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सर्वकोश
भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)

भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)

Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary

महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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( ३ )
नहि भगवन् राम वासनानन्या विजृंभते ।
ऋते त्वच्चरणभोज धूलधूसरतां तनो ॥
एतावदेव नः प्रार्थ्यं नाथ जन्मनि जन्मनि ।
श्रीराम तव पादाब्जतललग्ना वयं सदा ॥
—भु० रा० उत्तरखण्ड ३३।१०,११
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहौं निर्वान ।
जनम-जनम रति रामपद यह वरदान न आन ॥
—रामचरित मानस, अयो० दो० २०४
यही स्थिति कथा प्रसंगों की भी है । राम के परधाम गमन का वृत्त इस दृष्टि से विशेष
उल्लेखनीय है । रामचरित मानस मे कथा का अन्त राम का भ्राताओं, पार्षदो तथा सेवकों
सहित सरयू तटस्थ ‘अमराई’ मे जाने के साथ होता है—
हनूमान भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ।
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए । गजरथ तुरग मँगावत भए ॥
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ शीतल अमराई ।
—रामचरितमानस, उत्तर० ५०।२,३,५
वाल्मीकीय तथा अध्यात्म रामायण मे राम के स्वर्गारोहण का जो वर्णन मिलता है
उसमे प्रास्थानिक कर्मोपरान्त वैदिक रीति से प्रज्वलित अग्निहोत्र और बाजपेय छत्र को आगे
करके ऋषि-ब्राह्मणों, शस्त्रशास्त्र, धनुषबाण, भाइयो, अन्तःपुर की स्त्रियों तथा भृत्यो के साथ
उनके सरयूतट पर जाने का उल्लेख है—
प्रभाताया तु शर्वर्या पृथुवक्षा महायशाः ।
रामः कमल पत्राक्षः पुरोधसमथाब्रवीत ।
अग्निहोत्र ब्रजत्वग्रे दीप्यमान सहद्विजैः ॥
बाजपेयातपत्रं च शोभमानं महापथ ॥
अध्यर्ध योजनं गत्वा नदी पश्चान्मुखाश्रिताम् ।
सरयूं पुण्यसलिला ददर्श रघुनन्दन ॥
—वा० रा० उत्तर० १०९।१,२; ११०।१
अग्निहोत्रं ब्रजत्वग्रे दीप्यमानं सहद्विजै ।
बाजपेयतपत्रं च शोभमान महापथे ।।
ततः सर्वाः प्रकृतयो हृष्टपुष्ट जन वृताः ।
गच्छन्तमन्वगच्छतं राघवगुण रंजित' ॥
ततो वसिष्ठोऽपि चकार सर्वप्रास्थानिकं कर्म महद्विधानात् ।
क्षौमाम्बरो दर्भपवित्रपाणि महाप्रयाणाय गृहीत बुद्धि ॥
वेदाश्च सर्वे धृत विग्रहाश्च ययुश्च सर्वे मुनयश्च दिव्याः ।
माता श्रुतीना प्रणवेन साध्वी ययौ हरिः व्याहृतिभिः समेता ॥