गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी का अंग ५
अरब खरब लौं द्रव्य है रावत१ कोटि अनंत ।
नाहक जग में आइया जिन्ह सेये नहिं संत ॥४४॥
माया हुई तो क्या हुआ भूल रहा नर भूत ।
पिता कहैगा कौन कूँ तू बेस्या का पूत२ ॥४५॥
काया माया काल हैं बिन साहब के नावाँ ।
चेत सकै तो चेतिये बिन संतों नहिं दावाँ ॥४६॥
ऐसा अंजन आँजिये सूझे त्रिभुवनराय ।
काम धेनु अरु कलप बृछ घटही माँझ लखाय ॥४७॥
जोनी संकट मेटहूँ जो बिसरै नहिं मोहिं ।
जिन्ह संसारी चित धरी नहीं छुड़ाऊँ वोहि ॥४८॥
लख चौरासी बंध तैं सतगुरु लेत छोड़ाय ।
जे उर अंतर नाम है जोनी बहुरि न जाय ॥४६॥
सब माया के ख्याल हैं सब माया के चोज ।
बिन साँईं की बन्दगी जंगल हैगा रोज३ ॥५०॥
महसूदी४ चौतार नर खासे दहरे खूब ।
अंत मसाने जा बसे बिना भग्ति महबूब ॥५१॥
जोनी संकट मेटहूँ देहूँ निःचल बास ।
उर अंतर में राखहूँ जम की नहीं तिरास ॥५२॥
जो जन हमरी सरन है जा का हूँ मैं दास ।
भग्ति अनाहद बन्दगी अनँत लोक परकास ॥५३॥
बेमुख प्रानी जाहिंगे दोजख दुन्द बहीर५ ।
वा कूँ नर नहिं सुमिरते जिन्ह यह धरा सरीर ॥५४॥
इस माटी के महल में मगन भया क्यों मूढ़ ।
कर साहब की बन्दगी उस साँईं कूँ ढूँढ़ ॥५५॥
(१) राजा । (२) एक संस्कृत ग्रन्थ में लिखा हैकि बिष्णु और महादेव के सम्बाद में
बिष्णु ने कहा था कि मेरी स्त्री लक्ष्मी हरजाई है और मेरा पुत्र कामदेव उन्मद है । (३)
रोना, बिलाप । (४) जिसको देख कर लोग सिहाते हैं । (५) कुल परिवार सहित ।
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