गरीबदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर परम्परा एवं अमर ग्रन्थ)
Garibdas Ji Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त गरीबदास जी छुड़ानी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ गरीबदास जी की बानी
इस माटी के महल में मन बाँधी विष पोट।
अहरन१ पर हीरा धरा ताहि सहै घन चोट ॥५६॥
काँचा हीरा किरच है नहीं सहै घन मार।
ऐसा मन यह है रहा लेखा ले करतार ॥५७॥
हीरा घन की चोट सहि साँचे कूँ नहि आँच।
वह दरगह२ में क्या कहै जाके सँग हैं पाँच३ ॥५८॥
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु हेला दीन।
बन बस्ती में ना रहै ले जाता जम बीन ॥५६॥
चेत सकै तो चेतिये सतगुरु कहा पुकार।
बिना भगति छूटै नहीं बहु विधि जम की मार ॥६०॥
संतों सेतीं ओलने४ संसारी से नेह।
सो दरगह में मारिये सिर में देकर खेह ॥६१॥
भगति गरीबी बन्दगी संतों सेतीं हेत।
जिन्ह के निःचल बास है आसन दीजे सेत ॥६२॥
कुटिल बचन कूँ छाँड़ि दे मान मनी कूँ मार।
सतगुरु हेला देत जनि डूबै काली धार ॥६३॥
इस माटी के महल में नातर कीजै मोद।
राव रंक सब चलेंगे आपे कूँ ले सोध ॥६४॥
मात पिता सुत बंधवा देखें कुल के लोग।
रे नर देखत फूँकिये करते हैं सब सोग ॥६५॥
महल मँड़ेरी नीम सब चलै कौन के साथ।
कागा रौला हो रहा कछू न लागा हाथ ॥६६॥
गलतना गैबी चला माटी पिंडय जोख।
आया सो पाया नहीं अन आये कूँ रोक ॥६७॥
यह मन मंजन कीजिये रे नर बारंबार।
साईं से कर दोसती बिसर जाय संसार ॥६८॥
(१) निहाई। (२) दरबार। (३) पाँच दूत। (४) शिकायत।