गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
DevanagariHindipublished186 पृष्ठ
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ाना नाम है माल अजोख अपार।
यह सौदा सत कीजिये दुगुने तिगुने चार ॥८९॥
निरगुन निरमल नाम है अवगत नाम अबंच।
नाम रते सो धनपती और सकल परपंच ॥९०॥
ऐसे लाहा लीजिये संत समागम सेव।
सतगुरु साहब एक है तीनों अलख अभेव ॥९१॥
चेत सकै तो चेतिये कूकै संत सुमेर।
चौरासी कूँ जात है फेर सकै तो फेर ॥९२॥
मन माया की डुगडुगी बाजत है मिरदंग।
चेत सकै तो चेतिये जाना तुझे निहंग५ ॥९३॥
(१) इक्कीस हजार छः सौ स्वाँसा दिन रात में चलती है। (२) निर्मल। (३) मस्जिद।
(४) लाभ। (५) नंगा (बिना अंग के)।
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In line 9: "अंधे" or "अँधे"?
Look at line 9: "अंधे कूँ सूझै नहीं आगे जलै अँगीठ"
"अंधे" has an anusvara