भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ भारत में अंगरेज़ी राज
ईसाइयों, मर्द, औरत और बच्चों, यहाँ तक कि उनके ईसाई गुलामों
तक को उन्होंने अपनी कोठी के आस पास मकानों में जमा कर
लिया और बाहर चारों ओर के हिन्दोस्तानी मकानों को आग लगा
दी, ताकि सिराजुद्दौला से लड़ने के लिए मैदान साफ़ हो जाय ।
इतना ही नहीं, मालूम होता है कि ये लोग उस समय किसी
भी हिन्दोस्तानी पर विश्वास न कर सकते थे। सुप्रसिद्ध श्रमीचंद,
उसके साले हज़ारीमल और दीवान राजवल्लभ के बेटे राजा
किशनदास, इन तीनों को अंगरेज़ों ने क़ैद करके रखना आवश्यक
समझा । यह वही अमीचंद था जिसकी सहायता के बिना अंगरेज़ी
व्यापार या अंगरेज़ी सत्ता दोनों में से किसी के भी पैर बंगाल
के अन्दर हरगिज़ न जम सकते थे और राजा किशनदास अंगरेज़
कम्पनी का वह शरणागत था, जिसे उन्होंने सिराजुद्दौला के हवाले
करने तक से इनकार कर दिया था ।
जिस समय अंगरेज़ सिपाही अमीचंद को पकड़ने के लिए
उसके मकान पर पहुँचे, अमीचंद ने फ़ौरन अपने
ज़नानखाने पर
हमला
को उनके हवाले कर दिया । किन्तु हज़ारीमल
और राजा किशनदास से यह अपमान न सहा
गया। उन दोनों ने अपने आदमियों को अंगरेज़ सिपाहियों पर
गोली चलाने का हुकुम दिया। लड़ाई में हज़ारीमल वीरता के
साथ लड़ा। उसका बाँया हाथ उड़ गया और अंत में तीनों
गिरफ़्तार कर लिए गए। इसके बाद जब अंगरेज़ अफ़सरों ने अपने
उन्मत्त गोरे सैनिकों को अमीचंद के ज़नानख़ाने को ओर बढ़ने का