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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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४ गरीबदास जी की बानी
भग्ति हेत गृह बँधिया घन नामी घट माहिं।
साधू जन सेये बिना साँई पावै नाहि॥३२॥
भग्ति हेत काया धरी घन नामी घट बीच।
नीब लगै नहिं नारियर भावैं परमल सींच॥३३॥
यह माटी का महल है तासे कैसा नेह।
जो साँई मिल जात हैं तौ पारायन देह॥३४॥
यह माटी का महल है खाक मिलेगा धूर।
साँई के जाने बिना गदहा कुत्ता सूर१॥३५॥
यह माटी का महल है छार मिलै छिन माहिं।
चार सकस२ काँधे धरे मरघट कूँ ले जाहिं॥३६॥
जार बार तन फूँकिया होगा हाहाकार।
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु कहैं पुकार॥३७॥
जार बार तन फूँकिया मरघट मंडन माँड।
या तन की होरी बनी मिटी न जम की डाँड॥३८॥
जार बार तन फूँकिया मेटा खोज खलील३।
तू जानै मैं रहूँगा यहाँ तो कछू न ढील॥३६॥
जार बार तन फूँकिया फोकट मिटे फिराक४।
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु बोलै साख॥४०॥
जार बार कोइला किया होगया मरघट राख।
छाँड़े महल मँड़ेरिया५ क्या कौड़ी धन लाख॥४१॥
चढ़ कर तुरँग कुदावते और पालकी फील६।
ते नर जंगल जा बसे जम कूँ फेरा लील॥४२॥
अरब खरब लौं द्रव्य है उदय अस्त बिच जाह७।
बिन साँई की बंदगी डूब मुए दह८ माँह॥४३॥


(१) सुअर। (२) आदमी। (३) एक भक्त जिनके विषय में कथा है कि बादशाह ने
जीते जी आग में जला देना चाहा पर भगवत की दया से चिता फूल की क्यारी बन गई।
(४) बियोग। (५) मँड़ई। (६) हाथी। (७) मर्तबा। (८) कुंड।