सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मराठा, मैसूर (हैदर-टीपू) एवं सिख साम्राज्य को हड़पने के कूटनीतिक षड्यन्त्र

सिराजुद्दौला ४३
विद्रोही इस समय सिराजुद्दौला के हाथों में थे । वह चाहता तो वहीं
उनका काम तमाम कर सकता था । किन्तु उसने उनकी जानें बख़्श
दीं और उन्हें अपने साथ ले लिया। क़ासिमबाज़ार की कोठी के
तिजारती माल को भी उसने बिलकुल हाथ न लगाया। केवल वहाँ
के हथियारों और गोला बारूद को वहाँ से हटा लिया ।
वाट्स और दूसरे अंगरेज़ों को साथ लेकर ५ जून १७५६ को
सिराजुद्दौला कलकत्ते की ओर बढ़ा। उन दिनों की सैन्ययात्रा
निस्संदेह कुछ और ही थी। रेलों का उस समय संसार में कहीं
निशान न था, सड़कें भी हर जगह मौजूद न थीं। बंगाल की
सख़्त से सख़्त धूप और गरमो का महीना, उस पर रमज़ान के
दिन, जब कि सेना के अधिकांश मुसलमान अफ़सर और सिपाही
दिन दिन भर रोज़ा रखते थे । भारी भारी तोपें और अन्य सब
सामान जिसके बिना उन दिनों यात्रा असम्भव थी और जिसे
हाथियों और बैलों से खिंचवाकर ले जाना होता था । इन सब
हालतों में सिराजुद्दौला की सेना ने ११ दिन के अन्दर १६० मील
का सफ़र तय किया ।
अंगरेज़ों के काफ़ी युद्ध के जहाज़ कलकत्ते पहुँच चुके थे और
[हाशिया: तान्नाह में अंगरेज़ों की हार] इन लोगों ने अपनी ओर से सिराजुद्दौला के
विरुद्ध खुली बग़ावत शुरू कर दी थी । इस बीच

  • १३ जून को अंगरेज़ी सेना ने कलकत्ते से पाँच
    मील नीचे हुगली के इस पार तान्नाह का क़िला वहाँ के मुट्ठी भर
    भारतीय संरक्षकों के हाथों से छीन लिया । सिराजुद्दौला ने

४४ भारत में अंगरेज़ी राज
कलकत्ते जाने से पहले इस क़िले को फिर से विजय किया। इस
छोटे से संग्राम में नदी के ऊपर अंगरेज़ों की जहाज़ी तोपें और
किनारे पर से सिराजुद्दौला की तोप दोनों में कुछ देर तक ख़ासा
मुक़ाबला रहा। किन्तु आखिरकार अंगरेज़ी सेना को हारकर अपने
जहाज़ों सहित पीछे हट जाना पड़ा।
सिराजुद्दौला उस समय भी वृथा रक्त बहाने के विरुद्ध था।
अब भी वह इन अंगरेज़ व्यापारियों के साथ अमन
[सिराजुद्दौला की] से रहने के लिए तैयार था। इस यात्रा में उसके
[शान्ति प्रियता] एक दीवान ने कई बार वाट्स को अपने पास
बुलाकर समझाया कि यदि अंगरेज़ अपने इस समय तक के
अपराधों के बदले में बतौर जुर्माने या हरजाने के थोड़ा बहुत
भी धन पेश करने को तैयार हों और आइन्दा अमन से रहने
का वादा करें, तो सुलह की जा सकती है और व्यापार सम्बन्धी
समस्त अधिकार उन्हें फिर से मिल सकते हैं। कलकत्ते के अंगरेज़
अफ़सरों को भी इसकी सूचना दे दी गई। यदि वे चाहते तो उस
समय भी सिराजुद्दौला के साथ सुलह कर सकते थे। किन्तु ये लोग
अपने षडयन्त्रों के बल सिराजुद्दौला का नाश करने की आशा में थे।
ईमानदारी की लड़ाई में वे सिराजुद्दौला का किसी तरह का मुक़ा-
बला न कर सकते थे। फ़ौज और सामान दोनों
[अंगरेज़ों की रिशवतें] की उनके पास बेहद कमी थी। उनका सबसे
[और भेद नीति] बड़ा हथियार था—रिशवतें देकर, लालच देकर
और झूठे वादे करके सिराजुद्दौला के आदमियों और सैनिकों को

