भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)
Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary
महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा
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ततोऽतिदूरं नगरात्स गत्वा दृष्ट्वा नदी ता हरिनेत्रजाताम् ।
ननन्द रामः स्मृतपावनोऽतो ददर्शचाशेषमिदं हृदिस्थम् ॥
—अध्यात्म रा०, उत्तरकाण्ड ९।३८, ४१. ४८
किन्तु भुशुण्डिरामायण मे रामचतितमानस की भाँति ही लोकान्तरण के पूर्व राम के
सरयू तटस्थ आराम कुज अथवा 'अमराई' मे जाने का स्पष्ट निर्देश है—
जगाम सरयूतीरं वहत्त्रिविधि मारुतम् ।
आरामकुज शोभाढ्यम् हेमरत्नमया वनिम् ॥
तत्र गत्वा चिरं दध्यौ मायातीतं परं महः ।
वनोपवन शोभाढ्याम् सरयूतट भूमिगाम् ॥
—भु० रा०, उत्तरकाण्ड ५१।१७, १८, १९
ये तथ्य रामचरितमानसकार के भुशुण्डिरामायण से परिचय और एक सीमा तक
विवेकपूर्ण अनुसरण का सकेत देते हैं ।
अध्यात्म रामायण के प्रेरणा स्रोतो का विवेचन करते हुए डा० प्रबोधचन्द्र बागची
तथा रामचरित मानस के उपजीव्य साहित्य की मीमांसा के प्रसंग मे डा० वादवील ने उनके
आदर्श रूप मे किसी पूर्ववर्ती साम्प्रदायिक रामायण के अस्तित्व की संभावना व्यक्त की थी,
इसकी चर्चा हम पूर्वखण्ड की प्रस्तावना मे कर चुके हैं ( पृ० ४२, ४३ ) । यह एक सुखद
आश्चर्य है कि अब भुशुण्डि रामायण के प्रकाश मे आ जाने से उक्त मर्मज्ञ विद्वानो की धारणा
तथ्याश्रित प्रमाणित हो गयी है । विशेष रूप से इसलिए भी कि वैष्णवभक्ति के सिद्धान्त तथा
आचार पक्ष का इतना विशद एवं सूक्ष्म विवेचन किसी भी अन्य रामायण मे प्राप्त नहीं होता ।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा अपनी कृतियों में उसका विवेक पूर्वक विनियोग सन्त परम्परा मे
प्रस्तुत ग्रंथ की व्यापक स्वीकृति का द्योतक है ।
इस महाग्रन्थ के प्राकट्य के मूल मे सर्वेश्वर की इच्छा ही सर्वोपरि है । निमित्त का यदि
कुछ अंशदान रहा है तो उसका संस्कारजन्य क्षुद्र अहंकार, अज्ञान एवं दुराग्रह, ऐसा मै अनुभव
करता हूँ । उदार अध्येता इसे भवग्रस्त जीव का स्वभाव मानकर क्षमा करें, यही प्रार्थना है ।
वसन्तोत्सव भगवती प्रसाद सिंह
सं० २०४१
साकेत, बेतियाहाता, गोरखपुर