अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
About this granth
The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.
The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.
The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.
नामक वायु रखी है. अपने पति के पास जाने वाली सूर्या इस मनोमय रथ पर चढ़ती है. (१२)
सूर्याया वहतुः प्रागात् सविता यमवासृजत्.
मघासु हन्यन्ते गावः फल्गुनीषु व्यु ह्यते.. (१३)
सविता देव ने जिस को भेजा था, सूर्या का वह दहेज आगे गया है. मघा नक्षत्र में गाएं
भेजी जाती हैं और फाल्गुनी नक्षत्रों में विवाह होता है. (१३)
यदश्विना पृच्छमानावयातं त्रिचक्रेण वहतुं सूर्यायाः.
क्वैकं चक्रं वामासीत् क्व देष्ट्राय तस्थथुः.. (१४)
हे अश्विनीकुमारो! जब तुम सूर्या का दहेज ले कर चले, उस समय तुम देवों को पूछते
हुए तीन पहियों वाले रथ के सहारे चले. तुम्हारा वह कर्म सब देवों को रुचिकर प्रतीत हुआ.
पूषा ने तुम्हें इस प्रकार स्वीकार किया जैसे पुत्र पिता को स्वीकार करता है. (१४)
यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप.
विश्वे देवा अनु तद् वामजानन् पुत्रः पितरमवृणीत पूषा.. (१५)
हे सूर्या! तेरे रथ के दोनों चक्रों को ज्ञानीजन ऋतु के अनुसार जानते हैं. तेरे रथ का जो
एक चक्र गुप्त है, उसे विशेष ज्ञानी ही जानते हैं. (१५)
द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः.
अथैकं चक्रं यद् गुहा तदद्धातय इद् विदुः.. (१६)
हे शुभ करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम दोनों जब वर के द्वारा पूछने योग्य सूर्य के समीप
गए, तुम्हारे उसे कर्म को सभी देवों ने सराहा. पूषा ने तुम्हें उसी प्रकार स्वीकार किया जिस
प्रकार पुत्र पिता को स्वीकार करता है. (१६)
अर्यमणं यजामहे सुबन्धुं पतिवेदनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनात् प्रेतो मुञ्चामि नामुतः.. (१७)
अच्छे बंधुबांधवों से युक्त पति का ज्ञान देने वाले तथा श्रेष्ठ मनवाले हम तेरा सत्कार
करते हैं. खरबूजा जिस प्रकार अपनी बेल से छूट जाता है, उसी प्रकार मैं तुझे तेरे पितृकुल से
छुड़ाता हूं, मैं तुझे पतिकुल से अलग नहीं करता. (१७)
प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम्.
यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति.. (१८)
मैं तुझे तेरे पितृकुल से मुक्त करता हूं, पतिकुल से नहीं. पतिकुल से तो मैं तुझे
भलीभांति बांधता हूं. हे दाता इंद्र! ऐसी कृपा करो कि यह वधू उत्तम पुत्रों वाली तथा
सौभाग्यशालिनी बने. (१८)
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वाबध्नात् सविता सुशेवाः.
ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोके स्योनं ते अस्तु सहसंभलायै.. (१९)
मैं तुझे वरुण के उस शाप से मुक्त करता हूं, जिस से तुझे सेवा करने योग्य सविता ने
बांधा था. सदाचारी और उत्तम कर्म करने वाले पति के घर में तुझे सुख प्राप्त हो. (१९)
भगस्त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन.
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि.. (२०)
भग नाम के देव तेरा हाथ पकड़ कर तुझे यहां से चलाएं. अश्विनीकुमार तुझे रथ में बैठा
कर तेरे पति के घर पहुंचाएं. तू अपने पति के घर को जा. वहां तू घर की स्वामिनी बन और
सब को वश में रख. पति के घर में तू उत्तम विवेक की बात कह. (२०)
इह प्रियं प्रजायै ते समृध्यतामस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि.
एना पत्या तन्वं १ सं स्पृशस्वाथ जिर्विर्विदथमा वदासि.. (२१)
अपने पति के घर में तू गार्हपत्य अग्नि के प्रति सचेत रह. तेरी संतान के लिए वस्तुएं
बढ़ें. तू अपनी आयु पूर्ण होने तक बोलती रहे. (२१)
इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्य श्रुतम्.
क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वस्तकौ.. (२२)
तुम दोनों पतिपत्नी सदा साथ रहो. तुम कभी एकदूसरे से अलग मत होओ. तुम दोनों
जीवन पर्यंत अनेक प्रकार के भोजन करो, अपने पुत्र आदि के साथ क्रीड़ा कर के तथा
कल्याण से मुक्त होते हुए सदा प्रसन्न रहो. (२२)
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्.
विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूंरन्यो विदधज्जायसे नवः.. (२३)
ये सूर्य और चंद्रमा शिशु के समान क्रीड़ा करते हुए पूर्व से पश्चिम की ओर गमन करते
हैं. इन में से एक अर्थात् सूर्य लोकों को देखता हुआ ऋतुओं का निर्माण करता है तथा नवीन
रूप में प्रकट होता है. (२३)
नवोनवो भवसि जायमानो ऽ ह्नां केतुरुषसामेष्यग्रम्.
भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः.. (२४)
हे चंद्र! तुम मास में स्थित हो कर सदा नवीन रहते हो. तुम अपनी कलाओं को घटाते
और बढ़ाते हुए प्रतिपदा आदि तिथियों का निर्माण करते हो. तुम उषा काल में आगे आ कर
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देवों को उत्तम भाग देते हो तथा सभी को दीर्घ जीवन प्रदान करते हो. (२४)
परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु.
कृत्यैषा पद्द्वती भूत्वा जाया विशते पतिम्.. (२५)
हे वर! तुम उत्तम वस्त्रदान करो तथा ब्राह्मणों को धन दो, जब यह कृत्या अर्थात्
विनाशक स्वभाव वाली स्त्री बन कर पति के समीप जाती है. (२५)
नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्य ज्यते.
एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते.. (२६)
जब नीला और लाल वस्त्र होता है अथवा पुरुष क्रोधित होता है, तभी यह कृत्या अर्थात्
विनाशक स्वभाव वाली स्त्री बढ़ती है तथा इस की जाति के मनुष्यों की वृद्धि होती है. इसी के
कारण इस का पति बंधन में बंध जाता है. (२६)
अश्लीला तनूर्भवति रुशती पापयामुया.
पतिर्यद् वध्वो ३ वासः स्वमङ्गमभ्यूर्णुते.. (२७)
जब पत्नी के वस्त्र से पति अपना शरीर ढकता है, तब सुंदर शरीर वाला पति भी इस
पाप पूर्ण रीति के कारण शोभाहीन हो जाता है. (२७)
आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम्.
सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मोत शुम्भति.. (२८)
धारी वाले वस्त्रों में सिर के वस्त्र तथा सभी अंगों पर रहने वाले वस्त्रों में कृत्या अर्थात्
दुष्ट स्वभाव वाली स्त्री के रूपों को देखो. इन रूपों को ब्रह्मा ही तेजस्वी करता है. (२८)
तृष्टमेतत् कटुकमपाष्ठवद् विषवन्नैतदत्तवे.
