भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)
Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary
महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ )
७३. सीता की बाल क्रीड़ा, उनके आविर्भाव से मिथिला की अपूर्व शोभावृद्धि,
सीता जन्मोत्सव-कथा श्रवण का फल २७०-२७३
(आ) उत्तर खण्ड
१. इन्द्र के नेतृत्व मे देवताओं का ब्रह्मलोकगमन और राम के अवतार
लीला संवरणार्थ निवेदन २७४-२७६
२. ब्रह्मा के स्मरण करने पर महाकाल का आगमन, ब्रह्मा का उसे अयोध्या
जाकर स्वयं भगवान राम से नित्यधामगमन की प्रार्थना करने का
आदेश देना २७७-२८०
३. महाकाल द्वारा राम से लोकलीलासंवरण विषयक ब्रह्मा का संदेश
निवेदन २८१-२८२
४. ब्रह्मा के आदेश से काल का पुनः अयोध्या आगमन, लक्ष्मण को प्रतिहार
रूप मे नियुक्त कर राम द्वारा काल से मंत्रणा, राम का सहसा अन्तर्धान
होना, काल का प्रमोदवन गमन, उसके रक्षक से युद्ध तथा पराजित होना २८२-२८५
५ काल का गंगा-गण्डकी संगमस्थ वसिष्ठाश्रम के निकट वन मे आखेट
क्रीडारत सीता सहित राम का दर्शन और क्षमायाचना पूर्वक स्तुति २८६-२८७
६. राम का काल को लीलासंवरण की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करने के लिए अपनी
मायाशक्ति प्रसारण का निर्देश २८८-२८९
७ दुर्वासा का रामदरबार मे आगमन और प्रतिहार रूप मे नियुक्त लक्ष्मण
से राम को अपने आने की सूचना देने का निर्देश, काल से मंत्रणारत
राम के पास लक्ष्मण का गमन २९०
८. राम का अदृष्टपूर्व भयानक रूप देखकर लक्ष्मण का मूर्च्छित होना, राम
का प्रकृत रूप मे पुनः स्थित होना और काल को विदा करना २९१-२९२
९ रामगीतारंभ, दुर्वासा की जिज्ञासा निवृत्ति हेतु राम द्वारा आत्मोद्धार
के साधनों का उपदेश २९२-२९४
१०. राम द्वारा नित्य तथा नैमित्तिक कर्मों का उपदेश २९५-२९९
११ राम द्वारा आत्मज्ञ पुरुषो द्वारा प्राप्य सम्बन्धरूपा तथा परमप्रेमरूपा परा-
भक्ति का उपदेश ३००-३०१
१२. राम द्वारा एकान्तिक भक्तों की जीवनचर्या का विवेचन ३०१-३०२
१३ वैष्णव संस्कार, वैष्णवाचार, वैष्णव व्रतोत्सव तथा वैष्णव तीर्थों का वर्णन ३०२-३१०
१४. राम भक्तों की मानसीपूजापद्धति का स्वरूप निरूपण ३११-३१२
१५. रामनवमी-जानकीनवमी व्रतानुष्ठान तथा प्रपत्ति महिमा ३१३-३१४
१६. योग के भेदोपभेदों सहित भक्तियोग का वैशिष्ट्य निरूपण ३१५-३१६
१७. गुणातीत पद-प्राप्ति के लिए तत्त्वज्ञान के विविध स्तरों की व्याख्या ३१७-३१९
१८. कर्म उपासना तथा ज्ञान की अपेक्षा भक्ति की विशिष्टता का रहस्य,
उसके व्याख्याकारों की परंपरा, वैष्णवाचार एवं साधना पद्धति का वर्णन
तथा जानकी नामाष्टकमहिमा का निरूपण ३१९-३२३