गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
प्रारंभिक जीवन-चरित्र एवं छुड़ानी धाम महिमा
गरीबदास जी की बानी
[ जीवन चरित्र सहित ]
[ All Rights Reserved ]
[ कोई साहिब बिना इजाजत के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते ]
मुद्रक एवं प्रकाशक
बेलवोडियर प्रिंटिंग वर्क्स,
इलाहाबाद-२
[ मूल्य ८ रु०
Centre for the Study of
Developing Societies
29, Rajpur Road,
DELHI - 110 054.
गरीबदास जी की बानी
जीवन-चरित्र सहित
जिसमें
उन महात्मा की चुनी हुई अति कोमल और भक्ति बढ़ाने वाली
साखियाँ और पद शोध कर मुख्य मुख्य अंगों और रागों
के अनुसार रक्खे गये हैं और गूढ़ शब्दों के अर्थ
व संकेत भी भक्तों की कथा के साथ नोट
में लिख दिये गये हैं।
[ कोई साहेब बिना इजाज़त के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते ]
(All Rights Reserved.)
⁂
प्रकाशक
बेलविडियर प्रिंटिंग वर्क्स
इलाहाबाद
सन् १६६६ ] [ मूल्य ... ]
जीवन-चरित्र
———
महात्मा गरीबदास जी मौजा छुड़ानी तहसील झज्जर जिला रोहतक (पञ्जाब)
में बैसाख सुदी पूनो सम्बत १७७४ बिक्रमी मुताबिक ईसवी सन् १७१७ को प्रगट हुए।
वह जाति के जाट धनखड़े या दलाल गोत्र के थे और पेशा जमींदारी का करते थे।
अपने घर मौजा छुड़ानी ही में सतसंग खड़ा करके जीवों को चेताते रहे और सारी
उमर गृहस्थ में रह कर ६१ बरस की उमर में भादों सुदी २ विक्रमी संबत १८३५ मुताबिक
ईसवी सन् १७७८ को चोला छोड़ा। इस हिसाब से जान पड़ता है कि गरीबदास जी
और महात्मा चरनदास जी एक ही समय में बिराजमान थे—चरनदास जी के जन्म से
चौदह बरस पीछे यह प्रगट हुए और उनके चोला छोड़ने से चार बरस पहिले गुप्त हुए।
गरीबदास जी के दो लड़की और चार लड़के थे। बाजे कहते हैं कि उनके बेटों
ही में से एक गद्दी पर बैठा और बाजों का कथन है कि उनके गुरमुख चेले सलोतजी ने
गद्दी पाई। जो हो पर इस वक्त तो यही रिवाज है कि औलाद ही को महन्ती मिलती
है और वह गृहस्थ ही में रहा करते हैं।
गरीबदास जी पूरी साध गति के थे और उन्हों ने कबीर साहब को अपना गुरु
धारन किया। कबीर साहब अनुमान तीन सौ बरस इनके पहिले हुए थे लेकिन गरीबदास
जी से उन का मेला होने की बाबत कितनों का तो विश्वास है कि सुपने में दर्शन हुए और
उपदेश मिला और कुछ लोग कहते हैं कि बारह बरस की उमर में गरीबदास जी मौजा
छुड़ानी में पौहे चरा रहे थे कि कबीर साहब प्रगट हुए और एक छोटी भैंस को जो कभी
गाभिन नहीं हुई थी दिखला कर कहा कि इस का दूध हम को पिलाओ। गरीबदास जी
ने जवाब दिया कि यह दूध नहीं देती जिस पर कबीर साहब बोले कि देखो तो सही
जरूर देगी। गरीबदास जी ने ज्योंही हाथ लगाया उस छोटी भैंस के थन से दूध टपकने
लगा। यह चमत्कार देख कर गरीबदास जी को कबीर साहब के समरथ होने का
विश्वास हुआ और उन के चरनों पर गिर कर उपदेश लिया। पहली कथा जियादा
समझ में आती है।
बाईस बरस की उमर में गरीबदास जी ने एक ग्रन्थ रचना शुरू किया जिस में
सत्तरह हजार चौपाई और साखी उनकी हैं और उसी के साथ कबीर साहब की सात
हजार साखियाँ शामिल की हैं उन्हीं सत्तरह हजार कड़ियों में से इस पुस्तक के अंग और
कड़ियां चुन कर छापी गई हैं।
गरीबदास जी के पन्थ के बहुत से लोग हैं और अब तक उनका बंस भी मौजूद
है। मौजा छुड़ानी में फागुन सुदी दसमी को एक बड़ा मेला गरीबदासियों का उन
महात्मा जी का जारी किया हुआ अब तक होता है।