सूर्या यो ब्रह्मा वेद स इद् वाधूयमर्हति.. (२९)
यह अन्न प्यास उत्पन्न करने वाला तथा कड़वा है. यह अन्न घृणित तथा विषैला है. यह
खाने योग्य नहीं है. जो ब्राह्मण सूर्या को इस प्रकार की शिक्षा देता है, वह निश्चित रूप से वधू
संबंधी वस्त्र लेने योग्य है. (२९)
स इत् तत् स्योनं हरति ब्रह्मा वासः सुमङ्गलम्.
प्रायश्चित्तिं यो अध्येति येन जाया न रिष्यति.. (३०)
जिस वस्त्र से प्रायश्चित्त होता है अर्थात् चित् की शुद्धि होती है तथा जिस के कारण
पत्नी मरण को प्राप्त नहीं होती है, उस कल्याणकारी वस्त्र को ब्रह्मा धारण करता है. (३०)
युवं भगं भरतं समृद्धमृतं वदन्तावृत्तोद्येषु.
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ब्रह्मणस्पते पतिमस्यै रोचय चारु संभलो वदतु वाचमेताम्.. (३१)
हे पति और पत्नी! तुम दोनों सत्य व्यवहारों के रहते हुए तथा सत्य भाषण करते हुए
समृद्धि वाला भाग्य प्राप्त करो. हे बृहस्पति! इस पत्नी के हृदय में पति के प्रति रुचि उत्पन्न
करो. पति इस के प्रति सुंदर वाणी बोले. (३१)
इहेदसाथ न परो गमाथेमं गावः प्रजया वर्धयाथ.
शुभं यतीरुसियाः सोमवर्चसो विश्वे देवाः क्रन्निह वो मनांसि.. (३२)
हे गायो! तुम यहां ही रहो. तुम यहां से दूर मत जाओ. तुम इसे उत्तम संतान के साथ
बढ़ाओ. हे गायो! तुम शुभ को प्राप्त कराने वाली तथा चंद्रमा की किरणों के समान प्रभा
वाली बनो. सभी देव तुम्हारे हृदयों को स्थिर बनाएं. (३२)
इमं गावः प्रजया सं विशाथायं देवानां न मिनाति भागम्.
अस्मै वः पूषा मरुतश्च सर्वे अस्मै वो धाता सविता सुवाति.. (३३)
हे गायो! तुम इस के घर में अपनी संतान के साथ प्रवेश करो. यह मनुष्य देवों के भाग
का लोप नहीं करता. विधाता और सविता तुम्हें दूसरे मनुष्य के लिए उत्पन्न करते हैं. (३३)
अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्थानो येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम्.
सं भगेन समर्येम्णा सं धाता सृजतु वर्चसा.. (३४)
हमारे वे सभी मार्ग कंटक रहित और सरल हैं, जिन से हमारे मित्र कन्या के घर तक
पहुंचते हैं. धाता, भग और अर्यमा देव इसे तेज से युक्त करें. (३४)
यच्च वर्चो अक्षेषु सुरायां च यदाहितम्.
यद् गोष्वश्विना वर्चस्तेनेमां वर्चसावतम्.. (३५)
हे अश्विनीकुमारो! जो तेज आंखों में होता है, जो संपत्ति में स्थान प्राप्त करता है तथा
जो तेज गायों में है, उसी तेज से इस की रक्षा करो. (३५)
येन महानघ्न्या जघनमश्विना येन वा सुरा.
येनाक्षा अभ्यषिच्यन्त तेनेमां वर्चसावतम्.. (३६)
हे अश्विनीकुमारो! जिस से बड़ी गौ का निचला दुग्धाशय का भाग, जिस से संपत्ति तथा
जिस से आंखें भरी रहती हैं, उस तेज से उस वधू की रक्षा करो. (३६)
यो अनिध्मो दीदयदप्स्व १ न्तर्यं विप्रास ईडते अध्वरेषु.
अपां नपान्मधुमतीरपो दा याभिरिन्द्रो वावृधे वीर्या वान्.. (३७)
जो जलों में बिना ईंधनों के चमकने वाला तेज है, जो यज्ञों के द्विजों का ज्ञान रूप तेज
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है, जो जलों में मधुरता और पुरुषों में वीर्य है; इस तेज, ज्ञान, माधुर्य और वीर्य से गृहस्थ युक्त
हों. इंद्र इन्हीं की अधिकता से सब से महान बने हैं. (३७)
इदमहं रुशन्तं ग्राहं तनूदूषिमपोहामि. यो भद्रो रोचनस्तमुदचामि.. (३८)
मैं शरीर में दोष उत्पन्न करने वाले विनाशक रोग को दूर करता हूं. जो कल्याणमय
तेजस्वी है, उसे अपने पास बुलाता हूं. (३८)
आस्यै ब्राह्मणा: स्नपनीर्हरन्त्वीरघ्नीरुदजन्त्वापः
अर्यम्णो अग्निं पर्येतु पूषन् प्रतीक्षन्ते श्वशुरो देवरश्च.. (३९)
ब्राह्मण इस के लिए स्नान का जल ले आएं. वे ऐसा जल लाएं जो वीर का नाश न करे.
वह अर्यमा देव की अग्नि की प्रदक्षिणा करे. हे पूषा देव! ससुर और देवर इस वधू की प्रतीक्षा
करें. (३९)
शं ते हिरण्यं शमु सन्त्वापः शं मेथिर्भवतु शं युगस्य तद्मँ.
शं त आपः शतपवित्रा भवन्तु शमु पत्या तन्वं १ सं स्पृशस्व.. (४०)
तेरे लिए सुवर्ण कल्याणकारी तथा जल सुख देने वाला हो. गाय बांधने का खंभा तुझे
सुख देने वाला हो. जुए का छेद तुझे सुखकर हो. सौ प्रकार से पवित्रता प्रदान करने वाला
जल तेरे लिए सुखकारी हो. तू सुखकारक एक रीति से अपने पति के साथ अपने शरीर का
स्पर्श कर. (४०)
खे रथस्य खे ऽ नसः खे युगस्य शतक्रतो.
अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्वाकृणोः सूर्यत्वचम्.. (४१)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र देव! रथ के छिद्र में, गाड़ी के छिद्र तथा जुए के छिद्र में
अयोग्य रीति से पाली हुई युवती को तुम ने तीन बार पवित्र कर के सूर्य के समान तेजस्वी
त्वचा वाला बनाया है. (४१)
आशासाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम्.
पत्युरनुव्रता भूत्वा सं नह्यस्वामृताय कम्.. (४२)
उत्तम मन, संतान, सौभाग्य और धन की आशा करने वाली तू पति के अनुकूल
आचरण करने वाली हो कर सुखपूर्वक अमरत्व के हेतु सिद्ध हो. (४२)
यथा सिन्धुर्नदीनां साम्राज्यं सुषुवे वृषा.
