अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 732 of 1063
Read in contextअपो मा प्रापन्मलमेतदग्ने यमं मा प्रापत् पितॄंश्च सर्वान्.. (६९)
मैं इस कंघे से अपने शरीर के संहारक दोषों को दूर करता हूं. यह दोष मुझे न लगे,
पृथ्वी को, आकाश को, अंतरिक्ष को, देवों को तथा जल को भी वह दोष न लगे. हे अग्नि!
यह दोष पितरों तथा उन के अधिष्ठाता देव यमराज को भी न लगे. (६९)
सं त्वा नह्यामि पयसा पृथिव्याः सं त्व नह्यामि पयसौषधीनाम्.
सं त्वा नह्यामि प्रजसा धनेन सा संनद्धा सनुहि वाजमेमम्.. (७०)
हे पत्नी! मैं पृथ्वी के जल के समान सारतत्त्व से तथा ओषधियों के सारतत्त्व से तुझे
बांधता हूं. तू प्रजा और धन से संपन्न होती हुई मुझे धन देने वाली हो. (७०)
अमो ऽ हमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यृक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्.
ताविह सं भवाव प्रजामा जनयावहै.. (७१)
हे पत्नी! मैं साम हूं और तू ऋचा है. मैं आकाश हूं और तू पृथ्वी है. मैं विष्णु रूप हूं और
तू मेरी लक्ष्मी है. हम इस लोक में साथसाथ निवास करते हुए संतान को उत्पन्न करें. (७१)
जनियन्ति नावग्रवः पुत्रियन्ति सुदानवः.
अरिष्टासू सचेवहि बृहते वाजसातये.. (७२)
हे पत्नी! अविवाहित लोग हम लोगों के समान विवाह करने की इच्छा करते हैं. दाता
लोग पुत्र की कामना करते हैं. जब तक हमारे शरीरों में प्राण रहें, तब तक हम दोनों एकत्र हों
तथा बल प्राप्ति के लिए मिल कर रहें. (७२)
ये पितरो वधूददर्शा इमं वहतुमागजन्.
ते अस्यै वध्वै संपत्न्यै प्रजावच्छर्म यच्छन्तु.. (७३)
नव वधू को देखने की इच्छा वाले बहुत से लोग इस बरात को देखेंगे. वे इस वधू के
लिए उत्तम सुख प्रदान करें. (७३)
येदं पूर्वागन् रशनायमाना प्रजामस्यै द्रविणं चेह दत्त्वा.
तां वहन्त्वगतस्यानु पन्थां विराडियं सुप्रजा अत्यजैषीत्.. (७४)
रस्सी के समान बांधने वाली जो नारी पहले इस स्थान को प्राप्त हुई थी, हम संतान और
धन के द्वारा उस वधू को उस मार्ग से ले जाएं, जिस पर अब तक कोई नहीं चला है. (७४)
प्र बुध्यस्व सुबुधा बुध्यमाना दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु.. (७५)
हे उत्तम बुद्धि वाली! जगाई जाने पर तू सौ वर्ष की दीर्घायु प्राप्त करने के लिए जाग. तू
ebook converter DEMO Watermarks*