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भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)

Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary

महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं भुशुण्डि-गरुड़ संवाद पीठिका

भुशुण्डि रामायण
तृतीय भाग
(पश्चिम-उत्तर खंड)
संपादक
डॉ० भगवती प्रसाद सिंह
प्राक्तन आचार्य तथा अध्यक्ष हिन्दी विभाग
गोरखपुर विश्वविद्यालय
सहसंपादक
पं० रामाधार शुक्ल, साहित्याचार्य
अ. सा. मं.
अवध साहित्य मंदिर, गोरखपुर

प्रकाशक :
अवध साहित्य मंदिर
३५-बेतिया हाता
गोरखपुर-२७३००१
© डॉ० भगवती प्रसाद सिंह
इस पुस्तक का प्रकाशन उत्तर-प्रदेश संस्कृत अकादमी के
आर्थिक सहयोग से किया गया है।
मूल्य ७५.००
मुद्रक :
रत्ना प्रिंटिंग वर्क्स
B 21/42 A, कमच्छा, वाराणसी

BHUŚUNDI RĀMĀYANA
PART III (PASCHIM-UTTAR KHAND)
Edited by :
Dr. B. P. SINGH
Retd. Professor & Head
Department of Hindi
Gorakhpur University
Co-Editor :
Pt. Ramadhar Shukla
Sahityacharya
अ. सा. मं.
AVADH SAHITYA MANDIR
GORAKHPUR, INDIA

Avadh Sahitya Mandir
35, Betiahata
Gorakhpur-273001
© Dr. Bhagwati Prasad Singh
This book is published with the financial assistance
from the Uttara Pradesh Sanskrit Academy
Price 75.00
Printed by :
Ratna Printing Works
B21/42 A, Kamacha, Varanasi.

आमुख

भुशुण्डि रामायण के तृतीय तथा अन्तिम भाग को रामकथारसिको एवं अनुसंधित्सुओ
के लिए सुलभ होते देखकर मै अपार संतोष का अनुभव कर रहा हूँ । इस ग्रंथके उद्धार हेतु
निरन्तर तीस वर्षों तक किये गये विनम्र प्रयास की सफलता मेरी अकथनीय आत्म-तृप्ति का
कारण बनी है—'क्लेशः फलेन ही पुनर्नवतां विधत्ते'। विषम भौतिक परिस्थितियों और
पग-पग पर आनेवाली बाधाओ के शमन मे भगवदनुग्रह ही हमारा संबल रहा है । वह जिन
माध्यमों से अवतरित हुआ उनमे उत्तर प्रदेश संस्कृत-अकादमी एवं उसके वर्तमान निदेशक श्री
धर्मनारायण त्रिपाठी अविस्मरणीय हैं। इनके द्वारा प्रदत्त आर्थिक सहयोग से इस ग्रन्थ की
प्रकाशन यात्रा का पथ प्रशस्त हुआ । मुद्रणकार्य को ग्रन्थ के गौरवानुकूल सम्पन्न करने मे
रत्ना प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी के स्वत्वाधिकारी श्रीविनयशंकर पण्ड्या ने जिस उदारता और
धैर्य का परिचय दिया उसका 'आभार' अनुभव की वस्तु है 'प्रदर्शन' की नही ।

अब दो शब्द इस भाग के कथात्मक तथा तत्त्वात्मक वैशिष्ट्य के सम्बन्ध मे--
पूर्ववर्ती दक्षिण खंड के प्रतिपाद्य विषय का अनुशीलन करने से यह स्पष्ट हो गया होगा
कि उसके अन्तिम अध्यायो मे वर्णित रामाश्वमेध-अनुष्ठान, सीता का भूमिप्रवेश तथा राम की
दिव्यधाम यात्रा के साथ ही परम्परागत रामकथा समाप्त हो जाता है। अतः जहाँ तक राम की
लाकलीला का सम्बन्ध ह उसके पश्चात् कुछ भा कहने को शेष नहीं रह जाता । किन्तु पौरा-
णिक शैली मे विरचित रामायणो का उद्देश्य मात्र राम का जीवनयात्रा से सम्बद्ध प्रसगो का
निर्देश नही रहा है। इस परम्परा के ग्रन्थो में उपबृंहण की प्रवृत्ति आद्योपान्त व्याप्त पाई जाती
है। प्रवाह मे बाधा की सम्भावना से जो प्रसंग मूलकथा मे संक्षेप में अथवा संकेत मात्र से
अभिव्यक्त किये गये थे उसकी परिसमाप्ति के अनन्तर परवर्ती खण्डों या काण्डों में उनका
विशद विवरण अथवा उनसे सम्बद्ध नये सूत्रों की उद्भावना आख्यान, अवान्तर-कथाओ आदि
के रूप में प्रस्तुत की जाती रही है ।

इसके अतिरिक्त रामकथा अध्यात्मसाधना का भो आधार एव प्रेरणा स्रोत होने से, युगीन
धर्मदर्शन के प्रचार-प्रसार के सशक्त माध्यम रूप मे भी प्रयुक्त होती रही है। साम्प्रदायिक
रामायणो की प्रशस्त परम्परा इसी का प्रसाद है । इस वैशिष्ट्य के कारण समय के साथ बदलते
हुए युगमानस की अन्तर्धाराओ के विकासात्मक अध्ययन के अक्षयकोष के रूप मे भी उसकी
प्रतिष्ठा रही है । वैष्णव-भक्ति-आन्दोलन के प्रभावस्वरूप दार्शनिक मतवादो के साथ भक्ति
विशेषत. प्रेमा भक्ति, के स्वरूप, महत्व एव साधना सम्बन्धी तत्त्वो का भी उसमे व्यापक
रूप से समावेश हुआ । इस प्रकार जन-जीवन से संपृक्त होने के कारण समकालीन आध्यात्मिक
विचारधाराओ, लोकविश्वासो एवं सामाजिक मान्यताओ से सपोषित रामकथा युगीन परिवेश
के अनुसार नये सांचे में ढलती और समकालीन जीवन को नवीन दिशानिर्देश करती रही है ।
लोक की साझेदारी होने से रामकथाकारो को अपनी व्यक्तिगत धारणाओ की अपेक्षा जनरुचि
को वरीयता देनी पड़ी । रामायण परम्परा के विकास और रामचरित के विस्तार मे यह