गरीबदास जी की बाबत बहुत से चमत्कार मशहूर हैं लेकिन वह सब लिखने के
लायक नहीं हैं, सिर्फ दो एक चुनकर लिखे जाते हैं—
( २ )
(१) एक साल सूखा पड़ा। सेवकों ने प्रार्थना की तो आप ने दया से ऐसी मौज
की कि खूब मेंह बरसा। यह चर्चा दिल्ली में वादशाह के कान तक पहुँची। बादशाह पर
उसी समय में एक दुशमन ने चढ़ाई की थी इस लिये बादशाह ने बड़े आदर और
सत्कार से बहुत से हाथी और सवार भेजकर गरीबदास जी को बुलाया। इन्होंने
जलूस को तो लौटा दिया और आप सादी चाल से एक घोड़ी पर चढ़ कर पाँच सेवकों
के साथ दिल्ली पहुँचे। और महात्मा चरनदास जी के स्थान पर ठहर कर वहाँ से पैदल
बादशाह के यहाँ गये। बादशाह ने दीनता से दुशमन से बचाने के लिये बिनती की।
महात्मा जी बोले कि अगर तुम तीन बातें छोड़ दो तो दुशमन तुम्हारा बाल बाँका न कर
सकेगा—एक तो गोबध, दूसरे अनाज पर कर, तीसरे बहुत सी बेगमों का रखना। इस
पर बादशाह के दरबारियों ने बादशाह को भड़काया कि यह फकीर हिन्दू है और अपने
मत के जाल में हुजूर को भी फँसाया चाहता है। बादशाह ने उन नादानों की सलाह में
आकर गरीबदास जी को मय उन के सेवकों के कैदखाने में तीन तालों में बन्द कर
दिया। पहरेवाले ने ताने से कहा कि देखें तो अगर सच्चे फकीर हो तो बन्दीखाने से
निकल जाव। कुछ देर बाद महात्माजी ने ऐसी मौज की कि तीनों दरवाजे और ताले
खुल गये और वह अपने सेवकों के साथ निकल कर अपने स्थान को वापस
आये। अगले दिन जब बादशाह को खबर हुई तो वह लज्जित हुआ और फिर दोबारा
उनको बुलाया पर वह नहीं आये। फिर बादशाह ने पाँच गाँव की जागीर देनी चाही
उसके लेने से भी उन्होंने इनकार किया।
(२) मौजा आसोध जिला रोहतक के एक साहूकार का इकलौता बेटा संतोषदास
गरीबदासजी की महिमा सुन कर उनका चेला हुआ और कुछ दिन बाद उस की प्रार्थना
पर उन्हों ने उसे साधू बना लिया। यह सुन कर उस के बाप को बड़ा क्रोध आया और
गरीबदासजी के स्थान पर जाकर बहुत भला बुरा कह कर बोला की तू ने मेरे बेटे को
तो साधू बना लिया है अब उसकी घरवाली तेरी बहिन का क्या हाल होगा। महात्मा जी
ने उसके कटु बचन के जवाब में बहुत कोमलता से कहा कि अगर तुम अपनी पतोहू को
मेरी बहिन बनाते हो तो वह मेरी बहिन ही हो कर रहेगी। महात्मा जी के मुख से यह
बचन निकलते ही उस औरत को मौजा आसोध में बैराग आया और अपनी चूड़ी
वगैरह फोड़ कर साधुनी बन गई और गरीबदास जी की सेवा में रहने लगी।
और कथायें बहुत सी मशहूर हैं मगर मामूली सिद्धि शक्ति की हैं जो गरीबदास
जी सरीखे साध गुरु की अपरम्पार महिमा को नहीं लखातीं।
गरीबदास जी के पहिनने का जामा और बँधी हुई पगड़ी और धोती जूता और
लोटा और कटोरी और पलंग अब तक मौजा छुड़ानी में उनकी समाध के स्थान पर
मौजूद हैं जहाँ लोग दर्शन को जाते हैं।
सूचीपत्र
विषय पृष्ठ नं०
१—बंदना ... १
२—चेतावनी का अंग ... १
३—गुरुदेव का अंग ..... ६
४—सुमिरन का अंग ..... १८
५—भक्ति का अंग ..... २७
६—बिनती का अंग ... ३०
७—कुसंगत का अंग ... ४२
८—संगत का अंग ... ४४
९—बैराग का अंग ..... ४८
१०—लै का अंग ... ५०
११—साँच का अंग ... ५३
१२—विचार का अंग ... ५७
१३—जरना का अंग ... ६३
१४—निश्चय का अंग ... ७०
१५—साध महिमा का अंग ... ७७
१६—राग-धुनि ... ८२
१७—पारख का अंग ... ८४
१८—ब्रह्म बेदी ... ८६
१९—सुलच्छन कुलच्छन ... ९१
२०—सवैया .... ९२
२१—रेखता .... १००
२२—झूलना ... १०४
२३—अरिल ... ११३
२४—बैत ... १२२
२५—रमैनी ... १२७