एवा त्वं सम्राज्ञ्येधि पत्युरस्तं परेत्य.. (४३)
जिस प्रकार शक्तिशाली सागर नदियों पर शासन करता है, उसी प्रकार तू भी अपने
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पति के घर पहुंच कर सम्राज्ञी बनती हुई निवास कर. (४३)
सम्राज्ञ्येधि श्वशुरेषु सम्राज्ञ्युत देवृषु.
ननान्दुः सम्राज्ञ्येधि सम्राज्ञ्युत श्वश्र्वाः.. (४४)
तू ससुरों में स्वामिनी के समान, वरों में महारानी के समान आदर पा कर रह. तू ननद के
साथ रानी के समान तथा सास के साथ सम्राज्ञी के समान निवास कर. (४४)
या अकृन्तन्नवयन् याश्च तन्निरे या देवीरन्ताँ अभितो ऽ ददन्त.
तास्त्वा जरसे सं व्ययन्त्वायुष्मतीदं परि धत्स्व वासः.. (४५)
जिन देवियों ने स्वयं सूत काता है, जिन्होंने बुना है, जो ताना तानती हैं तथा चारों ओर
अंतिम भागों को ठीक रखती है, वे तुझे वृद्धावस्था तक रहने के लिए चुनें. तू दीर्घ आयु वाली
हो कर इन सब को धन्य बना. (४५)
जीवं रुदन्ति वि नयन्त्यध्वरं दीर्घामनु प्रसितिं दीध्युर्नरः.
वामं पितृभ्यो य इदं समीरिरे मयः पतिभ्यो जनये परिष्वजे.. (४६)
जीवित मनुष्य की विदाई पर लोग रोते हैं, यज्ञ को साथ ले जाते हैं तथा दीर्घ मार्ग का
विचार करते हैं. वे लोग अपने मातापिता के लिए यह सुंदर कार्य करते हैं. वे पत्नी को सुख
देने वाले हैं, जो स्त्री का आलिंगन करते हैं. (४६)
स्योनं ध्रुवं प्रजायै धारयामि ते ऽ श्मानं देव्याः पृथिव्या उपस्थे.
तमा तिष्ठानुमाद्या युवर्चा दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु.. (४७)
मैं पृथ्वी माता के पास संतान के लिए सुख देने वाला तथा स्थिर पत्थर के समान
आधार बनाता हूं. तू उस पर खड़ा तथा आनंद का अनुभव कर. तुम उत्तम तेज वाला बनो.
सविता तुझे लंबी आयु प्रदान करे. (४७)
येनाग्निरस्या भूम्या हस्तं जग्राह दक्षिणम्.
तेन गृह्णामि ते हस्तं मा व्यथिष्ठा मया सह प्रजया च धनेन च.. (४८)
जिस कारण अग्नि ने इस भूमि का दायां हाथ ग्रहण किया है, उसी उद्देश्य से मैं तेरा
हाथ पकड़ता हूं. तू दुःख मत कर. तू मेरे साथ प्रजा अर्थात् संतान और धन के साथ निवास
कर. (४८)
देवस्ते सविता हस्तं गृह्णातु सोमो राजा सुप्रजसं कृणोतु.
अग्निः सुभगां जातवेदाः पत्ये पत्नीं जरदष्टि कृणोतु.. (४९)
सविता देव तेरा पाणिग्रहण करें. राजा लोग तुझे उत्तम संतान वाली बनाएं. जातवेद
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अग्नि पति के लिए सौभाग्य वाली स्त्री को वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाली बनाएं. (४९)
गृह्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः.
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः.. (५०)
मैं सौभाग्य के लिए तेरा हाथ पकड़ता हूं. तू मुझ पति के साथ वृद्धावस्था तक जीवित
रह. भग, अर्यमा, सविता तथा सभी देवों ने तुझ को मेरे हाथ में गृहस्थाश्रम चलने के लिए
दिया है. (५०)
भगस्ते हस्तमग्रहीत् सविता हस्तमग्रहीत्.
पत्नी त्वमसि धर्मणाहं गृहपतिस्तव.. (५१)
भग तथा सूर्य देव ने तेरा हाथ पकड़ा है, इसलिए तू धर्मपूर्वक मेरी पत्नी है और मैं तेरा
पति हूं. (५१)
ममेयमस्तु पोष्या मह्यं त्वादद् बृहस्पतिः.
मया पत्या प्रजावति सं जीव शरदः शतम्.. (५२)
बृहस्पति ने तुझे मेरे लिए दिया है. तू मुझ पति के साथ रहती हुई संतान वाली बन तथा
सौ वर्ष की आयु भोगती हुई मेरी पोष्या अर्थात् पुष्ट होने वाली और पोषण प्राप्त करने वाली
बन. (५२)
त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पतेः प्रशिषा कवीनाम्.
तेनेमां नारीं सविता भगश्च सूर्यामिव परि धत्तां प्रजया.. (५३)
हे शुभे! इस कल्याणकारी वस्त्र को बृहस्पति की आज्ञा से त्वष्टा ने बनाया है. सविता
तथा भग देवता सूर्या के समान ही इस स्त्री को इस वस्त्र के द्वारा संतान आदि से संपन्न
बनाएं. (५३)
इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा.
बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु.. (५४)
दोनों अश्विनीकुमार, इंद्र और अग्नि, मित्र और वरुण, आकाश और पृथ्वी, बृहस्पति,
वायु, मरुद्गण, ब्रह्म तथा सोम देवता इस स्त्री को संतान से बढ़ाएं. (५४)
बृहस्पतिः प्रथमः सूर्यायाः शीर्षे केशाँ अकल्पयत्.
तेनेमामश्विना नारीं पत्ये सं शोभयामसि.. (५५)
हे अश्विनीकुमारो! बृहस्पति ने सूर्या के केशों का विन्यास किया था. उसी के अनुसार
हम वरभाव आदि के द्वारा इस स्त्री को पति के निमित्त सजाते हैं. (५५)
इदं तद्रूपं यदवस्त योषा जायां जिज्ञासे मनसा चरन्तीम्.
तामन्वर्तिष्ये सखिभिर्नवग्वैः क इमान् विद्वान् वि चचर्त पाशान्.. (५६)
इस रूप को योषा धारण करती है. मैं योषा को जानता हूं. मैं इस की नवीन चाल वाली
सखियों के अनुसार चलूंगा. यह केश विन्यास किस विद्वान् ने किया है. (५६)
अहं वि ष्यामि मयि रूपमस्या वेददित् पश्यन् मनसः कुलायम्.
न स्तेयमद्मि मनसोदमुच्ये स्वयं श्रथ्नानो वरुणस्य पाशान्.. (५७)
मैं इस के हृदय को जानता हुआ तथा उस के रूप को देखता हुआ अपने से आबद्ध
करता हूं. मैं चोरी का काम नहीं करता. मैं स्वयं मन लगा कर तेरे केशों को गूंथता हुआ तुझे
वरुण के पाशों से मुक्त करता हूं. (५७)
प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् येन त्वाबध्नात् सविता सुशेवाः.
उरुं लोकं सुगमत्र पन्थां कृणोमि तुभ्यं सहपत्न्यै वधु.. (५८)
सविता ने तुझे वरुण के जिस पाश में बांधा है उस पाश से मैं तुझे छुड़ाता हूं. हे पत्नी!