( २ )
तत्त्व सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ । रामकथा के मूलस्रोत वाल्मीकीय रामायण तथा उसके
आदर्श पर निर्मित परवर्ती रामायणो के कथातत्त्व की मीमासा करने पर यह तथ्य स्पष्ट हो
जाता है । उसकी अनन्तता तथा बहुआयामित्व का यही रहस्य है ।
अबतक प्राप्त रामायणों में भुशुण्डि रामायण सर्वाधिक विशद है । इसके अन्तर्गत छत्तीस
हजार श्लोको मे विस्तृत रामचरित को श्रीमद्भागवत मे वर्णित कृष्णलीला से जिस प्रकार
अनुरंजित किया गया है उसके पीछे पूर्वमध्यकालीन उत्तरभारतीय समाज मे व्याप्त कृष्णलीला-
सक्ति को आत्मसात् करने का सजग प्रयास लक्षित होता है । प्रस्तुत ग्रन्थ के असाधारण विस्तार
का यही मुख्य कारण है । पूर्व तथा दक्षिण खण्ड की भाँति ही पश्चिम और उत्तर खण्ड मे
वर्णित रामकथा के विस्तार मे सहायक एक अन्य तत्व है रामचरित तथा रामभक्ति से जुडे हुए
प्रसंगो का समावेश और उनका सविस्तर निरूपण । संक्षेप मे वे इस प्रकार हैं—
१. रामावतार के कारणो का निर्देश
२. राम जन्मोपाख्यान
३. सीता-जन्मोपाख्यान
४. सरयू-उत्पत्ति कथा
५ सहजोपाख्यान
६. वैवस्वतोपाख्यान
७. शिवगीता
८. कालदमनोपाख्यान
९. रामगीता
१०. प्रमोदवन अथवा महाधामवर्णन
इनके साथ ही पाठकों के मानस मे भक्तिभाव प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से कुछ नई
सामाग्री जोडी गई है । नीचे इसकी संक्षिप्त सूची दी जाती है—
१. रामनाम-महात्म्य
२. रामभक्ति का प्रवर्त्तन तथा प्रसार परम्परा
३. अयोध्या-सरयू-महात्म्य-वर्णन
४. कर्म, भक्ति, ज्ञान, तथा योग का स्वरूप निरूपण
५. ऽमाभक्ति की-सर्वश्रेष्ठता का प्रतिपादन
६ मानसो पूजा की विधि तथा महात्म्य
७. रामतीर्थों का विवरण
८. राम सम्बन्धी व्रतोत्सवो विशेषत रामनवमी का महात्म्य-वर्णन
९. रामकथा का संक्षेप मे वर्णन
१०. राम द्वारा अयोध्यावासियो को प्रबोधन
यह ध्यातव्य है कि परवर्ती रामायणों विशेषतः रामचरितमानस पर इसका गहरा
प्रभाव दिखाई देता है । कही-कही तो शब्दावली भी मिल जाती है । उदाहरणार्थ—

( ३ )
नहि भगवन् राम वासनानन्या विजृंभते ।
ऋते त्वच्चरणभोज धूलधूसरतां तनो ॥
एतावदेव नः प्रार्थ्यं नाथ जन्मनि जन्मनि ।
श्रीराम तव पादाब्जतललग्ना वयं सदा ॥
—भु० रा० उत्तरखण्ड ३३।१०,११
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहौं निर्वान ।
जनम-जनम रति रामपद यह वरदान न आन ॥
—रामचरित मानस, अयो० दो० २०४
यही स्थिति कथा प्रसंगों की भी है । राम के परधाम गमन का वृत्त इस दृष्टि से विशेष
उल्लेखनीय है । रामचरित मानस मे कथा का अन्त राम का भ्राताओं, पार्षदो तथा सेवकों
सहित सरयू तटस्थ ‘अमराई’ मे जाने के साथ होता है—
हनूमान भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ।
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए । गजरथ तुरग मँगावत भए ॥
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ शीतल अमराई ।
—रामचरितमानस, उत्तर० ५०।२,३,५
वाल्मीकीय तथा अध्यात्म रामायण मे राम के स्वर्गारोहण का जो वर्णन मिलता है
उसमे प्रास्थानिक कर्मोपरान्त वैदिक रीति से प्रज्वलित अग्निहोत्र और बाजपेय छत्र को आगे
करके ऋषि-ब्राह्मणों, शस्त्रशास्त्र, धनुषबाण, भाइयो, अन्तःपुर की स्त्रियों तथा भृत्यो के साथ
उनके सरयूतट पर जाने का उल्लेख है—
प्रभाताया तु शर्वर्या पृथुवक्षा महायशाः ।
रामः कमल पत्राक्षः पुरोधसमथाब्रवीत ।
अग्निहोत्र ब्रजत्वग्रे दीप्यमान सहद्विजैः ॥
बाजपेयातपत्रं च शोभमानं महापथ ॥
अध्यर्ध योजनं गत्वा नदी पश्चान्मुखाश्रिताम् ।
सरयूं पुण्यसलिला ददर्श रघुनन्दन ॥
—वा० रा० उत्तर० १०९।१,२; ११०।१
अग्निहोत्रं ब्रजत्वग्रे दीप्यमानं सहद्विजै ।
बाजपेयतपत्रं च शोभमान महापथे ।।
ततः सर्वाः प्रकृतयो हृष्टपुष्ट जन वृताः ।
गच्छन्तमन्वगच्छतं राघवगुण रंजित' ॥
ततो वसिष्ठोऽपि चकार सर्वप्रास्थानिकं कर्म महद्विधानात् ।
क्षौमाम्बरो दर्भपवित्रपाणि महाप्रयाणाय गृहीत बुद्धि ॥
वेदाश्च सर्वे धृत विग्रहाश्च ययुश्च सर्वे मुनयश्च दिव्याः ।
माता श्रुतीना प्रणवेन साध्वी ययौ हरिः व्याहृतिभिः समेता ॥