२६—आरती ... १३१
२७—राग कल्यान ... १३६
२८—राग बिजोग ... १३६
२९—राग परज ... १३६
३०—राग मंगल ... १४३
३१—राग बंगला ... १४६
३२—राग रामकली ... १५४
३३—राग असावरी ... १५८
३४—राग बिलावल ..... १६६
३५—राग काफी .... १८५
गरीबदास जी की बानी
बंदना
नमो नमो सतपुरुष कूँ, नमस्कार गुरु कीन्ह ।
सुर नर मुनि जन साधवा, संतन सर्बस दीन्ह ॥
सतगुरु साहब संत सब, डंडौत औ परनाम ।
आगे पीछे मद्ध हूँ, तिन्ह पर जा कुरवान ॥
निराकार निर्विषयं, काल जाल भय-भंजनं ।
निर्लेपं निज निर्गुनं, अकल अनूपं सुन धुनं ॥
सोहं सुरत समायतं, सकल समाना निरत लै ।
उजल हिरंबर१ हर दमं, बेपरवाह अथाह है ॥
वार पार नहिं मद्धतं ॥
चेतावनी का अंग
पानी की इक बूँद सूँ साज बनाया जीव ।
अंदर बहुत अंदेस था बाहर बिसरा पीव२ ॥ १ ॥
पानी की इक बूँद सूँ आज बनाया साँच ।
राखनहारा राखिया जठर अगिन की आँच ॥ २ ॥
पानी की इक बूँद सूँ साज बनाया साँच ।
कौड़ी बदले जात हैं कंचन साटे३ काँच ॥ ३ ॥
पानी की इक बूँद सूँ साज बनाया सोध ।
तू जग में पंडित भया पढ़ा अठरहो बोध ॥ ४ ॥
धरनीधर जाना नहीं कीन्हा कोटि जतन ।
जल से साज बनाय कर मानुस किया रतन ॥ ५ ॥
(१) हिरन्मय, निर्विकार । (२) पुराणों में कथा है कि जब प्राणी गर्भ में आता है तब
उसे ईश्वर का निरंतर दर्शन होता है और ईश्वर से प्रार्थना किया करता है कि इस
मलाशय से मुझे बाहर कीजिये मैं प्रतिदिन आपका ध्यान किया करूँगा परन्तु बाहर आते
ही संसार की माया से अज्ञानी होकर उसको भूल जाता है । (३) साथ ।
२ गरीबदास जी की बानी
धरनोधर जाना नहीं जिन्ह सिरजा जल बूँद ।
गुलजारा दरसै नहीं चसमैं फिर गई धूँध ॥ ६ ॥
धरनोधर जाना नहीं जिन्ह सिरजा जल बूँद ।
नाड़ी सहज सँवारि कर लाया नख सिख गूँद ॥ ७ ॥
धरनीधर जाना नहीं जिन्ह सिरजा तन साज ।
चेत सकै तो चेतिये बिगर जायगा काज ॥ ८ ॥
पानो की इक बूँद से अजब बनाया ख्याल ।
धरनीधर जाना नहीं आय पड़ा जम जाल ॥ ६ ॥
उरध मुखी जब रहे थे तल सिर ऊपर पाँव ।
राखनहारा राखिया जठर अगिन की लाव१ ॥१०॥
अस्थि चाम रग रोम सब किस ने कीया गूँध ।
उदर बीच पोषण किया बिन जननी के दूध ॥११॥
तुही तुही तुतकार थी जपता अजपा जाप ।
बाहर आकर भरमिया बहुत उठाये पाप ॥१२॥
तुही तुही तुतकार थी ररङ्कार धुन ध्यान ।
जिन्ह यह साज बनाया ताकूँ ले पहिचान ॥१३॥
वजू२ उरध मुख जपै था ररङ्कार धुन धीर ।
वा तालिब कूँ याद कर जिन्ह यह धरा सरीर ॥१४॥
वजू उरध मुख जपै था जोनी जिंद जहान ।
बाहर मूल गँवाइया पूजत है पाखान ॥१५॥
जठर अगिन से राखिया ना सांई गुन भूल ।
वह साहब दरहाल है क्यों बोवत है सूल ॥१६॥
आध घड़ी की अध घड़ी आध घड़ी की आध ।
साधू सेती गोसटी३ जो कीजै सो लाभ ॥१७॥
पाव घड़ी तो याद कर नीमाना सन४ खोय ।
सतगुरु हेला देत है बिषै सूल नहिं बोय ॥१८॥
(१) लवर । २) वजू = पंचस्नाना, जप । (३) बातचीत । (४) पूरा बरस ।
चेतावनी का अंग ३
अलिफ अलह कूँ याद कर कादिर कूँ कुरबान ।
साँई सेती तोड़ कर राखा अधम जहान ॥१९॥
अलिफ अलह कूँ याद कर जिन्ह कीन्हा यह साज ।
उस साहब कूँ याद कर पाला१ जल बिन नाज ॥२०॥
संसारी में आन कर कहा किया रे मूढ़ ।
सूआ सेमर सेइया लागे डोंड़े टूट ॥२१॥
सूआ सेमर सेइया बारह बरस बिसास२।
अंत चोंच खाली पड़ी डोंड़े बीस कपास ॥२२॥
सूआ सेमर सेइया ऐसे नर या देंह ।
जम किंकर तुझ लेगया मुख में देकर खेह ॥२३॥
आदि समय चेता नहीं अंत समय अँधियार ।
मद्ध समय माया रते पाकर लिये गँवार ॥२४॥
