भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिराजुद्दौला ४३
विद्रोही इस समय सिराजुद्दौला के हाथों में थे । वह चाहता तो वहीं
उनका काम तमाम कर सकता था । किन्तु उसने उनकी जानें बख़्श
दीं और उन्हें अपने साथ ले लिया। क़ासिमबाज़ार की कोठी के
तिजारती माल को भी उसने बिलकुल हाथ न लगाया। केवल वहाँ
के हथियारों और गोला बारूद को वहाँ से हटा लिया ।
वाट्स और दूसरे अंगरेज़ों को साथ लेकर ५ जून १७५६ को
सिराजुद्दौला कलकत्ते की ओर बढ़ा। उन दिनों की सैन्ययात्रा
निस्संदेह कुछ और ही थी। रेलों का उस समय संसार में कहीं
निशान न था, सड़कें भी हर जगह मौजूद न थीं। बंगाल की
सख़्त से सख़्त धूप और गरमो का महीना, उस पर रमज़ान के
दिन, जब कि सेना के अधिकांश मुसलमान अफ़सर और सिपाही
दिन दिन भर रोज़ा रखते थे । भारी भारी तोपें और अन्य सब
सामान जिसके बिना उन दिनों यात्रा असम्भव थी और जिसे
हाथियों और बैलों से खिंचवाकर ले जाना होता था । इन सब
हालतों में सिराजुद्दौला की सेना ने ११ दिन के अन्दर १६० मील
का सफ़र तय किया ।
अंगरेज़ों के काफ़ी युद्ध के जहाज़ कलकत्ते पहुँच चुके थे और
[हाशिया: तान्नाह में अंगरेज़ों की हार] इन लोगों ने अपनी ओर से सिराजुद्दौला के
विरुद्ध खुली बग़ावत शुरू कर दी थी । इस बीच
- १३ जून को अंगरेज़ी सेना ने कलकत्ते से पाँच
मील नीचे हुगली के इस पार तान्नाह का क़िला वहाँ के मुट्ठी भर
भारतीय संरक्षकों के हाथों से छीन लिया । सिराजुद्दौला ने