( ४ )
ततोऽतिदूरं नगरात्स गत्वा दृष्ट्वा नदी ता हरिनेत्रजाताम् ।
ननन्द रामः स्मृतपावनोऽतो ददर्शचाशेषमिदं हृदिस्थम् ॥
—अध्यात्म रा०, उत्तरकाण्ड ९।३८, ४१. ४८
किन्तु भुशुण्डिरामायण मे रामचतितमानस की भाँति ही लोकान्तरण के पूर्व राम के
सरयू तटस्थ आराम कुज अथवा 'अमराई' मे जाने का स्पष्ट निर्देश है—
जगाम सरयूतीरं वहत्त्रिविधि मारुतम् ।
आरामकुज शोभाढ्यम् हेमरत्नमया वनिम् ॥
तत्र गत्वा चिरं दध्यौ मायातीतं परं महः ।
वनोपवन शोभाढ्याम् सरयूतट भूमिगाम् ॥
—भु० रा०, उत्तरकाण्ड ५१।१७, १८, १९
ये तथ्य रामचरितमानसकार के भुशुण्डिरामायण से परिचय और एक सीमा तक
विवेकपूर्ण अनुसरण का सकेत देते हैं ।
अध्यात्म रामायण के प्रेरणा स्रोतो का विवेचन करते हुए डा० प्रबोधचन्द्र बागची
तथा रामचरित मानस के उपजीव्य साहित्य की मीमांसा के प्रसंग मे डा० वादवील ने उनके
आदर्श रूप मे किसी पूर्ववर्ती साम्प्रदायिक रामायण के अस्तित्व की संभावना व्यक्त की थी,
इसकी चर्चा हम पूर्वखण्ड की प्रस्तावना मे कर चुके हैं ( पृ० ४२, ४३ ) । यह एक सुखद
आश्चर्य है कि अब भुशुण्डि रामायण के प्रकाश मे आ जाने से उक्त मर्मज्ञ विद्वानो की धारणा
तथ्याश्रित प्रमाणित हो गयी है । विशेष रूप से इसलिए भी कि वैष्णवभक्ति के सिद्धान्त तथा
आचार पक्ष का इतना विशद एवं सूक्ष्म विवेचन किसी भी अन्य रामायण मे प्राप्त नहीं होता ।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अपनी कृतियों में उसका विवेक पूर्वक विनियोग सन्त परम्परा मे
प्रस्तुत ग्रंथ की व्यापक स्वीकृति का द्योतक है ।
इस महाग्रन्थ के प्राकट्य के मूल मे सर्वेश्वर की इच्छा ही सर्वोपरि है । निमित्त का यदि
कुछ अंशदान रहा है तो उसका संस्कारजन्य क्षुद्र अहंकार, अज्ञान एवं दुराग्रह, ऐसा मै अनुभव
करता हूँ । उदार अध्येता इसे भवग्रस्त जीव का स्वभाव मानकर क्षमा करें, यही प्रार्थना है ।
वसन्तोत्सव भगवती प्रसाद सिंह
सं० २०४१
साकेत, बेतियाहाता, गोरखपुर

विषय सूची
(अ) पश्चिम खंड
आमुख
१. भरत के पूछने पर लक्ष्मण द्वारा रामभक्ति की महिमा तथा प्रवर्तन-
परम्परा का वर्णन १-३
२. राम-सीता की प्रमोदवनलीला के समय लक्ष्मण की रक्षासेवा तथा वरप्राप्ति ४-६
३. भरत के प्रश्न पर लक्ष्मण द्वारा ज्ञान-भक्ति का स्वरूप निरूपण ७-८
४. प्रमोदवन-शोभा-वर्णन ९
५. प्रमोदवन-विहारी राम के अवतार ग्रहण के कारण, हिरण्याक्ष-हिरण्यक-
शिपु-वध; रावण का शिवाराधन, वर प्राप्ति तथा कैलाश उठाने का
प्रयास, नन्दीश्वर का शाप देना १०-१३
६. राम-जन्मोपाख्यान १४-१६
७. सीताजन्मोपाख्यान १७-१९
८. सीता की अष्ट नित्यसखियों का नदीरूप मे मिथिला मे अवतरण १९--२३
९. त्रियुगा की प्रादुर्भावकथा २३-२५
१०. कमलेश्वरी की प्रादुर्भावकथा २५-२९
११. गण्डकी की प्रादुर्भावकथा ३०-३१
१२. अघवारा की प्रादुर्भावकथा ३२-३३
१३. द्युम्ना की प्रादुर्भावकथा ३४-३६
१४. घोषवती की प्रादुर्भावकथा ३७-४०
१५. वनघोषा की प्रादुर्भावकथा ४१-४२
१६. स्वयं लक्ष्मी की प्रादुर्भावकथा ४३-४५
१७. कौशिकी की प्रादुर्भावकथा ४६-५१
१८. सीता जन्मोत्सव ५२-५९
१९. सीता जन्म के अवसर पर महादेव द्वारा स्तुति ५९-६१
२०. सीता जन्म के अवसर पर इन्द्र द्वारा स्तुति ६१-६३
२१. सीता जन्म के अवसर पर अग्नि द्वारा स्तुति ६३-६४
२२. यम कृत जानकी स्तुति ६५-६७
२३. निर्ऋति कृत जानकी-स्तुति ६७-६९
२४. वरुण कृत जानकी-स्तुति ६९-७१
२५. वायु कृत जानकी-स्तुति ७१-७३
२६. कुबेर कृत जानकीस्तुति ७४-७५
२७. सीता जन्मोत्सव के अवसर पर मिथिला का अलंकरण ७५-७६