मैं तेरे साथ लोक के इस विस्तृत मार्ग को सरल बनाता हूं. (५८)
उद्याच्छध्वमप रक्षो हनोथेमां नारीं सुकृते दधात.
धाता विपश्चित् पतिमस्यै विवेद भगो राजा पुर एतु प्रजानन्.. (५९)
जल प्रदान करो. राक्षसों को मारो. इस स्त्री को पुण्य में प्रतिष्ठित करो. धाता ने इसे पति
प्रदान किया है. विद्वान् भग इस के सामने हैं. (५९)
भगस्ततक्ष चतुरः पादान् भगस्ततक्ष चत्वार्युष्पलानि.
त्वष्टा पिपेष मध्यतो ऽ नु वर्ध्रानत्सा नो अस्तु सुमङ्गली.. (६०)
भग देवता ने इस के पैरों के लिए चार आभूषणों को तथा शरीर पर धारण करने योग्य
चार फूलों को बनाया है. उन्होंने कमर में पहनने योग्य करधनी बनाई है. इन आभूषणों को
धारण कर के यह स्त्री उत्तम मंगलमयी बने. (६०)
सुकिंशुकं वहतुं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम्.
आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पतिभ्यो वहतुं कृणु त्वम्.. (६१)
हे सूर्या! तू उत्तम पुष्पों वाले, अनेक रूप वाले तथा चमकने वाले अनेक रंगों से
सुशोभित इस रथ पर आसीन हो. जो उत्तम वेष्टनों वाला तथा सुंदर पहियों वाला है. तू अमृत
के लोक पर पहुंच तथा विवाह के दहेज के रूप में प्राप्त इसे अपने पति के लिए सुखदायक
बना. (६१)
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अभ्रातृघ्नीं वरुणापशुघ्नीं बृहस्पते.
इन्द्रापतिघ्नीं पुत्रिणीमास्मभ्यं सवितर्वह.. (६२)
हे बृहस्पति, हे इंद्र, हे सविता देव! इस वधू को अपने भ्राता, पति, पशु आदि का विनाश
करने वाली मत बनाओ. इसे पुत्र, धन आदि में संपन्न रूप में हमें प्राप्त कराओ. (६२)
मा हिंसिष्टं कुमार्य १ स्थूणे देवकृते पथि.
शालाया देव्या द्वारं स्योनं कृण्मो वधूपथम्.. (६३)
हे देव! इस वधू को वहन करने वाले रथ को हानि मत पहुंचाओ. हम इस वधू के मार्ग
को शाला के द्वार पर कल्याणमय बनाते हैं. (६३)
ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्वं ब्रह्मान्ततो मध्यतो ब्रह्म सर्वतः.
अनाब्याधां देवपुरां प्रपद्य शिवा स्योना पतिलोके वि राज.. (६४)
हे वधू! तेरे आगेपीछे, भीतर बाहर एवं मध्य में अर्थात् सभी ओर ब्राह्मण रहें. तू देवों के
निवास वाली एवं रोगरहित शाला को प्राप्त कर तथा पति गृह में मंगलमयी होती हुई प्रसन्नता
प्राप्त कर. (६४)
सूक्त-२ देवता—आत्मा, यक्ष्मानाशिनी
तुभ्यमग्रे पर्यवहन्सूर्यां वहतुना सह.
स नः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह.. (१)
हे अग्नि देव! हम दहेज के साथ सूर्या को तुम्हारे निमित्त लाए थे. तुम हमें संतान वाली
पत्नी दो. (१)
पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा.
दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम्.. (२)
अग्नि देव ने हमें आयु और तेज के साथसाथ पत्नी प्रदान की है. इस का पति दीर्घजीवी
हो और सौ वर्ष की आयु प्राप्त करे. (२)
सोमस्य जाया प्रथमं गन्धर्वस्ते ऽ परः पतिः.
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः.. (३)
हे वधू! तू पहले सोम की पत्नी हुई. इस के बाद तू गंधर्वों की पत्नी बनी. इस के बाद
तेरे तीसरे पति अग्नि देव बने. मैं मनुष्य तेरा चौथा पति हूं. (३)
सोमो ददद् गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये.
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रयिं च पुत्रांश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम्.. (४)
हे वधू! सोम ने तुझे गंधर्व को दिया. गंधर्व ने तुझे अग्नि को प्रदान किया तथा अग्नि ने
तुझे मेरे लिए दिया है. उन्होंने मुझे धन और पुत्रों से भी संपन्न किया. (४)
आ वामगन्त्सुमतिर्वाजिनीवसू न्यू श्विना हृत्सु कामा अरंसत.
अभूतं गोपा मिथुना शुभस्पती प्रिया अर्यम्णो दुर्या अशीमहि.. (५)
हे उषाकालीन ऐश्वर्य वाले अश्विनकुमारो! तुम्हारे हृदय में जो अभीष्ट है, वह तुम्हारी
कृपामयी बुद्धि के द्वारा हमें प्राप्त हो. तुम हमारे प्रिय तथा रक्षक बनो. हम सूर्य देव की कृपा
से घरों में सुख का भोग करने वाले हैं. (५)
सा मन्दसाना मनसा शिवेन रयिं धेहि सर्ववीरं वर्चस्यम्.
सुगं तीर्थं सुप्रापणं शुभस्पती स्थाणुं पथिष्ठामप दुर्मतिं हतम्.. (६)
तुम कल्याणकारी मन से वीरों से युक्त धन का पोषण करो. हे अश्विनी कुमारो! तुम इस
तीर्थ को सुफल करते हुए मार्ग में प्राप्त होने वाली दुर्गति आदि को दूर करो. (६)
या ओषधयो या नद्यो ३ यानि क्षेत्राणि या वना.
तास्त्वा वधु प्रजावतीं पत्ये रक्षन्तु रक्षसः.. (७)
हे वधू! ओषधि, नदी, श्वेत और वन तुझे संतान वाली बनाएं तथा दुष्टों से तेरे पति की
रक्षा करें. (७)
एमं पन्थामरुक्षाम सुगं स्वस्तिवाहनम्.
यस्मिन् वीरो न रिष्यत्यन्येषां विन्दते वसु.. (८)
हम उस मार्ग पर चलते हैं, जिस पर वाहन सुखपूर्वक चल सकते हैं. इस मार्ग पर वीरों
की हानि नहीं होती तथा अन्य जनों का धन प्राप्त होता है. (८)
इदं सु मे नरः शृणुत ययाशिषा दम्पती वाममश्नुतः.
ये गन्धर्वा अप्सरसश्च देवीरेषु वानस्पत्येषु ये ऽ धि तस्थुः.
स्योनास्ते अस्यै वध्वै भवन्तु मा हिंसिषुर्वरहतुमुह्यमानम्.. (९)
हे मनुष्यो! मेरी बात सुनो. वनस्पतियों में गंधर्व तथा अप्सराएं हैं. वे इसे सुख देने वाले
हैं. इस दहेज रूप धन को नष्ट न करें. इस आशीर्वादात्मक वाणी से ये दोनों उत्तम पदार्थों का
उपभोग करें. (९)
ये वध्व श्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनाँ अनु.
