भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ भारत में अंगरेज़ी राज
कलकत्ते जाने से पहले इस क़िले को फिर से विजय किया। इस
छोटे से संग्राम में नदी के ऊपर अंगरेज़ों की जहाज़ी तोपें और
किनारे पर से सिराजुद्दौला की तोप दोनों में कुछ देर तक ख़ासा
मुक़ाबला रहा। किन्तु आखिरकार अंगरेज़ी सेना को हारकर अपने
जहाज़ों सहित पीछे हट जाना पड़ा।
सिराजुद्दौला उस समय भी वृथा रक्त बहाने के विरुद्ध था।
अब भी वह इन अंगरेज़ व्यापारियों के साथ अमन
[सिराजुद्दौला की] से रहने के लिए तैयार था। इस यात्रा में उसके
[शान्ति प्रियता] एक दीवान ने कई बार वाट्स को अपने पास
बुलाकर समझाया कि यदि अंगरेज़ अपने इस समय तक के
अपराधों के बदले में बतौर जुर्माने या हरजाने के थोड़ा बहुत
भी धन पेश करने को तैयार हों और आइन्दा अमन से रहने
का वादा करें, तो सुलह की जा सकती है और व्यापार सम्बन्धी
समस्त अधिकार उन्हें फिर से मिल सकते हैं। कलकत्ते के अंगरेज़
अफ़सरों को भी इसकी सूचना दे दी गई। यदि वे चाहते तो उस
समय भी सिराजुद्दौला के साथ सुलह कर सकते थे। किन्तु ये लोग
अपने षडयन्त्रों के बल सिराजुद्दौला का नाश करने की आशा में थे।
ईमानदारी की लड़ाई में वे सिराजुद्दौला का किसी तरह का मुक़ा-
बला न कर सकते थे। फ़ौज और सामान दोनों
[अंगरेज़ों की रिशवतें] की उनके पास बेहद कमी थी। उनका सबसे
[और भेद नीति] बड़ा हथियार था—रिशवतें देकर, लालच देकर
और झूठे वादे करके सिराजुद्दौला के आदमियों और सैनिकों को