सिराजुद्दौला ४५
अपनी ओर फोड़ लेना। वही वाट्स और उसके अंगरेज़ साथी,
जिनकी सिराजुद्दौला ने जानें बख़्शी थीं, इस समय सिराजुद्दौला
की सेना के अन्दर इस प्रकार की साज़िशों के जाल पूर रहे थे।
सिराजुद्दौला की सेना में और ख़ासकर उसके तोपख़ाने में
अनेक यूरोपियन और अन्य ईसाई नौकर थे।
[हाशिया: ईसाई पादरियों के फ़तवे] ईसाई पादरियों के दस्तख़तों से एक दूसरे के
बाद तीन व्यवस्थापत्र यानी फ़तवे निकाले गए,
जिनमें लिखा था कि किसी भी ईसाई धर्मावलम्बी के लिए मुसलमानों
का पक्ष लेकर अपने सहधर्मियों के ख़िलाफ़ लड़ना ईसाई धर्म के
विरुद्ध और महापाप है। ये फ़तवे गुप्त ढंग से सिराजुद्दौला के ईसाई
मुलाज़िमों में बाँटे गये। इन्हीं फ़तवों में सिराजुद्दौला के मुलाज़िमों
को यह भी लालच दिया गया कि यदि तुम नवाब की सेना से
भाग कर अंगरेज़ों की ओर चले आश्रोगे, तो तुम्हें फ़ौरन अंगरेज़ी
सेना में नौकर रख लिया जायगा। इस तरह की चालों द्वारा काफ़ी
नमकहराम सिराजुद्दौला की सेना में पैदा कर दिए गए।
कलकत्ते के अंगरेज़ों का व्यवहार इस अवसर पर अपने हिन्दो-
स्तानी मददगारों के साथ अत्यन्त ख़राब था।
[हाशिया: अपने हिन्दोस्तानी मददगारों के साथ व्यवहार] सिराजुद्दौला के आने की ख़बर पाते ही इन लोगों
ने कलकत्ते के तमाम हिन्दू और मुसलमानों को,
जिनमें अधिकतर कम्पनी के मुलाज़िम, गुमाश्ते,
व्यापारी और मज़दूर थे अरक्षित छोड़ दिया और उनसे कह दिया कि
अंगरेज़ तुम्हारी रक्षा न करेंगे। किन्तु यूरोपियनों, हिन्दोस्तानी

४६ भारत में अंगरेज़ी राज
ईसाइयों, मर्द, औरत और बच्चों, यहाँ तक कि उनके ईसाई गुलामों
तक को उन्होंने अपनी कोठी के आस पास मकानों में जमा कर
लिया और बाहर चारों ओर के हिन्दोस्तानी मकानों को आग लगा
दी, ताकि सिराजुद्दौला से लड़ने के लिए मैदान साफ़ हो जाय ।
इतना ही नहीं, मालूम होता है कि ये लोग उस समय किसी
भी हिन्दोस्तानी पर विश्वास न कर सकते थे। सुप्रसिद्ध श्रमीचंद,
उसके साले हज़ारीमल और दीवान राजवल्लभ के बेटे राजा
किशनदास, इन तीनों को अंगरेज़ों ने क़ैद करके रखना आवश्यक
समझा । यह वही अमीचंद था जिसकी सहायता के बिना अंगरेज़ी
व्यापार या अंगरेज़ी सत्ता दोनों में से किसी के भी पैर बंगाल
के अन्दर हरगिज़ न जम सकते थे और राजा किशनदास अंगरेज़
कम्पनी का वह शरणागत था, जिसे उन्होंने सिराजुद्दौला के हवाले
करने तक से इनकार कर दिया था ।
जिस समय अंगरेज़ सिपाही अमीचंद को पकड़ने के लिए
उसके मकान पर पहुँचे, अमीचंद ने फ़ौरन अपने
ज़नानखाने पर
हमला
को उनके हवाले कर दिया । किन्तु हज़ारीमल
और राजा किशनदास से यह अपमान न सहा
गया। उन दोनों ने अपने आदमियों को अंगरेज़ सिपाहियों पर
गोली चलाने का हुकुम दिया। लड़ाई में हज़ारीमल वीरता के
साथ लड़ा। उसका बाँया हाथ उड़ गया और अंत में तीनों
गिरफ़्तार कर लिए गए। इसके बाद जब अंगरेज़ अफ़सरों ने अपने
उन्मत्त गोरे सैनिकों को अमीचंद के ज़नानख़ाने को ओर बढ़ने का

