय । अपने देश के धनवान् व्यक्तियों पर विशेष कर लगाकर तथा उनसे एकमुश्त रकम लेकर आपत्ति का प्रतीकार किया जाय ।
(१) या तो जो देश धन-धान्य संपन्न दीखे वहीं प्रजा सहित चला जाय । अथवा समुद्र के किनारे या बड़े-बड़े तालाबों के पास जाकर बसा जाय, जहाँ पर कि धान्य, शाक, मूल, फल आदि की खेती की जा सके । अथवा मृग, पशु, पक्षी, व्याघ्र और मछली आदि का शिकार कर प्राण-रक्षा की जाय ।
(२) चूहों से रक्षा : चूहों का उत्पात बढ़ जाने पर जगह-जगह बिल्ली और नेवला छोड़ दिए जायें । जो उनको पकड़े या मारे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । उन लोगों पर भी बारह पण दण्ड किया जाय, जो दूसरों का नुकसान करने वाले पालतू कुत्तों को रोक कर न रखें । जंगली कुत्तों को न पकड़ने पर कोई अपराध न माना जाय ।
(३) चूहों के प्रतीकार के लिए सेंहुड़ के दूध में साने हुए अनाज को या औपनिषदिक अधिकरण में निर्दिष्ट औषधियों से मिले हुए अनाज को इधर-उधर बखेर दिया जाय । अथवा चूहादानी द्वारा चूहों को पकड़ने का प्रबन्ध किया जाय । अथवा सिद्ध या तपस्वियों द्वारा चूहों को नष्ट करने के लिए शान्तिकर्म करवाये जांय । पर्व तिथियों पर मूषक-पूजा कराई जाय ।
(४) इसी के अनुसार कीट, पतङ्ग, पक्षी आदि द्वारा उत्पन्न उत्पातों का प्रतीकार कराया जाय ।
(५) व्याघ्र से रक्षा : व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं का भय बढ़ जाय तो औप-
प्र० ७८ : अ० ३ ] दैवी आपत्तियों का प्रतीकार ३५९
(१) लुब्धकाः श्वगणिनो वा कूटपञ्जरावापातैश्चरेयुः । आवरणिनः शस्त्रपाणयो व्यालानभिहन्युः । अनभिसर्तुर्द्वादशपणो दण्डः । स एव लाभो व्यालघातिनः ।
(२) पर्वसु च पर्वतपूजाः कारयेत् । तेन मृगपक्षिसङ्घग्राहप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(३) सर्पभये मन्त्रौषधिभिश्च जाङ्गलीविदश्चरेयुः । सम्भूय वोपसर्पान् हन्युः । अथर्ववेदविदो वाभिचरेयुः । पर्वसु च नागपूजाः कारयेत् । तेनोदकप्राणिभयप्रतीकारा व्याख्याताः ।
(४) रक्षोभये रक्षोघ्नान्यथर्ववेदविदो मायायोगविदो वा कर्माणि कुर्युः । पर्वसु च वितर्दिच्छत्रोल्लोपिकाहस्तपताकाच्छागोपहारैश्चैत्यपूजाः कारयेत् । चरूं वश्चराम इत्येवं सर्वभयेष्वहोरात्रं चरेयुः ।
निषदिक अधिकरण में निर्दिष्ट मदनसंयुक्त मृत-पशुओं की लाशें जङ्गल में छुड़वा दी जायें । अथवा धतूरा और जङ्गली कोदो ( कोहव ) को मिलाकर पशुओं की लाशों में भर कर उन्हें जङ्गल में रखवा दिया जाय ।
( १ ) व्याघ्र-विपत्ति को दूर करने के लिए शिकारी और बहेलिये गढों में छिप-कर उनको मारें । कवच पहिन कर हथियारों से बाघ को मारा जाय । बाघ आदि हिंसक पशुओं से घिरे हुए आदमी की जो सहायता न करे उसको बारह पण दण्ड किया जाय । जो व्याघ्र आदि का शिकार करे उसे बारह पण इनाम दिया जाय ।
( २ ) व्याघ्र आदि से रक्षा के लिए पर्व तिथियों पर पर्वतों की पूजा कराई जाय । अन्य जङ्गली पशु-पक्षियों के प्रतीकार के लिए भी यही नियम समझने चाहिएँ ।
( ३ ) साँप से रक्षा : मन्त्र तथा जड़ी-बूटियों को जानने वाले विषवैद्यों को चाहिए कि वे सर्प-भय का प्रतीकार करें । अथवा नगरवासी जहाँ भी साँप देखें उसको मार डालें । अथवा अथर्व वेद के ज्ञाता अभिचार क्रियाओं द्वारा सापों को मार डालें । सर्प-भय से बचने के लिए पर्व तिथियों पर उनकी पूजा की जाय । इसी प्रकार जलचर जीवों द्वारा होने वाले भयों का प्रतीकार समझना चाहिए ।
( ४ ) राक्षसों से रक्षा : राक्षसों का भय पैदा हो जाने पर तन्त्र और अथर्व वेद के ज्ञाता अभिचारक तथा मायायोग क्रियाओं द्वारा उसका प्रतीकार करें । कृष्ण चतुर्दशी तथा अष्टमी आदि पर्व तिथियों पर वेदी, छाता, खाद्य सामग्री, छोटी झंडी और बलि के लिए बकरा लेकर श्मशान भूमि में राक्षसों की पूजा करायी जाय । प्रत्येक भय पर ‘हम तुम्हारे लिए हवि पकाते हैं’ ( चरुं वश्चरामः ), इस प्रकार कहते हुए दिन-रात घूमें ।