भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)
Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary
महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा
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५५ कश्यप-अदिति का दशरथ-कौशल्या के रूप मे जन्मग्रहण, उनके पुत्ररूप
मे परात्पर ब्रह्म राम का अवतरण तथा प्रमोदवनलीलाधिष्ठात्री सहजा
का आविर्भाव १५६-१५९
५६. तत्वो द्वारा राम तथा सहजा की स्तुति १५९-१६३
५७. शुकदेव द्वारा प्रमोदवन-लीला-महात्म्य वर्णन १६३-१६५
५८. जनक के प्रश्न पर शुकदेव द्वारा सुखित-मालिका के पुत्र रूप मे राम के
आविर्भाव का वृत्तान्त वर्णन १६६-१७५
५९. शुकदेव द्वारा विवस्वान् के नन्दनगोप और प्रभा के राजिनी रूप मे
जन्म और उनकी पुत्री सहजा के रूप मे महालक्ष्मी के अवतरण का
वृत्तान्त वर्णन १७५-१७७
६०. प्रमोदवनलीला-श्रवण-महात्म्य १७७-१८०
६१. प्रमोदवनलीला मे सहजा का मान १८०-१८६
६२. सरयू के उत्तर-दक्षिणस्थ गोपप्रदेश मे राम और सहजा की बाललीला
का वर्णन १८७-१९३
६३. शिव द्वारा सहजा-महिमा-वर्णन १९४-१९६
६४. सहजा और राम की प्रमोदवनलीला का ध्यान वर्णन १९७-१९९
६५. वसिष्ठादि ऋषियों द्वारा रामस्तुति २००-२०२
६६. शिव द्वारा सहजा शक्ति के पारमार्थिक तथा यौगिक स्वरूप का वर्णन २०२-२०४
६७. गोपमहिषी राजिनी के प्रश्न पर शिव द्वारा सहजा की जनकपुत्री के रूप
मे अवतरण और उनकी तीन बहनों—ऊमिला, माडवी तथा श्रुतकीर्ति के
साथ महाराज दशरथ के पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के विवाह
का वृत्तान्त-कथन २०५-२१४
६८. विवाह के अनन्तर राम की युवराजपदप्राप्ति, रामराज्याभिषेक की
तैयारी, वनगमन, छाया-सीता का रावण द्वारा हरण, राम द्वारा लका
विजय, सीता की अग्निपरीक्षा, पुष्पक पर सीता, लक्ष्मण, हनुमान,
सुग्रीवादि भक्तों के साथ राम का अयोध्या प्रस्थान, भरद्वाज आश्रम
होते हुए नन्दिग्राम आगमन, अयोध्या प्रवेश, राम राज्याभिषेक, सीता का
गर्भ धारण आदि घटनाओं का तिथिनिर्देश सहित संक्षेप मे वर्णन २१५-२३७
६९. महजा-स्वरूपा सीता के साथ राम की प्रमोदवन तथा अन्य रसमयी
लीलाओ का शिवद्वारा राजिनी की जिज्ञासा निवृत्ति हेतु वर्णन २३७-२६०
७०. गोपिकाओं द्वारा सहजा स्वरूपधारिणी सीता तथा राम की गोपनीय
लीलाओं का दर्शन २६१-२६४
७१. शुकदेव की कृपा से जनक द्वारा सहजा का स्वरूप ज्ञान और उनके प्रति
वात्सल्य भाव प्राप्ति २६४-२६६
७२. सहजा-राम तत्व के परिज्ञान से जनक को विदेहत्व प्राप्ति, दिव्यचक्षुओं से
सीता के विराट् स्वरूप का दर्शन तथा स्तुति २६६-२६९