( ६ )
२८. भरत की जिज्ञासा निवृत्ति हेतु लक्ष्मण द्वारा भूमिजा सीता के प्रति जनक-
सुनयना के अपत्य स्नेह का रहस्योद्घाटन ७७-७९
२९. शुकदेव द्वारा सीता-महिमा तथा नित्यलीलाभूमि प्रमोदवन का शोभावर्णन ८०-८५
३० सनत्कुमार द्वारा रामभक्ति, रामनाम तथा रामतत्व का महिमावर्णन ८५-८७
३१. प्रमोदवन-परत्व-वर्णन ८७-९१
३२. सनत्कुमार द्वारा राम के मुख्य-आविर्भाव स्थलो का वर्णन ९१-९२
३३. सरयू-उत्पत्ति-कथा ९३-९४
३४. सरयू-सहस्रनाम ९४-१०४
३५. सरयू-माहात्म्य १०५-१०६
३६ गंगा-विरजादि नदियों तथा लोपामुद्रादि देवियों का द्रवरूप मे सरयू मे
मिलना १०६-१०९
३७. मुनियों द्वारा सरयू-स्तवन १०९-११२
३८ वसिष्ठ की तपस्या से सन्तुष्ट सरयू का पृथ्वी पर अवतरण ११२-११६
३९. शिव द्वारा वैवस्वत मनु को ज्ञानोपदेश ११७-११९
४०. वैवस्वत का गृहत्याग तथा तप हेतु हिमालय-गमन का संकल्प ११९-१२२
४१. विवस्वान् द्वारा पुत्र से गृहस्थाश्रम का महत्ववर्णन, उसमे रहकर प्रजा
पालन का अनुरोध तथा भगवान् से प्राप्त तद्विषयक उपदेश का वर्णन १२२-१२६
४२ भगवान द्वारा विवस्वान् को आत्मविवेकोपदेश १२६-१३०
४३. भगवान द्वारा विवस्वान् को ज्ञानोपदेश । १३०-१३१
४४. भगवान् द्वारा विवस्वान को भक्तियोगोपदेश १३२-१३५
४५. विवस्वान् द्वारा अपने पुत्र वैवस्वत मनु को ब्रह्मज्ञानोपदेश के अनन्तर
प्रजापालन का निर्देश १३६
४६. ब्रह्मा द्वारा वैवस्तमनु को राजधर्मोपदेश, अयोध्या की राजधानी रूप मे
प्रतिष्ठा तथा इक्ष्वाकुवंश-विस्तार-वर्णन १३६-१३७
४७. वैवस्वत मनु की घोर तपश्चर्या, भगवान श्रीराम का आविर्भाव, मनु द्वारा
स्तुति तथा वरदान-प्राप्ति १३८-१३९
४८. अयोध्या तथा प्रमोदवन-महिमा-वर्णन १३९-१४०
४९. ब्रह्मा के अनुरोध से वसिष्ठ द्वारा सूर्यवंश की पौरोहित्य स्वीकृति १४१
५०. मनु की प्रार्थना पर वसिष्ठ द्वारा कठोर तपःसाधना तथा राम की प्रेरणा
से सरयू का आविर्भाव १४२-१४४
५१. मनु द्वारा वसिष्ठ तथा सरयू की स्तुति १४५-१४६
५२. वसिष्ठकन्या के रूप मे सरयू की अवतरण कथा १४७-१४८
५३. राम की वररूप मे प्राप्ति के लिए सरयू द्वारा तपस्या और योगानल मे
शरीर त्याग १४८-१५१
५४. पद्मगिरि की कन्या के रूप में सरयू का पुर्नजन्म, राम द्वारा वरण तथा
प्रमोदवनलीला में प्रवेश १५१-१५५

( ७ )
५५ कश्यप-अदिति का दशरथ-कौशल्या के रूप मे जन्मग्रहण, उनके पुत्ररूप
मे परात्पर ब्रह्म राम का अवतरण तथा प्रमोदवनलीलाधिष्ठात्री सहजा
का आविर्भाव १५६-१५९
५६. तत्वो द्वारा राम तथा सहजा की स्तुति १५९-१६३
५७. शुकदेव द्वारा प्रमोदवन-लीला-महात्म्य वर्णन १६३-१६५
५८. जनक के प्रश्न पर शुकदेव द्वारा सुखित-मालिका के पुत्र रूप मे राम के
आविर्भाव का वृत्तान्त वर्णन १६६-१७५
५९. शुकदेव द्वारा विवस्वान् के नन्दनगोप और प्रभा के राजिनी रूप मे
जन्म और उनकी पुत्री सहजा के रूप मे महालक्ष्मी के अवतरण का
वृत्तान्त वर्णन १७५-१७७
६०. प्रमोदवनलीला-श्रवण-महात्म्य १७७-१८०
६१. प्रमोदवनलीला मे सहजा का मान १८०-१८६
६२. सरयू के उत्तर-दक्षिणस्थ गोपप्रदेश मे राम और सहजा की बाललीला
का वर्णन १८७-१९३
६३. शिव द्वारा सहजा-महिमा-वर्णन १९४-१९६
६४. सहजा और राम की प्रमोदवनलीला का ध्यान वर्णन १९७-१९९
६५. वसिष्ठादि ऋषियों द्वारा रामस्तुति २००-२०२
६६. शिव द्वारा सहजा शक्ति के पारमार्थिक तथा यौगिक स्वरूप का वर्णन २०२-२०४
६७. गोपमहिषी राजिनी के प्रश्न पर शिव द्वारा सहजा की जनकपुत्री के रूप
मे अवतरण और उनकी तीन बहनों—ऊमिला, माडवी तथा श्रुतकीर्ति के
साथ महाराज दशरथ के पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के विवाह
का वृत्तान्त-कथन २०५-२१४
६८. विवाह के अनन्तर राम की युवराजपदप्राप्ति, रामराज्याभिषेक की
तैयारी, वनगमन, छाया-सीता का रावण द्वारा हरण, राम द्वारा लका
विजय, सीता की अग्निपरीक्षा, पुष्पक पर सीता, लक्ष्मण, हनुमान,
सुग्रीवादि भक्तों के साथ राम का अयोध्या प्रस्थान, भरद्वाज आश्रम
होते हुए नन्दिग्राम आगमन, अयोध्या प्रवेश, राम राज्याभिषेक, सीता का
गर्भ धारण आदि घटनाओं का तिथिनिर्देश सहित संक्षेप मे वर्णन २१५-२३७
६९. महजा-स्वरूपा सीता के साथ राम की प्रमोदवन तथा अन्य रसमयी
लीलाओ का शिवद्वारा राजिनी की जिज्ञासा निवृत्ति हेतु वर्णन २३७-२६०
७०. गोपिकाओं द्वारा सहजा स्वरूपधारिणी सीता तथा राम की गोपनीय
लीलाओं का दर्शन २६१-२६४
७१. शुकदेव की कृपा से जनक द्वारा सहजा का स्वरूप ज्ञान और उनके प्रति
वात्सल्य भाव प्राप्ति २६४-२६६
७२. सहजा-राम तत्व के परिज्ञान से जनक को विदेहत्व प्राप्ति, दिव्यचक्षुओं से
सीता के विराट् स्वरूप का दर्शन तथा स्तुति २६६-२६९