अंत समय बीतै घनी तन मन धरै न धीर ।
उस साहब कूँ याद कर जिन्ह यह धरा सरीर ॥२५॥
धूआँ का सा धौरहर बालू की सी भीत ।
उस खाविंद कूँ याद कर महल बनाया सीत ॥२६॥
धूआँ केरा धौरहर यह बालू का साज ।
उस खाविंद कूँ याद कर साजी गैब अवाज ॥२७॥
धूआँ केरा धौरहर बालू जेहा भेव ।
गैबी से गैबी मिलै तौ परसै दिल देव ॥२८॥
गैब अजाती पिंड में जा का गैबी नाँवँ ।
सुन्न सनेही जानिये मढ़ी महल नहिं ठावँ ॥२९॥
भगति हेत गृह बँधिया माटी महल मसान ।
तैं साहब जाना नहीं भूला मूढ़ जहान ॥३०॥
भगति हेत गृह बँधिया घन नामी घट माहिं ।
बिन सतगुरु की बंदगी साहब पावै नाहिं ॥३१॥
(१) पालन किया। (२) बिस्वास।
४ गरीबदास जी की बानी
भग्ति हेत गृह बँधिया घन नामी घट माहिं।
साधू जन सेये बिना साँई पावै नाहि॥३२॥
भग्ति हेत काया धरी घन नामी घट बीच।
नीब लगै नहिं नारियर भावैं परमल सींच॥३३॥
यह माटी का महल है तासे कैसा नेह।
जो साँई मिल जात हैं तौ पारायन देह॥३४॥
यह माटी का महल है खाक मिलेगा धूर।
साँई के जाने बिना गदहा कुत्ता सूर१॥३५॥
यह माटी का महल है छार मिलै छिन माहिं।
चार सकस२ काँधे धरे मरघट कूँ ले जाहिं॥३६॥
जार बार तन फूँकिया होगा हाहाकार।
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु कहैं पुकार॥३७॥
जार बार तन फूँकिया मरघट मंडन माँड।
या तन की होरी बनी मिटी न जम की डाँड॥३८॥
जार बार तन फूँकिया मेटा खोज खलील३।
तू जानै मैं रहूँगा यहाँ तो कछू न ढील॥३६॥
जार बार तन फूँकिया फोकट मिटे फिराक४।
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु बोलै साख॥४०॥
जार बार कोइला किया होगया मरघट राख।
छाँड़े महल मँड़ेरिया५ क्या कौड़ी धन लाख॥४१॥
चढ़ कर तुरँग कुदावते और पालकी फील६।
ते नर जंगल जा बसे जम कूँ फेरा लील॥४२॥
अरब खरब लौं द्रव्य है उदय अस्त बिच जाह७।
बिन साँई की बंदगी डूब मुए दह८ माँह॥४३॥
(१) सुअर। (२) आदमी। (३) एक भक्त जिनके विषय में कथा है कि बादशाह ने
जीते जी आग में जला देना चाहा पर भगवत की दया से चिता फूल की क्यारी बन गई।
(४) बियोग। (५) मँड़ई। (६) हाथी। (७) मर्तबा। (८) कुंड।
चेतावनी का अंग ५
अरब खरब लौं द्रव्य है रावत१ कोटि अनंत ।
नाहक जग में आइया जिन्ह सेये नहिं संत ॥४४॥
माया हुई तो क्या हुआ भूल रहा नर भूत ।
पिता कहैगा कौन कूँ तू बेस्या का पूत२ ॥४५॥
काया माया काल हैं बिन साहब के नावाँ ।
चेत सकै तो चेतिये बिन संतों नहिं दावाँ ॥४६॥
ऐसा अंजन आँजिये सूझे त्रिभुवनराय ।
काम धेनु अरु कलप बृछ घटही माँझ लखाय ॥४७॥
जोनी संकट मेटहूँ जो बिसरै नहिं मोहिं ।
जिन्ह संसारी चित धरी नहीं छुड़ाऊँ वोहि ॥४८॥
लख चौरासी बंध तैं सतगुरु लेत छोड़ाय ।
जे उर अंतर नाम है जोनी बहुरि न जाय ॥४६॥
सब माया के ख्याल हैं सब माया के चोज ।
बिन साँईं की बन्दगी जंगल हैगा रोज३ ॥५०॥
महसूदी४ चौतार नर खासे दहरे खूब ।
अंत मसाने जा बसे बिना भग्ति महबूब ॥५१॥
जोनी संकट मेटहूँ देहूँ निःचल बास ।
उर अंतर में राखहूँ जम की नहीं तिरास ॥५२॥
जो जन हमरी सरन है जा का हूँ मैं दास ।
भग्ति अनाहद बन्दगी अनँत लोक परकास ॥५३॥
बेमुख प्रानी जाहिंगे दोजख दुन्द बहीर५ ।
वा कूँ नर नहिं सुमिरते जिन्ह यह धरा सरीर ॥५४॥
इस माटी के महल में मगन भया क्यों मूढ़ ।
कर साहब की बन्दगी उस साँईं कूँ ढूँढ़ ॥५५॥
(१) राजा । (२) एक संस्कृत ग्रन्थ में लिखा हैकि बिष्णु और महादेव के सम्बाद में