सिराजुद्दौला ४७
हुकुम दिया, तो अमीचंद के वफ़ादार हिन्दोस्तानी जमादार का रक्त
खौलने लगा। गोरे सिपाहियों की नियत ज़ाहिर थी। श्रौर्म नामक
यूरोपियन इतिहास लेखक इस घटना के विषय में लिखता है —
"अमीचंद के जमादार ने जो एक ऊँची ज़ात का हिन्दोस्तानी था, मकान
को आग लगा दी और फिर कहा जाता है इसलिए ताकि विदेशी लोग घर
की स्त्रियों की बेइज़्ज़ती न कर सकें, उसने ज़नानख़ाने में घुसकर अपने हाथ
से तेरह स्त्रियों का काम तमाम किया और फिर अंत में अपने भी ख़ंज़र घोंप
लिया। किन्तु उसका अपना ज़ख़्म कारगर न हो सका।"*
अनेक अंगरेज़ इतिहास लेखक शिकायत करते हैं कि बहुत से
भारतीय कुलियों, मल्लाहों और नौकरों ने उस समय अंगरेज़
व्यापारियों का साथ छोड़ दिया। यदि यह बात सच है तो ऊपर
के अत्याचारों में इसके लिए काफ़ी वजह मौजूद थी।
१६ जून को सिराजुद्दौला कलकत्ते पहुँचा। १६ और १७ को
[विजयी सिराजुद्दौला] कई छोटी मोटी लड़ाइयाँ हुईं। १८ को शुक्रवार
[का कलकत्ता प्रवेश] के दिन कम्पनी की ओर से साफ़ आज्ञा निकली
कि यदि शत्रु का कोई आदमी ज़ख़्मी होकर
या किसी और वजह से पनाह की प्रार्थना करे तो उस पर कोई
किसी तरह की दया न दिखावे। उसी दिन सिराजुद्दौला की सेना
ने कम्पनी की सेना पर बाज़ाब्ता चढ़ाई की और बावजूद सिरा-
जुद्दौला के अनेक ईसाई नौकरों की नमकहरामी के कम्पनी को

  • Orme, vol. ii, p. 60.

४८ भारत में अंग्रेज़ी राज
सेना देर तक सिराजुद्दौला के गोलों का सामना न कर सकी।
अंत में अंगरेज़ों को हार स्वीकार करनी पड़ी।
रविवार २० जून सन् १७५१ को सिराजुद्दौला की विजयी सेना
ने कलकत्ते की अंगरेज़ी कोठी में प्रवेश किया। कोठी के तमाम
अंगरेज़ क़ैद कर लिए गए। सिराजुद्दौला के लिए इस समय
कलकत्ते के इन बागी विदेशी व्यापारियों का वहीं एक एक कर
काम तमाम कर देना और उनकी कोठी को नेस्त नाबूद कर देना
एक बहुत आसान काम था, किन्तु उदार सिराजुद्दौला इन लोगों
के छलों से अभी तक पूरी तरह परिचित न हुआ था।
सिराजुद्दौला के हुकुम से क़िले के अन्दर एक दरबार लगा,
जिसमें तमाम यूरोपियन क़ैदी नवाब के सामने
सिराजुद्दौला की पेश किए गए। क़ैदियों ने नवाब से क्षमा की
उदारता प्रार्थना की। उदार भारतीय नवाब ने उन सब की
जानें बख़्श दीं।* अंगरेज़ इतिहास लेखक जेम्स मिल लिखता है —
“जब मिस्टर हॉलवेल (कलकत्ते की कोठी का मुखिया) हथकड़ी पहने
हुए नवाब के सामने पेश किया गया, तो नवाब ने फ़ौरन हुकुम दिया कि
हथकड़ी खोल दी जाय और स्वयं अपनी सिपहगरी की शपथ खाकर हॉलवेल
को विश्वास दिलाया कि “तुम्हारे या तुम्हारे किसी साथी के सर का एक
बाल भी किसी को छूने न दिया जायगा।”†
यही इतिहास लेखक स्वीकार करता है कि विजयी हिन्दोस्तानी

  • Talboys Wheeler's Early Records of British India, vol. i. p. 160.
    † History of India, by James Mill, vol, iii. p. 1179.

सिराजुद्दौला
[ 'बँग्लार इतिहास,' नामक बँग्ला ग्रन्थ से ]

This page is blank and contains no text to transcribe.

सिराजुद्दौला ४६
सैनिकों ने “पराजित अंगरेज़ों के साथ कोई बुरा बर्ताव नहीं किया।”
और उनके साथ के “मुसलमान मुल्ला ख़ुदा की बंदगी में लगे
रहे।” क़िले और कोठी के अंदर का गोला बारूद सब नवाब ने
हटवा लिया, किन्तु जितना तिजारती माल कोठी के अंदर भरा
हुआ था उसे सिराजुद्दौला या उसके सैनिकों ने हाथ तक नहीं
लगाया, सिराजुद्दौला की आज्ञा से उसे हिफ़ाज़त के साथ ज्यों का
त्यों रहने दिया गया। यही व्यवहार सिराजुद्दौला ने अंगरेज़ों
की दूसरी कोठियों में किया ।
कलकत्ते के बहुत से अंगरेज़ सिराजुद्दौला की सेना के क़िले में
दाख़िल होने से पहले ही पीछे की ओर से अपने जहाज़ों में बैठकर
भाग गए थे। जो रह गए थे उन्होंने अब सिराजुद्दौला से प्रार्थना
की कि हमारी जान बख़्शी जाय और हमें बंगाल छोड़ कर अपने
साथियों के पास मद्रास चले जाने की इजाज़त दी जाय। सिरा-
जुद्दौला ने सहर्ष उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। अनेक यूरोपियन
इतिहास लेखक इस बात की शहादत देते हैं कि इस अवसर पर
सिराजुद्दौला की शक्ति को देख कर अधिकांश यूरोपियन चकित
और भयभीत हो गए।
जॉन कुक लिखता है कि सिराजुद्दौला की मुसलमान सेना का
नियम था कि वे रात को कभी न लड़ते थे और शाम होते ही
गोलाबारी बंद् कर देते थे। कुक यह भी लिखता है कि यदि ऐसा
न होता तो २० तारीख़ से पहले ही अंगरेज़ों की बुरी हालत हो
गई होती।
४