( ८ )
७३. सीता की बाल क्रीड़ा, उनके आविर्भाव से मिथिला की अपूर्व शोभावृद्धि,
सीता जन्मोत्सव-कथा श्रवण का फल २७०-२७३
(आ) उत्तर खण्ड
१. इन्द्र के नेतृत्व मे देवताओं का ब्रह्मलोकगमन और राम के अवतार
लीला संवरणार्थ निवेदन २७४-२७६
२. ब्रह्मा के स्मरण करने पर महाकाल का आगमन, ब्रह्मा का उसे अयोध्या
जाकर स्वयं भगवान राम से नित्यधामगमन की प्रार्थना करने का
आदेश देना २७७-२८०
३. महाकाल द्वारा राम से लोकलीलासंवरण विषयक ब्रह्मा का संदेश
निवेदन २८१-२८२
४. ब्रह्मा के आदेश से काल का पुनः अयोध्या आगमन, लक्ष्मण को प्रतिहार
रूप मे नियुक्त कर राम द्वारा काल से मंत्रणा, राम का सहसा अन्तर्धान
होना, काल का प्रमोदवन गमन, उसके रक्षक से युद्ध तथा पराजित होना २८२-२८५
५ काल का गंगा-गण्डकी संगमस्थ वसिष्ठाश्रम के निकट वन मे आखेट
क्रीडारत सीता सहित राम का दर्शन और क्षमायाचना पूर्वक स्तुति २८६-२८७
६. राम का काल को लीलासंवरण की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करने के लिए अपनी
मायाशक्ति प्रसारण का निर्देश २८८-२८९
७ दुर्वासा का रामदरबार मे आगमन और प्रतिहार रूप मे नियुक्त लक्ष्मण
से राम को अपने आने की सूचना देने का निर्देश, काल से मंत्रणारत
राम के पास लक्ष्मण का गमन २९०
८. राम का अदृष्टपूर्व भयानक रूप देखकर लक्ष्मण का मूर्च्छित होना, राम
का प्रकृत रूप मे पुनः स्थित होना और काल को विदा करना २९१-२९२
९ रामगीतारंभ, दुर्वासा की जिज्ञासा निवृत्ति हेतु राम द्वारा आत्मोद्धार
के साधनों का उपदेश २९२-२९४
१०. राम द्वारा नित्य तथा नैमित्तिक कर्मों का उपदेश २९५-२९९
११ राम द्वारा आत्मज्ञ पुरुषो द्वारा प्राप्य सम्बन्धरूपा तथा परमप्रेमरूपा परा-
भक्ति का उपदेश ३००-३०१
१२. राम द्वारा एकान्तिक भक्तों की जीवनचर्या का विवेचन ३०१-३०२
१३ वैष्णव संस्कार, वैष्णवाचार, वैष्णव व्रतोत्सव तथा वैष्णव तीर्थों का वर्णन ३०२-३१०
१४. राम भक्तों की मानसीपूजापद्धति का स्वरूप निरूपण ३११-३१२
१५. रामनवमी-जानकीनवमी व्रतानुष्ठान तथा प्रपत्ति महिमा ३१३-३१४
१६. योग के भेदोपभेदों सहित भक्तियोग का वैशिष्ट्य निरूपण ३१५-३१६
१७. गुणातीत पद-प्राप्ति के लिए तत्त्वज्ञान के विविध स्तरों की व्याख्या ३१७-३१९
१८. कर्म उपासना तथा ज्ञान की अपेक्षा भक्ति की विशिष्टता का रहस्य,
उसके व्याख्याकारों की परंपरा, वैष्णवाचार एवं साधना पद्धति का वर्णन
तथा जानकी नामाष्टकमहिमा का निरूपण ३१९-३२३

( ९ )
१९ संतों के लिए तीर्थाटन का महत्व, गृहस्थो की त्रिगुणात्मक कर्मव्यवस्था,
कर्म तथा ज्ञान मार्ग की अपेक्षा भक्तिसाधना का महत्व ३२४-३२५
२०. दुर्वासा के प्रबोधार्थ राम द्वारा अक्षरब्रह्म होते हुए भी भक्तों के परितोष-
हेतु पुरुषोत्तम रूप मे अतरंगा शक्तियों सहित रसमयी लीलाओं के आयो-
जन का औचित्य प्रतिपादन ३२६-३२७
२१. दुर्वासा की प्रार्थना पर राम द्वारा विराट् स्वरूप दिखाना, मुनि द्वारा
स्तुति और राम का पुनः द्विभुज रूप धारण करना, अष्टदशाध्यायी राम-
गीता की समाप्ति ३२८-३३२
२२. विदा होते समय वियोग व्यथा से पीड़ित दुर्वासा को निजधाम प्राप्ति के
साधनों का राम द्वारा उपदेश और आगामी सारस्वत कल्प मे नित्य
लीला मे स्थान देने का आश्वासन ३३२-३३४
२३ प्रेमविह्वल दुर्वासा का अयोध्या से प्रस्थान, राम तीर्थो का पर्यटन,
रामलीलागान, स्थितप्रज्ञ भाव से जीवनयापन तथा महर्षियो का
सत्संग करते हुए सारस्वत कल्प आने पर चन्द्रचूड़ा सखी के रूप मे
नित्यलीला प्रवेश ३३५-३३६
२४. वसिष्ठ, अगस्त्य, गौतम, याज्ञवल्क्य, भरद्वाज, शुकदेव, आंगिरस, मांडव्य,
आपस्तम्ब, शांडिल्य आदि असंख्य मुनियो का सखी रूप में राम सानिध्य
प्राप्ति ३३७-३३९
२५. दुर्वासा के विदा होने पर राम से प्रतिहार रूप मे अपने द्वारा किये गये
आज्ञोल्लघन अपराध के लिए दंड देने की लक्ष्मण की प्रार्थना, राम द्वारा
अवतार लीला का प्रयोजनकथन एवं उसके संवरण की घोषणा के साथ
लक्ष्मण को समाश्वासन ३३९-३५०
२६. राम द्वारा लक्ष्मण से अपने नित्यलीला धाम प्रमोदवन के ऐश्वर्य
का वर्णन और उसमे उन्हे मुख्यपरिकररूपेण ग्रहण करने का
आश्वासन ३५०-३५५
२७. राम से विदा होकर लक्ष्मण का अपने सरयू तटस्थ प्रासाद में गमन और
उद्विग्न-चित्त से लीलाप्रवेशतिथि की प्रतीक्षा ३५६
२८ राम दरबार मे उपस्थित होकर अयोध्या वासियों द्वारा रामचरित, राम-
नाम महिमा तथा राम की प्रकट-अप्रकट लीला का महात्म्य-गान ३५६-३६७
२९. राम द्वारा अयोध्या मे प्राणत्यागने वाले जीवमात्र के गरुड़ारूढ होकर
परमधाम प्राप्ति का रहस्योद्घाटन ३५८-३६०
३०. राम द्वारा अयोध्या तथा सरयू का महात्म्य वर्णन ३६०-३७२
३१. अयोध्यावासी दुष्पीति नामक चाडाल के यमपुरी से उद्धार का वृत्तांत ३७२-३७५
३२. राम द्वारा अयोध्या मे अनुष्ठानीय वर्षोत्सवों का महात्म्यवर्णन ३७६-३७७
३३. राम का अयोध्यावासियों को अपने साथ दिव्य विमानो से परमधाम ले
जाने का आश्वासन, लोकातरण का उद्देश्यकथन और विसर्जन ३७८-३७९

