भुशुण्डि रामायण (काकभुशुण्डि एवं गरुड़ संवाद - पूर्वखण्ड सविस्तार व्याख्या)
Bhusundi Ramayana: Purva Khanda with Commentary
महर्षि भुशुण्डि (सम्पादक: डॉ. भगवतीप्रसाद सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआमुख
भुशुण्डि रामायण के तृतीय तथा अन्तिम भाग को रामकथारसिको एवं अनुसंधित्सुओ
के लिए सुलभ होते देखकर मै अपार संतोष का अनुभव कर रहा हूँ । इस ग्रंथके उद्धार हेतु
निरन्तर तीस वर्षों तक किये गये विनम्र प्रयास की सफलता मेरी अकथनीय आत्म-तृप्ति का
कारण बनी है—'क्लेशः फलेन ही पुनर्नवतां विधत्ते'। विषम भौतिक परिस्थितियों और
पग-पग पर आनेवाली बाधाओ के शमन मे भगवदनुग्रह ही हमारा संबल रहा है । वह जिन
माध्यमों से अवतरित हुआ उनमे उत्तर प्रदेश संस्कृत-अकादमी एवं उसके वर्तमान निदेशक श्री
धर्मनारायण त्रिपाठी अविस्मरणीय हैं। इनके द्वारा प्रदत्त आर्थिक सहयोग से इस ग्रन्थ की
प्रकाशन यात्रा का पथ प्रशस्त हुआ । मुद्रणकार्य को ग्रन्थ के गौरवानुकूल सम्पन्न करने मे
रत्ना प्रिंटिंग वर्क्स, वाराणसी के स्वत्वाधिकारी श्रीविनयशंकर पण्ड्या ने जिस उदारता और
धैर्य का परिचय दिया उसका 'आभार' अनुभव की वस्तु है 'प्रदर्शन' की नही ।
अब दो शब्द इस भाग के कथात्मक तथा तत्त्वात्मक वैशिष्ट्य के सम्बन्ध मे--
पूर्ववर्ती दक्षिण खंड के प्रतिपाद्य विषय का अनुशीलन करने से यह स्पष्ट हो गया होगा
कि उसके अन्तिम अध्यायो मे वर्णित रामाश्वमेध-अनुष्ठान, सीता का भूमिप्रवेश तथा राम की
दिव्यधाम यात्रा के साथ ही परम्परागत रामकथा समाप्त हो जाता है। अतः जहाँ तक राम की
लाकलीला का सम्बन्ध ह उसके पश्चात् कुछ भा कहने को शेष नहीं रह जाता । किन्तु पौरा-
णिक शैली मे विरचित रामायणो का उद्देश्य मात्र राम का जीवनयात्रा से सम्बद्ध प्रसगो का
निर्देश नही रहा है। इस परम्परा के ग्रन्थो में उपबृंहण की प्रवृत्ति आद्योपान्त व्याप्त पाई जाती
है। प्रवाह मे बाधा की सम्भावना से जो प्रसंग मूलकथा मे संक्षेप में अथवा संकेत मात्र से
अभिव्यक्त किये गये थे उसकी परिसमाप्ति के अनन्तर परवर्ती खण्डों या काण्डों में उनका
विशद विवरण अथवा उनसे सम्बद्ध नये सूत्रों की उद्भावना आख्यान, अवान्तर-कथाओ आदि
के रूप में प्रस्तुत की जाती रही है ।
इसके अतिरिक्त रामकथा अध्यात्मसाधना का भो आधार एव प्रेरणा स्रोत होने से, युगीन
धर्मदर्शन के प्रचार-प्रसार के सशक्त माध्यम रूप मे भी प्रयुक्त होती रही है। साम्प्रदायिक
रामायणो की प्रशस्त परम्परा इसी का प्रसाद है । इस वैशिष्ट्य के कारण समय के साथ बदलते
हुए युगमानस की अन्तर्धाराओ के विकासात्मक अध्ययन के अक्षयकोष के रूप मे भी उसकी
प्रतिष्ठा रही है । वैष्णव-भक्ति-आन्दोलन के प्रभावस्वरूप दार्शनिक मतवादो के साथ भक्ति
विशेषत. प्रेमा भक्ति, के स्वरूप, महत्व एव साधना सम्बन्धी तत्त्वो का भी उसमे व्यापक
रूप से समावेश हुआ । इस प्रकार जन-जीवन से संपृक्त होने के कारण समकालीन आध्यात्मिक
विचारधाराओ, लोकविश्वासो एवं सामाजिक मान्यताओ से सपोषित रामकथा युगीन परिवेश
के अनुसार नये सांचे में ढलती और समकालीन जीवन को नवीन दिशानिर्देश करती रही है ।
लोक की साझेदारी होने से रामकथाकारो को अपनी व्यक्तिगत धारणाओ की अपेक्षा जनरुचि
को वरीयता देनी पड़ी । रामायण परम्परा के विकास और रामचरित के विस्तार मे यह