५० भारत में अंगरेज़ी राज
इस प्रकार कम्पनी के अंगरेज़ व्यापारी सन् १७५६ में भारत
अंगरेज़ों का बंगाल के सब से अधिक उपजाऊ और समृद्ध प्रान्त
से निकाला जाना बंगाल से निकाल बाहर किए गए। हॉलवेल ने
कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम अपनी ३० नवम्बर
१७५६ की चिट्ठी में लिखा :—
“इतनी घातक और शोकजनक आपत्ति बाबा आदम के समय से लेकर
आज तक किसी भी क़ौम या उसके उपनिवेश के इतिहास में न आई होगी।”
सिराजुद्दौला ने ‘कलकत्ते’ का नाम बदलकर ‘अलीनगर’ रक्खा
और अपने एक दीवान राजा मानिकचंद को अलीनगर और उसके
आसपास के इलाक़े का हाकिम नियुक्त किया।
प्रायः समस्त अंगरेज़ इतिहास लेखक अपनी क़ौम की इस हार
के साथ एक भयंकर हत्याकाण्ड का ज़िक्र करते
“ब्लैक होल” का हैं, जिसे “ब्लैक होल” हत्याकाण्ड, या बंगाल में
क़िस्सा “अंधकूप हत्या”, कहा जाता है। ब्लैक होल
कलकत्ते की अंगरेज़ी कोठी के अंदर एक अँधेरी कोठरी या काल-
कोठरी थी, जो अंगरेज़ व्यापारियों ही की बनाई हुई थी और
जिसमें कम्पनी के अफ़सर अपने हिन्दोस्तानी अपराधियों या
क़र्ज़दारों को बंद कर दिया करते थे। इन अंगरेज़ लेखकों का बयान
है कि २० जून की रात को इस १८ फुट लम्बी और कुछ कम चौड़ी
कोठरी में सिराजुद्दौला के हुकुम से १४६ यूरोपियन क़ैदी बंद कर
दिए गए। जून का महीना, जगह की तंगी और ताज़ी हवा न मिल
सकने के कारण अनेक तीव्र यातनाओं के बाद सुबह तक इन १४६

में से केवल २३ ज़िन्दा बचे, और वह भी भयंकर अधमरी
हालत में।
किन्तु उस समय के इतिहास की खोज करने वालों पर अब
यह बात अच्छी तरह प्रकट हो चुकी है कि ब्लैक होल का यह
सारा क़िस्सा बिलकुल झूठा है और केवल सिराजुद्दौला के चरित्र
को कलंकित करने और अंगरेज़ों के बाद के कुचक्रों को जायज़
क़रार देने के लिए गढ़ा गया था।
विद्वान इतिहासलेखक अक्षयकुमार मैत्र ने अपने बंगला ग्रंथ
“सिराजुद्दोला” में इस क़िस्से के विरुद्ध अनेक अकाट्य युक्तियाँ
संग्रह की हैं। अव्वल तो इतनी छोटी (२६७ वर्ग फुट) जगह
में १४६ मनुष्य चावलों के बोरों की तरह भी नहीं भरे जा
सकते। इसके अलावा सैयद गुलाम हुसैन की “सियरउल-
मुताख़रीन” में या उस समय के किसी भी प्रामाणिक इतिहास में,
या कम्पनी के रोज़नामचों, “काररवाई के रजिस्टरों” या मद्रास
कौन्सिल की बहसों में इस घटना का कहीं ज़िक्र नहीं आता।
क्लाइव और वाट्सन ने कुछ समय बाद नवाब की ज़्यादतियों और
कम्पनी की हानियों को दर्शाते हुए नवाब के नाम जो पत्र लिखे,
उनमें इस घटना का कहीं ज़िक्र नहीं आता, न अलीनगर के संधिपत्र
में उसका कहीं नाम है। बहुत समय बाद क्लाइव ने कम्पनी के डाइ-
रेक्टरों के नाम एक लम्बा पत्र लिखा, जिसमें उसने सिराजुद्दौला के
साथ कम्पनी के क्रूर व्यवहार के अनेक सबब गिनवाए हैं। उनमें
इस घटना का कहीं इशारा भी नहीं मिलता। अंगरेज़ों ने अंत में मीर