( १० )
३४. अयोध्यावासियों के प्रस्थान के पश्चात् राम द्वारा समागत गोपवृंद का
प्रबोधन और उन्हें प्रमोदवनलीला मे परिकररूप मे स्थान देने का
समाश्वासन ३७९-३८०
३५. ख्रिग नामक अन्त्यज के उद्धार की कथा ३८०-३८७
३६. रामराज्य की सुव्यवस्था एवं सम्पन्नता का वर्णन, राम तथा उनके तीनो
भाइयों के पुत्रों की विभिन्न प्रदेशो में राज्य संस्थापना और चिरकाल तक
धर्मसंस्थापना पूर्वक लोकपालन ३८८-३८९
३७. राम का सरयूतटवर्ती आरामकुंज गमन तथा सीता एवं परिकरों सहित
निवास ३९०-३९१
३८. राम द्वारा दिव्यधाम गमन की घोषणा और साथ चलने के लिये उत्सुक
प्रजावर्ग सहित जीवमात्र को सरयू तट पर आने का आवाहन, राम का
सीता, भ्राताओं, भ्रातृवधुओ, हनुमानादि सेवको, प्रजा तथा कीट
पतंगादि जंतुओ सहित सरयूस्नान के अनंतर दिव्य विमानों द्वारा
प्रमोदवन के लिए प्रस्थान ३९१-३९३
३९. राम के लोकान्तरणोपरात गोप-गोपियों की कालक्षेपव्यवस्था ३९४
४०. ब्रह्मा द्वारा प्रस्तुत ग्रंथ की वक्ता-श्रोता-परम्परा तथा महात्म्य वर्णन ३९५-३९६

श्री गणेशाय नमः । श्रीरामोजयति¹ ।
श्रीमदादिरामायणम्
पश्चिमखण्डः
प्रथमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच
एकदा भरतः श्रीमाञ्छ्रीमन्तं लक्ष्मणं प्रभुम् ।
शेषं संकर्षणं वीरं सुखासीनं शुचिस्मितम् ॥ १ ॥
श्रीमत्सीतानुजाकान्त श्रीरामभ्रातृसुन्दरम् ।
त्रैलोक्यसारं सुभगं² गौर हलधरं वरम् ॥ २ ॥
एकांस³धृतभूभारं श्रीरामपदसेवकम् ।
प्रावृषेण्यघनश्यामं मधुरोज्ज्वलविग्रहम् ॥
एकान्ते समुपागम्य भक्त्या नम्रोऽब्रवीदिदम् ॥ ३ ॥
भरत उवाच
स्वच्छन्दलील सर्वेश⁴ लक्ष्मण भ्रातृसत्तम ।
समस्ताधिकसौभाग्य नाममाहात्म्यपावन ॥ ४ ॥
एकान्तरामभक्तेश पृच्छामि त्वां महामते ।
सर्वतत्त्वं पर ब्रह्म परमानन्दलक्षणम् ॥ ५ ॥
त्रयीतत्त्वं सर्वगुह्यं श्रीराम इति कीर्तितम् ।
तस्यैव सकला लीलां विश्वसर्गादिलक्षणाः ॥
तत्प्रेमपात्रं परमं भवानेव न संशयः ॥ ६ ॥
न त्वां विना रमति जल्पति नो कदाचिन्नो वा कचिद्धसति तिष्ठति वा सजोषम् ।
शय्यासनाशनविहारविलासकादौ श्रीमान् विभाति भवतैव युतः प्रभुर्नः ॥ ७ ॥
त्वां मन्त्रयत्यविरतं पतिते विचारे प्राणाधिकस्त्वमसि तस्य सुहृत् सखा च ।
त्रैलोक्यभारमखिलं त्वयि न्यस्य रामः शेते सुखं जनकजासहितो विलासी ॥ ८ ॥
यत्कर्मवीर्यमतुलं त्रिजगत्सु वेत्तु कः कल्पते मुनिसुरासुरमानुषेषु ।
तस्य स्वरूपमखिलं खलु तत्त्वतस्त्वं जानासि राघवकुलोद्वह वीर बाहो ॥ ९ ॥
१. ' ' नास्ति-रीवां । २. शुभगं-रीवां । ३. एकांश-रीवां । ४. शर्वेश-रीवां ।