बिष्णु ने कहा था कि मेरी स्त्री लक्ष्मी हरजाई है और मेरा पुत्र कामदेव उन्मद है । (३)
रोना, बिलाप । (४) जिसको देख कर लोग सिहाते हैं । (५) कुल परिवार सहित ।
२
६ गरीबदास जी की बानी
इस माटी के महल में मन बाँधी विष पोट।
अहरन१ पर हीरा धरा ताहि सहै घन चोट ॥५६॥
काँचा हीरा किरच है नहीं सहै घन मार।
ऐसा मन यह है रहा लेखा ले करतार ॥५७॥
हीरा घन की चोट सहि साँचे कूँ नहि आँच।
वह दरगह२ में क्या कहै जाके सँग हैं पाँच३ ॥५८॥
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु हेला दीन।
बन बस्ती में ना रहै ले जाता जम बीन ॥५६॥
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु कहा पुकार।
बिना भगति छूटै नहीं बहु विधि जम की मार ॥६०॥
संतों सेतीं ओलने४ संसारी से नेह।
सो दरगह में मारिये सिर में देकर खेह ॥६१॥
भगति गरीबी बन्दगी संतों सेतीं हेत।
जिन्ह के निःचल बास है आसन दीजे सेत ॥६२॥
कुटिल बचन कूँ छाँड़ि दे मान मनी कूँ मार।
सतगुरु हेला देत जनि डूबै काली धार ॥६३॥
इस माटी के महल में नातर कीजै मोद।
राव रंक सब चलेंगे आपे कूँ ले सोध ॥६४॥
मात पिता सुत बंधवा देखें कुल के लोग।
रे नर देखत फूँकिये करते हैं सब सोग ॥६५॥
महल मँड़ेरी नीम सब चलै कौन के साथ।
कागा रौला हो रहा कछू न लागा हाथ ॥६६॥
गलतना गैबी चला माटी पिंडय जोख।
आया सो पाया नहीं अन आये कूँ रोक ॥६७॥
यह मन मंजन कीजिये रे नर बारंबार।
साईं से कर दोसती बिसर जाय संसार ॥६८॥
(१) निहाई। (२) दरबार। (३) पाँच दूत। (४) शिकायत।
चेतावनी का अंग ७
अंत समय को बात सुन तेरा संगी कौन ।
माटी में माटी मिलै पवनहिं मिलिहै पौन ॥६९॥
ये बादर सब धुंध के मन माया चितराम१।
दीखै सो रहता नहीं सप्तपुरी सब धाम ॥७०॥
जनम जनम को मैल है जनम जनम की घात ।
जड़ नर तोहि सूझै नहीं ले चला चोर बिरात ॥७१॥
जाते कूँ नर जान दे रहते कूँ ले राख ।
सत्त सब्द उर ध्यान धर मुख सूँ कूड़ न भाख ॥७२॥
निरबानी के नाम से हिल मिल रहना हंस ।
उर में करिये आरती कधी न बूड़ै बंस ॥७३॥
पंछी उड़ै अकास कूँ कित कूँ कीन्हा गौन ।
यह मन ऐसे जात है जैसे बुदबुद२ पौन ॥७४॥
धन संचै तो संत का और न तेरे काम ।
अठसठ तीरथ जो करै नाहीं संत समान ॥७५॥
धन संचै तो सील का दूजा परम सँतोख ।
ज्ञान रतन भाजन३ भरो असल खजाना रोक ॥७६॥
दया धर्म दो मुकट हैं बुद्धि बिबेक बिचार ।
हर दम हाजिर हूजिये सौदा त्यारंत्यार ॥७७॥
नाम अभय पद निरमला अटल अनूपम एक ।
यह सौदा सत कीजिये बनिजो बनिज अजेख ॥७८॥
यह संजम सैलान कर यह मन यह बैराग ।
मन बसती कितहो रहो लगे बिरह का दाग ॥७९॥
रंचक नाम सँभारिये परपंची कूँ खोय ।
अंत समय आनंद है अटल भगति देउँ तोय ॥८०॥
जा घट भगित बिलास है ता घट हीरा नाम ।
जो राजा पृथ्वी-पती ता घर मुख्ते४ दाम ॥८१॥
(१) नक्शबन्दी । (२) बुलबुला । (३) बरतन । (४) बहुत ।
ाना नाम है माल अजोख अपार।
यह सौदा सत कीजिये दुगुने तिगुने चार ॥८९॥
निरगुन निरमल नाम है अवगत नाम अबंच।
नाम रते सो धनपती और सकल परपंच ॥९०॥
ऐसे लाहा लीजिये संत समागम सेव।
सतगुरु साहब एक है तीनों अलख अभेव ॥९१॥
चेत सकै तो चेतिये कूकै संत सुमेर।
चौरासी कूँ जात है फेर सकै तो फेर ॥९२॥
मन माया की डुगडुगी बाजत है मिरदंग।
चेत सकै तो चेतिये जाना तुझे निहंग५ ॥९३॥
(१) इक्कीस हजार छः सौ स्वाँसा दिन रात में चलती है। (२) निर्मल। (३) मस्जिद।
(४) लाभ। (५) नंगा (बिना अंग के)।
Wait, in line 16: "खजाना" - standard ख, not ख़.