पुनस्तान् यज्ञिया देवा नयन्तु यत आगताः.. (१०)
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चंद्रमा के समान प्रसन्नता देने वाले दहेज की ओर जो साधन आते हैं, यज्ञीय देवता उन्हें
वहीं पहुंचा दें, जहां से वे आते हैं. (१०)
मा विदन् परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती.
सुगेन दुर्गमतीतामप द्रान्तवरातयः.. (११)
जो दस्यु दंपती के समीप आना चाहते हैं, वे इन्हें प्राप्त न कर सकें. हम इस दुर्गम मार्ग
को सुगमता से पार करें तथा हमारे शत्रु दुर्गति में पड़ें. (११)
सं काशयामि वहतुं ब्रह्मणा गृहैरघोरेण चक्षुषा मित्रियेण.
पर्याणद्धं विश्वरूपं यदस्ति स्योनं पतिभ्यः सविता तत् कृणोतु.. (१२)
मैं मंत्रों और नक्षत्रों के द्वारा दहेज को दीप्त करता हूं. इस में जो विभिन्न प्रकार के
पदार्थ हैं, सविता देव उन पदार्थों को प्राप्त करने वालों को सुख देने वाला बनाएं. (१२)
शिवा नारीयमस्तमागन्निमं धाता लोकमस्यै दिदेश.
तामर्यमा भगो अश्विनोभा प्रजापतिः प्रजया वर्धयन्तु.. (१३)
इस स्त्री के लिए धाता ने घर के रूप में लोक का निर्माण किया है. यह कल्याणी इसे
प्राप्त हो गई है. इस वधू को अश्विनीकुमार, अर्यमा, भग और प्रजापति संतान के द्वारा बढ़ाएं.
(१३)
आत्मन्वत्युर्वरा नारीयमागन् तस्यां नरो वपत बीजमस्याम्.
सा वः प्रजां जनयद् वक्षणाभ्यो बिभ्रती दुग्धमृषभस्य रेतः.. (१४)
हे पुरुष! तू इस उर्वरा नारी में बीजों का वपन कर. वृषभ के समान तेरे वीर्य को और
अपने दूध को धारण करने वाले यह तेरे निमित्त संतान उत्पन्न करे. (१४)
प्रति तिष्ठ विराट्सि विष्णुरिवेह सरस्वति.
सिनीवालि प्र जायतां भगस्य सुमतावसत्.. (१५)
हे सरस्वती! तू विष्णु के समान विराट् है. इसलिए तू प्रतिष्ठित हो. हे सिनीवाली! तू भग
देवता की सुंदर बुद्धि में रहती हुई संतान उत्पन्न कर. (१५)
उद् व ऊर्मिः शम्या हन्त्वापो योक्त्राणि मुञ्चत.
मादुष्कृतौ व्ये नसावघ्न्यावशुनमारताम्.. (१६)
हे जलो! अपने कर्म की तरंगों को शांत करो तथा लगामों को ढीला करो. श्रेष्ठ कर्म
करने वाले तथा न मारने योग्य वाहन अशुभ न करने लगें. (१६)
अघोरचक्षुरपतिघ्नी स्योना शग्मा सुशेवा सुयमा गृहेभ्यः.
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वीरसूर्देवृकामा स त्वयैधिषीमहि सुमनस्यमाना.. (१७)
हे वधू! तू स्निग्ध दृष्टि रखती हुई तथा पति को क्षीण न करने वाली हो. तू वीर पुत्रों को
प्रसन्न करती हुई तथा अपने मन में प्रसन्न होती हुई सब को सुखी करने वाली हो. तू इस घर
को प्राप्त हो तथा हम भी तेरे द्वारा वृद्धि प्राप्त करें. (१७)
अदेवृघ्न्यपतिघ्नीहैधि शिवा पशुभ्यः सुयमा सुवर्चाः.
प्रजावती वीरसूर्देवृकामा स्योनेममग्निं गार्हपत्यं सपर्ये.. (१८)
हे वधू! तू अपने पति और देवर को हानि न पहुंचाने वाली, पशुओं का हित करने वाली,
प्रजावती, शोभन कांति से युक्त तथा सुख देने वाली होती हुई पति और देवर को कष्ट मत
पहुंचाए. तू अग्नि का पूजन कर. (१८)
उत्तिष्ठेतः किमिच्छन्तीदमागा अहं त्वेडे अभिभूः स्वाद् गृहात्.
शून्यैषी निर्ऋते याजगन्धोत्तिष्ठाराते प्र पत मेह संस्थाः.. (१९)
हे निर्ऋति! तू यहां से उठ कर भाग. तू किसी वस्तु की इच्छा से यहां उपस्थित हुई है. मैं
तुझे अपने घर से भगाता हुआ तेरा सत्कार करता हूं. तू शुभ रूपिणी है तथा शून्य बनाने की
इच्छा से यहां आई है, परंतु तू यहां विहार मत कर. (१९)
यदा गार्हपत्यमसपर्यैत् पूर्वमग्निं वधूरियम्.
अधा सरस्वत्यै नारि पितृभ्यश्च नमस्कुरु.. (२०)
गृहस्थ रूप आश्रम में प्रवेश करने से पहले यह वधू अग्नि का पूजन कर रही है. हे स्त्री!
अब तू सरस्वती को तथा पितरों को नमस्कार कर. (२०)
शर्म वर्मैतदा हरास्यै नार्या उपस्तिरे.
सिनीवालि प्र जायतां भगस्य सुमतावसत्.. (२१)
इस स्त्री के लिए मृगचर्म रूप आसन मंगल और रक्षा को प्राप्त कराए. ये भग देवता
प्रसन्न रहें. हे सिनीवाली! यह स्त्री संतानोत्पत्ति करती रहे. (२१)
यं बल्बजं न्यस्यथ चर्म चोपस्तृणीथन.
तदा रोहतु सुप्रजा या कन्या विन्दते पतिम्.. (२२)
यह प्रजावती और पति की कामना करने वाली कन्या तुम्हारे द्वारा रखे गए तृण और
मृगचर्म पर आसीन हो. (२२)
उप स्तृणीहि बल्बजमधि चर्मणि रोहिते.
तत्रोपविश्य सुप्रजा इममग्निं सपर्येतु.. (२३)
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पहले चटाई फैला दो. इस के बाद मृगचर्म के ऊपर उत्तम प्रजा उत्पन्न करने वाली यह
स्त्री अग्नि की उपासना करे. (२३)
आ रोह चर्मोप सीदाग्निमेष देवो हन्ति रक्षांसि सर्वा.
इह प्रजां जनय पतये अस्मै सुज्यैष्ठ्यो भवत् पुत्रस्त एष:.. (२४)
हे स्त्री! तू इस मृगचर्म पर चढ़ कर अग्नि देव के पास बैठ. ये देवता सभी राक्षसों को
मारने में समर्थ हैं. तू इस घर में अपनी प्रथम संतान को उत्पन्न कर. यह तेरा ज्येष्ठ पुत्र
कहलाएगा. (२४)
वि तिष्ठन्तां मातुरस्या उपस्थान्नानारूपाः पशवो जायमानाः.
