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गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)

Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished186 पृष्ठ

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गरीबदास जी की बानी
बंदना
नमो नमो सतपुरुष कूँ, नमस्कार गुरु कीन्ह ।
सुर नर मुनि जन साधवा, संतन सर्बस दीन्ह ॥
सतगुरु साहब संत सब, डंडौत औ परनाम ।
आगे पीछे मद्ध हूँ, तिन्ह पर जा कुरवान ॥
निराकार निर्विषयं, काल जाल भय-भंजनं ।
निर्लेपं निज निर्गुनं, अकल अनूपं सुन धुनं ॥
सोहं सुरत समायतं, सकल समाना निरत लै ।
उजल हिरंबर१ हर दमं, बेपरवाह अथाह है ॥
वार पार नहिं मद्धतं ॥
चेतावनी का अंग
पानी की इक बूँद सूँ साज बनाया जीव ।
अंदर बहुत अंदेस था बाहर बिसरा पीव२ ॥ १ ॥
पानी की इक बूँद सूँ आज बनाया साँच ।
राखनहारा राखिया जठर अगिन की आँच ॥ २ ॥
पानी की इक बूँद सूँ साज बनाया साँच ।
कौड़ी बदले जात हैं कंचन साटे३ काँच ॥ ३ ॥
पानी की इक बूँद सूँ साज बनाया सोध ।
तू जग में पंडित भया पढ़ा अठरहो बोध ॥ ४ ॥
धरनीधर जाना नहीं कीन्हा कोटि जतन ।
जल से साज बनाय कर मानुस किया रतन ॥ ५ ॥


(१) हिरन्मय, निर्विकार । (२) पुराणों में कथा है कि जब प्राणी गर्भ में आता है तब
उसे ईश्वर का निरंतर दर्शन होता है और ईश्वर से प्रार्थना किया करता है कि इस
मलाशय से मुझे बाहर कीजिये मैं प्रतिदिन आपका ध्यान किया करूँगा परन्तु बाहर आते
ही संसार की माया से अज्ञानी होकर उसको भूल जाता है । (३) साथ ।