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सर्वकोश
भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)

भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)

Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary

महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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( ६ )
२८. भरत की जिज्ञासा निवृत्ति हेतु लक्ष्मण द्वारा भूमिजा सीता के प्रति जनक-
सुनयना के अपत्य स्नेह का रहस्योद्घाटन ७७-७९
२९. शुकदेव द्वारा सीता-महिमा तथा नित्यलीलाभूमि प्रमोदवन का शोभावर्णन ८०-८५
३० सनत्कुमार द्वारा रामभक्ति, रामनाम तथा रामतत्व का महिमावर्णन ८५-८७
३१. प्रमोदवन-परत्व-वर्णन ८७-९१
३२. सनत्कुमार द्वारा राम के मुख्य-आविर्भाव स्थलो का वर्णन ९१-९२
३३. सरयू-उत्पत्ति-कथा ९३-९४
३४. सरयू-सहस्रनाम ९४-१०४
३५. सरयू-माहात्म्य १०५-१०६
३६ गंगा-विरजादि नदियों तथा लोपामुद्रादि देवियों का द्रवरूप मे सरयू मे
मिलना १०६-१०९
३७. मुनियों द्वारा सरयू-स्तवन १०९-११२
३८ वसिष्ठ की तपस्या से सन्तुष्ट सरयू का पृथ्वी पर अवतरण ११२-११६
३९. शिव द्वारा वैवस्वत मनु को ज्ञानोपदेश ११७-११९
४०. वैवस्वत का गृहत्याग तथा तप हेतु हिमालय-गमन का संकल्प ११९-१२२
४१. विवस्वान् द्वारा पुत्र से गृहस्थाश्रम का महत्ववर्णन, उसमे रहकर प्रजा
पालन का अनुरोध तथा भगवान् से प्राप्त तद्विषयक उपदेश का वर्णन १२२-१२६
४२ भगवान द्वारा विवस्वान् को आत्मविवेकोपदेश १२६-१३०
४३. भगवान द्वारा विवस्वान् को ज्ञानोपदेश । १३०-१३१
४४. भगवान् द्वारा विवस्वान को भक्तियोगोपदेश १३२-१३५
४५. विवस्वान् द्वारा अपने पुत्र वैवस्वत मनु को ब्रह्मज्ञानोपदेश के अनन्तर
प्रजापालन का निर्देश १३६
४६. ब्रह्मा द्वारा वैवस्तमनु को राजधर्मोपदेश, अयोध्या की राजधानी रूप मे
प्रतिष्ठा तथा इक्ष्वाकुवंश-विस्तार-वर्णन १३६-१३७
४७. वैवस्वत मनु की घोर तपश्चर्या, भगवान श्रीराम का आविर्भाव, मनु द्वारा
स्तुति तथा वरदान-प्राप्ति १३८-१३९
४८. अयोध्या तथा प्रमोदवन-महिमा-वर्णन १३९-१४०
४९. ब्रह्मा के अनुरोध से वसिष्ठ द्वारा सूर्यवंश की पौरोहित्य स्वीकृति १४१
५०. मनु की प्रार्थना पर वसिष्ठ द्वारा कठोर तपःसाधना तथा राम की प्रेरणा
से सरयू का आविर्भाव १४२-१४४
५१. मनु द्वारा वसिष्ठ तथा सरयू की स्तुति १४५-१४६
५२. वसिष्ठकन्या के रूप मे सरयू की अवतरण कथा १४७-१४८
५३. राम की वररूप मे प्राप्ति के लिए सरयू द्वारा तपस्या और योगानल मे
शरीर त्याग १४८-१५१
५४. पद्मगिरि की कन्या के रूप में सरयू का पुर्नजन्म, राम द्वारा वरण तथा
प्रमोदवनलीला में प्रवेश १५१-१५५