५२ भारत में अंगरेज़ी राज
जाफ़र के साथ जो संधि की, उसमें कम्पनी के हर तरह के हरजाने
का हिसाब लगाया गया है, किन्तु इन १२३ मनुष्यों के कुटुम्बियों
को मुश्रावज़ा दिलवाने का कहीं ज़िक्र नहीं। जो विदेशी लोग जहाज़ों
में बैठकर भाग निकले थे, उनके बाद १२३ शायद क़िले के अन्दर
बचे भी न थे। कुछ लोगों ने बाद में कुल ऐसे यूरोपनिवासियों
की सूची तैयार करने को कोशिश की, जो उस समय कलकत्ते के
क़िले के अन्दर मरे श्रौर उसे १२३ तक लाने का प्रयत्न भी किया,
फिर भी यह सूची ५६ से ऊपर न पहुंच सकी श्रौर ये ५६ भी किसी
कोठरी में दम घुटकर नहीं मरे, बल्कि लड़ाई के ज़ख़्मों श्रौर मामूली
रोगों के शिकार हुए। फिर बाक़ी ६७ कौन थे ? इत्यादि ।
वास्तव में इस झूठे क़िस्से को फ़रवरी सन् १७५७ ई० में
कलकत्ते के अंगरेज़ मुखिया हॉलवेल ने भारत से विलायत जाते
समय जहाज़ के ऊपर बैठकर गढ़ा था। यह वही हॉलवेल है जिसको
सिराजुद्दौला ने हथकड़ी खुलवा दी थी। अपने झूठों और जाल-
साज़ियों के लिए यह अंगरेज़ काफ़ी मशहूर था।
मिसाल के तौर पर हॉलवेल के अन्य कारनामों में से केवल एक
को यहाँ बयान कर देना काफ़ी होगा। यह घटना कुछ दिनों
बाद की है, किन्तु इस स्थान पर बेमौक़े न होगी। सिराजुद्दौला
के बाद मीर जाफ़र को मसनद पर बैठाने के लिए उसने मीर जाफ़र
से एक लाख रुपए रिश्वत के ले लिए और मीर जाफ़र की खूब
तारीफ़ की। बाद में जब मीर क़ासिम को मसनद पर बैठाने
की ज़रूरत हुई तो उसने तीन लाख रुपए मीर क़ासिम से लेकर

सिराजुद्दौला ५३
चट कर लिए। अब मीर जाफ़र को बदनाम करना उसके लिए
ज़रूरी हो गया। इसलिए कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम उसने एक
लम्बा पत्र लिखा, जिसमें मीर जाफ़र को उसने घोर अन्यायी और
हत्यारा बयान किया और अनेक ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की एक
सूची साथ में दी, जिन्हें वह लिखता है कि मीर जाफ़र ने बेक़सूर
मार डाला। प्रत्येक पुरुष के पिता का नाम और प्रत्येक स्त्री के
पति का नाम सूची में दिया गया। छोटी से छोटी तफ़सील तक
इन हत्याओं की हॉलवेल के पत्र में मौजूद है। इसके कई साल बाद
क्लाइव और उसके साथियों ने डाइरेक्टरों को एक और पत्र भेजा
जिसमें उन्होंने बताया कि मीर जाफ़र पर जितने इलज़ाम हॉलवेल
ने लगाए हैं वे सब सर से पाँव तक झूठे हैं और जिन पुरुष स्त्रियों
की सूची हॉलवेल ने अपने पत्र में दी है यह कह कर कि मीर जाफ़र
ने इन लोगों को बेक़सूर मारडाला उनमें से दो को छोड़कर बाक़ी
सब अभी तक ज़िंदा हैं।*
फिर भी सिराजुद्दौला को बदनाम करने और अपने देशवासियों
के काले कारनामों पर मुलम्मा फेरने के लिए उस समय से आज
तक अंग्रेज़ इतिहास लेखकों ने हॉलवेल की ब्लैक होल नामक
कल्पना से पूरा फ़ायदा उठाया है। अंग्रेज़ी स्कूलों की समस्त
पाठ्य पुस्तकों में, जिनमें कि अंग्रेज़ों के ऊपर सिराजुद्दौला के
बेशुमार अहसानों का कहीं ज़िक्र नहीं, उनमें यह क़िस्सा सच्चा
कह कर बयान किया जाता है।

  • Letter to the Directors, dated 1st October, 1765, by Clive and others.