  • २ -
    सर्वे सहोदरपदस्य जुषो वयं स्म तस्योत्तमस्य पुरुषस्य रमेश्वरस्य ।
    भूयस्तथापि भवतैव वशीकृतात्मा विक्रीड़ितुं१ वितनुते भुवि राघवेन्द्रः ॥ १० ॥
    तत्कारणं किमपि लक्ष्मण भिन्नमेवं भाग्याधिकं प्रभुकृपाभरभाजनं यत् ।
    किंवा पुरा त्रिभुवनोत्तमसंविधाभिराराधितः स भगवान् रघुवंशरत्नः ॥ ११ ॥
    लक्ष्मण उवाच
    एवमेव यदात्थ त्वं भरत प्राणसम्मित ।
    श्रीरामस्य दयापात्रमहमेव विशेषतः ॥ १२ ॥
    अयं हि भगवान् साक्षाद्विश्वबीजप्रदः प्रभुः ।
    स्वयंशक्तिः स्वयंज्योतिः पूर्णपूर्णः परात्परः ॥ १३ ॥
    २तस्याहं परमः प्रेयान् मित्रं चैव सखा सुहृत् ।
    सर्वातिगः सर्वगुप्तः सर्वात्मा विश्वतः स्थितः ॥ १४ ॥
    प्रमोदवनलीलासु पर्यायोऽन्यरसालसः ।
    तस्य सर्वासु लीलासु सदा तिष्ठामि सन्निधौ ॥ १५ ॥
    लीलैव ममसर्वस्वं लीलैव मम जीवनम् ।
    अहं लीलारसाभिज्ञो जानकी हनुमाञ्छिवः ॥ १६ ॥
    भवांश्च भरत प्राज्ञ शत्रुहा च विभीषणः ।
    यावान् यस्याधिकारः स्यात्तावत्तस्य प्रदर्शयन् ॥ १७ ॥
    अवतारचरित्राणि मूलचारित्रमेव च ।
    कुरुते जानकीकान्तः स्वाच्छन्द्यरसनिर्भरः ॥ १८ ॥
    तत्राहमस्य परमः सचिवः सुहृच्च मित्रं जनश्च सुजनश्च दयालयश्च ।
    तत्कारणं जगति केवलमेतदेव श्रीजानकीचरणपङ्कज रेणुमात्रम् ॥ १९ ॥
    श्रीरामस्य प्रियाभक्तिर्भावरूपा सतां गतिः ।
    तद्रूपिणी स्वयं सीता सहजानन्दरूपिणी ॥ २० ॥
    सा सैव परमा तस्य रमा त्रैलोक्यसुन्दरी ।
    भक्ताना वैष्णवानां च सा गुरुः समुदीर्यते ॥ २१ ॥
    न तां विना भवेद्दीक्षा रामतत्त्वविभाविनी ।
    तया संसृज्यते लोकः पाल्यते ह्रियतेऽपि च ॥ २२ ॥
    सैव स्वयं राम इति भेदेन समुदीर्यते ।
    राममेव परात्परं परं ब्रह्म रसात्मकम् ॥ २३ ॥
    सीताराम इति ख्यातं त्रिषु वेदेषु कीर्तितम् ।
    न ब्रह्मा न भवो नेन्द्रो नान्ये च त्रिदिवौकसः ॥ २४ ॥
    १. विक्रीडितं-मधु०, रीवा ।
    २. तस्या हं वै प्रेयान्मित्रो सखाहं हि सुहृत्तथा-मधु०, बडौ० ।
  • ३ -
    तस्य तत्त्वं विजानन्ति इदमित्थंतया प्रभोः ।
    स्वच्छन्द एव लीलासु सर्वासु युगलात्मकः ॥ २५ ॥
    युग्मनामा युग्मकेलिर्युग्मभावविनोदवान् ।
    युग्मभूषाविलासाद्यो युग्मस्थानविलासकः ॥ २६ ॥
    युग्मजन्मा युग्मजल्पो युग्मप्रेक्षाविधायकः ।
    प्रभुरेष विलासीनः सदानन्दपयोनिधिः ॥ २७ ॥
    तन्नामामृतपानेन स्वस्थचित्ताः सनातनाः ।
    ऋषयः परमहंसाश्च बहवस्त्यक्तबान्धवाः ॥ २८ ॥
    श्रद्धावन्तो भक्तिवन्तो रामपादनिशेवकाः ।
    मुक्तिं गताः सद्गुरुभिर्ज्ञाततत्त्वाः सुकोविदाः ॥ २९ ॥
    स वै प्रपत्तिमात्रेण जनान् मोचयते भवात् ।
    शत्रुस्तवास्मीति वदन् मत्समः क्रियतेऽचिरात् ॥ ३० ॥
    प्रारब्धक्लेशहरिणी तस्य भक्तिर्निगद्यते ।
    न तच्चरणपाथोजप्रपत्त्या विशते विना ॥ ३१ ॥
    परे ब्रह्मणि स्वानन्दलीलारसविनोदिनि ।
    तल्लीलास्मृतिमात्रेण नरो भवति पावितः ॥ ३२ ॥
    कोटिगङ्गादितीर्थौघवाजपेयादिभिर्मखैः ।
    सा तस्य सहजानन्दविग्रहा स्वैरकेलिनी ॥ ३३ ॥
    नित्यलीला विनोदा च सुखप्राग्भारसम्पदा ।
    तस्याश्चरणपद्मोत्थप्रसादारुणरेणुभिः ॥ ३४ ॥
    पूतात्मा लभते रामं सच्चिदानन्दलक्षणम् ।
    रामभक्तिः स्वयं सीता तद्भक्तं विद्धि मामथ ॥ ३५ ॥
    तद्भक्तं हनुमन्तं च जानीहि पवनाङ्गजम् ।
    एवं प्रवर्तिता भक्तिर्भुवने रामतोषिणी ॥ ३६ ॥
    इति श्रीमदादिरामायणे ब्रह्मभुशुण्डसंवादे पश्चिमखण्डे¹भरतलक्ष्मणसंवादे
    प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
    ⁕
    १. पूर्वखण्डे (?) ब्रह्मभुशुण्डसंवादे—बड़ौ० ।

द्वितीयोऽध्यायः
भरत उवाच
कदा साऽऽराधिता देवी जानकी भवता प्रभो ।
यस्याः पदाम्बुजरजःप्रसादेन त्वया मुहुः ॥ १ ॥
अनन्यभक्तिः रामस्य प्राप्ता यानन्यगामिनी ।
अनन्यकरुणा चैव प्राप्ता यानन्यगामिनी ॥ २ ॥
लक्ष्मण उवाच
प्रमोदविपिने रामश्चिक्रीडे रासलीलया ।
ब्रह्मकल्पसहस्त्राणि स्वच्छन्दो निरवग्रहः ॥ ३ ॥
तावत्त्रैलोक्यभारं च मयि दध्रे स्वसम्मते ।
तामसानसुरान् सर्वान् दैत्यांश्चैवापि दानवान् ॥ ४ ॥
श्रीरामकेलिप्रत्यूहानहं जघ्ने तदाज्ञया ।
रामेण पाल्यमानाश्च धेनू रक्षितवानहम् ॥ ५ ॥
ता वै चतुर्वेदऋचो ज्ञानकर्मादिसाधिकाः ।
भक्तिरूपं वनं सद्यो विविशू रामपालिताः ॥ ६ ॥
तदाहं तस्य देवस्य लीलैकरसवर्तिनः ।
परिचर्यामकार्षं वै शयनासनभोजने ॥ ७ ॥
यथा यथा प्रभुस्तुष्येत्तथा कार्यं मया शनैः ।
प्रमोदवनलीलेशी सहजेयं तदाभवत् ॥ ८ ॥
या देवी जानकीत्यत्र कीर्तिता शुभनामिनी ।
कदाचिद्रासवलयेक्रीडन्तं व्रजशक्तिभिः ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा प्रियतमं देवी मानतप्ता बभूव ह ।
इतश्च श्रीरामचन्द्रो विरहव्याधिपीडितः ॥ १० ॥
तदाहं ऋतुराजस्य रूपं दध्रे मनोहरम् ।
रसालमञ्जरीयत्तमत्तभ्रमरनादितम् ॥ ११ ॥
मनोज्ञकोकिलालापकूजत्पुंस्कोकिलाकुलम् ।
मलयानिलसौरभ्यसम्पर्किद्रुमराजितम् ॥ १२ ॥
अनेकद्रुमसंदोहमञ्जरीरजसाकुलम् ।
कुञ्जमण्डपसानन्दनिकूजच्छुकसारिकम् ॥ १३ ॥
प्रसन्नसलिलोत्फुल्लपङ्कजालिसुगन्धिकम् ।
हंससारसचक्राह्वकादम्बप्रमदाकरम् ॥ १४ ॥

