गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ गरीबदास जी की बानी
धरनोधर जाना नहीं जिन्ह सिरजा जल बूँद ।
गुलजारा दरसै नहीं चसमैं फिर गई धूँध ॥ ६ ॥
धरनोधर जाना नहीं जिन्ह सिरजा जल बूँद ।
नाड़ी सहज सँवारि कर लाया नख सिख गूँद ॥ ७ ॥
धरनीधर जाना नहीं जिन्ह सिरजा तन साज ।
चेत सकै तो चेतिये बिगर जायगा काज ॥ ८ ॥
पानो की इक बूँद से अजब बनाया ख्याल ।
धरनीधर जाना नहीं आय पड़ा जम जाल ॥ ६ ॥
उरध मुखी जब रहे थे तल सिर ऊपर पाँव ।
राखनहारा राखिया जठर अगिन की लाव१ ॥१०॥
अस्थि चाम रग रोम सब किस ने कीया गूँध ।
उदर बीच पोषण किया बिन जननी के दूध ॥११॥
तुही तुही तुतकार थी जपता अजपा जाप ।
बाहर आकर भरमिया बहुत उठाये पाप ॥१२॥
तुही तुही तुतकार थी ररङ्कार धुन ध्यान ।
जिन्ह यह साज बनाया ताकूँ ले पहिचान ॥१३॥
वजू२ उरध मुख जपै था ररङ्कार धुन धीर ।
वा तालिब कूँ याद कर जिन्ह यह धरा सरीर ॥१४॥
वजू उरध मुख जपै था जोनी जिंद जहान ।
बाहर मूल गँवाइया पूजत है पाखान ॥१५॥
जठर अगिन से राखिया ना सांई गुन भूल ।
वह साहब दरहाल है क्यों बोवत है सूल ॥१६॥
आध घड़ी की अध घड़ी आध घड़ी की आध ।
साधू सेती गोसटी३ जो कीजै सो लाभ ॥१७॥
पाव घड़ी तो याद कर नीमाना सन४ खोय ।
सतगुरु हेला देत है बिषै सूल नहिं बोय ॥१८॥
(१) लवर । २) वजू = पंचस्नाना, जप । (३) बातचीत । (४) पूरा बरस ।