५४ भारत में अंगरेज़ी राज
अपनी वीरता और उदारता दोनों का सबूत देने के बाद
[हाशिया: सिराजुद्दौला की] विजयी सिराजुद्दौला २४ जून को कलकत्ते से
[हाशिया: कलकत्ते से वापसी] अपनी राजधानी की ओर लौटा। मार्ग में हुगली
के ऊपर उसने एक दरबार किया, जिसमें फ्रांसीसी
कोठी के वकील ने साढ़े तीन लाख रुपए और डच कोठी के वकील
ने साढ़े चार लाख रुपए अपनी अपनी राजभक्ति दर्शाने के लिए
सिराजुद्दौला की नज़र किए। सिराजुद्दौला ने उन्हें अपना व्यापार
जारी रखने की इजाज़त दे दी। सिराजुद्दौला को अभी तक आशा
थी कि इसी तरह का समझौता अङ्गरेज़ों के साथ भी हो जायगा।
११ जुलाई सन् १७५६ ई० को सिराजुद्दौला मुर्शिदाबाद पहुँच गया।
थोड़े ही दिनों बाद पूर्णिया के नवाब शौकतजंग ने फिर
बग़ावत का झंडा ऊँचा किया। १६ अक्तूबर सन् १७५६ को राज-
महल नामक स्थान पर सिराजुद्दौला और शौकतजंग की सेनाओं
में मुक़ाबला हुआ, जिसमें शौकतजंग काम आया और सिराजुद्दौला
ने विजय प्राप्त की। सिराजुद्दौला अब शौकतजंग की जगह राजा
युगलसिंह नामक एक हिन्दू को पूर्णिया की गद्दी पर बैठाकर
मुर्शिदाबाद लौट आया। इस बार सिराजुद्दौला की प्रजा ने उसे
बधाइयाँ दीं और दिल्ली के सम्राट ने एक नए फ़रमान के ज़रिये
उसे बंगाल, बिहार और उड़ीसा तीनों प्रान्तों की सूबेदारी की
मसनद पर फिर से पक्का किया। यह बात याद रखने योग्य है कि
सिराजुद्दौला आरम्भ से जो कुछ करता था दिल्ली सम्राट के नाम
पर और सम्राट एक सेवक की हैसियत से ही करता था।

सिराजुद्दौला ५५
कलकत्ते से भागे हुए अंगरेज़ कलकत्ते से कुछ नीचे बंगाल
[हाशिया: फल्ता में] की खाड़ी के ऊपर फल्ता नामक स्थान पर जाकर
[हाशिया: अंगरेज़] ठहर गए और क़रीब छै महीने वहीं ठहरे रहे ।
कम्पनी के कारबार की दृष्टि से उस ज़माने में
कलकत्ते की निस्बत मद्रास अधिक महत्व की जगह थी। फल्ता
से इन अंगरेज़ों ने एक ओर तो मद्रास की कोठी के अंगरेज़ों को यह
लिखा कि मद्रास से नई सेना जमा करके बंगाल भेजी जाय और
दूसरी ओर—क्योंकि केवल सेना के बल सिराजुद्दौला से जीतना
वे असम्भव समझ चुके थे—उन्होंने अपने गुप्तचरों के ज़रिये झूठे
सच्चे लोभ दिखलाकर कलकत्ते के राजा मानिकचंद को और
सिराजुद्दौला के अन्य सेनापतियों, दरबारियों और सामन्तों को
अपनी ओर फोड़ने के प्रयत्न शुरू किए । निस्संदेह भेद नीति का
यह विस्तृत जाल ही वह मुख्य उपाय था जिसके द्वारा ये मुट्ठी
भर निर्बल किन्तु चालाक विदेशी बलवान किन्तु अनुभवशून्य
भारतीय नवाब को गिराने की आशा कर रहे थे । स्क्रैफ़टन नामक
अंगरेज़ लिखता है :—
“यह एक बड़े भारी आश्चर्य की बात मालूम होगी कि सूबेदार (नवाब)
ने इतने दिनों इतनी शान्ति से हमें फल्ता में क्यों पड़े रहने दिया । × × ×
इसकी वजह मैं केवल यह बता सकता हूँ कि वह हमें एक बहुत ही तुच्छ
चीज़ समझता था । × × × और उसे इस बात का गुमान भी न था कि
हम सैन्यबल के सहारे फिर बंगाल लौटने की हिम्मत करेंगे ।” ꕤ

  • "Reflections" by Scrafton p. 58.