– ५ –
कुलाङ्गनामनोंमानभञ्जनोद्धुरशक्तिकम् ।
अनेकपुष्पसंदोहरजोभिश्चनिशायितम् ॥ १५ ॥
स्मरलीलावहः हेमकेतकीधूलिधूसरम् ।
तत्काललसितोद्यानरामणीकरोचितम् ॥ १६ ॥
नवपल्लवलौहित्यसूर्यातपविभासितम् ।
फुल्लत्किंशुकवृक्षौघलोहितीकृतदिक्तटम् ॥ १७ ॥
अथोदियाय पूर्णेन्दुः प्राचीदिङ्मुखमण्डनः ।
फुल्लत्कुवलयारण्यकरसंचारकोविदः ॥ १८ ॥
चकोरकामिनीचारुचञ्चुपुटविकासकः ।
तदा सा सहजानन्दा कलहान्तरिताभवत् ॥ १९ ॥
ईशश्च सुतरां तावद्विरहाकुलमानसः ।
प्राप्ताः प्रियसखीर्वीक्ष्य केलीमण्डपमागमत् ॥ २० ॥
तत्रैतयोः सुभगयोः प्रपञ्चोत्तरकामिनोः ।
समागमः समभवत्परमानन्दकारकः ॥ २१ ॥
आकालिकं वसन्तं च दृष्ट्वासौ भक्तवत्सलः ।
मयि पूर्णां कृपा चक्रे ज्ञातसारोऽखिलेश्वरः ।
सन्तुष्ट इदमाहासौ मम भाग्यैकवर्धनः ॥ २२ ॥
श्रीराम उवाच
भ्रातर्धन्योऽसिधन्योऽसि मम दुःखनिवारकः ।
त्वं हि मे लीलया नित्यं सन्तुष्टो भक्तिभावितः ॥ २३ ॥
एवमेव सदा तिष्ठ मम लीलैकवीक्षकः ।
गुप्ताश्च प्रकटाश्चैव यावत्यो मम केलयः ॥ २४ ॥
तावतीनां त्वमेवैकः साक्षी भव महामते ।
दृष्ट्वा प्रभोः कृपापात्रं जानकी प्राह मां ततः ॥ २५ ॥
इयं हि परिचर्या ते मम संतोषवर्द्धिनी ।
अनया परितुष्टाहं ददामि कामितं वरम् ॥ २६ ॥
यथा त्वं मम भक्तोऽसि तथेशस्यापि वै भव ।
अनन्यगामिनीयं मे कृपा भवति वर्द्धताम् ॥ २७ ॥
इति दत्तवरं मां सा वनरक्षानियोजितम् ।
विसृज्य सहजानन्दा रेमे स्वप्रेयसा सह ॥ २८ ॥
तदावधि तयोर्भूरिकृपयाऽऽनन्दितोऽस्म्यहम् ।
एतत्ते कारणं प्रोक्तं रामानुग्रहवस्तुनि ॥ २९ ॥

  • ६ -
    अचिन्त्यैव कृपा तस्य युग्मलीलाविनोदिनः।
    न कर्मभिर्न तपसा न ज्ञानेन न चेज्यया ॥ ३० ॥
    सुलभा तत्कृपा कापि फलरूपादि सा यतः।
    तस्यां च परिलब्धायां न लभ्यान्तरमिष्यते ॥ ३१ ॥
    तथापि कर्मभिर्दिव्यैः पूतात्मानं परायणम्।
    ज्ञानसंशुद्धचित्तं च भक्तिद्रुतसुधान्वितम् ॥ ३२ ॥
    श्रीपादपद्मरजसा स्वाभिषिक्त शुभोदयम्।
    सोऽनुगृह्णाति वै भक्तं नित्यलीलान्तवैभवम् ॥ ३३ ॥
    ब्रह्मादयोऽपि यस्यान्तं न ययुदुर्लभात्मनः।
    अनायासेन सुलभः स लीलारसभावनात् ॥ ३४ ॥
    एवं शुकादयः सर्वे प्रेमभक्तिविभाविताः। ‘
    प्रवेशिताः स्वात्मरसे तेनैव प्रभुना सखे ॥ ३५ ॥
    सर्वसाधारणोऽप्येष स्वभक्तानां विशिष्यते।
    नैतावतास्य वैषम्यं लीलैकरसनिर्वृतेः ॥ ३६ ॥
    स यदा ब्रह्मभावेन वर्तते ज्ञानवेदितः।
    तदा सर्वापि मर्यादा विद्यते तस्य नान्यदा ॥ ३७ ॥
    एक एव द्विधा जातो भगवान् भावभावितः।
    ब्रह्म ब्रह्मेतिज्ञानेन ईश ईशेतिभक्तितः ॥ ३८ ॥
    इति श्रीमदादिरामायणे ब्रह्मभुशुण्डसंवादे पश्चिमखण्डे¹ भरतलक्ष्मणसंवादे
    द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
    ✤
    तृतीयोऽध्यायः
    ब्रह्मोवाच
    इति श्रुत्वा स भरतः परमोत्कण्ठमानसः।
    ज्ञानस्य चापि भक्तेश्च विशेषं परिपृच्छति ॥ १ ॥
    भरत उवाच
    किं ज्ञानं का च सा भक्तिर्यया स वशतां व्रजेत्।
    एतन्मे कथय भ्रातुरुभयोस्तत्त्वनिश्चयम् ॥ २ ॥
    १. पूर्वखण्डे (?)-बड़ो० ।