गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी का अंग ७
अंत समय को बात सुन तेरा संगी कौन ।
माटी में माटी मिलै पवनहिं मिलिहै पौन ॥६९॥
ये बादर सब धुंध के मन माया चितराम१।
दीखै सो रहता नहीं सप्तपुरी सब धाम ॥७०॥
जनम जनम को मैल है जनम जनम की घात ।
जड़ नर तोहि सूझै नहीं ले चला चोर बिरात ॥७१॥
जाते कूँ नर जान दे रहते कूँ ले राख ।
सत्त सब्द उर ध्यान धर मुख सूँ कूड़ न भाख ॥७२॥
निरबानी के नाम से हिल मिल रहना हंस ।
उर में करिये आरती कधी न बूड़ै बंस ॥७३॥
पंछी उड़ै अकास कूँ कित कूँ कीन्हा गौन ।
यह मन ऐसे जात है जैसे बुदबुद२ पौन ॥७४॥
धन संचै तो संत का और न तेरे काम ।
अठसठ तीरथ जो करै नाहीं संत समान ॥७५॥
धन संचै तो सील का दूजा परम सँतोख ।
ज्ञान रतन भाजन३ भरो असल खजाना रोक ॥७६॥
दया धर्म दो मुकट हैं बुद्धि बिबेक बिचार ।
हर दम हाजिर हूजिये सौदा त्यारंत्यार ॥७७॥
नाम अभय पद निरमला अटल अनूपम एक ।
यह सौदा सत कीजिये बनिजो बनिज अजेख ॥७८॥
यह संजम सैलान कर यह मन यह बैराग ।
मन बसती कितहो रहो लगे बिरह का दाग ॥७९॥
रंचक नाम सँभारिये परपंची कूँ खोय ।
अंत समय आनंद है अटल भगति देउँ तोय ॥८०॥
जा घट भगित बिलास है ता घट हीरा नाम ।
जो राजा पृथ्वी-पती ता घर मुख्ते४ दाम ॥८१॥
(१) नक्शबन्दी । (२) बुलबुला । (३) बरतन । (४) बहुत ।