सुमङ्गल्युप सीदेममग्निं संपत्नी प्रति भूषेह देवान्.. (२५)
इस माता से अनेक पुत्र प्रकट हो कर इस की गोद में बैठें. हे सुंदर कल्याण वाली स्त्री!
तू अग्नि के पास बैठ कर इन सब देवताओं को सुशोभित कर. (२५)
सुमङ्गली प्रतरणी गृहाणां सुशेवा पत्ये श्वशुराय शंभूः.
स्योना श्वश्र्वै प्र गृहान् विशेमान्.. (२६)
तू कल्याणकारी, पति को सुख देने वाली, घर का काम करने वाली ससुर और सास के
लिए सुखकारिणी होती हुई घर में प्रवेश कर. (२६)
स्योना भव श्वशुरेभ्यः स्योना पत्ये गृहेभ्यः.
स्योनास्यै सर्वस्यै विशे स्योना पुष्टायैषां भव.. (२७)
तू पति को सुख देने वाली तथा घर के लिए मंगलमयी हो. तू श्वसुर का कल्याण करने
वाली तथा संतानों को सुख देती हुई उन का पालन पोषण कर. (२७)
सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत.
सौभाग्यमस्मै दत्त्वा दौर्भाग्येर्विपरेतन.. (२८)
यह वधू कल्याणमयी है. सब मिल कर इसे देखो. तुम सब इस के दुर्भाग्य को दूर करते
हुए इसे भाग्य प्रदान करो. (२८)
या दुर्हार्दो युवतयो याश्चेह जरतीरपि.
वर्चो न्व १ स्यै सं दत्ताथास्तं विपरेतन.. (२९)
जो स्त्रियां दूषित हृदय वाली तथा वृद्धाएं हों, वे इसे तेज प्रदान करती हुई यहां से चली
जाएं. (२९)
रुक्मप्रस्तरणं वह्यं विश्वा रूपाणि बिभ्रतम्.
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आरोहत् सूर्या सावित्री बृहते सौभाग्य कम्.. (३०)
सूर्या सुख देने के लिए इस पलंग पर चढ़ी थी जिस पर मन को अच्छा लगने वाला
बिछौना बिछा था. (३०)
आ रोह तल्पं सुमनस्यमानेह प्रजां जनय पत्ये अस्मै.
इन्द्राणीव सुबुधा बुध्यमाना ज्योतिरग्रा उषसः प्रति जागरासि.. (३१)
हे स्त्री! तू प्रसन्न होती हुई इस पलंग पर चढ़ तथा पति हेतु संतान उत्पन्न कर. तू अपने
पति के समान बुद्धि से संपन्न बन तथा नित्य उषाकाल में जागने वाली बन. (३१)
देवा अग्रे न्य पद्यन्त पत्नीः समस्पृशन्त तन्व स्तनूभिः.
सूर्येव नारि विश्वरूपा महित्वा प्रजावती पत्या सं भवेह.. (३२)
प्राचीन काल में देवताओं ने भी पलंग पर चढ़ कर अपने अंगों से अपनी पत्नियों के
अंगों का स्पर्श किया था. हे स्त्री! तू सूर्या के समान ही पति के साथ निवास करती हुई
संतानवती बन. (३२)
उत्तिष्ठेतो विश्वावसो नमसेडामहे त्वा.
जामिमिच्छ पितृषदं न्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि.. (३३)
हे विश्वावसु! यहां से उठो. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं. तू पिता के घर रहने वाली
सुशोभित वधू को प्राप्त करने की इच्छा कर. यह तेरा भाग है. जन्म से उस का ज्ञान प्राप्त
कर. (३३)
अप्सरसः सधमादं मदन्ति हविर्धानमन्तरा सूर्यं च.
तास्ते जनित्रमभि ताः परेहि नमस्ते गन्धर्वर्तुना कृणोमि.. (३४)
हविर्धान और सूर्य के मध्य में अप्सराएं साथसाथ मिल कर आनंदित होने वाले कर्म में
हर्षित होती हैं. वह तेरा जन्म स्थान है. तू उन के समीप जा. गंधर्व तथा ऋतुओं के साथ मैं
तुझे नमन करता हूं. (३४)
नमो गन्धर्वस्य नमसे नमो भामाय चक्षुषे च कृण्मः.
विश्वावसो ब्रह्मणा ते नमोऽभि जाया अप्सरसः परेहि.. (३५)
गंधर्व के नमस्कार को हमारा नमस्कार है. उस की तेजस्वी आंखों के लिए हम नमस्कार
करते हैं. हे सभी प्रकार के धनों के स्वामी! तुझे हम ज्ञानपूर्वक नमन करते हैं. तुम अप्सराओं
के समान हमारी पत्नियों से दूर रहो. (३५)
राया वयं सुमनसः स्यामोदितो गन्धर्वमावीवृताम.
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अगन्त्स देवः परमं सधस्थमगन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः.. (३६)
हम लोग धन के साथ उत्तम मन वाले हैं. हम यहां रहते हुए गंधर्वों को घेरें. वे हमारा
नमस्कार स्वीकार करें. हम उन की कृपा प्राप्त करें. वह देव उस परम श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त
हुआ है, जहां अपनी आयु को दीर्घ बनाते हुए हम भी पहुंचते हैं. (३६)
सं पितरावृत्विये सृजेथां माता पिता च रेतसो भवाथः.
मर्य इव योषामधिरोहयैनां प्रजां कृण्वाथामिह पुष्यतं रयिम्.. (३७)
तुम दोनों ऋतुकाल में मातापिता बनने के लिए संयुक्त होओ. वीर्य के योग से तुम माता
और पिता बनो. हे पति! मानवोचित निर्णय से पलंग पर चढ़ो. इस प्रकार तुम संतान को
जन्म दो तथा अपने धन की वृद्धि करो. (३७)
तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या ३ वपन्ति.
या न ऊरू उशती विश्रयाति यस्यामुशन्तः प्रहरेम शेपः.. (३८)
हे पूषा देव! तुम उस कल्याणमयी स्त्री को प्राप्त करो, जिस में बीज बोया जाता है. जो
इच्छा करती हुई हमें अपना शरीर समर्पित करती है, हम उस के साथ इंद्रिय सुख प्राप्त करें.
(३८)
आ रोहोरुम उप धत्स्व हस्तं परि ष्वजस्व जायां सुमनस्यमानः.
प्रजां कृण्वाथामिह मोदमानौ दीर्घं वामायुः सविता कृणोतु.. (३९)
हे पति! तू अपनी पत्नी को स्पर्श कर. प्रसन्न होते हुए तुम दोनों संतान को उत्पन्न करो.
सविता देव तुम्हारी आयु में वृद्धि करें. (३९)
आ वां प्रजां जनयतु प्रजापतिरहोरत्राभ्यां समनक्त्वर्यमा.