In line 9: "अंधे" or "अँधे"?
Look at line 9: "अंधे कूँ सूझै नहीं आगे जलै अँगीठ"
"अंधे" has an anusvara
गुरुदेव के अंग ६
नंगा आया जगत में नंगा ही तू जाय।
बिच कर ख्वाबी ख्याल है मन माया भरमाय ॥६४॥
फूँक फाँक फारिग किया कहीं न पाया खोज।
चेत सकै तो चेतिये ये माया के चोज१ ॥६५॥
नैना निरमल नूर के बैना बानी सार।
आरत अंजन कीजिये डारो सिर से भार ॥६६॥
गुरुदेव के अंग
पुर पट्टन पर लोक है अदली सतगुरु सार।
भगित हेत से उतरे पाया हम दीदार ॥ १ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला अललपच्छ२ की जात।
काया माया ना वहाँ नहीं पिंड नहि नात ॥ २ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला उजल हिरंबर आद।
भलका ज्ञान कमान का घालत है सर साध ॥ ३ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुन्न बिदेसी आप।
रोम रोम परकास है दे हीं अजपा जाप ॥ ४ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला मगन किये मुस्ताक।
प्याला प्रेम पिलाइया गगन मँडल गरगाप३ ॥ ५ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु की सैन।
उर अंतर परकासिया अजब सुनाये बैन ॥ ६ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु की सैल।
बजर पौरि पट खोल कर ले गया झीनी गैल ॥ ७ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के तीर।
सब संतन सिरताज है सतगुरु अदल कबीर ॥ ८ ॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के माँह।
सब्द सरूपी अंग है पिंड प्रान नहि छाँह ॥ ६ ॥
(१) बिलास। (२) एक आकाशी चिड़िया जो आकाश ही में अंडा देती है और अंडे
के पृथ्वी पर पहुँचने के पहले बच्चा निकल कर ऊपर को उड़ जाता है। (३) मतवाला।
१० गरीबदास जी की बानी
ऐसा सतगुरु हम मिला गलताना१ गुलजार ।
वार पार की मत नहीं नाहिं हलका नाह भार ॥१०॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के मंझ ।
अण्डों आनंद पोख ही बैन सुनाये कुंज२ ॥११॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के नाल ।
पीतम्बर ताखी३ धरयो बानी सब्द रसाल४ ॥१२॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के नाल ।
गमन किया परलोक से अललपच्छ की चाल ॥१३॥
ऐसा सतगुरु हम मिला सुरत सिंधु के नाल ।
ज्ञान जोग औ भगति सब दीन्हीं नजर निहाल ॥१४॥
ऐसा सतगुरु हम मिला बेपरवाह अबंध ।
परम हंस पूरन पुरुष रोम रोम रबि चंद ॥१५॥
ऐसा सतगुरु हम मिला है जिंदा जगदीस ।
सुन्न बिदेसी मिल गया छत्र मुकुट है सीस ॥१६॥
सतगुरु के लच्छन कहूँ मधुरे बैन विनोद ।
चार बेद षट सास्तर कहा अठारह बोध ॥१७॥
सतगुरु के लच्छन कहूँ अचल बिहंगम चाल ।
हम अमरापुर ले गया ज्ञान सब्द के नाल ॥१८॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तुरिया के रे तीर ।
सब विद्या वानी कहै छानै नीर अरु छीर ॥१९॥
जिंदा जोगी जगत-गुरु मालिक मुरसिद पीव ।
काल कर्म लागै नहीं संका नाह सींव५ ॥२०॥
जिंदा जोगी जगत गुरु मालिकै मुरसिद पीर ।
दुहूँ दीन झगड़ा मचा पाया नहीं सरीर६ ॥२१॥
(१) मतवाला। (२) कुंज चिड़िया अपने अंडे को बैठकर नहीं सेती बल्कि सुरत
से। (३) टोपी। (४) रसीला। (५) हद। (६) कहते हैं कि कबीर साहब के चोला छोड़ने
गुरुदेव के अंग ११
ऐसा सतगुरु हम मिला मालिक मुरसिद पीर।
मारा भलका¹ भेद से लगे ज्ञान के तीर ॥२२॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तेज पुँज के अंग।
