भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)
Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary
महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा
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तत्त्व सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ । रामकथा के मूलस्रोत वाल्मीकीय रामायण तथा उसके
आदर्श पर निर्मित परवर्ती रामायणो के कथातत्त्व की मीमासा करने पर यह तथ्य स्पष्ट हो
जाता है । उसकी अनन्तता तथा बहुआयामित्व का यही रहस्य है ।
अबतक प्राप्त रामायणों में भुशुण्डि रामायण सर्वाधिक विशद है । इसके अन्तर्गत छत्तीस
हजार श्लोको मे विस्तृत रामचरित को श्रीमद्भागवत मे वर्णित कृष्णलीला से जिस प्रकार
अनुरंजित किया गया है उसके पीछे पूर्वमध्यकालीन उत्तरभारतीय समाज मे व्याप्त कृष्णलीला-
सक्ति को आत्मसात् करने का सजग प्रयास लक्षित होता है । प्रस्तुत ग्रन्थ के असाधारण विस्तार
का यही मुख्य कारण है । पूर्व तथा दक्षिण खण्ड की भाँति ही पश्चिम और उत्तर खण्ड मे
वर्णित रामकथा के विस्तार मे सहायक एक अन्य तत्व है रामचरित तथा रामभक्ति से जुडे हुए
प्रसंगो का समावेश और उनका सविस्तर निरूपण । संक्षेप मे वे इस प्रकार हैं—
१. रामावतार के कारणो का निर्देश
२. राम जन्मोपाख्यान
३. सीता-जन्मोपाख्यान
४. सरयू-उत्पत्ति कथा
५ सहजोपाख्यान
६. वैवस्वतोपाख्यान
७. शिवगीता
८. कालदमनोपाख्यान
९. रामगीता
१०. प्रमोदवन अथवा महाधामवर्णन
इनके साथ ही पाठकों के मानस मे भक्तिभाव प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से कुछ नई
सामाग्री जोडी गई है । नीचे इसकी संक्षिप्त सूची दी जाती है—
१. रामनाम-महात्म्य
२. रामभक्ति का प्रवर्त्तन तथा प्रसार परम्परा
३. अयोध्या-सरयू-महात्म्य-वर्णन
४. कर्म, भक्ति, ज्ञान, तथा योग का स्वरूप निरूपण
५. ऽमाभक्ति की-सर्वश्रेष्ठता का प्रतिपादन
६ मानसो पूजा की विधि तथा महात्म्य
७. रामतीर्थों का विवरण
८. राम सम्बन्धी व्रतोत्सवो विशेषत रामनवमी का महात्म्य-वर्णन
९. रामकथा का संक्षेप मे वर्णन
१०. राम द्वारा अयोध्यावासियो को प्रबोधन
यह ध्यातव्य है कि परवर्ती रामायणों विशेषतः रामचरितमानस पर इसका गहरा
प्रभाव दिखाई देता है । कही-कही तो शब्दावली भी मिल जाती है । उदाहरणार्थ—