अदुर्मङ्गली पतिलोकमा विशेमं शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (४०)
प्रजापति तुम दोनों की संतान को जन्म दें. अर्यमादेव तुम दोनों को रातदिन संयुक्त करें.
हे वधू! तू अमंगलों से अलग रहती हुई इस घर में प्रवेश कर और दो पैरों वाले मनुष्यों तथा
चार पैरों वाले पशुओं को सुख देने वाली बन. (४०)
देवैर्दत्तं मनुना साकमेतद् वाधुयं वासो वध्वश्च वस्त्रम्.
यो ब्रह्मणे चिकितुषे ददाति स इद् रक्षांसि तल्पानि हन्ति. (४१)
मनु के साथसाथ देवों द्वारा दिया हुआ विवाह के समय का यह वस्त्र वधू का वस्त्र है.
यह निश्चित रूपसे पलंग पर रहने वाले राक्षसों का विनाश करता है. (४१)
यं मे दत्तो ब्रह्मभागं वधूयोर्वाधूयं वासो वध्वश्च वस्त्रम्.
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युवं ब्रह्मणे ऽ नुमन्यमानौ बृहस्पते साकमिन्द्रश्च दत्तम्.. (४२)
हे बृहस्पति देव! तुम इंद्र के साथ मिल कर वधू का विवाह के समय पहना जाने वाला
वस्त्र इस वधू को प्रदान करो. जो ब्राह्मण का भाग है, तुम दोनों वह वस्त्र मुझे प्रदान करते हो.
तुम दोनों ब्राह्मण की अनुमति से यह वस्त्र मुझे देते हो. (४२)
स्योनाद्योनेरधि बुध्यमानौ हसामुदौ महसा मोदमानौ.
सुगू सुपुत्रौ सुगृहौ तराथो जीवावुषसो विभाती:.. (४३)
हम दोनों हंसते हुए प्रसन्नता को तथा सुखपूर्वक ज्ञान को प्राप्त करें. हम सुंदर गति वाले
हों तथा पुत्र आदि से संपन्न रहते हुए उषाओं को पार करें. (४३)
नवं वसानः सुरभिः सुवासा उदागां जीव उषसो विभाती:.
आण्डात् पत्रीवामुक्षि विश्वस्मादेनसस्परि.. (४४)
मैं नवीन वस्त्र धारण करता हूं. सुगंध धारण कर के उत्तम वस्त्र पहनने वाला मैं
जीवधारी मनुष्यों के समान उषा काल में उठता हूं. जिस प्रकार पक्षी अंडे से निकलता है,
उसी प्रकार मैं भी सब पापों से छूट जाऊं. (४४)
शुम्भनी द्यावापृथिवी अन्तिसुम्ने महिव्रते.
आपः सप्त सुस्रुवुर्देवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४५)
सुशोभित पृथ्वी और आकाश के मध्य चेतन और अचेतन दोनों प्रकार के प्राणी निवास
करते हैं. विशाल कर्म वाले आकाश और पृथ्वी तथा ये प्रवाहित होने वाले सात प्रकार के
जल हमें पापों से मुक्त करें. (४५)
सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च.
ये भूतस्य प्रचेतसस्तेभ्य इदमकरं नम:.. (४६)
जो सूर्या को, देवगण को, मित्र और वरुण को तथा सभी प्राणियों को जानने वाले हैं,
उन्हें मैं नमस्कार करता हूं. (४६)
य ऋते चिदभिश्रिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः.
संधाता संधिं मघवा पुरूवसुर्निष्कर्ता विह्रुतं पुनः.. (४७)
जो चिपके बिना तथा छेद किए बिना इन हड्डियों को जोड़ देता है, जो फटे हुए को
पुनः जोड़ता है तथा उत्तम और पर्याप्त धन प्रदान करता है, वही ईश्वर है. (४७)
अपास्मत् तम उच्छतु नीलं पिशङ्गमनुत लोहितं यत्.
निर्दहनी या पृषातक्य १स्मिन् तां स्थाणावध्या सजामि.. (४८)
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जो नीला, पीला तथा लाल रंग का अंधकार है, वह हम से दूर रहे. जो जलाने वाली दोष
की स्थिति इस में है, मैं उसे इस स्तंभ में लगा देता हूं. (४८)
यावतीः कृत्या उपवासने यावन्तो राज्ञो वरुणस्य पाशाः.
व्यृद्धयो या असमृद्धयो या अस्मिन् ता स्थाणावधि सादयामि.. (४९)
उपवस्त्रों में हिंसा करने वाली जो कृत्याएं हैं, राजा वरुण के जितने पाश हैं तथा जो
दरिद्रताएं और बुरी अवस्थाएं हैं, उन सब को मैं इस खंभे में स्थापित करता हूं. (४९)
या मे प्रियतमा तनूः सा मे बिभाय वाससः.
तस्याग्रे त्वं वनस्पते नीविं कृणुष्व मा वयं रिषाम.. (५०)
मेरा प्रिय शरीर मेरे वस्त्र में भयभीत होता है, इसलिए हे वनस्पति! पहले तुम इस की
गांठ बांध दो जिस से हम दुखी न हों. (५०)
ये अन्ता यावतीः सिचो य ओतवो ये च तन्तवः.
वासो यत् पत्नीभिरुतं तन्नः स्योनमुप स्पृशात्.. (५१)
इस वस्त्र में जो झालरें और किनारियां हैं, जो ताने और बाने हैं तथा जो वस्त्र स्त्रियों ने
बुना है, वह हमारे शरीर का सुखपूर्वक स्पर्श करने वाला हो. (५१)
उशतीः कन्यला इमाः पितृलोकात् पतिं यतीः.
अव दीक्षामसृक्षत स्वाहा.. (५२)
पति की इच्छा करने वाली ये कन्याएं पिता के घर से पति के घर जाती हुई दीक्षा का
व्रत धारण करें. यही उत्तम उपदेश है. (५२)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
वर्चो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५३)
बृहस्पति की यह ओषधि विश्वे देवों के द्वारा पुष्ट की गई है. हम इसे गायों के तेज से
मिलाते हैं. (५३)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
तेजो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५४)
बृहस्पति की रची हुई इस ओषधि को विश्वे देवों ने पुष्ट किया है. हम इसे उस तेज से
संयुक्त करते हैं जो गायों में प्रवेश कर गया है. (५४)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
भगो गोषु प्रविष्टो यस्तेनेमां सं सृजामसि.. (५५)
बृहस्पति द्वारा विरचित इस ओषधि को विश्वे देवों ने धारण किया था. जो भग गायों में
प्रवेश कर चुका है, हम इस ओषधि को उस भग से संपन्न करते हैं. (५५)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
यशो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५६)
बृहस्पति देव द्वारा इस ओषधि का सृजन हुआ है. गायों में जो यज्ञ प्रवेश कर गया है, मैं
उस यज्ञ से इसे संयुक्त करता हूं. (५६)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
पयो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५७)
बृहस्पति द्वारा यह ओषधि विश्वे देवों के हेतु पुष्ट हुई है. गायों में जो दूध स्थित है, हम
इस ओषधि को उस से संयुक्त करते हैं. (५७)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
रसो गोषु प्रविष्टो यस्तेनेमां सं सृजामसि.. (५८)
बृहस्पति के द्वारा निर्मित इस ओषधि को सभी देवों ने पुष्ट किया है. गायों में जो रस
प्रविष्ट है, हम उस रस से इस ओषधि को संयुक्त करते हैं. (५८)
यदीमे केशिनो जना गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृण्वन्तो ३ घम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (५९)
लंबे केशों वाले ये लोग तेरे घर में नाचते रहे हैं तथा रोके से पाप करते रहे हैं, अग्नि देव
तुझे उस पाप से मुक्त कराएं. (५९)
यदीयं दुहिता तव विकेश्यरुदद् गृहे रोदेन कृण्वत्य् १ घम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६०)
तेरी पुत्री अपने केशों को फैला कर रोती रही है, तेरे घर में हुए इस पाप से सविता और
अग्नि तुझे छुड़ाएं. (६०)
यज्जामयो यद्युवतयो गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृणवतीरघम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६१)
तेरी बहन तथा अन्य स्त्रियां दुःखी हुईं और रोती हुई तेरे घर में घूमती रही हैं. सविता
और अग्नि तुझे उस पाप से मुक्त करें. (६१)
यत् ते प्रजायां पशुषु यद्वा गृहेषु निष्ठितमघकृद्भिर्घं कृतम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६२)
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संतान और पशुओं को दुःखी करने वालों ने तेरे घर में जिस दुःख का विस्तार किया है.