५६ भारत में अंग्रेज़ो राज
इस पर जीन लॉ लिखता है :-
“सिराजुद्दौला यूरोपनिवासियों को बहुत ही ज़्यादा हक़ीर और तुच्छ
समझता था । वह कहा करता था कि इन्हें ठिकाने रखने के लिये केवल एक
जोड़ी चप्पल की ज़रूरत है । × × × इसलिए वह यह सोच ही न सकता
था कि अंग्रेज़ सैन्यबल द्वारा फिर से बंगाल में पैर जमाने का विचार कर
सकते हैं । यदि वह यह अनुमान भी कर सकता था कि अंग्रेज़ कोई नई
तरकीब सोच रहे होंगे तो केवल यह अनुमान कर सकता था कि वे विनम्र
होकर एक हाथ से मेरे सामने नज़र पेश करेंगे और दूसरे हाथ से फिर
अपनी तिजारत शुरू करने के लिए खुशी के साथ मेरा फ़रमान हासिल
करेंगे । निस्संदेह इसी ख़याल से सिराजुद्दौला ने अंग्रेज़ों को शांतिपूर्वक
फलता में पड़े रहने दिया ।”*
फलता में अंग्रेज़ों ने नवाब के अफ़सरों से यह कहा कि हमें
मौसम ख़राब होने की वजह से यहाँ रुकना पड़
सिराजुद्दौला के रहा है और ज्योंही मौसम समुद्र यात्रा के
साथ छल क़ाबिल हुआ हम मद्रास चले जायँगे । दूसरी
ओर उन्होंने “नवाब को धोखा देने के स्पष्ट उद्देश से”† अत्यन्त
दीन और नम्र शब्दों में इस मज़मून की अर्ज़ियाँ सिराजुद्दौला
के पास भेजनी शुरू कर दीं कि हमें फिर से बंगाल में व्यापार करने
की इजाज़त दी जाय ।

  • Bengal in 1756—57, vol. iii. p. 176.
    † “To deceive the Nawab…………” S. C. Hill in Bengal in 1756—57.
    vol. i, pp. cxi, cxv.

सिराजुद्दौला ५७
सिराजुद्दौला ने बजाय किसी तरह की सख़्ती के इस समय भी
सिराजुद्दौला की उनके साथ दया का व्यवहार किया । जब उसे
दयालुता यह मालूम हुआ कि अंगरेज़ों के फल्ता पहुँचने
पर वहाँ के लोगों ने बाज़ार बंद कर दिए थे
जिसकी वजह से अगरेज़ों को रसद की दिक़्क़त हो रही थी, तो
उसने फ़ौरन हुकुम भेज दिया कि बाज़ार खोल दिए जायँ और
“बेचारे परदेसियों को खाने पीने के सामान की कोई दिक़्क़त न
होने पाए ।” सिराजुद्दौला दिल से चाहता था कि अंगरेज़ अपनी
शरारतें छोड़कर फिर से बंगाल में तिजारत करने लगें । इसीलिए
उसने अपनी विजय के बाद भी क़ासिमबाज़ार, कलकत्ते इत्यादि
की कोठियों में उनके तिजारती माल को हाथ न लगाया था ।
सिराजुद्दौला की नीयत यदि कुछ और होती तो कलकत्ते या
फल्ता में से कहीं भी इन विदेशी व्यापारियों का एक एक कर
ख़ात्मा कर डालना और साथ ही उनके समस्त षड़यंत्रों का अंत
कर देना उसके लिए एक बहुत ही आसान काम था । यदि वह
ऐसा कर डालता तो कोई निष्पक्ष इतिहास लेखक उसे दोषी भी न
ठहरा सकता था । किन्तु उस भोले एशियाई नरेश को इन विदेशियों
के चरित्र और उनकी चालों का अभी तक भी पता न था । इस
भोलेपन का मूल्य सिराजुद्दौला और उसके देश दोनों को बहुत
ज़बरदस्त चुकाना पड़ा ।
२० जून सन् १७५६ को अंगरेज़ कलकत्ते से निकाले गए । १६
अगस्त को कलकत्ते के छिन जाने का समाचार मद्रास पहुँचा ।

५८ भारत में अंगरेज़ी राज
अक्तूबर के मध्य में ८०० यूरोपियन और १३०० हिन्दोस्तानी
[हाशिया: बंगाल में अंगरेज़ों का फिर से प्रवेश] सिपाही मद्रास से रवाना किए गए। जल सेना
का अधिकार ऐडमिरल वाट्सन को और स्थल
सेना का सुप्रसिद्ध करनल क्लाइव को दिया
गया। मद्रास की अंगरेज़ कौंसिल के मेम्बरों ने १३ अक्तूबर के एक
पत्र में इस सेना के अफ़सरों को खुले आदेश दिया कि आप लोग
बंगाल पहुँच कर नवाब के आदमियों को अपनी ओर फोड़कर
किसी दूसरे को नवाबी का हक़दार खड़ा करके और अन्य हर
तरह के उपायों और षड्यन्त्रों द्वारा नवाबी को पलट देने का प्रयत्न
करें।* इस प्रकार बंगाल में ग़दर करवाने के इरादे से दिसम्बर
सन् १७५६ के मध्य में यह सेना फल्ता पहुँच गई ।
यह सैन्यबल भी बहुत दरजे तक केवल एक दिखावे की चीज़
थी। असली चीज़ साज़िशों का वह जाल था जो
[हाशिया: साज़िशों का जाल] बंगाल में पूरी तरह फैल चुका था। कलकत्ते का
राजा मानिकचंद भी किसी न किसी लालच में
फंस कर अपने स्वामी और देश दोनों के साथ विश्वासघात करने
को राज़ी हो गया। फल्ता पहुँचते ही क्लाइव और वाट्सन दोनों ने
नवाब के नाम अलग अलग दो लम्बे पत्र लिखे, जिनमें सिवाय
धमकियों, छल और बदतमीज़ी के और कुछ न था। सिराजुद्दौला
इन पत्रों का क्या उत्तर दे सकता था ? और अंगरेज़ों को भी
सिराजुद्दौला के जवाब का कहाँ इन्तज़ार था ?