झिलमिल नूर जहूर है रूप रेख नहिं रंग ॥२३॥
ऐसा सतगुरु हम मिला तेज पुंज की लोय²।
तन मन अरपों सीस हू होनी होय सो होय ॥२४॥
ऐसा सतगुरु हम मिला खोले बज्र किवार।
अगम दीप कूँ ले गया जहाँ ब्रह्म दरबार ॥२५॥
ऐसा सतगुरु हम मिला खोले बज्र कपाट।
अगम भूमि कूँ गम करी उतरे औघट घाट ॥२६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला मारी गाँसी सैन।
रोम रोम में सालती पलक नहीं है चैन ॥२७॥
सतगुरु भलका खैंच कर लाया बान जो एक।
साँस उभारे सालता पड़ा कलेजे छेक ॥२८॥
सतगुरु मारा बान कस कैबर³ गाँसी खैंच।
भरम करम सब जरि गये लई कुबुधि सब ऐंच ॥२६॥
सतगुरु आये दया कर ऐसे दीन-दयाल।
बंदि छोड़ाई बिरद⁴ सुनि जठर अगिन प्रतिपाल ॥३०॥
जठर अगिन से राखिया प्याया अमृत छीर।
जुगन जुगन सतसंग है समझ कुटिल बेपीर ॥३१॥
जोनी संकट मेटि हैं ऊरध मुख नहि आय।
ऐसा सतगुरु सेइये जम से लेत छुड़ाय ॥३२॥
पर उनके हिन्दू शिष्य चाहते थे कि शरीर को दाह करें और मुसलमान चाहते थे कि गाड़
दें परन्तु शरीर गुप्त हो गया और इस तरह आपस का झगड़ा निबट गया।
(१) कमान । (२) लौ । (३) काँटेदार गाँसी जो घुसने पर निकलती नहीं । (४) स्तुति
( चेतावनी की पहिली साखी का नोट देखो ) ।
१२ गरीबदास जी की बानी
जम जोरा जा से डरै धर्मराय के दूत।
चौदह१ कोर न चंपहीं सुन सतगुरु की कूत२ ॥३३॥
जम जोरा जा से डरै धर्मराय धर धीर।
ऐसा सतगुरु एक है अदली अदल कबीर ॥३४॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के अंक।
कागज लीरैं३ दरगह दईं चौदह कोर न चंप ॥३५॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के रेख।
अदली अदल कबीर है कुल के सतगुरु एक ॥३६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला पहुँचा बंक निदान।
नौका नाम चढ़ाय कर पार किये परवान ॥३७॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के माँह।
नौका नाम चढ़ाय कर ले राखे निज ठाँह ॥३८॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के बीच।
खेवट सब कूँ खेवता क्या उत्तम क्या नीच ॥३६॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं जीव।
ऐसा सतगुरु हम मिला ले परसाया पीव ॥४०॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं हंस।
ऐसा सतगुरु हम मिला अलख लखाया बंस ॥४१॥
माया का रस पीय कर फूट गये दोउ नैन।
ऐसा सतगुरु हम मिला बास दिया सुख चैन ॥४२॥
माया का रस पीय कर होगये डावाँडोल।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग दिया खोल ॥४३॥
माया का रस पीय कर होगये भूत खबीस।
ऐसा सतगुरु हम मिला भक्ति दई बकसीस ॥४४॥
(१) जम गिनती में १४ हैं। (२) बल। (३) धज्जियाँ—अर्थ यह है कि कर्म के
लेखे फट कर मालिक की दरगाह में दाखिल हो गये अब चौदह जम कोर नहीं
दबा सकते ।
गुरुदेव के अंग १३
माया का रस पीय कर फूट गये पट चार ।
ऐसा सतगुरु हम मिला लिये निसंक उधार ॥४५॥
माया का रस पीय कर डूब गये दुहुँ१ दीन ।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग परबीन ॥४६॥
माया का रस पीय कर भये सठ२ गारत गोर३ ।
ऐसा सतगुरु हम मिला परघट लिये बहोर ॥४७॥
सतगुरु कूँ क्या दीजिये देवे को कछु नाँय ।
सम्मन५ को साका४ किया सेऊ५ भेट चढ़ाय ॥४८॥
सिर साँटे६ की भगति है और कछू नहिं बात ।