उस पाप से सविता और अग्नि तुझे छुड़ाएं. (६२)
इयं नार्युप ब्रूते पूल्यान्यावपन्तिका.
दीर्घायुरस्तु मे पतिर्जीवाति शरदः शतम्.. (६३)
अग्नि में खीलों की आहुति देती हुई यह वधू कामना करती है कि मेरा पति दीर्घ आयु
वाला हो और सौ वर्ष तक जीवित रहे. (६३)
इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती.
प्रजयैनौ स्वस्तकौ विश्वमायुर्व्य श्रुताम्.. (६४)
हे इंद्र! इन पति और पत्नी को ऐसा प्रेम दो, जैसे चकवी और चकवे में होता है. इन्हें
सुंदर घर और संतानों से युक्त रखो. ये दोनों जीवनभर भांतिभांति के सुख भोगते रहें. (६४)
यदासन्द्यामुपधाने यद् वोपवासने कृतम्.
विवाहे कृत्यां यां चक्रूरास्नाने तां नि दध्मसि.. (६५)
हम ने असंदी अर्थात् कुरसी पर, बिस्तर पर, सिरहाने तथा उपवस्त्र पर जो पाप किया
और अपने विवाह में जो हिंसक प्रयोग किया, उसे हम स्नान के द्वारा धो डालते हैं. (६५)
यद् दुष्कृतं यच्छमलं विवाहे वहतौ च यत्.
तत् संभलस्य कम्बले मृज्महे दुरितं वयम्.. (६६)
हम ने विवाह में तथा बरात के रथ में जो दुष्ट और मलिन कर्म किया, उसे हम मधुर
भाषी पुरुष के कंबलों से युक्त करते हैं. (६६)
संभले मलं सादयित्वा कम्बले दुरितं वयम्.
अभूम यज्ञियाः शुद्धाः प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६७)
संभल अर्थात् दूत में मन को तथा कंबल में पाप को स्थित कर के हम यज्ञ करने योग्य
शुद्ध हो जाएं. वह शुद्धि हमारी आयु को शुद्ध बनाए. (६७)
कृत्रिमः कण्टकः शतदन् य एषः.
अपास्याः केश्यं मलमप शीर्षण्यां लिखात्.. (६८)
यह सैकड़ों दांतों वाला कंघा कृत्रिम रूप से बनाया गया है. यह हमारे शीश पर पहुंच
कर हमारे शीश के मैल को छुड़ाए. (६८)
अङ्गादङ्गाद् वयमस्या अप यक्ष्मं नि दध्मसि.
तन्मा प्रापत् पृथिवीं मोत देवान् दिवं मा प्रापदुर्व १ न्तरिक्षम्.
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अपो मा प्रापन्मलमेतदग्ने यमं मा प्रापत् पितॄंश्च सर्वान्.. (६९)
मैं इस कंघे से अपने शरीर के संहारक दोषों को दूर करता हूं. यह दोष मुझे न लगे,
पृथ्वी को, आकाश को, अंतरिक्ष को, देवों को तथा जल को भी वह दोष न लगे. हे अग्नि!
यह दोष पितरों तथा उन के अधिष्ठाता देव यमराज को भी न लगे. (६९)
सं त्वा नह्यामि पयसा पृथिव्याः सं त्व नह्यामि पयसौषधीनाम्.
सं त्वा नह्यामि प्रजसा धनेन सा संनद्धा सनुहि वाजमेमम्.. (७०)
हे पत्नी! मैं पृथ्वी के जल के समान सारतत्त्व से तथा ओषधियों के सारतत्त्व से तुझे
बांधता हूं. तू प्रजा और धन से संपन्न होती हुई मुझे धन देने वाली हो. (७०)
अमो ऽ हमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यृक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्.
ताविह सं भवाव प्रजामा जनयावहै.. (७१)
हे पत्नी! मैं साम हूं और तू ऋचा है. मैं आकाश हूं और तू पृथ्वी है. मैं विष्णु रूप हूं और
तू मेरी लक्ष्मी है. हम इस लोक में साथसाथ निवास करते हुए संतान को उत्पन्न करें. (७१)
जनियन्ति नावग्रवः पुत्रियन्ति सुदानवः.
अरिष्टासू सचेवहि बृहते वाजसातये.. (७२)
हे पत्नी! अविवाहित लोग हम लोगों के समान विवाह करने की इच्छा करते हैं. दाता
लोग पुत्र की कामना करते हैं. जब तक हमारे शरीरों में प्राण रहें, तब तक हम दोनों एकत्र हों
तथा बल प्राप्ति के लिए मिल कर रहें. (७२)
ये पितरो वधूददर्शा इमं वहतुमागजन्.
ते अस्यै वध्वै संपत्न्यै प्रजावच्छर्म यच्छन्तु.. (७३)
नव वधू को देखने की इच्छा वाले बहुत से लोग इस बरात को देखेंगे. वे इस वधू के
लिए उत्तम सुख प्रदान करें. (७३)
येदं पूर्वागन् रशनायमाना प्रजामस्यै द्रविणं चेह दत्त्वा.
तां वहन्त्वगतस्यानु पन्थां विराडियं सुप्रजा अत्यजैषीत्.. (७४)
रस्सी के समान बांधने वाली जो नारी पहले इस स्थान को प्राप्त हुई थी, हम संतान और
धन के द्वारा उस वधू को उस मार्ग से ले जाएं, जिस पर अब तक कोई नहीं चला है. (७४)
प्र बुध्यस्व सुबुधा बुध्यमाना दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु.. (७५)
हे उत्तम बुद्धि वाली! जगाई जाने पर तू सौ वर्ष की दीर्घायु प्राप्त करने के लिए जाग. तू
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