  • Letter dated 13th October 1756. Bengal in 1756-57, vol. i, pp. 239, 240.

सिराजुद्दौला ५६
कलकत्ते से कुछ नीचे बजबज में एक अत्यन्त मज़बूत पुराना
[बजबज में दिखा- क़िला था, जिसके चारों ओर एक गहरी खाई
वटी लड़ाई] थी। यह क़िला राजा मानिकचंद के सुपुर्द था।
२६ दिसम्बर को क्लाइव के अधीन थोड़ी सी
अंगरेज़ी सेना जहाज़ से उतर कर बजबज पहुँची। अंगरेज़ों और
मानिकचंद के बीच पहले से तय हो चुका था कि मानिकचंद केवल
दिखाने के लिए एक बार अंगरेज़ों का मुक़ाबला करे। चुनाँचे
मानिकचंद दो हज़ार सैनिक लेकर क्लाइव के २६० सैनिकों का
मुक़ाबला करने के लिए क़िले से बाहर निकला। केवल आध घंटे की
झूठी फटफट के बाद मानिकचंद ने क़िले के दरवाज़े खोल दिए और
बिना किसी रुकावट के २६ दिसम्बर की रात को अंगरेज़ी सेना ने
बजबज के ज़बरदस्त क़िले में प्रवेश किया। मानिकचंद अपनी सेना
लिए पीछे की ओर हटता चला गया। मानिकचंद कायर न था।
छै साल बाद कम्पनी ने राजा मानिकचंद के एक बेटे को अपने
यहाँ तनख़्वाह देकर नौकर रखा, जिसकी वजह सरकारी काग़ज़ात
में इन साफ़ शब्दों में दी हुई है—"क्योंकि पिछले ३० साल के
अंदर मानिकचंद कई तरह से हमारे लिए उपयोगी साबित हो
चुका था।"*
बजबज के क़िले के अंदर जितने मामूली ग़ैर फ़ौजी हिन्दुस्तानी
थे, उनमें से कुछ भाग निकले और जो रहे उनको अंगरेज़ों ने क़त्ल
कर दिया ?

  • Rev. Long's Selections from the Government Records.

६० भारत में अंगरेज़ी राज
इसके बाद दूसरी जगह, जहाँ मानिकचंद अंगरेज़ों का मुक़ा-
कलकत्ते पर अंग- बला कर सकता था, कलकत्ता थी। किन्तु यहाँ
रेज़ों का फिर से पर उसने या उसके विदेशी दोस्तों ने दिखावे की
क़ब्ज़ा। भी ज़रूरत न समझी। बजबज से भागकर मानिक-
चंद सीधा हुगली पहुँचा। वहाँ से उसने सिराजु-
दौला को कहला भेजा कि “अंगरेज़ों की विशाल ( ? ) सेना के
सामने मैं ठहर न सका।” २ जनवरी सन् १७५७ को मानिकचंद
की ग़ैरहाज़िरी में बहुत आसानी से कलकत्ता फिर से अंगरेज़ों के
हाथों में आगया। इसके बाद तान्नाह का क़िला भी अंगरेज़ी
सेना को पहले ही से खुला हुआ और ख़ाली मिला। ३ जनवरी
सन् १७५७ को कलकत्ते का क़िला ड्रेक और उसकी एक कौंसिल
के हवाले कर दिया गया।
अंगरेज़ इतिहास लेखक एस० सी० हिल लिखता है कि इस
समय सिराजुद्दौला पर हमला करने से पहले अंगरेज़ों के सामने
एक ख़ास सवाल यह था कि सिराजुद्दौला की जगह सूबेदारी का
हक़दार किसको खड़ा किया जाय। कुछ की सलाह थी कि
“सरफ़राज़ ख़ाँ के उन बेटों में से एक को, जो इस समय ढाका में
क़ैद थे, सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ सूबेदारी का हक़दार खड़ा कर
दिया जाय।”* किन्तु यह मामला अभी तय नहीं किया गया।
कलकत्ते के आस पास केवल एक हुगली का क़िला और बाक़ी रह

  • Bengal in 1756—57, vol. i. p. cxxxviii.