सिर के साँटे पाइये अविगत अलख अनाद ॥४६॥
(१) हिंदू और मुसलमान । (२) शठ = दुष्ट । (३) सत्यानास । (४) साका = शोहरत
नाम । (५) सम्मन एक भक्त थे उनकी स्त्री जिसका नाम नेकी था और पुत्र जिसका नाम
सेऊ था यह दोनों भी पक्के भक्त थे । एक समय कबीर साहब अपने चेलों कमाल और
फ़रीद के साथ उनके स्थान पर पधारे । इन भक्तों के घर में न एक कौड़ी थी और न
अन्न । बेचारे घबराये कि किस तरह ऐसे महात्माओं का सम्मान करें । इधर उधर
माँगने गये कुछ नहीं मिला तब सेऊ की माँ ने अपने पति और पुत्र से कहा कि जाकर
कहीं अन्न की चोरी करो, पर दोनों पहिले तो रुके आखिर माता के समझाने से सेऊ
तैयार हो गया और बाप भी साथ हो लिया । सेऊ एक बनिये के घर में सेंध मार कर
घुसा और कुछ अन्न चुरा कर लाया । बाप ने जो बाहर खड़ा था अन्न को देख कर
कहा कि चोरी भी की तो इतना अन्न न लाये कि जिससे पूरा पड़े । इस पर सेऊ फिर
बनिये के घर में घुसा । बनिया जाग पड़ा और सेऊ को पकड़ लिया । सेऊ ने बिनती की
कि मेरा पिता बाहर खड़ा है मेरा पाँव बाँध कर डोरी अपने हाथ में रक्खो और मेरा
सिर सेंध के छेद से बाहर निकाल दो जिसमें मैं अपने पिता से दो बात कर लूँ क्योंकि
सबेरे तो मारा ही जाऊँगा । इस बात को बनिये ने मंजूर किया । सेऊ ने बाहर सिर
निकाल कर पिता से कहा कि तुरन्त मेरा सिर काट लो नहीं तो सबेरे जब पहिचाने
जायेंगे तो घर भर पकड़ा जायगा और साध सेवा में बिघ्न पड़ेगा । पिता ने ऐसा ही
किया और बेटे के सिर को काट कर घर में एक आले पर छिपा कर रख दिया और जो
अन्न चोरी का मिला था उससे सम्मन और नेकी ने भोजन बना कर कबीर साहब और
उनके दोनों चेलों के सामने धरा । कबीर साहब ने पूछा कि सेऊ कहाँ है वह भी आवे तो
हम भोग लगावें । सम्मन और नेकी जवाब देने में हिचकिचाये परन्तु अन्तरजामी कबीर
साहब ने सेऊ के सिर को मँगा कर अपना अमी रूपी प्रसाद उसके मुख में डाल कर
जिला दिया । (६) बदले ।
३
१२ गरीबदास जी की बानी
जम जोरा जा से डरे धर्मराय के दूत।
चौदह१ कोर न चंपहीं सुन सतगुरु की कूत२ ॥३३॥
जम जोरा जा से डरै धर्मराय धर धीर।
ऐसा सतगुरु एक है अद्ली अदल कबीर ॥३४॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के अंक।
कागज लीरैं३ दरगह दई चौदह कोर न चंप ॥३५॥
जम जोरा जा से डरै मिटे कर्म के रेख।
अद्ली अदल कबीर है कुल के सतगुरु एक ॥३६॥
ऐसा सतगुरु हम मिला पहुँचा बंक निदान।
नौका नाम चढ़ाय कर पार किये परवान ॥३७॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के माँह।
नौका नाम चढ़ाय कर ले राखे निज ठाँह ॥३८॥
ऐसा सतगुरु हम मिला भवसागर के बीच।
खेवट सब कूँ खेवता क्या उत्तम क्या नीच ॥३६॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं जीव।
ऐसा सतगुरु हम मिला ले परसाया पीव ॥४०॥
चौरासी की धार में बहे जात हैं हंस।
ऐसा सतगुरु हम मिला अलख लखाया बंस ॥४१॥
माया का रस पीय कर फूट गये दोउ नैन।
ऐसा सतगुरु हम मिला बास दिया सुख चैन ॥४२॥
माया का रस पीय कर होगये डावाँडोल।
ऐसा सतगुरु हम मिला ज्ञान जोग दिया खोल ॥४३॥
माया का रस पीय कर होगये भूत खबीस।
ऐसा सतगुरु हम मिला भक्ति दई बकसीस ॥४४॥
(१) जम गिनती में १४ हैं। (२) बल। (३) धज्जियाँ—अर्थ यह है कि कर्म के
लेखे फट कर मालिक की दरगाह में दाखिल हो गये अब चौदह जम कोर नहीं
दबा सकते।